मध्य प्रदेश में मुख्य सचिव अनुराग जैन द्वारा कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को दी गई सख्त चेतावनी ने राज्य की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कानून-व्यवस्था, अवैध खनन, प्रदूषण, पेयजल संकट और योजनाओं के कमजोर क्रियान्वयन को लेकर सरकार अब जवाबदेही तय करने के संकेत दे रही है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह चेतावनी केवल औपचारिकता साबित होती है या प्रशासनिक सुधारों की नई शुरुआत बनती है।
पवन वर्मा-विनायक फीचर्स
मध्य प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था इन दिनों एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन द्वारा हाल ही में कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों के साथ की गई समीक्षा बैठकों में जिस तरह का सख्त लहजा अपनाया गया है,
वह प्रदेश में प्रशासनिक सुस्ती और बढ़ती अफसरशाही पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। जिस तरह से कानून-व्यवस्था, अवैध खनन, पेयजल और विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर कलेक्टरों को कड़ी चेतावनी दी गई है, वह स्थिति यह संकेत देती है कि जमीनी स्तर पर प्रशासनिक नियंत्रण अपनी पकड़ खो रहा है।
प्रशासनिक पदानुक्रम में जब राज्य का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी स्वयं जिलों के मुखियाओं को यह याद दिलाए कि ‘गुजरे जमाने के तौर-तरीके अब नहीं चलेंगे’, तो यह सीधे तौर पर जिला प्रशासन की विफलता को ही दिखाता है।
अवैध खनन पर प्रशासन का खौफ न होने पर यह तीखी टिप्पणी की गई है। जब प्रशासनिक अधिकारियों के क्षेत्र में आम नागरिक जनसुनवाई में जहर खाने या आत्मदाह करने जैसी चरम सीमाओं तक पहुँचने पर मजबूर हो जाते हैं, तो यह व्यवस्था में व्याप्त संवेदनहीनता को ही दर्शाता है। मुख्य सचिव के हालिया तेवर देख ऐसा माना जा सकता है कि राज्य सरकार अब और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
मैहर और सिंगरौली जैसे जिलों में बढ़ते प्रदूषण के मामलों पर नाराजगी जताना यह बताने के लिए पर्याप्त है कि स्थानीय स्तर पर नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। यह केवल एक विभाग की समस्या नहीं है, बल्कि एक व्यापक प्रशासनिक गिरावट का संकेत है, जहाँ कलेक्टर और एसपी स्तर के अधिकारी अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं के प्रति गंभीर नहीं हैं।
अक्सर यह देखा गया है कि उच्च स्तर पर समीक्षा बैठकें होती हैं, फटकारें लगाई जाती हैं, नाराजगी जताई जाती है, लेकिन धरातल पर परिणाम शून्य ही रहते हैं। मुख्य सचिव ने स्पष्ट किया है कि वे अब ऐसी स्थिति को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कलेक्टर-कमिश्नर अब अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी जिम्मेदारी के साथ करें।
सवाल यह उठता है कि क्या केवल मौखिक निर्देश और फटकार ही इस बेकाबू अफसरशाही को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त हैं? राज्य की प्रशासनिक संरचना में जवाबदेही का अर्थ यह होना चाहिए कि यदि निर्धारित समयसीमा के भीतर लक्ष्य पूरे नहीं होते, तो संबंधित अधिकारी पर कठोर प्रशासनिक कार्रवाई की जाए। कई लंबित कार्यों और विभागीय कोताही पर नाराजगी जताई गई है, लेकिन इस नाराजगी पर अभी भी ठोस प्रशासनिक एक्शन की प्रतीक्षा है। जब तक प्रशासनिक तंत्र को यह डर नहीं होगा कि गलत काम या निष्क्रियता का परिणाम दंड के रूप में मिलेगा, तब तक वे पूरी तरह सतर्क नहीं होंगे।
सुशासन का अर्थ केवल फाइलों को गति देना नहीं है, बल्कि उस आखिरी व्यक्ति तक राहत पहुँचाना है, जिसके लिए सरकार बनी है। मुख्य सचिव अनुराग जैन ने जिस तरह से जबलपुर और नरसिंहपुर में पराली जलाने और कृषि से जुड़ी समस्याओं पर कलेक्टरों को घेरा, वह दर्शाता है कि राज्य के नीतिगत फैसले जिला स्तर पर लागू नहीं हो रहे हैं। पेयजल की समस्या पर भी स्थिति चिंताजनक है। राज्य में अनेक सरकारी हैंडपंपों पर निजी कब्जे हैं और स्थानीय प्रशासन मूकदर्शक बना रहे?
यह एक गंभीर प्रशासनिक चूक है जो सीधे तौर पर सुशासन के दावों पर सवाल उठाती है। मुख्य सचिव ने कहा है कि अब ऐसी शिकायतों पर कड़ी कार्रवाई हो। आशा की जानी चाहिए कि मुख्य सचिव के इस निर्देश के बाद अब किसी भी स्तर पर होने वाली कोताही को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। प्रशासन का मूल काम आम आदमी की समस्याओं का समाधान करना है, लेकिन यदि अधिकारी अपनी कार्यशैली नहीं बदलते, तो सरकार की पूरी मशीनरी पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है।
मुख्य सचिव की इस चेतावनी का एक व्यापक असर यह हो सकता है कि प्रशासनिक अधिकारी अपने दायित्वों और जनहितैषी कार्यो के लिए सजग हो। अवैध परिवहन करने वाले वाहनों की नीलामी और प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों का निरीक्षण करना, एक सामान्य प्रशासनिक कार्य है। यदि मुख्य सचिव को इन कार्यों के लिए बार-बार निर्देश देने पड़ रहे हैं, तो यह उस प्रशासनिक तंत्र की कमजोरी है, जिसे स्वतः ही इन कार्यों को पूरा करना चाहिए था।
अनुशासनहीनता की जड़ें जब गहरी हो जाती हैं, तो उन्हें उखाड़ने के लिए केवल फटकार पर्याप्त नहीं होती। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह किस तरह से अधिकारियों के बीच काम करने की संस्कृति को दोबारा विकसित करे।
प्रदेश में जो कलेक्टर या एसपी अपने कार्यक्षेत्र में प्रभावशाली ढंग से कार्य नहीं कर पा रहे हैं, उनके विरुद्ध कठोर प्रशासनिक निर्णयों की आवश्यकता अब बढ़ती जा रही है। मुख्य सचिव की यह भूमिका एक चेतावनी के रूप में देखी जा सकती है, जिसके बाद यदि स्थिति नहीं सुधरती, तो प्रशासनिक फेरबदल और सख्त अनुशासनिक कदम अपरिहार्य हो जाएंगे।
मध्य प्रदेश की प्रशासनिक अफसरशाही अब उस स्थान पर खड़ी है, जहां एक तरफ सरकार की अपेक्षाएं हैं जो सुशासन और जनहित के कार्यों में तेजी चाहती हैं, और दूसरी तरफ वह सुस्त कार्यप्रणाली है जो अपनी ढर्रे पर चल रही है। मुख्य सचिव अनुराग जैन का रुख बिल्कुल स्पष्ट दिख रहा है कि अब प्रदर्शन आधारित कार्य ही एकमात्र विकल्प है।
अधिकारियों को बहुत ज्यादा तंग करना या उनके मनोबल को तोड़ना सरकार का उद्देश्य नहीं हो सकता, लेकिन प्रदेश की जनता के हितों से समझौता करना भी संभव नहीं है। अतः मुख्य सचिव द्वारा दी गई यह फटकार यदि भविष्य में ठोस कार्रवाई में बदलती है, तो यह मध्य प्रदेश की तस्वीर बदलने में मील का पत्थर साबित हो सकती है।
अब देखना यह है कि क्या ये बैठकें और फटकारें केवल प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह जाएंगी, या वाकई में एक नए और जवाबदेह मध्य प्रदेश की शुरुआत साबित होंगी। जनता को केवल शब्दों और निर्देशों की नहीं, बल्कि जमीनी सुधारों और प्रशासनिक जवाबदेही की प्रतीक्षा है। मुख्य सचिव की यह चेतावनी निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण संकेत है, लेकिन अंततः परिणाम ही इस बात को सिद्ध करेंगे कि प्रशासनिक तंत्र पर सरकार का नियंत्रण कितना मजबूत है।
प्रशासनिक अधिकारियों को यह समझना होगा कि उनकी नियुक्ति केवल पद के मान-सम्मान के लिए नहीं, बल्कि आम जनता की सेवा के लिए है। मुख्य सचिव ने जिस तेवर में अपनी नाराजगी व्यक्त की है, वह उन सभी अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है जो अभी तक अपनी जिम्मेदारियों के प्रति बेपरवाह बने हुए थे। *(विनायक फीचर्स)*


