इमरजेंसी और माफी का खेल: सत्ता के गलियारों में छिपे इतिहास का सच

लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।
मुखौटों के पीछे अपनी असलियत छिपाना और दूसरों की महानता के साये में अपना अस्तित्व तलाशना संघ और उसके अनुषंगी संगठनों का स्थाई चरित्र रहा है। सौ वर्षों की लंबी यात्रा में शून्य उपलब्धियों के बोझ तले दबे इस संगठन के पास अपनी विरासत में दिखाने के लिए सिवाय झूठ और भ्रामक प्रचार के कुछ भी नहीं है। इसी घबराहट में ये इतने असुरक्षित हो जाते हैं कि इतिहास की सच्चाई को झुठलाने के लिए बड़े से बड़े झूठ का सहारा लेने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते। गोयबल्स के ये हिंदुस्तानी चेले आज अपने गुरु से भी कई कदम आगे निकल चुके हैं।
हाल ही में बंकिमचंद्र चटर्जी के प्रति दिखाया गया सम्मान इसका ज्वलंत उदाहरण है। जिस महापुरुष की एक भी रचना कभी इनके एजेंडे का हिस्सा नहीं रही, उन्हें अचानक अपना बताने की कोशिश दरअसल इतिहास के पुनर्लेखन की एक भोंडी कोशिश है। बंकिम बाबू वे थे जिन्होंने ब्रिटिश उपनिवेशवाद को चुनौती दी और समाजवाद से प्रभावित होकर भारत में ‘साम्य’ की बात उठाई थी, जबकि संघ का इतिहास औपनिवेशिक शक्तियों के साथ तालमेल बिठाने का रहा है। ठीक ऐसा ही झूठ श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लेकर फैलाया जाता है। वास्तविकता यह है कि मुखर्जी न केवल भारत विभाजन के सावरकरी एजेंडे के समर्थक थे, बल्कि मुस्लिम लीग की सरकार में मंत्री रहते हुए वे स्वतंत्रता संग्राम को कुचलने के लिए अंग्रेजों को पत्र लिखा करते थे। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जब आपके साथ हो, तो सच को झुठलाना बहुत आसान हो जाता है।
बात अगर 1975-77 की इमरजेंसी की करें, तो भाजपा और संघ के दावों की कलई खुल जाती है। आज जो लोग आपातकाल के खिलाफ लड़ने का ढोंग रचते हैं, वे भूल जाते हैं कि उस दौर में उनकी भूमिका क्या थी। जब देश की जेलें लोकतंत्र बचाने वालों से भरी थीं, तब ये माफीनामे लिखकर रिहाई की भीख मांग रहे थे। इनके तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहब देवरस ने इंदिरा गांधी को न केवल पत्र लिखे, बल्कि उनकी प्रशंसा में कसीदे भी पढ़े थे। देवरस ने जेल से लिखे पत्रों में न केवल आपातकाल को उचित ठहराया, बल्कि जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से संघ का पल्ला झाड़ने तक की कोशिश की।
इतना ही नहीं, प्रतिबंध हटाने के लिए उन्होंने विनोबा भावे के माध्यम से याचना की। संजय गांधी के विवादित 5-सूत्री कार्यक्रम और जबरन नसबंदी जैसी दमनकारी नीतियों तक को ये ‘राष्ट्रहित’ का कार्य बताकर रिहाई की गुहार लगाते रहे। ये दस्तावेज आज भी सार्वजनिक रिकॉर्ड में दर्ज हैं, जो इनके तथाकथित ‘लोकतंत्र प्रेम’ का पर्दाफाश करते हैं। ये वही ‘सावरकर-शैली’ है, जिसमें साहस का नहीं, बल्कि समर्पण का इतिहास लिखा गया है। गांधी हत्याकांड के बाद गोलवलकर जी का सरदार पटेल को लिखा पत्र हो या सावरकर द्वारा अंग्रेजों और नेहरू को लिखी गई चिट्ठियाँ—इनका इतिहास हमेशा से ही समझौते और आत्मसमर्पण का रहा है।
तानाशाह की मानसिकता रखने वाले ये लोग खुद को भले ही आज सत्ता के शिखर पर देखें, लेकिन इनका पूरा शौर्य दिखावटी और सत्ता के संरक्षण का मोहताज है। इमरजेंसी के दौरान तुर्कमान गेट कांड और प्रेस सेंसरशिप का समर्थन करने वाले आज भाजपा के माननीय चेहरे बने हुए हैं। 1975 की इमरजेंसी ने यदि लोकतंत्र को जख्मी किया था, तो आज का ‘अघोषित आपातकाल’ उसे जड़ से मिटाने पर आमादा है। आज का आर्थिक संकट और उससे निपटने के नाम पर अपनाई गई नीतियां देश को गर्त में धकेल रही हैं। मीडिया पर नियंत्रण, शिक्षा का भगवाकरण और संविधान के बुनियादी ढांचे पर प्रहार, इंदिरा गांधी के आपातकाल की तुलना में कहीं अधिक भयावह है।
26 जून 1975 की घटना ने निश्चित रूप से भारतीय लोकतंत्र में एक गहरा घाव किया था, लेकिन आज की स्थिति उससे कहीं अधिक चिंताजनक है। जो इतिहास से सबक नहीं लेते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं। आज जरूरत इन पाखंडियों के चेहरे से मुखौटा उतारने की है ताकि देश के भविष्य और संविधान को सुरक्षित रखा जा सके। याद रहे, इतिहास का चक्का घूमता है और झूठ के बुनियाद पर बनी इमारतें अंततः ढह जाती हैं।
(लेखक लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-10671)

