असम: 15 दस्तावेज़ों के बावजूद हाईकोर्ट ने व्यक्ति को ‘विदेशी’ घोषित करने का फैसला बरकरार रखा
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असम: 15 दस्तावेज़ों के बाद भी हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को माना ‘विदेशी’
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नागरिकता का प्रमाण: 15 दस्तावेज़ पेश करने के बावजूद नहीं मिली राहत, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
नई दिल्ली | 3 जुलाई, 2026|अटल हिन्द ब्यूरो
गौहाटी हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में असम के एक 38 वर्षीय निवासी को ‘विदेशी’ घोषित करने के विदेशी न्यायाधिकरण (फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल) के आदेश को सही ठहराया है। याचिकाकर्ता अमीनुल हक ने अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए स्कूल प्रमाणपत्र, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र सहित 15 दस्तावेज़ पेश किए थे, लेकिन अदालत ने इन्हें अपर्याप्त माना।
मामले का विवरण
याचिकाकर्ता अमीनुल हक, जो कामरूप (मेट्रोपॉलिटन) ज़िले के निवासी और एक दिहाड़ी मजदूर हैं, को 28 फरवरी, 2019 को एक विदेशी न्यायाधिकरण ने ‘विदेशी’ घोषित किया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए हक ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
न्यायालय का मुख्य तर्क
जस्टिस कल्याण राय सुराना और शमीमा जहां की पीठ ने सुनवाई के दौरान निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले:
दस्तावेज़ी विसंगतियां: अदालत ने कहा कि पेश किए गए दस्तावेज़ों में नाम और वर्तनी (स्पेलिंग) की गंभीर विसंगतियां थीं। मात्र मौखिक गवाही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि याचिकाकर्ता वही व्यक्ति है, जिसका नाम 1990 के दशक की मतदाता सूचियों या पुराने सरकारी अभिलेखों में दर्ज है।
एनआरसी की वैधता: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1951 के एनआरसी का जो अंश याचिकाकर्ता ने पेश किया, वह बिना किसी विधिवत प्रमाणन के केवल कंप्यूटर प्रिंटआउट था। ‘एविडेंस एक्ट, 1872’ की धारा 65B के तहत इसके लिए प्रमाण पत्र अनिवार्य है।
‘फॉरेनर्स एक्ट’ की धारा 9: अदालत ने कहा कि ‘फॉरेनर्स एक्ट, 1946’ की धारा 9 के तहत यह साबित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से व्यक्ति पर है कि वह भारतीय नागरिक है, जिसे याचिकाकर्ता पूरा करने में विफल रहा।
याचिकाकर्ता का दावा
अमीनुल हक का तर्क था कि नदी के कटाव के कारण उनके परिवार को स्थान बदलना पड़ा था। उन्होंने 1973 की भूमि रजिस्ट्री, अपने माता-पिता और दादा-दादी के नामों वाले एनआरसी दस्तावेज़ और अन्य पहचान पत्र पेश किए थे। उनका दावा था कि नामों की स्पेलिंग में अंतर महज एक लिपिकीय त्रुटि है।
विदेशी न्यायाधिकरण: ये अर्ध-न्यायिक निकाय हैं, जो असम समझौते के तहत 24 मार्च 1971 की कट-ऑफ तारीख के आधार पर नागरिकता की स्थिति निर्धारित करते हैं।
नई नीति: गौरतलब है कि 2025 में असम सरकार ने ‘इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) अधिनियम, 1950’ के तहत कुछ मामलों में विदेशी न्यायाधिकरण की लंबी प्रक्रिया को दरकिनार कर संदिग्ध प्रवासियों को सीधे वापस भेजने (पुश बैक) की कार्रवाई भी शुरू की है।
कानूनी स्थिति: इस मामले ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि असम में नागरिकता सिद्ध करने के लिए केवल पहचान पत्र पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि वंशावली के लिंक और आधिकारिक रिकॉर्ड में नाम की निरंतरता का कानूनी रूप से प्रमाणित होना अनिवार्य है।

