रामपुर में ढहता आजम साम्राज्य, क्या 2027 में बचेगी सियासी विरासत?
अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ ( उ. प्र.)
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसे नेताओं की सूची बहुत लंबी नहीं है, जिनके नाम के साथ किसी जिले की पहचान जुड़ गई हो। रामपुर का नाम लेते ही दशकों तक जिस चेहरे की तस्वीर सबसे पहले उभरती थी, वह आजम खान थे। 1980 के दशक से लेकर 2022 तक रामपुर की राजनीति का कोई भी बड़ा फैसला उनके प्रभाव से अछूता नहीं माना जाता था।
नौ बार विधायक, एक बार सांसद और उत्तर प्रदेश सरकार में कई बार कैबिनेट मंत्री रहे आजम खान का राजनीतिक कद इतना बड़ा था कि विरोधी भी उनकी संगठन क्षमता और जनाधार को स्वीकार करते थे। लेकिन 2026 आते-आते हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। आजम खान जेल में हैं, उनके खिलाफ दर्जनों नहीं बल्कि 90 से अधिक मुकदमे अदालतों में लंबित हैं, उनका परिवार कानूनी लड़ाइयों में उलझा है और उनका सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी अब प्रशासनिक कार्रवाई के सबसे बड़े निशाने पर है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले रामपुर में आजम खान का राजनीतिक अध्याय सचमुच अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है? आजम खान का राजनीतिक सफर किसी सामान्य नेता की तरह नहीं रहा। वर्ष 1980 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे आजम खान ने अगले चार दशकों में रामपुर को समाजवादी राजनीति का सबसे मजबूत गढ़ बना दिया।
मुलायम सिंह यादव के सबसे भरोसेमंद नेताओं में उनकी गिनती होती थी। 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद उन्हें नगर विकास, संसदीय कार्य, अल्पसंख्यक कल्याण, मुस्लिम वक्फ और हज जैसे कई अहम विभागों की जिम्मेदारी मिली। उस दौर में उनकी राजनीतिक ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जाता था कि प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर पार्टी संगठन तक उनके प्रभाव को नजरअंदाज करना आसान नहीं था।
2014 में उनके फार्महाउस से सात भैंसों की चोरी का मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था। पुलिस की कई टीमें, क्राइम ब्रांच और खोजी कुत्तों को लगाया गया। कुछ ही घंटों में भैंसें बरामद हो गईं।
यह घटना विपक्ष के लिए सत्ता के दुरुपयोग का प्रतीक बनी, जबकि समर्थकों ने इसे प्रशासन की तत्परता बताया। लेकिन वही आजम खान कुछ वर्षों बाद खुद कानून की सबसे बड़ी कार्रवाई का सामना करेंगे, शायद उस समय किसी ने नहीं सोचा था। 2017 में उत्तर प्रदेश में सत्ता बदलने के बाद आजम खान की राजनीतिक मुश्किलें तेजी से बढ़ीं।
योगी आदित्यनाथ सरकार बनने के बाद उनके खिलाफ एक के बाद एक मुकदमे दर्ज होने लगे। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार उनके और परिवार के खिलाफ करीब 90 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हुए। इनमें सरकारी जमीन पर कब्जा, किसानों की भूमि अधिग्रहण, शत्रु संपत्ति, वक्फ संपत्ति, भड़काऊ भाषण, फर्जी दस्तावेज, सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और बेटे अब्दुल्ला आजम के दो जन्म प्रमाण पत्र और पासपोर्ट से जुड़े मामले शामिल हैं।
कई मामलों में अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया, जिसके बाद उनकी विधानसभा सदस्यता चली गई और चुनाव लड़ने की पात्रता पर भी असर पड़ा। आज भी अनेक मुकदमे विभिन्न अदालतों में विचाराधीन हैं। इन सभी विवादों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर हो रही है। लगभग 250 एकड़ क्षेत्र में फैले इस विश्वविद्यालय को आजम खान अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक और सामाजिक विरासत बताते रहे हैं।
विश्वविद्यालय में मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, शिक्षा संकाय, पुस्तकालय और कई शैक्षणिक भवन बनाए गए। समर्थकों का दावा रहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक छात्रों के लिए यह संस्थान शिक्षा का बड़ा केंद्र बना, जबकि विरोधियों का आरोप था कि इसके निर्माण के दौरान किसानों और भूमिधारकों की जमीनों का अधिग्रहण नियमों के अनुरूप नहीं हुआ।
बीते कुछ वर्षों में यही विश्वविद्यालय कानूनी विवादों का केंद्र बन गया। पहले भूमि अधिग्रहण और शत्रु संपत्ति के मामलों की जांच हुई। इसके बाद राजस्व विभाग ने कई हिस्सों की पैमाइश कराई।
अब रामपुर विकास प्राधिकरण ने विश्वविद्यालय परिसर के 40 भवनों में से 38 भवनों को बिना स्वीकृत मानचित्र के निर्मित बताते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया है। प्रशासन का दावा है कि केवल दो भवनों के नक्शे विधिवत स्वीकृत मिले हैं, जबकि बाकी निर्माण विकास प्राधिकरण के नियमों के अनुरूप नहीं हैं।
यही नहीं, समाजवादी सरकार के दौरान लगभग 17 करोड़ रुपये की लागत से बनी करीब 3.5 किलोमीटर लंबी चार लेन सड़क, जिसे बाद में विश्वविद्यालय परिसर का हिस्सा बना दिया गया था, उसे भी प्रशासन ने दोबारा आम जनता के लिए खोल दिया।
इन कार्रवाइयों ने यह संकेत दे दिया कि सरकार अब जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े मामलों में पीछे हटने के मूड में नहीं है। यहीं से राजनीतिक बहस भी तेज हो गई। समाजवादी पार्टी का आरोप है कि भाजपा सरकार कानून के नाम पर राजनीतिक प्रतिशोध ले रही है। पार्टी का कहना है कि शिक्षा संस्थान को निशाना बनाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छा संदेश नहीं है।
दूसरी तरफ भाजपा का तर्क है कि कानून सबके लिए समान है और यदि किसी ने नियमों का उल्लंघन किया है तो कार्रवाई होना स्वाभाविक है। सरकार यह भी कह रही है कि किसानों की जमीन और सरकारी संपत्ति पर अवैध कब्जे की शिकायतें वर्षों से थीं और अब उन्हीं मामलों में कार्रवाई हो रही है।
रामपुर की राजनीति को समझने के लिए वहां का सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण है। जिले में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत के आसपास मानी जाती है।
इसके अलावा दलित, पिछड़ा और सवर्ण मतदाता भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। लंबे समय तक मुस्लिम-यादव समीकरण ने समाजवादी पार्टी को मजबूत बनाए रखा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर बदलती दिखाई दी। 2022 के विधानसभा चुनाव में आजम खान जेल में रहते हुए भी जीत गए, लेकिन उसके बाद उनकी सदस्यता समाप्त हुई और उपचुनाव में भाजपा ने सीट अपने नाम कर ली।
इससे यह संदेश गया कि केवल सहानुभूति की राजनीति अब पहले जितनी प्रभावी नहीं रही। लोकसभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन रामपुर में संगठनात्मक कमजोरी साफ दिखाई दी। आजम खान के पुराने सहयोगियों का एक बड़ा वर्ग सक्रिय राजनीति से दूर हो चुका है। कई स्थानीय नेता या तो निष्क्रिय हैं या दूसरे राजनीतिक विकल्प तलाश रहे हैं। यही कारण है कि 2027 के चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती नया स्थानीय नेतृत्व तैयार करने की होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आजम खान की व्यक्तिगत लोकप्रियता और समाजवादी पार्टी का संगठन अब दो अलग-अलग बातें बन चुकी हैं। मुस्लिम समाज के एक हिस्से में उनके प्रति सहानुभूति आज भी मौजूद है, लेकिन चुनाव केवल सहानुभूति से नहीं जीते जाते। बूथ प्रबंधन, स्थानीय नेतृत्व, गठबंधन, उम्मीदवार और सामाजिक समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
यदि आजम खान लंबे समय तक सक्रिय राजनीति से बाहर रहते हैं तो रामपुर में सपा को नई रणनीति बनानी ही पड़ेगी। भाजपा की रणनीति भी स्पष्ट दिखाई देती है। पार्टी कानून-व्यवस्था, अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई और भ्रष्टाचार विरोधी छवि को चुनावी मुद्दा बनाए रखना चाहती है।
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी इसे राजनीतिक प्रतिशोध और अल्पसंख्यक उत्पीड़न के नैरेटिव से जोड़कर पेश करेगी। यानी 2027 का चुनाव केवल विकास बनाम विकास नहीं होगा, बल्कि कानून बनाम राजनीतिक प्रतिशोध की बहस भी उसमें प्रमुख रहेगी। हालांकि अंतिम फैसला अदालतों को करना है।
आजम खान के कई मामलों में अभी न्यायिक प्रक्रिया जारी है और कानूनी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। इसलिए उनकी राजनीतिक कहानी पर अंतिम विराम लगाना जल्दबाजी होगी।
लेकिन इतना तय है कि जिस रामपुर में कभी आजम खान की अनुमति के बिना राजनीतिक पत्ता तक नहीं हिलता था, उसी रामपुर में आज उनकी सबसे बड़ी विरासत प्रशासनिक कार्रवाई के घेरे में खड़ी है। यह बदलाव केवल एक नेता की कहानी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीति, बदलते सत्ता संतुलन और कानून तथा राजनीति के टकराव की भी कहानी है। 2027 का चुनाव तय करेगा कि यह अध्याय यहीं समाप्त होगा या आजम खान का नाम एक बार फिर रामपुर की राजनीति में किसी नए रूप में लौटेगा।
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