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नरेंद्र मोदी  ने जिन मीरा मांझी के यहां चाय पी,उस परिवार की हालत आज भी बदतर है!

नरेंद्र मोदी  ने जिन मीरा मांझी के यहां चाय पी,उस परिवार की हालत आज भी बदतर है!

30 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी बहुप्रचारित यात्रा के दौरान ‘अचानक’ अयोध्या के राजघाट स्थित कंधरपुर की निवासी उज्ज्वला योजना की दस करोड़वीं लाभार्थी मीरा मांझी के घर जाकर चाय पी थी. मीडिया ने इससे जुड़ी छोटी-बड़ी ढेरों ख़बरें दिखाईं लेकिन उनकी ‘असुविधाजनक’ बातों और मांगों को ‘गोल’ कर गए.

 

अयोध्या की मीरा मांझी के घर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: पीआईबी)
BY-कृष्ण प्रताप सिंह
एक समय हम देश के समाचार माध्यमों को इस बात के लिए जानते थे कि वे आम लोगों की आवाजें सरकारों तक पहुंचाते हैं-सरकारें कुछ भी न देखने और कुछ भी न सुनने पर उतर आएं तो भी और सब-कुछ दिखाने-सुनाने के उनके कर्तव्यपालन को आड़े आकर सताने लग जाएं तो भी. लेकिन अब इन माध्यमों ने अपने प्रवाह को कुछ इस तरह उलट दिया है कि सरकारों के तो छोटे-बड़े सारे ‘संदेश’ और ‘फरमान’ लोगों तक ले आते हैं- और दिन हो या रात, लगातार ले आते हैं- इस हद तक कि वे उन्हें देखते-सुनते उकता जाएं, लेकिन लोगों की आवाजें तो क्या कराहें भी सरकारों तक ले जाने के जाखिम नहीं उठाते. कतई नहीं.
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गत 30 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी बहुप्रचारित यात्रा के दौरान ‘अचानक’ अयोध्या के राजघाट स्थित कंधरपुर की निवासी उज्ज्वला योजना की दस करोड़वीं लाभार्थी मीरा मांझी के घर जाकर उनकी बनाई ‘कुछ ज्यादा ही मीठी’ चाय पी ली, तो भी इन माध्यमों ने कुछ ऐसा ही किया. इस तरह कि उसके एक महीना बाद भी कई हलकों में कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने तो मीरा के घर चाय भर पी, ये माध्यम तो मीरा का पक्ष ही ‘पी’ गए!
इसे यों समझ सकते हैं कि इन माध्यमों ने यह खबर तो दी कि प्रधानमंत्री ने मीरा से इतने आत्मीय होकर बातें कीं कि उन्होंने ‘आह्लादित’ होकर उन्हें ‘भगवान’ का दर्जा दे डाला, उनके जूठे कप को ताजिंदगी संजोए रखने के इरादे से ससम्मान भगवान के पास रख दिया, प्रधानमंत्री ने उन्हें धन्यवाद का पत्र व ‘रिटर्न गिफ्ट’ भेजा, अयोध्या के जिलाधिकारी आयुष्मान कार्ड देने उनके घर गए और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने उन्हें जन आरोग्य योजना का लाभार्थी भी बना दिया, लेकिन मीरा की इसके बाद की ‘असुविधाजनक’ बातों और मांगों को ‘गोल’ कर गए.
महीने भर में कभी यह बताने का फर्ज भी नहीं निभा पाए कि प्रधानमंत्री का मीरा के घर जाना मीरा के लिए भले ही ‘अचानक’ था, सरकारी अमले के लिए नहीं था और इस निष्कर्ष तक पहुंचने के पर्याप्त कारण हैं कि वह महीनों से अंदरखाने इसकी ‘तैयारियां’ कर रहा था: मीरा द्वारा ‘उज्ज्वला योजना’ का लाभ पाने के लिए भरा गया फार्म कई महीनों से संभवतः इसीलिए अटका रखा गया था कि उन्हें योजना की दस करोड़वीं लाभार्थी बनाया जा सके. समाचार माध्यमों को उन्होंने खुद बताया कि उन्हें योजना के तहत रसोई गैस कनेक्शन/सिलेंडर बहुत लेट मिला.
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फिर प्रधानमंत्री की यात्रा से एक दिन पहले अचानक सिलेंडर देकर पूछा गया कि वे पहले पहल उस पर क्या पकाएंगी? उन्होंने कहा कि परंपरा के अनुसार पहले दिन कोई मीठी चीज यानी खीर वगैरह पकानी चाहिए, लेकिन उनके घर में पैसे नहीं हैं, इसलिए वे चाय वगैरह कुछ भी बना लेंगी. प्रधानमंत्री की यात्रा के दिन अधिकारियों ने उनसे कहा कि वे उस पर भोजन पकाकर तैयार रखें, एक अति महत्वपूर्ण शख्सियत उनके घर खाने पर आने वाली है. उन्होंने उस शख्सियत के लिए दाल-भात व सब्जी पकाई और सोचा कि रोटी उसके आने पर सेंक लेगी. लगे हाथ चाय के लिए दूध आदि का इंतजाम भी किया.
घंटे भर पहले अधिकारी दूध और सुरक्षा वगैरह की जांच करने आए तो बताया कि प्रधानमंत्री खुद आ रहे हैं. फिर तो वे ऐसी ‘निहाल’ हुईं कि प्रधानमंत्री आकर चले भी गए और वे उनसे कुछ कह ही नहीं पाई. कुछ देर बाद समाचार माध्यमों के प्रतिनिधि आने लगे तो गलती सुधारते हुए उन्हें वे सारी बातें बताईं, जो प्रधानमंत्री को नहीं बता पाई थी. लेकिन कुछ न्यूज पोर्टल व यूट्यूबचैनलों को छोड़कर किसी ने भी उनकी उन बातों को खबरों व रिपोर्टो में देने लायक नहीं पाया.
उनकी इन बातों में एक यह भी थी कि उनके पास रोजी-रोटी का कोई ठीक-ठाक जरिया नहीं है और आगे भी नहीं हुआ तो उन्हें मिला रसोई गैस सिलेंडर खत्म होने पर फिर से भरवाना मुश्किल हो सकता है. ऐसा हुआ तो उन्हें फिर से भट्ठी पर खाना पकाना पड़ेगा. इसलिए बेहतर हो कि उन्हें सरयू के उस घाट पर, जहां डलिया में ले जाकर वे फूल बेचती हैं, बेचने का कोई स्थायी ठौर और उनके पति सूरज को कोई नौकरी दिलाई जाए.
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उन्होंने यह भी कहा था कि न अभी उनके घर की दीवारों पर प्लास्टर हुआ है, न उसमें शौचालय ही है. उनके अनुसार स्थानीय भाजपा सांसद लल्लू सिंह ने प्लास्टर के लिए अपनी पार्टी के एक स्थानीय नेता को कुछ पैसे देकर काम शुरू करवाने को कहा था, लेकिन उस ने काम नहीं कराया.
एक सवाल के जवाब में उन्होंने यह भी कहा था कि अयोध्या में हुए ‘बदलाव’ या ‘विकास’ से पैसे वालों और उन लोगों के जीवन में ही ‘बदलाव’ आया है, जो पहले से कोई रोजगार करते आ रहे हैं. उनके जैसे (रोज कुआं खोदने और पानी पीने वाले) परिवारों के जीवन में कुछ नहीं बदला है. भले ही उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सिर पर छत नसीब हो गयी है और हर महीने राशन मिलता है, गरीबी पीछा नहीं छोड़ रही. वे अभी भी अपने घर में बिजली का महज एक बल्ब जलाने के लिए विवश हैं क्योंकि बिजली का ‘बड़ा’ बिल नहीं भर सकतीं.
समाचार माध्यमों का उनके प्रति यह असहानुभूतिपूर्ण रवैया तब है, जब मीरा और उनके पति सूरज को उन सबके स्वागत-सत्कार के लिए कई हफ्ते अपनी मेहनत-मशक्कत छोड़कर घर बैठना पड़ा और हजारों रुपये कर्ज लेने पड़े हैं. अकारण नहीं कि कई लोग माध्यमों के इस रवैये की तुलना सरकारी अमले के उस रवैये से करते हैं, जिसके तहत उसने मीरा के पड़ोसियों तक को प्रधानमंत्री के आने पर कुछ बोलने नहीं दिया.
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पड़ोसियों ने समाचार माध्यमों को इस बाबत बताया भी. दूसरी ओर मीरा की मानें तो उनके प्रति समाचार माध्यमों का रवैया वैसा ही है, जैसा उन अधिकारियों का, जो उनके घर प्रधानमंत्री के आने की सूचना लाए थे और अब उनकी मांगें प्रधानमंत्री तक पहुंचा देने को कहने पर जबानी जमाखर्च से आगे बढ़ते नहीं दिखते.
लेकिन क्या समाचार माध्यमों ने अपना फर्ज निभाने में कोताही बरतकर सिर्फ मीरा से ही अन्याय किया? जवाब है- नहीं. इससे उनके दर्शक और पाठक यह जानने से महरूम रह गए कि मीरा ने प्रधानमंत्री को बताया कि वे फूल बेचती हैं तो प्रधानमंत्री ने जो कुछ कहा, उसके आगे की हकीकत क्या है?
दरअसल, प्रधानमंत्री ने खुश होकर कहा था कि अब तो अयोध्या में (श्रद्धालुओं की आमदरफ्त कई गुनी बढ़ जाने के कारण) फूल कम पड़ जाएंगे. इसके आगे की हकीकत यह है कि मीरा अस्सी-नब्बे रुपये किलो के भाव से खरीदे फूलों को पत्तों से बने ‘दोनों’ में घाट पर अलग-अलग रखकर श्रद्धालुओं को दस-दस रुपये में बेच पाएं, इसके लिए भी उन्हें पैसे देने पड़ते हैं. तिस पर उससे इतनी आमदनी नहीं होती कि उनकी नियति बदल सके. तिस पर उनकी गोद में दूध पीने वाला बच्चा है, जिसके बीमार हो जाने के डर से कड़ाके की ठंड व शीतलहरी में वे घाट पर जा ही नहीं पा रही.
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उनके पति सूरज दिहाड़ी मजदूर हैं, गोताखोर भी और नाव भी चलाते हैं. लेकिन इनमें से किसी भी काम से ठीक से गुजर-बसर नहीं हो पाती. गोताखोरी सरयू में आकस्मिकताओं के वक्त किसी डूबते को बचाने, किसी का डूबा हुआ कुछ ढूंढने या श्रद्धालुओं के फेंके सिक्के निकालने भर के काम काम आती है. दूसरी ओर सरयू में क्रूज और मोटर बोट वगैरह उतार दिए जाने से नावों के धंधे में भी अब कोई भविष्य नहीं रह गया है.
सूरज द्वारा दी गई यह जानकारी भी समाचार माध्यमों ने नहीं दी कि श्रद्धालुओं द्वारा सरयू में फेंके गए सिक्के निकालने के उनके काम में भी निकाले गए सिक्कों को ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ करने की ‘मजबूरी’ होती है और मेलों के दिनों में एक चौथाई पर ही संतोष करना पड़ता है. अलबत्ता, अन्य दिनों में जितने सिक्के सात-आठ घंटों की गोताखोरी में मिलते हैं, मेलों के दौरान दो घंटों से भी कम में मिल जाते हैं. लेकिन जाड़ों में यह काम करने से लाभ के बजाय हानि ही होती है क्योकि नदी के पानी में कई-कई घंटे तक रहने पर बीमारी पकड़ लेती है और जितने सिक्के हाथ नहीं आते, उनका कई गुना इलाज में खर्च करना पड़ता है.
विडंबना देखिए: समाचार माध्यमों ने असुविधाजनक मानकर यह सब नहीं बताया, न सही, यह बताने की जहमत भी नहीं उठाई कि प्रधानमंत्री के अपने घर आने को सपने जैसा बताने वाली मीरा ने अपनी जातीय अस्मिता की तुष्टि महसूस की, कहा कि इससे भगवान राम को नदी पार कराने वाले मांझी समुदाय में उनका नाम तो हुआ ही है, मांढह समाज को भी नाम मिल गया है. ऐसे में प्रधानमंत्री पूरा समर्थन दें तो वे भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव भी लड़ सकती हैं.
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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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