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RSS NEWS-हिंदू राष्ट्र और उससे जुड़ा छलावा,भविष्य के हिंदू राष्ट्र को, आतंक का इस्तेमाल कर तानाशाही वाला तंत्र बनाना होगा। 

हिंदू राष्ट्र और उससे जुड़ा छलावा,भविष्य के हिंदू राष्ट्र को, आतंक का इस्तेमाल कर तानाशाही वाला तंत्र बनाना होगा।

आरएसएस का हिंदू राष्ट्र, इज़ारेदार पूंजी की सरपरस्ती में आतंक का इस्तेमाल करने वाली तानाशाही होगी और संकट में फंसे नव-उदारवादी निज़ाम को मजबूत करेगी।
हिंदू राष्ट्र और उससे जुड़ा छलावा,भविष्य के हिंदू राष्ट्र को, आतंक का इस्तेमाल कर तानाशाही वाला तंत्र बनाना होगा।
BY-प्रभात पटनायक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना, हिंदू राष्ट्र (Hindu Rashtra)या हिंदू राज्य की स्थापना के उद्देश्य के मद्देनज़र हुई थी। इस पर तुरंत यह सवाल उठता है कि: हिंदू राज्य क्या है?What is Hindu state?
दुनिया में ऐसे कई देश हैं जो एक धर्म को बाकी सभी धर्मों से ऊपर प्रधानता देते हैं या धर्मतंत्रीय निज़ाम हैं, लेकिन इससे उनके देशों की वर्ग चरित्र या वर्गीय संरचना में रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता है।
इसी तरह, कभी हिंदू राज्य, यदि बन जाता है, तो वह अन्य सभी धर्मों से ऊपर, एक धर्म का सहारा ले सकता है लेकिन इससे उसका चरित्र या वर्गीय संरचना को परिभाषित नहीं किया जा सकेगा। जिन कारणों पर हम चर्चा करेंगे, वे जरूरी तौर पर आतंक का इस्तेमाल करने वाली तानाशाही होगी जिसे इजारेदार पूंजी द्वारा, खासकर इजारेदार पूंजी के नए और अधिक आक्रामक तत्वों के माध्यम से लागू किया जाएगा या थोपा जाएगा।
 कम्युनिस्ट इंटरनेशनल(Communist International) के अध्यक्ष जॉर्जी दिमित्रोव ने अपनी सातवीं कांग्रेस में, फासीवादी राज्य को “वित्त पूंजी के सबसे प्रतिक्रियावादी और विद्रोही वर्गों की आतंकवादी तानाशाही” के रूप में परिभाषित किया था; इसलिए, हमारा तर्क भी उसी के समान है कि एक हिंदू राष्ट्र यदि बनता है तो वह अनिवार्य रूप से एक फासीवादी राज्य होगा।
ऐसे राष्ट्र/राज्य में, सभी आधिकारिक कार्यक्रम हिंदू देवताओं (hindu gods)के मंत्रों के जाप के साथ शुरू हो सकते हैं; सभी सड़कों, रेलवे स्टेशनों या शहरों के नाम मध्ययुगीन सम्राटों के नामों से बदलकर हिंदुत्व के प्रतीकों के नाम पर रखे जा सकते हैं; सभी शैक्षणिक गतिविधि सरस्वती वंदना से शुरू हो सकती हैं; और कई और मंदिर बनाए जा सकते हैं, यहां तक कि राज्य के वित्त पोषण से भी इन्हे बनाया जा सकता है। लेकिन इन सब के बावजूद औसत हिंदू के जीवन में कोई सुधार नहीं होगा, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि एर्दोगन सरकार ने इस्लामी भावनाओं का दोहन करने की अपनी इच्छा के चलते इस्तांबुल में प्रसिद्ध हागिया सोफिया मस्जिद को एक कामकाजी मस्जिद में बदला, लेकिन क्या इससे तुर्की में औसत नागरिक के जीवन में कोई सुधार हुआ।
वास्तव में, कोई इससे भी आगे जा सकता है। आइए पहले हम हिंदुत्व तत्वों के वर्तमान शासन से हासिल अपने अनुभवों पर विचार करें।
 देश में बेरोजगारी अब पहले के दशकों से भी बदतर है: सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (जो सामान्य अंतरराष्ट्रीय अभ्यास के अनुरूप, अवैतनिक पारिवारिक श्रम को रोजगार के रूप में नहीं गिनता है) के अनुसार, बेरोजगारी दर 2008 और 2019 के बीच औसतन 5 फीसदी और 6 फीसदी के बीच से बढ़ाकर, अब लगभग 8 फीसदी तक पहुंच गई है; और इसमें उन लोगों को नहीं जोड़ा गया है जो “निराश कर्मचारी प्रभाव” के कारण काम पर नहीं जाते हैं या काम नहीं खोजते हैं।
 लेकिन, न केवल हिंदुत्व (hindutva)की ताकतों के नेतृत्व वाली सरकार, इस बिगड़ती प्रवृत्ति को रोकने में विफल रही है बल्कि इसके मुख्य आर्थिक सलाहकार ने भी खुल कर घोषणा कर दी है कि सरकार बेरोजगारी की समस्या के बारे में कुछ नहीं कर सकती है। उन्होंने न तो अपना बयान वापस लिया है, न ही किसी आधिकारिक सूत्र ने सरकार को उनके बयान से अलग करने का प्रयास किया गया है, जिससे स्पष्ट है कि सरकार भी स्थिति यही है।
 इस प्रकार, कामकाजी लोगों को प्रभावित करने वाले सबसे ज्वलंत मुद्दे पर, एक ऐसा मुद्दा जो मेहनतकश जनता की वर्तमान बदतर दुर्दशा का आधार है, सरकार ने केवल किसी भी किस्म की कार्रवाई न करने के अपने पक्के इरादे को दोहराया है।
 इसका मतलब यह है कि वर्तमान सरकार के तहत लोगों की दुर्दशा बिगड़ती रहेगी जिस पर प्रतिक्रिया केवल नकली अनुमानित सकल घरेलू उत्पाद की प्रभावशाली वृद्धि दर को लेकर रहेगी जिसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर की जा रही उदारता को उचित ठहराने के लिए किया जा सकता है। राज्य द्वारा “विकास” के नाम पर इजारेदार पूंजीपति वर्ग कोदऔर बढ़ते दुख की सच्ची तस्वीर पेश करने के सभी निष्पक्ष प्रयासों का तिरस्कार करना है।
यदि हिंदुत्व तत्वों के प्रभुत्व वाली एक निर्वाचित सरकार ऐसा कर रही है तो भविष्य का कोई भी हिंदू राष्ट्र लोगों के भौतिक जीवन के प्रति राज्य की संस्थागत लापरवाही को और भी मजबूत करेगा।
यही कारण है कि भविष्य के हिंदू राष्ट्र को, आतंक का इस्तेमाल कर तानाशाही(dictatorship) वाला तंत्र बनाना होगा। कामकाजी लोगों पर, संपत्तिवान वर्गों का कोई भी शासन, एक ऐसे राष्ट्र/राज्य में कायम रहता है जो वर्गीय तानाशाही का प्रतिनिधित्व करता है, भले ही सरकार का स्वरूप लोकतांत्रिक क्यों न हो।
ऐसा कहने का मतलब यह नहीं है कि देश का लोकतांत्रिक स्वरूप अप्रासंगिक है या केवल एक विशेष घटना का प्रतिनिधित्व करता है; यह केवल इस बात को रेखांकित करने के लिए है कि लोकतांत्रिक स्वरूप खुद उस वर्ग तानाशाही के कारण क्षीण हो जाता है जिसके भीतर वह विराजमान है। लेकिन जब इस वर्ग तानाशाही के परिणामस्वरूप लोगों की स्थिति वास्तव में खराब हो जाती है, यदि राज्य इसके बारे में कुछ नहीं करता है, तो यह वर्ग तानाशाही अनिवार्य रूप से सरकार के लोकतांत्रिक स्वरूप का गला घोंट देगी। यह अनिवार्य रूप से लोगों के अधिकारों और लोकतांत्रिक शासन की संस्थाओं को कुचल देगी।
 यदि हिंदू राष्ट्र, इजारेदार पूंजी की सरपरस्ती में वर्ग तानाशाही के रूप में अस्तित्व में आता है, और इसलिए एक नव-उदारवादी ढांचे के भीतर काम करता है जिसमें इजारेदार पूंजीपति इकट्ठा हैं, तो निश्चित रूप से कामकाजी लोगों की दुर्दशा खराब होगी, खासकर नव उदारवाद के संकट के दौर में ऐसा होगा। इसलिए, यह आवश्यक रूप से आतंक का इस्तेमाल कर तानाशाही के रूप में विकसित होगा।
वास्तव में, यही कारण है कि इजारेदार पूंजीपति वर्ग का बड़ा हिस्सा हिंदू राष्ट्र परियोजना को स्वीकार कर सकता है। जो आतंक का पूरक यानि सांप्रदायिक टकराव को बढ़ावा देना, एक अल्पसंख्यक धार्मिक समूह को “अन्य” कहना और उस समूह के खिलाफ नफ़रत को बढ़ाना, जिस समूह को हिंदू राष्ट्र के गठन के माध्यम से क्रिस्टलीकृत किया जाएगा।
 इसलिए, इजारेदार पूंजी के आतंक का इस्तेमाल करने वाली तानाशाही, हिंदू राष्ट्र में हिंदू वर्चस्ववाद को बढ़ावा देने के पूरक के रूप में काम करेगी। इसीलिए हमने शुरुआत में कहा था कि हिंदू राष्ट्र अनिवार्य रूप से इजारेदार पूंजी की सरपरस्ती में आतंक का इस्तेमाल करके एक तानाशाही का आगाज़ करेगा।
इन दो कारकों अलावा, अर्थात् आतंक का इस्तेमाल और हिंदू वर्चस्ववाद को बढ़ावा देना, हिंदू राष्ट्र की तीसरी लामबंदी का कारक, सामाजिक प्रति-क्रांति को बढ़ाएगा।
 20वीं सदी में, भारत में दो समानांतर आंदोलन चले थे: एक उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन था और दूसरा उन लोगों की मुक्ति का संघर्ष था जो जाति-आधारित सामंती समाज के भीतर सहस्राब्दियों से सामाजिक रूप से उत्पीड़ित थे। एक आंदोलन के कई नेता व्यक्तिगत रूप से, दूसरे के प्रति सहानुभूति पूर्ण नहीं रहे होंगे, लेकिन लोकप्रिय स्तर पर दोनों के बीच सहजीवी संबंध था; और वामपंथियों ने इस सहजीवन को व्यक्त किया था।
 इस दोहरे आंदोलन के परिणामस्वरूप देश में व्यापक सामाजिक बदलाव हुए थे। निःसंदेह, यह उतना व्यापक नहीं थे जितने होने चाहिए थे; यह बदलाव बुर्जुआ सीमाओं से घिरा हुआ था जिसे पार नहीं किया जा सका। बहरहाल, यह एक महत्वपूर्ण प्रगति है, जिसे केवल एक उदाहरण से दर्शाया जा सकता है।
20वीं सदी की शुरुआत में, उस इलाके में जो अब केरल का हिस्सा है, न केवल “अस्पृश्यता” थी, बल्कि “अदृश्यता” भी थी, जिसका अर्थ था कि “उच्च” जाति से संबंधित कोई भी व्यक्ति यदि दलित जाति के व्यक्ति को देख लेता तो वह प्रदूषित हो जाता था।
 जब हम उस स्थिति की तुलना आज के केरल से करते हैं, जिसके मानव विकास संकेतक न केवल तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों से बेहतर हैं, बल्कि अक्सर उन्नत पूंजीवादी दुनिया के देशों से भी अनुकूल तुलना करते हैं, तो हमें सामाजिक बदलाव की विशालता का अंदाजा होता है जिससे ऐसा हुआ है। सच है, केरल एक स्पष्ट अर्थ में एक बाहरी इलाका है; लेकिन ऐसा बदलाव, हालांकि केरल की तुलना में कम है, पूरे भारत में अलग-अलग डिग्री में हुआ है।
हिंदुत्व के बढ़ते प्रभुत्व से उस बदलाव को पलटने के उसके अंतर्निहित वादे और वास्तविक प्रयास से सहायता मिली है। राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में इस बदलाव को उलटने, लोकतंत्र को कमजोर करने, जिसने लोगों को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाया था और धर्मनिरपेक्षता को लागू किया गया था, यह सर्वविदित है; लेकिन यह उलटफेर कहीं अधिक व्यापक है। उदाहरण के लिए, हिंदुत्व के नेतृत्व वाले नव-उदारवाद के तहत होने वाला निजीकरण, जिसमें शिक्षा का क्षेत्र भी शामिल है, नौकरियों और अवसरों से सामाजिक रूप से वंचित लोगों को बाहर कर देगा, जो पहले की प्रवृत्ति के उलट है।
उच्च मध्यम वर्ग जो नव-उदारवादी निज़ाम का सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है और जिसने खुद को मेहनतकश जनता से अलग कर लिया है और उसके प्रति थोड़ी सहानुभूति भी नहीं है, वह इस प्रति-क्रांति का समर्थक है।
 मुद्दा यह है कि यदि हिंदुत्व का प्रभुत्व पिछले कई वर्षों में भारत में हुए सामाजिक बदलाव के पीछे हटने से जुड़ा है तो स्पष्ट रूप से एक हिंदू राष्ट्र को एक वास्तविक प्रति-क्रांति की आवश्यकता होगी।
 शब्द अत्यधिक भ्रामक हो सकते हैं; और हिंदू राष्ट्र इसका एक आदर्श उदाहरण है। हिंदुत्ववादी ताकतों की प्रचार मशीनरी हिंदू राष्ट्र को ऐसे पेश करती है मानो उसका आगमन हिंदुओं के लिए मुक्ति का पल होगा। हालांकि, इसके विपरीत, हिंदू राष्ट्र एक संकट में फंसे नव-उदारवादी निज़ाम को सहारा देते हुए इजारेदार पूंजी के हितों में इस्तेमाल की जाने वाली तानाशाही का मुखौटा होगा।
 बहुसंख्यकों के हित में होना तो दूर की बात है, बल्कि यह एक ऐसी प्रति-क्रांति की शुरूआत का प्रतीक है जो पिछली शताब्दी में लोगों द्वारा हासिल किए गए अधिकतर सामाजिक और राजनीतिक लाभ को उलट देगा। इसलिए, मजदूर वर्ग का किसान वर्ग के साथ मिलकर हिंदू राष्ट्र की ओर बढ़ते किसी भी कदम को रोकना ऐतिहासिक कर्तव्य बन जाता है।
 (लेखक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
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