जहरीला पानी कांड और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की मुहिम

==संजय पराते===
इंदौर मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी है। इस जिले का प्रभार खुद मुख्यमंत्री मोहन यादव के पास है। यहां से विधायक, नगर मंत्री स्वनामधन्य कैलाश विजयवर्गीय हैं, जो इंदौर नगर निगम के महापौर भी रह चुके हैं। इसी इंदौर शहर को फर्जी आंकड़ों के जरिए देश का सबसे स्वच्छ शहर का तमगा दिया गया था, जिसकी देर सबेर कलई उतरनी ही थी। जहरीले दूषित पानी से हुई बीस से ज्यादा मौतों और अस्पताल में पड़े सैकड़ों लोगों और अपने घरों के बिस्तर में पड़े-पड़े इलाज करवा रहे हजारों लोगों ने इस कलई को उतर दिया। स्वच्छ शहर का तमगा धूल चाट रहा है, लेकिन इस अकल्पनीय हादसे की जिम्मेदारी लेने के लिए न मुख्यमंत्री तैयार हैं और न नगरीय प्रशासन मंत्री। हाई कोर्ट में सरकार ने केवल चार मौतों को ही स्वीकार किया है और हजारों प्रभावितों में से केवल 35 मरीजों का खर्चा उठाने की जिम्मेदारी लेने की घोषणा की है। इस हादसे पर एनडीटीवी के पत्रकार अनुराग द्वारी के साथ जिस असभ्य और अभद्र लहजे में इस मंत्री ने बात की है, उसके वीडियो हवा में वायरल हो रहे हैं। लगता है, इस सरकार की आंखों में शर्म की दो बूंद आंसू भी नहीं बची है। इस हादसे की सरकार ने कोई जिम्मेदारी नहीं ली और दिखावे की कार्यवाही करते हुए इंदौर नगर निगम के आयुक्त दिलीप यादव को हटाया है और अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया तथा पीएचई के प्रभारी अधीक्षण यंत्री संजीव श्रीवास्तव को निलंबित किया है।
इस समय इंदौर के कलेक्टर शिवम् वर्मा है, जो आईएएस हैं। कभी वे इंदौर नगर निगम के आयुक्त भी रह चुके हैं और मुख्यमंत्री मोहन यादव से उनकी निकटता जगजाहिर हैं। मुख्यमंत्री खांटी संघी है। हाल फिलहाल संघ के सर्वोच्च नेता मोहन भागवत ने दावा किया है कि संघ को राजनीति से कोई मतलब नहीं है, उसका काम समाज सेवा है। लेकिन संघी मुख्यमंत्री ने अपने प्रिय कलेक्टर से आज तक कोई पूछताछ नहीं की, कोई सवाल-जवाब नहीं किया, जिसे पूरे जिले के किसी भी अच्छे बुरे काम के लिए पहला जिम्मेदार माना जाता है। मुख्यमंत्री खांटी संघी है, सो मुख्यमंत्री की कृपा प्राप्त इस अफसर को भी अपनी संघ-निष्ठा का परिचय तो देना ही था। इसके लिए लोक-लाज छोड़ना पड़ता है, प्रशासन की आचार संहिता का अचार भी डालना पड़ता है। संघ का प्रसाद पाने की ये दो अनिवार्य शर्तें हैं। जहरीले पानी कांड के बाद इन दोनों शर्तों को इस होनहार कलेक्टर ने बखूबी पूरा किया है। वे जहरीले पानी के पीड़ितों के पास तो नहीं पहुंचे, लेकिन इंदौर महापौर पुष्यमित्र के साथ संघ के दफ्तर में जरूर मत्था टेकने पहुंच गए। यह इस बात का सीधा और खतरनाक संकेत है कि आने वाले दिनों में सरकार नाम की संस्था कागज में ही रहने जा रही है, उसकी असली नकेल संघी गिरोह के हाथ में होगी, जो पूरी नौकरशाही को अपने हिसाब से हांकेगी।
संघ के दरबार में कलेक्टर के मत्था टेकने के बाद स्लॉटर हाउस की घटना सामने आई है और लोग इसे जहरीले पानी कांड से आम जनता का ध्यान हटाने की चाल भी मान रहे हैं, क्योंकि इस तरह की साजिशें करने में भाजपा और आरएसएस को पहले से ही महारत हासिल है। स्लाटर हाउस के बारे में हमारे पाठक जान लें कि इंदौर नगर निगम क्षेत्र में जिंसी नामक जगह पर एक स्लॉटर हाउस है। कहा जाता है कि इसकी अनुमति निगम परिषद ने नहीं, बल्कि एमआईसी ने चुपचाप दे दी थी। बहरहाल, अनुमति किसी की भी हो, यह स्लॉटर हाउस पीपीपी मॉडल पर वैध तरीके से चल रहा है और सरकार को भी इसके बारे में पूरी जानकारी है। इस स्लाटर हाउस के आधुनिकीकरण पर हाल ही में नगर निगम ने 35 करोड़ खर्च भी किए हैं।
इस स्लॉटर हाउस में कथित गोकशी मामला 17-18 दिसंबर की रात को तब सामने आया था, जब पीएचक्यू के सामने से मांस ले जा रहे एक कंटेनर में गौ-मांस का मिलना बताया जाता है। कंटेनर में भोपाल स्लॉटर हाउस से जारी मांस का सर्टिफिकेट भी मिला। संघी गिरोह से जुड़े हिंदुत्ववादी संगठनों के लिए हल्ला मचाने और हिन्दू-मुस्लिम करने के लिए इतना ही काफी था। लेकिन सवाल यह उठता है कि गौवंशी जानवर इस स्लॉटर हाउस में कैसे काटे जा सकते हैं? और यदि कटे हैं, तो निगम प्रशासन और भाजपा सरकार इस जिम्मेदारी से कैसे बच सकती है, जबकि नियमानुसार, किसी जानवर के कटने से पहले वेटर्निटी डॉक्टर उस जानवर की मेडिकल जांच करता है कि वह बीमारी रहित और खाने योग्य है या नहीं। इसके साथ ही निगम का एक अधिकारी काटे जाने वाले जानवरों की जानकारी रजिस्टर में दर्ज करता है। यदि यह दावा सही है तो फिर स्लॉटर हाउस में गौवंशी पशुओं के सींग, खाल, पूंछ जैसे दूसरे अवशेष भी तो मिलने चाहिए? लेकिन इस संबंध में भी पुलिस और प्रशासन कुछ भी बताने के लिए तैयार नहीं है, जिससे साफ है कि संदेह पैदा करके साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने की साजिश खुलकर रची जा रही है।
लेकिन अब जनता भी समझ ही रही है कि स्लॉटर हाउस तो बहाना है, संघी गिरोह, प्रशासन और सरकार का असली इरादा जहरीले पानी कांड से ध्यान हटाना है। इस कांड के बाद सरकार द्वारा की जा रही पेयजल आपूर्ति की गुणवत्ता पर पूरे देश का ध्यान गया है। इंदौर में पेयजल के 60 नमूनों में से 59 नमूने गुणवत्ता मानकों में फेल हुए हैं और पूरा इंदौर शहर ही जहरीले पानी को जिंदा रहने की मजबूरी में पी राजा है, क्योंकि उसके पास पानी खरीदने की औकात नहीं है। भोपाल में हुई पानी की जांच में भी 5 सैंपल दूषित पाए गए हैं। इससे पहले 2024 की सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि भोपाल के 5.33 लाख लोग दूषित पानी की बीमारियों से प्रभावित हो रहे हैं। प्रभावित नहीं हो रहे हैं, तो केवल सरकार और उसके कारिंदे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के हर वार्ड में दूषित पानी की आपूर्ति की शिकायतें सामने आई हैं और ये शिकायतें इतनी बड़ी संख्या में है कि इससे निपटना निगम प्रशासन के लिए आसान नहीं है।
जो सरकार अपनी जनता को पीने का शुद्ध पानी भी न दे सके, उसे सत्ता में एक मिनट भी बने रहना का हक नहीं है। इस मामले में हर स्तर पर जवाबदेही तय करने और कार्यवाही करने की जरूरत है। लेकिन जब सरकार खुद ही जवाबदेह हो, तो कार्यवाही कौन करेगा? सरकार को खुद इस्तीफा देना चाहिए। लेकिन यह भी तभी होगा, जब शर्म का कोई पर्दा उसकी आंखों में पड़ा होगा। बेशर्म सरकार को लोकतंत्र में जनता ही हटा सकती है।


