*राजनैतिक व्यंग्य-समाग
अमेरिका खतरे में है : विष्णु नागर
भारत को तो केवल पाकिस्तान और चीन से खतरा रहा है, इधर इस सरकार के प्रकट होने के बाद तथाकथित बांग्लादेशियों प्रवासियों से भी खतरा पैदा हो गया है। पिछले बारह साल से यहां हिंदू सरकार आने के बाद हिंदू भी ‘खतरे’ में आ गए हैं, मगर हमारी सरकार का परम दोस्त अमेरिका तो अट्ठारहवीं सदी से आज तक खतरे में चल रहा है! उसे किसी भी बात से, कहीं भी, कभी भी खतरा हो सकता है! खतरे में रहने का नाम ही अमेरिका है!
आजकल उसे ईरान से खतरा चल रहा है। मान लो कल ईरान से खतरा नहीं रहा, तो वह सुरक्षित नहीं हो जाएगा और खतरे वह अपने सिर पर उठा लेगा। जब तक पृथ्वी रहेगी, आकाश रहेगा, वायु और जल रहेंगे, एशिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और यहां तक कि यूरोप रहेगा, वह खतरे में रहेगा! वह खतरे में रहने और दुनिया को खतरे में डालने के लिए ही पैदा हुआ है!
उसका खतरा तो उसी दिन से शुरू हो गया था, जब 18वीं सदी से ब्रिटेन, फ्रांस, स्वीडन, नीदरलैंड के अपराधी वहां निर्वासित कर दिए गए थे। आते ही इन गोरे अपराधियों को अमेरिका के मूल निवासियों, रेड इंडियनों से खतरा पैदा हो गया! जमीन उनकी, देश उनका और खतरा इन अपराधियों को उन्हीं से!
रेड इंडियनों का सफाया करने के बाद अमेरिका में गुलाम बनाकर लाये गए काले लोगों से इन गोरों को खतरा पैदा हो गया! फिर पता चला कि इन्हें औरतों से भी खतरा है, इसलिए गोरी औरतों को भी मताधिकार नहीं दिया गया।बड़ी मुश्किल से 1920 में उन्हें आधा -अधूरा यह अधिकार मिला, मगर काली औरतों को मिल कर भी नहीं मिला। 45 साल और संघर्ष करने के बाद उन्हें यह अधिकार मिला! आजाद भारत में यह अधिकार 1950 में ही मिल गया था!
आजकल यूरोप से भगाए गए अपराधियों के वंशजों को दूसरे देशों से आए प्रवासियों से खतरा है! हमारे देशवासियों को यहां हथकड़ी-बेड़ियों में वापस भेजा गया! पर कोई बात नहीं, आज का अमेरिका, भारत का, मोदी जी का सबसे अच्छा दोस्त है! दोस्त का तो काम ही दोस्त का अपमान करना होता है, इसका बुरा नहीं मानते!
अमेरिका और उसके पक्के से भी पक्का दोस्त इस्राइल भी हमेशा खतरे में रहता है। इन दोनों को खतरे में रहने और दुनिया को खतरे में डालने की आदत-सी पड़ चुकी है। चैन से बैठने से इन्हें सख़्त परहेज़ है! इनकी तबियत खराब हो जाती है। आईसीयू में भर्ती करना पड़ता है!
खतरा नहीं, तो ये भी नहीं। अभी कल तक अमेरिका को वेनेजुएला से खतरा था, तो वहां के राष्ट्रपति को उठाकर अमेरिका अपने यहां ले आया। अमेरिका या तो तख्ता पलटकर राष्ट्रपतियों-प्रधानमंत्री का तत्काल निबटारा कर देता है या फिर अपने देश ले जाकर रेत-रेत कर उन्हें ऊपर भेजने का इंतजाम करता है।
अभी उसे वेनेजुएला से खतरा नहीं है, मगर मान लो, कल वहां के तेल की लूट के खिलाफ लोग उठ खड़े हो गए, तो अमेरिका फिर खतरे में पड़ जाएगा! जहां भी लूट का उसका ‘अधिकार’ खतरे में पड़ता है, वह खतरे में पड़ जाता है। जो देश स्वतंत्र निर्णय ले, अपने संसाधनों का राष्ट्रीयकरण करे, अमेरिकी लूट के रास्ते बंद कर दे, उसके विरोधी देशों से संबंध रखे, अपने को कम्युनिस्ट घोषित करे, अपनी संप्रभुता का दावा करे, तो ये खतरे में पड़ जाते हैं। रूस से भारत सस्ता तेल खरीदे, अंबानी जी की जबरदस्त कमाई करवाए, तो भी अमेरिका को खतरा पैदा हो जाता है। मोदी जी ने उस खतरे को फिलहाल दूर भगा दिया है। रूस से तेल लेना बंद कर दिया है! अमेरिका और इस्राइल ने ईरान पर हमला किया, मोदी जी ने तुरंत उनकी हां में हां मिलाई, वरना वे खुद खतरे में पड़ जाते।भारत खतरे में पड़ जाए तो कोई समस्या नहीं, मोदी जी पर खतरा नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे सबसे बड़े राष्ट्रवादी हैं। उनसे भी बड़े राष्ट्रवादी हैं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपनी जान दे दी!
1959 में क्यूबा में क्रांति हुई, अमेरिका खतरे में पड़ गया। फिदेल कास्रो को मारने की अनगिनत कोशिशें हुईं, मगर बंदा बच गया, इसका अफसोस आज तक अमेरिका को है, क्योंकि क्यूबा से उसे आज भी उसे खतरा है। उसे अपने सभी पड़ोसी देशों से खतरा है और जो देश उससे हजारों किलोमीटर दूर है, उनसे भी खतरा है। उसे पड़ोसी कनाडा तक से खतरा है,जिसे अमेरिका का 51 वां राज्य बनाने की इच्छा ट्रंप जी प्रकट कर चुके हैं। उसे मैक्सिको से खतरा है। उसे कोलंबिया से खतरा है। उसे ब्राजील से खतरा है। उसे खतरा ही खतरा है। उसे पहले सोवियत संघ से खतरा था। अब चीन, रूस और उत्तरी कोरिया से स्थायी खतरा है, जिसका इलाज वह अभी तक ढूंढ नहीं पाया है। खतरा है, मगर इनसे अभी वह डरा-डरा सा रहता है। उसे सुदूर अफ्रीका में नाइजीरिया से खतरा है, क्योंकि वहां के ईसाई खतरे में हैं, जिस तरह हिंदू , पाकिस्तान और बांग्लादेश में खतरे में हैं। उसे अफ्रीका के साहेल क्षेत्र के अमेरिका-विरोधी समूहों से खतरा है। उसे अफ्रीका में चीन और रूस का प्रभाव बढ़ने से खतरा है।उसने जिन आतंकी संगठनों को बनाया और बढ़ाया, उनसे भी खतरा है।
उसे अपने आपसे भी खतरा है। उसे अमेरिकी महाद्वीप के हर देश से ख़तरा है। अपने देश के उन राज्यों से भी खतरा है, जहां डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकारें हैं, वहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राज्यों की इच्छा के विरुद्ध सेना और नेशनल गार्ड लगा दिए हैं। अमेरिका को अब दुनिया भर में प्रतिष्ठित अपने विश्वविद्यालयों से भी खतरा है। रिपब्लिक पार्टी को वोट न देनेवाले वोटरों से भी खतरा है यानी अमेरिका को बाहर से ही नहीं, अंदर से भी खतरा है। जब तक अमेरिका है,उसे खतरा है। उसे चींटी से खतरा है, हाथी से खतरा है, चूहे से खतरा है। उसे कनेर के फूलों से खतरा है, उसे बिहार के ठेकुआ और मालपुआ से खतरा है, उसे मध्य प्रदेश के कलाकंद और महाराष्ट्र के श्रीखंड और पावभाजी से खतरा है। उसे हिंदी से खतरा है, भिंडी से खतरा है, गरीब के चिथड़ों से खतरा है। उसे आपसे, हमसे और उनसे भी खतरा है! इस व्यंग्य लेख से उसे खतरा है, इसे पढ़ने वालों से उसे खतरा है। इतना दयनीय है अमेरिका, उसे खतरा है!
*(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)*
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2. ऐ ईरानियों, विश्व गुरु का नाम बदनाम ना करो! : राजेंद्र शर्मा*
हमें तो ईरान वालों के लिए सॉरी फील हो रहा है, बुरा-सा लग रहा है। नहीं, नहीं, हम किसी को सॉरी नहीं बोल रहे हैं। हम किसी को सॉरी बोलने नहीं जाते। किसी को भी नहीं। फिर ईरान वाले तो आते ही किस गिनती में हैं। पहले कभी किसी से सॉरी बोला होगा तो बोला होगा, पर मोदी युग में तो सॉरी बोलने का कोई सवाल ही नहीं उठता है। मोदी कुल रीति सदा चली आयी, न इस्तीफा देब, न माफी मांगी जाई!
जब मोदी जी ने 2002 के गुजरात के नरसंहार के लिए माफी नहीं मांगी, जब मोदी जी ने नोटबंदी के लिए माफी नहीं मांगी, जब मोदी जी ने कोरोना के टैम में दवा, आक्सीजन, अस्पताल में बैड के अभाव में तड़प-तड़प कर दम तोड़ने वालों के घरवालों से, लॉकडाउन में सैकड़ों किलोमीटर पैदल घिसट-घिसट कर शहरों से गिरते-पड़ते गांव-घर तक पहुंचने वाले मजदूरों से माफी नहीं मांगी, जब मोदी जी ने इलैक्टोरल बांड के गैर-कानूनी हथियार के जरिए, हजारों करोड़ रुपये की अवैध वसूली के लिए माफी नहीं मांगी, और तो और, सवा साल दिल्ली के बार्डरों पर डटे रहे किसानों से बिना अगर-मगर लगाए माफी नहीं मांगी, तो उनके प्रजा जन कैसे माफी मांगेंगे?
और माफी भी ईरान से। और वह भी सिर्फ इसलिए कि उस पर जब इलाके से बाहर वालों ने हमला किया, तो हमारे मुंह से विरोध के दो शब्द तक नहीं निकले। जब उसके सबसे बड़े नेता की निशाना साधकर हत्या कर दी गयी, तो हमारे नेता से शोक तक नहीं जताया गया। अब विरोध करना, शोक जताना और पड़ोसी का साथ देना और किसी वजह से ऐसा न कर पाएं तो माफी मांगना, ये सब तो नैतिक तकाजे हैं, जिनसे गांधी-नेहरू के टैम वाला पुराना भारत चला करता था।
यह मोदी जी का नया भारत है, जो नैतिकता वगैरह के चक्करों में नहीं फंसता। बस बड़े सेठों का मुनाफा देखता है। तभी तो बाकी दुनिया में कुछ भी होता रहे, नया भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के रास्ते पर बढ़ता चला जा रहा है। नैतिकता के चक्कर में हिचकने वालों को पीछे छोड़ता जा रहा है। नैतिकता के चक्करों में ही पड़े रहते, तब तो हमें भी पीछे छोडक़र कोई और आगे निकल गया होता। मोदी जी के यशस्वी नेतृत्व में 2047 तक विकसित देश बनने के रास्ते पर बढ़ते भारत के ऐसा करने का तो सवाल ही नहीं उठता है।
हम तो सिर्फ इतना कह रहे हैं कि हमें भी बुरा सा लग रहा है। हमें भी बुरा लग रहा है कि हमले के पहले ही दिन अमेरिका के बमों ने मीनाब में छोटी बच्चियों के एक स्कूल को निशाने पर ले लिया और एक साथ 165 छोटी-छोटी बच्चियों को मौत की नींद सुला दिया। आखिर, इन छोटी बच्चियों ने किसी का क्या बिगाड़ा था? हमें भी बुरा लग रहा है कि भारत में एक संयुक्त नौसैनिक आयोजन से लौटते हुए, ईरान के एक युद्धपोत को, जो एक प्रकार से निहत्था था, हमारे पास के समंदर में, जहां हम समुद्री सुरक्षा मुहैया कराने की ठेकेदारी के हौसले जताते आए थे, एक अमेरिकी पनडुब्बी ने डुबो दिया और करीब एक सौ चालीस ईरानी नौसैनिकों को समंदर में मरने के लिए ही छोड़ दिया। वह तो श्रीलंका की नौसेना ने बत्तीस-चौतीस नौसैनिकों को बचा लिया, वर्ना अपने बाकी साथियों के साथ ही उनकी भी जल-समाधि हो जाती। मरने वाले नौसैनिक तो भारत में ही एक समारोही आयोजन में हिस्सा लेकर अपने घर लौट रहे थे, उनके लिए बुरा लगता है। हम तो कहेंगे कि इस लड़ाई में ईरान में भी और ईरान पर हमला करने वालों तथा उनकी मदद करने वाले देशों में भी, जितने लोग भी मरे हैं, जितने भी घायल हुए हैं और जितना भी नुकसान हुआ है और आगे होगा, उसके लिए हमें बुरा लगता है। मोदी जी गलत थोड़े ही कहते हैं, हम बुद्ध के देश से हैं, न कि युद्ध के देश से!
हमें ईरान वालों के लिए बुरा इसलिए और भी लग रहा है कि, वे बड़ी आसानी से खुद भी इस युद्ध की आफत से बच सकते थे और बाकी दुनिया को भी इस मुसीबत से बचा सकते थे। और जब हम बाकी दुनिया कहते हैं, तो शब्दश: सारी दुनिया को मुसीबत से बचाने की बात करते हैं। देखा नहीं, कैसे तेल के चक्कर में सारी दुनिया की इकोनॉमी की वॉट लगी पड़ी है और वह भी सिर्फ एक हफ्ते की लड़ाई में। ट्रंप साहब की मानें, तो उनकी तैयारी महीने भर से भी ज्यादा की है। यानी सारी दुनिया की इकोनॉमी का तो कबाड़ा ही होने वाला है समझिए। पर ईरान वाले इससे आसानी से खुद भी बच सकते थे और बाकी दुनिया को भी बचा सकते थे। जाहिर है कि बाकी दुनिया में वो खाड़ी देश भी आते ही हैं, जो अमेरिका और ईरान की लड़ाई में सिर्फ इसलिए पिस रहे हैं कि अमेरिका को ईरान को निशाना बनाने के लिए उनके ठिकानों और तरह-तरह की सहूलियतों का सहारा लेना पड़ रहा है। उस बेचारे को खाड़ी की पंचैती करने के लिए, अपने लाव-लश्कर के साथ, हजारों किलोमीटर दूर से जो आना पड़ता है।
ईरान वाले दुनिया को इस मुसीबत से बचा सकते थे, कैसे? सिंपल है। विश्व गुरु का दिखाया रास्ता अपना कर। ईरान को ज्यादा अपना दिमाग लगाने की जरूरत ही नहीं थी। बस भारत जो-जो करता रहा है, वही-वही करना था। स्वतंत्रता, संप्रभुता सब भूल जाते, जो ट्रम्प साहब कहते, यस सर कहकर मान लेते। ट्रम्प साहब कहते कि हमारा पट्ठा नेतन्याहू जो कहे, पहले वह मानकर दिखाओ, तो नेतन्याहू जो कहता मानकर दिखा देते। ट्रंप-नेतन्याहू कहते कि ईरान में राजशाही को वापस ले आओ, तो राजशाही वापस ले आते। ट्रंप साहब कहते कि अपना तेल, हमारी बड़ी तेल कंपनियों के हवाले कर दो, तो कर देते। ट्रंप और नेतन्याहू कोई पागल तो हैं नहीं कि फिर भी ईरान पर हमला करते। ईरान को भी खाड़ी देशों के अमेरिकी अड्डों पर हमला नहीं करना पड़ता। पर नहीं, ईरान वालों को तो अपने ही मन की करनी थी। विश्व गुरु का उदाहरण सामने था, पर नहीं, उन्हें तो विश्व बॉस की इच्छा अनसुनी करनी थी। सो भुगत रहे हैं और अपने साथ बाकी सारी दुनिया को भी भुगतवा रहे हैं। और लड़ाई में विश्व बॉस का कुछ बिगड़े न बिगड़े, कम से कम सारी दुनिया में विश्व बॉस के साथ-साथ विश्व गुरु की भी थू-थू तो करा ही रहे हैं।
ईरानियो, इतने वार सहकर अब तो संभल जाओ। कम से कम स्वतंत्रता, संप्रभुता वगैरह की गुजरे जमाने की बातें पब्लिक को याद दिलाकर, विश्व गुरु का नाम बदनाम ना करो।
*(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)


