हरियाणा राज्यसभा चुनाव
लोकतंत्र की जीत, भाजपा का धनतंत्र और शकुनी रणनीति हुई सरेंडर-पर्ल चौधरी
“निर्दलीय का मुखौटा पहनाकर असल राजनीतिक मंशा छिपाने की कोशिश
चुनाव ने राज्य की राजनीति, सामाजिक समीकरण, लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा ली
भारतीय जनता पार्टी और पार्टी नतृत्व सामाजिक न्याय की भावना के खिलाफ
कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा सांसद कर्मबीर बौद्ध, वंचित वर्ग के प्रतिनिधि
फतह सिंह उजाला
गरुग्राम/पटौदी। हरियाणा में हुए राज्यसभा चुनाव ने केवल एक संसदीय सीट का फैसला नहीं किया, बल्कि राज्य की राजनीति, सामाजिक समीकरणों और लोकतांत्रिक मूल्यों की भी परीक्षा ली। मतगणना के दौरान आई रुकावटों और घटनाक्रमों ने यह संकेत दिया कि चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के प्रयास हुए, जिन पर गंभीर सवाल उठे हैं। हरियाणा महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष पर्ल चौधरी ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “लोकतंत्र में पारदर्शिता सबसे बड़ी ताकत होती है, लेकिन यहां बार-बार प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिश ने कई सवाल खड़े किए हैं।” यह चुनाव शुरुआत से ही असामान्य परिस्थितियों में लड़ा गया। भारतीय जनता पार्टी ने एक ऐसे उम्मीदवार को “निर्दलीय” के रूप में मैदान में उतारा, जो लंबे समय से पार्टी से जुड़ा रहा है। इस कदम को केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों को प्रभावित करने के प्रयास के रूप में भी देखा गया।
इस पर पर्ल चौधरी ने कहा, “निर्दलीय का मुखौटा पहनाकर असल राजनीतिक मंशा को छिपाने की कोशिश हरियाणा की जागरूक जनता से नहीं छिप सकती।” कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार कर्मबीर बौद्ध, जो वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, उनके खिलाफ इस तरह की रणनीति अपनाकर भाजपा ने सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न को और अधिक प्रासंगिक बना दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी लगातार “जितनी संख्या भारी, उतनी हिस्सेदारी” की बात करते रहे हैं। इस संदर्भ में पर्ल चौधरी का कहना है, “जब संख्या ही पूरी नहीं थी, तब भी प्रतिनिधित्व पर डाका डालने की कोशिश करना बताता है कि भाजपा सामाजिक न्याय की भावना के खिलाफ खड़ी है।”
यहां के भाजपा नेतृत्व पर अविश्वास का प्रमाण
उन्होंने कहा चुनाव के दौरान एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया—भाजपा का केंद्रीय हस्तक्षेप। गुजरात से उपमुख्यमंत्री हर्ष सांगवी को पर्यवेक्षक के रूप में भेजा गया, जिसे इस रूप में देखा गया कि मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और प्रदेश अध्यक्ष मोहन लाल बडोली को बाहरी राजनीतिक मॉडल के सामने झुकना पड़ा। पर्ल चौधरी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “हरियाणा की राजनीति को बाहर से नियंत्रित करने की कोशिश दरअसल यहां के भाजपा नेतृत्व पर अविश्वास का प्रमाण है।”
भाजपा की राजनीति सामाजिक संतुलन नहीं एकतरफा
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पर्ल चौधरी ने एक महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने रखा। उन्होंने कहा, “आज हरियाणा में लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर कुल 15 सांसद हैं। इनमें कांग्रेस पार्टी के 6 सांसदों में से 3 सांसद वंचित समाज से आते हैं, यानी 50 प्रतिशत हिस्सेदारी दी गई है। वहीं भारतीय जनता पार्टी के 9 सांसदों में इस वर्ग का प्रतिनिधित्व न के बराबर है। यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि भाजपा की राजनीति सामाजिक संतुलन के बजाय एकतरफा है।” हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस विधायकों ने एकजुटता और दृढ़ता का परिचय दिया। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के “बब्बर शेरों” ने इस तथाकथित मॉडल को चुनौती देते हुए अंततः उसे परास्त कर दिया। अंत में, कांग्रेस उम्मीदवार कर्मबीर बौद्ध की जीत हुई, जिसे लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक संतुलन की जीत के रूप में देखा जा रहा है। इस जीत का श्रेय कांग्रेस के वरिष्ठ नेतृत्व—पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा, प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह, प्रभारी बी. के. हरिप्रसाद तथा सभी विधायकों—को जाता है।
भाईचारे और लोकतंत्र में विश्वास की जीत
इस अवसर पर पर्ल चौधरी ने कहा, “यह जीत सिर्फ एक उम्मीदवार की नहीं, बल्कि हरियाणा की 36 बिरादरी के भाईचारे और लोकतंत्र में विश्वास की जीत है।” अंत में हरियाणा की जनता अखिल भारतीय कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व—सामाजिक न्याय के योद्धा राहुल गांधी, राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे तथा संगठन महासचिव के. सी. वेणुगोपाल—का तहे दिल से धन्यवाद करती है, जिन्होंने श्री कर्मबीर बौद्ध जी को उम्मीदवार बनाकर सामाजिक न्याय की दिशा में एक मजबूत कदम उठाया। यह चुनाव एक स्पष्ट संदेश देता है कि हरियाणा की जनता किसी भी प्रकार की विभाजनकारी राजनीति के आगे झुकने वाली नहीं है।
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