*भारतीय नाविकों की सुरक्षा अब भारत की शीर्ष रणनीतिक प्राथमिकता क्यों होनी चाहिए?*
आलेख : जैकब क्लिंट, अनुवाद : संजय पराते
ऐसे समय में जब ओमान की मध्यस्थता में बातचीत चल रही थी, ब्लू वॉटर्स जो कभी आर्थिक खुशहाली और पारस्परिक जुड़ाव को दिखाता था, अब धातुओं के कब्रिस्तान और एक बड़े युद्ध का मंच बन गया है। ईरान पर थोपा गया साम्राज्यवादी युद्ध, जिसमें अमेरिका और इज़राइल का मुख्य मकसद सरकार को बदलना है, पश्चिम एशिया से आगे बढ़कर भारत के दरवाजे तक पहुँच गया है। इस लड़ाई के केंद्र में भारतीय नाविक हैं, जो अक्सर वैश्विक वाणिज्य के अनदेखे स्तंभ होते हैं, जो अब खुद को हमले की जद में और एक जानलेवा गोलीबारी में फंसा हुआ पा रहे हैं, जो समुद्री इतिहास का चेहरा हमेशा के लिए बदल सकती है।

वर्तमान समुद्री संकट का मानवतावादी पहलू चौंकाने वाला है, जो वैश्विक कार्य बल के लिए एक कठोर वास्तविकता को उजागर करता है। भारतीय नाविक, जो दुनिया के व्यापारिक बेड़े का लगभग 10% हिस्सा बनाते हैं, अब इस भू-राजनीतिक संघर्ष के केवल अनजाने पीड़ित नहीं हैं ; वे एक साम्राज्यवादी युद्ध के मुख्य शिकार बन गए हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि ये मजदूर वैश्विक व्यापार के सबसे खतरनाक मार्गों पर नौ परिवहन संचालित करते हुए गोलीबारी में मारे जा रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली घटना ओमान की खाड़ी में पलाऊ-ध्वज वाले टैंकर स्काईलाइट पर हमले के दौरान हुई। एक मिसाइल हमला जहाज के ब्रिज पर हुआ, जो क्षेत्रीय शक्तियों के बीच प्रतिशोधात्मक कार्रवाईयों का एक सीधा परिणाम था। इस हमले में तीन भारतीय मजदूरों की मौत हो गई और अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए, जिससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को चलाए रखने के दौरान मजदूर वर्ग के समक्ष उपस्थित गंभीर जोखिमों का पता चलता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और फारस की खाड़ी में हालात काफी बिगड़ गए हैं और वे “डार्क ज़ोन” बन गए हैं। जीपीएस धोखाधड़ी, इलेक्ट्रॉनिक दखल और ड्रोन हमलों के लगातार खतरे ने नौ-परिवहन संचालन को मौत का जुआ बना दिया है। इस जल क्षेत्र में टैंकरों और कार्गो जहाजों पर सवार हजारों भारतीयों के लिए, हर एक घंटा एक अनदेखे दुश्मन के खिलाफ जिंदा रहने की लड़ाई है। ऐसे जल क्षेत्र में, जहां कभी भी कोई “फैंटम” मिसाइल हमला कर सकती है, नौ-परिवहन करने का मनोवैज्ञानिक असर होता है। यह चालक दल के ऐसे सदस्यों के बीच मानसिक स्वास्थ्य का संकट पैदा कर देता है, जिनमें से कई जहाज़ों में फंसे हुए हैं, जो अपने जलयानों को किनारे नहीं लगा पा रहे हैं या अपने खतरनाक रास्तों से भटक गए हैं।
हिंद महासागर क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नौसैनिक संघर्ष ने हलचल पैदा कर दी हैं। एक नाटकीय घटनाक्रम में, ईरानी नौसेना का प्रमुख युद्धपोत, आईआरआईएस डेना, 4 मार्च 2026 को श्रीलंका के गाले तट से लगभग 40 समुद्री मील की दूरी पर उच्च समुद्री झड़प में अमेरिकी पनडुब्बियों द्वारा टॉरपीडो से उड़ा दिया गया। यह जहाज विशाखापत्तनम में भारत के मिलान 2026 नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के बाद ईरान लौट रहा था। जबकि इस हमले पर पश्चिम के देशों ने चुप्पी साधे रखी थी, श्रीलंका ने इस बात की पुष्टि की कि जहाज ने डूबने से पहले एक संकट संकेत भेजा था। श्रीलंकाई बचावकर्मियों ने 32 नौसैनिकों को बचाया, लेकिन जहाज पर सवार 180 कर्मियों में से दर्जनों लापता हैं या मारे गए हैं।
यह संकट विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित राइसीना डायलॉग में चर्चा का केंद्रीय विषय बना, जहां एक आश्चर्यजनक राजनयिक बदलाव आया। श्रीलंका और मालदीव जैसे छोटे राज्यों ने भी अमेरिका के प्रति अपनी रीढ़ दिखाते हुए, भू-राजनीतिक दबाव के बावजूद त्रासदी का पारदर्शी विवरण प्रदान किया। इस तनाव के बीच, ईरान के उप विदेश मंत्री ने कहा कि भारत को उस जहाज़ पर हुए हमले की अधिकृत तौर पर निंदा करनी चाहिए, जो अभी-अभी उसके अपने नौसैनिक अभ्यास में मेहमान बनकर आया था। बहरहाल, मोदी सरकार की चुप्पी साबित करती है कि वह इतनी अधीनस्थ और डरपोक हो गई है कि उसने प्रभावी रूप से भारत के वैश्विक पहचान और रणनीतिक स्वायत्तता को त्याग दिया है।
बहरहाल, सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात है आईआरआईएस डेना के डूबने पर भारत की डरपोक चुप्पी। भारतीय महासागर क्षेत्र में एक पारंपरिक सुरक्षा प्रदाता के रूप में, भारत का औपचारिक निंदा या विस्तृत रिपोर्ट जारी करने से इंकार करना अमेरिकी हितों के समक्ष भारत के राजनयिक आत्मसमर्पण को दिखाता है।अमेरिका के साथ अपने “मेजर डिफेंस पार्टनर” स्टेटस और इज़राइल के साथ अपने गहरे होते रिश्तों को प्रबंधित करते हुए भी, भारत को ईरान के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी बनाए रखनी चाहिए, जो चाबहार पोर्ट और क्षेत्रीय संपर्क के लिए ज़रूरी है। यह चुप्पी भारतीय नाविकों को अनिश्चितता के शून्य में छोड़ देती है। वे सोचते हैं कि उनका संरक्षक क्या मात्र एक दर्शक बन रहा है, जबकि वे जिन जलमार्गों पर यात्रा करते हैं, वे नाविकों के एक कब्रिस्तान में बदल रहे हैं।
इस संकट की गंभीरता को समझने के लिए, राष्ट्रीय आर्थिक परिदृश्य में नाविकों के महत्व को समझना आवश्यक है। अंतर्राष्ट्रीय समुद्री उद्योग में नाविक प्रदान करने वाले देशों की सूची में भारत तीसरे स्थान पर है। देश में इस क्षेत्र में 2.5 लाख से अधिक पंजीकृत पेशेवर नाविक हैं। ये देश की ऊर्जा सुरक्षा के जीवन आधार हैं और वे यह सुनिश्चित करते हैं कि भारत के 80% से अधिक कच्चे तेल और 50% एलएनजी की आपूर्ति विश्व भर से हो। इसके अलावा, इन नाविकों द्वारा भेजी गई विदेशी मुद्रा भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में अरबों डॉलर का योगदान देती है और केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे तटीय राज्यों में लाखों परिवारों का पालन-पोषण करती है।
बड़े पैमाने पर, अंतर्राष्ट्रीय समुद्री उद्योग में भारतीय नाविकों का योगदान अतुलनीय है। विशाल आकार के ट्रिपल ई-कंटेनर जहाजों से लेकर अत्यधिक उन्नत और तकनीकी रूप से परिष्कृत एलएनजी जहाजों तक, भारतीय नाविक हर जलयान कंपनी के लिए एक मूल्यवान संपत्ति हैं। उनके बिना, अंतर्राष्ट्रीय समुद्री उद्योग पूरी तरह से खत्म हो जाता, अगर रूस-यूक्रेन की लड़ाई ने पूरी दुनिया को ऊर्जा संकट में न डाल दिया होता।
अपने मूल्यवान योगदान के बावजूद, युद्ध ने एक अंधकारमय वास्तविकता को उजागर किया है। चूंकि बीमा प्रीमियम आसमान छू रहे हैं और शिपिंग कंपनियों को संघर्ष-सम्बंधी प्रतिबंधों के कारण संभावित दिवालियापन या काली सूची में डाले जाने का सामना करना पड़ रहा है, कई भारतीय नाविकों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है। जलयानों को खतरनाक जल क्षेत्र अस्थायी रूप से रोककर रखा गया है, जहाज मालिक संचार-विच्छेद कर रहे हैं और वे आवश्यक आपूर्ति या वेतन प्रदान करने में विफल हो रहे हैं।
समुद्री श्रम सम्मेलन (मैरीटाइम लेबर कन्वेंशन), जिसे नाविकों के अधिकारों का कानून भी कहा जाता है, वह एकमात्र चीज है, जो जहाजों पर काम करने वाले लोगों की रक्षा करती है। यह कन्वेंशन कहता है कि जहाजों पर काम करने वाले लोगों को युद्ध क्षेत्र में जाने से इंकार करने का अधिकार है। उन्हें तुरंत घर जाने का भी अधिकार है और जहाज के मालिक को इसके लिए भुगतान करना होगा। मैरीटाइम लेबर कन्वेंशन यह भी कहता है कि जहाजों का बीमा होना चाहिए, जो जहाज पर काम करने वाले लोगों के वेतन और उन्हें घर भेजने की लागत को भी कवर करेगा, यदि वे निःसहाय छोड़ दिए जाते हैं। यह अब बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य में कई लोग फंसे हुए हैं और उनके पास न तो भोजन है और न ही मदद पाने का कोई अन्य तरीका है।
डर के इस माहौल में, सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीआईटीयू) और फॉरवर्ड सी-मेंस यूनियन ऑफ इंडिया (एफएसयूआई), जो सीटू से संबद्ध है, ने समुद्री कार्यबल के प्राथमिक रक्षक के रूप में पहलकदमी की है। सीटू और एफएसयूआई ने महसूस किया है कि नाविकों का उपयोग तोप के चारे की तरह किया जा रहा है, इसलिए उन्होंने एक बहु-स्तरीय हस्तक्षेप शुरू किया है। एफएसयूआई ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक जरूरी ज्ञापन भेजा है, जिसमें सबसे अस्थिर क्षेत्रों में फंसे लोगों की रक्षा के लिए भारतीय नौसेना की तत्काल तैनाती की मांग की गई है। उन्होंने शिपिंग के महानिदेशालय से संघर्ष क्षेत्र में जीवन की हानि या गंभीर चोट का सामना करने वाले भारतीय नाविकों के लिए सीफेयरर्स वेलफेयर फंड सोसाइटी (एसडब्ल्यूएफएस) के माध्यम से न्यूनतम 45 लाख रुपये की अनुग्रह राशि की घोषणा करने का औपचारिक अनुरोध किया है। एफएसयूआई के हस्तक्षेप के माध्यम से, ‘अदृश्य कार्यबल’ की दुर्दशा मुख्यधारा के भारतीय मीडिया तक पहुंच पाई है, जिससे यह सार्वजनिक चर्चा शुरू हुई है कि समुद्र में भारतीय जीवन को भूमि पर जीवन के समान प्राथमिकता क्यों नहीं दी जाती है। यूनियन ने युद्ध-प्रभावित क्षेत्रों में पी एंड आई (प्रोटेक्शन एंड इंडेमनिटी) कवरेज की अनुपस्थिति के बारे में भी तत्काल चिंता जताई है और इन असाधारण परिस्थितियों में नाविकों के कल्याण की सुरक्षा पर जोर दिया है।
भारतीय नाविकों की दुर्दशा इस बात का संकेत है कि हमारी आधुनिक दुनिया कितनी नाजुक है। ये पुरुष और महिलाएं, जो समुद्र के ‘स्काईलाइट्स’ को नेविगेट करते हैं, चुप्पी भरी कूटनीति और परित्यक्त जहाजों से अधिक की हकदार हैं। एफएसयूआई और सीटू के हस्तक्षेप ने एक आशा की किरण प्रदान की है, यह सुनिश्चित करते हुए कि मैरीटाइम लेबर कन्वेंशन (एमएलसी) के कानूनी संरक्षण केवल कागज पर शब्द नहीं हैं, बल्कि सक्रिय जीवन-आधार हैं।
जब भारतीय महासागर अधिक अशांत ज्वार की ओर बढ़ रहा है, तो भारत सरकार को चुप्पी तोड़कर कार्रवाई की ओर बढ़ना चाहिए। होर्मुज जलडमरूमध्य में खून का बहना आखिरी उपाय होना चाहिए, अन्यथा दुनिया जब अपनी संवेदनाओं को पुनः प्राप्त करेगी, तो पता चलेगा कि वे लोग, जो इसके दिल को धड़काते रहे है, वे नाविक, जलयान चलाने के लिए वहां नहीं होंगे।
*(लेखक फॉरवर्ड सी-मेंस यूनियन ऑफ इंडिया (सीटू) के संयुक्त सचिव हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*


