म्यूनिख मंसूबा : भेड़िये ने दिया गिद्धभोज का न्यौता*
आलेख : बादल सरोज
घटनाओं को उनके आगे-पीछे से काटकर सिर्फ घटना के रूप देखना एक तरह की दुर्घटना ही कहा जाएगा, उन्हें एक परिघटना के हिस्से और अभिव्यक्ति के रूप में देखने से ही ठीक-ठीक समझा जा सकता है। सरल भाषा में कहें, तो सिर्फ रूप भर निहारने से असलियत उजागर नहीं होती, समग्रता उसके सार में होती है। यह बात जितनी सामान्य जीवन के लिए सच है, उतनी बल्कि, उससे कहीं ज्यादा, राजनीतिक और सामाजिक घटनाविकास के मामले में सटीक है।
इसी का थोड़ा और विस्तार किया जाए, तो कारनामों को सिर्फ व्यक्तियों, उनकी सनक या इच्छा भर मान लेना सही नहीं है, मूलतः वे एक ख़ास रुझान, दिशा और उद्देश्य की अभिव्यक्ति होती हैं। ईरान पर थोपे गए युद्ध, गज़ा में जारी नरसंहार, वेनेजुएला के राष्ट्रपति के उनकी पत्नी सहित घोर आपराधिक अपहरण, दुनिया भर के खिलाफ छेड़े गए टैरिफ युद्ध, अंतर्राष्ट्रीय कानूनों से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ को खुले-आम दिखाए जा रहे ठेंगे सहित भारत जैसे बड़े देश के अमरीका द्वारा बार-बार किये जा रहे सार्वजनिक अपमान को इसी तरह से पढ़े जाने की जरूरत है।
यह सिर्फ ठरकी ट्रम्प की सनक भर नहीं है, यह दूनिया को फिर से ढालने – असल में गुलाम बनाने — की एक अत्यन्त भयानक परियोजना की पटकथा है।
वह दुनिया कैसी होगी, उसकी कुटिल योजना का ब्लूप्रिंट ट्रम्प वाली अमरीका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने 14 फरवरी को म्यूनिख में हुए सुरक्षा सम्मेलन – सिक्यूरिटी कांफ्रेंस – में रखा। इसे रखते में रुबियो ने ऊपर लिखी बात अपनी तरह से दोहराते हुए कहा कि ‘’सेनाएं अमूर्त धारणाओं के लिए नहीं लड़ती हैं। सेनाएं एक जनसमूह के लिए लड़ती हैं ; सेनाएं राष्ट्र के लिए लड़ती हैं ; सेनाएं जीवन-पद्धति के लिए लड़ती हैं। और हम इसी की रक्षा कर रहे हैं : एक महान सभ्यता, जिसके पास अपने इतिहास पर गर्व करने, अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त होने का पूरा अधिकार है, और जो सदैव अपनी आर्थिक और राजनीतिक नियति की मालिक बने रहने का संकल्प रखती है।“
जिस महान सभ्यता की बहाली की पैरवी ट्रम्प के विदेश मंत्री की ने की, उसी ने बिना पलक झपकाए उसका खाका भी रखा, जिसका सार यह है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के गुलाम देशों का आजाद होना और उपनिवेशवाद का खात्मा होना गलत था, बड़े-बड़े लोककल्याणकारी राज्यों का गठन होना गलत था, लोकतंत्र और (शासक देशों को छोड़ बाकी देशों की) संप्रभुता की समझदारी का विकसित होना गलत था, विश्व मानवता एक समान है और हरेक का सम्मान ही वैश्विक सभ्यता की पहचान है, यह भी गलत धारणा है । इन सबको उलटा जाना चाहिए। पृथ्वी के पर्यावरण आदि की रक्षा की बात करना एक तरह का ‘कल्ट’ है, इसके चक्कर में नहीं आना चाहिए। बिना किसी लाग लपेट के रुबियो ने गोरों की सर्वोच्चता – व्हाइट सुप्रीमेसी – की गौरवगाथा का गान करते हुए उसी महान सभ्यता को फिर से लाने के संकल्प का एलान किया।
रुबियो के शब्दों में “द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति से पहले पांच शताब्दियों तक पश्चिमी जगत फैलता रहा था – उसके मिशनरी, उसके तीर्थयात्री, उसके सैनिक, उसके खोजकर्ता उसके तटों से निकलकर महासागरों को पार करते रहे ; नए महाद्वीपों में बसते रहे ; और दुनिया भर में विशाल साम्राज्य खड़े करते रहे। लेकिन 1945 में, कोलंबस के युग के बाद पहली बार, यह विस्तार सिमटने लगा। यूरोप तबाह हो चुका था। उसका आधा भाग लौह आवरण के पीछे जीवन बिता रहा था और शेष भी मानो उसी दिशा में बढ़ता दिखाई देता था। महान पश्चिमी साम्राज्य अपने पतन के अंतिम दौर में प्रवेश कर चुके थे। ईश्वरविहीन साम्यवादी क्रांतियों और उपनिवेशविरोधी विद्रोहों ने इस प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया, जिसने आने वाले वर्षों में विश्व का स्वरूप बदल दिया और मानचित्र के विशाल हिस्सों को हंसिया-हथौड़ा वाले लाल झंडों से ढंक दिया।“ उसने कहा कि अमरीका अब इस दुनिया को फिर से उसी तरह की – द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले की — दुनिया बनाने के लिए दृढ प्रतिज्ञ है।
नई सदी को एक बार फिर दुनिया भर पर पश्चिमी वर्चस्व वाली सदी बनाने और इस तरह इतिहास को उलटने की इस डरावनी परियोजना में भागीदारी के लिए यूरोप को न्यौता देते हुए उसने यूरोपीयों के साथ अपनी रिश्तेदारी भी खोज निकाली : अमरीका को ‘खोजने’ वाले कोलंबस और उसके बाद समय-समय पर अमरीकी मूल निवासियों के नरसंहार कर पूरे महाद्वीप पर कब्जा करने वाले अलग-अलग यूरोपीय देशों का नाम ले लेकर उनके प्रति आभार जताया। यूरोप को लुभाते हुए रुबियो ने कहा कि : “हम अमेरिकियों के लिए, हमारा घर भले ही पश्चिमी गोलार्ध में हो, लेकिन हम हमेशा यूरोप की संतान ही रहेंगे। अमेरिका और यूरोप एक-दूसरे के पूरक हैं। हम एक ही सभ्यता – पश्चिमी सभ्यता – का हिस्सा हैं। हम उन सबसे गहरे बंधनों से एक-दूसरे से जुड़े हैं, जो राष्ट्र साझा कर सकते हैं – सदियों के साझा इतिहास, ईसाई धर्म, संस्कृति, विरासत, भाषा, वंश और उन बलिदानों से निर्मित बंधन, जो हमारे पुरखों ने उस साझा सभ्यता के लिए दिए, जिसके हम वारिस हैं। हम आध्यात्मिक रूप से और सांस्कृतिक रूप से भी परस्पर जुड़े हुए हैं।“
जिस यूरोप को ट्रम्प लगातार लज्जित करता है, ग्रीनलैंड पर कब्जे का खुलेआम एलान करता है, उस यूरोप को दिया जा रहा निमंत्रण भी बिना धमकी के नहीं था। रुबियो ने साफ़ साफ़ शब्दों में कहा कि : “राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में, अमेरिका एक बार फिर नवीनीकरण और पुनर्स्थापना का कार्य संभालेगा, जो एक ऐसे भविष्य के दृष्टिकोण से प्रेरित होगा, जो हमारी अतीत की सभ्यता की तरह ही गौरवशाली, संप्रभु और जीवंत हो। और यदि आवश्यक हुआ, तो हम इस काम को अकेले करने के लिए तैयार हैं, लेकिन हमारी प्राथमिकता और हमारी आशा यही है कि हम इसे आपके साथ – यहां यूरोप में अपने मित्रों के साथ – मिलकर करें।“
मतलब यूरोप भी आये या न आये, अमरीका तो उसे करके ही मानेगा। उसने साफ़ एलान किया कि दुनिया के, विशेषकर जिसे वैश्विक दक्षिण – ग्लोबल साउथ – कहा जाता है, जिन्हें सदियों तक गोरों ने गुलाम बनाकर लूटा था, उसके सारे संसाधनों पर राजी या गैर-राजी अमरीका का कब्जा होना चाहिए ।
यह सिर्फ गुण्डई की भाषा नहीं है, यह पूरी दुनिया को अपने अधीन बनाने का शैतानी विचार है। इस सबकी वजह भी रुबियो ने मानी और जिस वैश्वीकरण की आर्थिक प्रणाली को खुद उसने विश्व बैंक, आई एम एफ और विश्व व्यापार संगठन के जरिये दुनिया पर थोपा था, उसकी विफलता को स्वीकार किया। उसे अपनी गलती बताया। यह गलती अब फिर से गुलामी और नए रूप का उपनिवेशवाद लाकर सुधारी जानी है।
इस गुलामी के अलावा ट्रम्प की अगुआई में नवीनीकरण और पुनर्स्थापना की जिस महान सभ्यता की बहाली की बात रुबियो ने की, वह कैसी होगी इसका उदाहरण – यदि वियतनाम युद्ध और लैटिन अमरीका तथा अफ्रीका पर थोपी गयी जंग को छोड़ भी दें तो — पिछली दो साल से अधिक समय से गज़ा में जारी बच्चों और महिलाओं सहित नागरिक आबादी के नरसंहार और ईरान पर ताजे हमले की शुरुआत 28 फरवरी 2026 को लड़कियों के स्कूल पर बम फोड़ 153 से अधिक बच्चियों की ह्त्या करके दिया जा रहा था। जिस ‘आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महानता’ की दुहाई दी जा रही थी, वह कितनी घिनौनी है, यह अब तक जारी 35 लाख एप्सटीन फाइलों में दुनिया देख चुकी है और न जाने कितनी लाख और फाइलों में देखना बाकी है।
ध्यान दें, अमरीकी विदेश मंत्री म्यूनिख में जो कह रहा था, उसमे नया कुछ भी नहीं है। सैमुअल हंटिंगटन इसे सभ्यताओं के टकराव — ‘द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन्स’ – के अपने कुख्यात सिद्धांत में तीस साल पहले 1996 में ही दे चुके है। हंटिंगटन का दावा था कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद, अब दुनिया में संघर्ष का मुख्य कारण सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान होगी। उसका मानना था कि भविष्य के युद्ध देशों के बीच नहीं, बल्कि अलग-अलग सभ्यताओं के बीच होंगे।
पश्चिमी सभ्यता को सबसे विकसित और आदर्श बताते हुए हटिंगटन ने उसका टकराव जिन 7 ‘सभ्यताओं’ से बताया था, उसने उनमें इस्लामिक, चीनी, हिन्दू, ऑर्थोडॉक्स रूसी, जापानी, लैटिन अमेरिकी, अफ्रीकी सभ्यताओं को शामिल किया था। मतलब जिस पश्चिमी वर्चस्व वाली दुनिया की बहाली का ख्वाब देखा जा रहा है, वह दुनिया की सभी सभ्यताओं के खिलाफ है। एक ऐसे देश, जिसकी उम्र मात्र 250 बरस की है, उस अमरीका का विदेश मंत्री बिना हटिंगटन का नाम लिए ही बाकी सभी सभ्यताओं के साथ टकराव को युद्ध तक पहुंचाने का एलान कर रहा है।
सनद रहे कि जिस 1945 के महायुद्ध के बाद बनी दुनिया पर स्यापा किया जा रहा है, वह हिटलर के नाजी श्रेष्ठता के कुख्यात वहम को पराजित करके कायम हुई थी और वह इसी का सबसे भौंड़ा और नृशंस पूर्व अवतार था। इसकी कीमत उस समय की दुनिया को 5 करोड़ इंसानों की मौत से चुकानी पड़ी थी। अब नयी तिथि और नए दस्तखत के साथ मौत का वही परवाना लेकर ट्रम्प का अमरीका आया है। रुबियो का ‘म्यूनिख घोषणापत्र’, एक तरह से, ‘ईसाई पश्चिम’ की कथित सभ्यतानुरूप एकता की घोषणा है। यह सिर्फ ‘नास्तिक कम्युनिस्टों’ के खिलाफ ही नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण के ‘उपनिवेशवाद-विरोधी’ लोगों के खिलाफ भी एक आह्वान है।
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, कम-से-कम चर्चिल के बाद तो एक भी पश्चिमी नेता ऐसा नहीं हुआ, जिसने यूरोपीय उपनिवेशवाद के अंत पर इस तरह खुलकर अफ़सोस जताया हो। पड़ोसी क्यूबा और वेनेजुएला से लेकर मध्य में यूरोप और पश्चिम एशिया तक और यूरेशिया के पार सुदूर पूर्व तक, संयुक्त राज्य अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध के बाद प्राप्त प्रभुत्व को बनाए रखने का प्रयास कर रहा है। रुबियो का यूरोप को दिया गया आश्वासन हाल ही में यूरोपीय चिंताओं के मद्देनजर आया है, जिन्हें लगता है कि ट्रंप ‘अमरीका को पुनः महान बनाने’ के समर्थन में उन्हें दरकिनार कर सकते हैं। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उन्हें खड़े होकर तालियाँ मिलीं।
सवाल यह है कि जब भारत सहित दुनिया के 100 से भी अधिक देशों के महान स्वतत्रता संग्रामों को गलत और उनकी मुश्किल से हासिल आजादी को नुकसानदेह बताकर दोबारा से उसी तरह का साम्राज्य कायम करने की घोषणा की जा रही थी, तब वन्दे मातरम् के नाम पर कथित राष्ट्रीय गौरव की दुहाई, आत्मनिर्भरता का जाप और अपने मुंह मियाँ विश्वगुरु बनने का दावा करने वाली भारत की सरकार क्या कर रही थी? म्युनिख में मार्को रुबियो को सुनने बैठे भारत के विदेश मंत्री जयशंकर क्या कर रहे थे?
जब रुबियो इन सब कूटनीतिक बदतमीजियों, अमानवीय इरादों की बकवास के साथ रूस के तेल पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने का जिक्र करते भारत द्वारा अतिरिक्त रूसी तेल की खरीद बंद करने को सरेआम अपनी उपलब्धि के रूप में गिना रहा था, तब ठीक उसी सभागार में बैठे भारत के विदेश मंत्री ने क्या कहा?
उन्होंने भारत-अमरीकी व्यापार समझौतों का गुणगान किया, यूरोपीय देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों की बड़ाई की, मगर दुनिया के खिलाफ जंग के रुबियो की यलगार पर कुछ भी नहीं बोला।
वे ट्रम्प की घुड़कियो के आगे मुसक्का मारे बैठे, उसकी नाराजगी के डर से भारत के सदियों से पुराने मित्र ईरान के सर्वोच्च नेता की मौत पर औपचारिक श्रद्धांजलि देने से भी बच रहे अपने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरह चुपचाप सब सुनते रहे। सरकार नहीं बोली तो नहीं बोली, उसकी पार्टी भारतीय जनता पार्टी भी कुछ नहीं बोली। यहाँ तक कि बात-बेबात पर बोलने वाले और अगली सदी को हिन्दुओं की सदी होने का ख़म ठोंकने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी जुबान नहीं खोली।
ऐसा अकारण नहीं है – यह भाजपा जिसकी राजनीतिक भुजा है, उस संघ की परम्परा का हिस्सा है। एक तो इसलिए कि ट्रम्प का अमरीका जिस आर्थिक-राजनीतिक गुलामी वाले गुजर चुके अतीत की बहाली और यूरोप के नाम पर गोरों की श्रेष्ठता के नाम पर जिस नस्लवादी राह पर चलने के मंसूबे साध रहा है – आरएसएस भारत के पैमाने पर उसी तरह की आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था की बहाली के सपने देखती है।
दूसरे इसलिए कि जिन राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों को कोसा जा रहा था, उनके साथ संघ का कभी कोई रिश्ता तक नहीं रहा। उस दौरान दुनिया के अनेक देशों में चल रहे संघर्षों के प्रति सहानुभूति दिखाना तो दूर की बात थी, वे जिस देश में थे, उस भारत की आजादी की लड़ाई में वे पूरे तन-मन से अंग्रेजो के साथ रहे। रुबियो उसी की तो पुनर्स्थापना का दावा कर रहे हैं : सो भला आपत्ति कैसी!
वैसे भी इन दिनों अमरीकी साम्राज्यवाद ही नया अंग्रेज है : नया आराध्य है। उसकी नजरो में अच्छा दिखने के लिए अपने आप को सांस्कृतिक संगठन बताने वाला आरएसएस भारत-अमरीकी आर्थिक गठबंधन को महत्वपूर्ण और जरूरी बताता रहता है।9 करोड़ों रूपये खर्च करके अमेरिका में अपनी छवि सुधारने के लिए अमेरिकी विधि कंपनी ‘स्क्वॉयर पैटन बोग्स’ (एसपीबी) लॉबिंग कम्पनी की सेवा लेने – जिसे पोल खुलने के बाद बंद कर दिया गया — में भी नहीं हिचकता, जो पाकिस्तान के लिए लॉबिंग करने वाली आधिकारिक इकाईयों में से एक है। यही है संघ का असली चेहरा : वैश्विक राजनीति का उसका मनुवादी भाष्य, जिन्हें अपने से कमजोर मानते है, उनको दबाना और जिन्हें अपने से ताकतवर समझते हैं, उनके अधीनस्थ रहने को सौभाग्य समझना। अमरीका के आगे चुप्पी इसी का नतीजा है।
मगर भारत सिर्फ उसकी सरकार नहीं है, भारत सिर्फ उस सरकार का असंवैधानिक नियंत्रणकर्ता आरएसएस नही है। भारत वह डेढ़ अरब की विशाल आबादी वाला देश है, जिसके पुरखों ने करीब दो सौ साल तक ब्रिटिश गुलामी के खिलाफ शानदार लड़ाई लड़ी और जीती। जो अंग्रेजों के साथ-साथ पुर्तगालियों और फ्रांसीसियों के आधिपत्य से भी लडे और जीते। जिन्होंने लोकतंत्र और समता, कल्याणकारी राज्य की अवधारणा और हर तरह के नस्लवाद-रंगभेदवाद का विरोध खुद अपने अनुभवों से सीखा और अपने अनुल्लंघनीय व्यवहार का हिस्सा बनाया।
तय है कि भारत का वह अवाम मार्को रुबियो के ‘म्यूनिख घोषणापत्र’ में दर्ज इतिहास उलटने के इरादों को समझेगा और इनका विरोध अपने संघर्षो के एजेंडे का हिस्सा बनाएगा।
*(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)*


