*प्रकाशनार्थ*
*केरल के इतिहास के कुछ सबक सीखिए राहुलजी!*
*(साभार टिप्पणी : पीपुल्स डेमोक्रेसी, अनुवाद : संजय पराते)*
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी ने 7 मार्च को यूडीएफ की एक रैली को संबोधित किया। उन्होंने पैसों सहित केरल के लोगों को कई तरह की सौगातें देने का वादा करते हुए पाँच गारंटियों की घोषणा भी की। इन गारंटियों में केएसआरटीसी की बसों में महिलाओं के लिए मुफ़्त यात्रा, छात्राओं के लिए हर महीने इनाम, युवाओं के लिए बिना ब्याज के ऋण, स्वास्थ्य बीमा और बढ़ी हुई पेंशन आदि शामिल हैं। इन गारंटियों से केरल कोई हलचल नहीं हुई, खासकर इसलिए कि केरलम के लोग पहले से ही केरल सरकार की ऐसी कई योजनाओं का फायदा उठा रहे हैं।
बहरहाल, श्रीमान गांधी के भाषण का मकसद अलग था। उन्होंने मोदी सरकार और एलडीएफ सरकार के बीच एक ‘गुप्त’ गठबंधन की डरावनी तस्वीर दिखाने में अपनी समझ और ऊर्जा की ताकत लगाई, और यह ‘साबित’ करने की कोशिश की कि अगर मोदी सरकार जनविरोधी है, तो राज्य की एलडीएफ़ सरकार को भी उसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए। उन्होंने इसे सीजेपी (कम्युनिस्ट जनता पार्टी) कहा, और अपने ही प्रकरण का हवाला देकर अपनी बात साबित करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि ईडी ने उन पर 55 दिनों तक मुकदमा चलाया, लेकिन केरल के मुख्यमंत्री पर एक दिन भी मुकदमा नहीं चला। बदकिस्मती से, यह बात झूठी निकली, क्योंकि नेशनल हेराल्ड प्रकरण में श्रीमान गांधी और उनके परिवार पर लंबे समय से मुकदम चल रहा है, जबकि केरल के मुख्यमंत्री को उनके नाम पर चल रहे एकमात्र गंभीर प्रकरण, एसएनएस-लवलिन केस से पहले ही बरी कर दिया गया था। ईडी की आदत है कि अगर विपक्ष में किसी के खिलाफ बाल की खाल के बराबर भी चूक मिले, तो वह उस पर झपट पड़ता है और राहुल गांधी के पास इतने कंकाल हैं, जो दिखाते हैं कि कई कांग्रेसी इस थोड़-सी चूक पर फिसल गए हैं और भाजपा में शामिल हो गए हैं। शायद राहुल गांधी के लिए फायदेमंद यह होगा कि वे कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने वालों का एक डोजियर रखें, न कि एक बेतुकी तुलना के आधार पर किसी गुप्त गठबंधन के बारे में बकवास करें।
राहुलजी के लिए केरल के इतिहास से कुछ सबक लेना भी फायदेमंद होगा। केरल के कुछ कांग्रेस नेताओं की बताई बेकार की कहानियों से बचना भी फायदेमंद होगा। ऐसा पहला सबक 1957 का है, जब नए बने केरल राज्य में एक कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई, और उसने वे ज़रूरी सुधार शुरू किए, जिन्हें केंद्र में सत्ता में बैठी कांग्रेस सरकार भी कर सकती थी। इसमें भूमि सुधार, शिक्षा सुधार, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार, पुलिस सुधार, सरकारी नियुक्तियों में आरक्षण के नियम और शासन का विकेंद्रीकरण आदि शामिल थे। बहरहाल, कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने इन सुधारों का विरोध करने का फैसला किया और सरकार को गिराने के लिए जातिवादी और सांप्रदायिक ताकतों के साथ मिलीभगत की। इस तरह, कांग्रेस की वजह से सांप्रदायिकता को केरल में पहली बार सांस लेने की जगह मिली।
दूसरा सबक 1971 का है। उस समय केरल में कांग्रेस की यूडीएफ सरकार थी। थालास्सेरी में, मंदिर के जुलूस और युवाओं के एक समूह के बीच एक छोटी-सी कहा-सुनी के बाद थालास्सेरी और उसके आस-पास एक बड़ी आगजनी हो गई, जहाँ आरएसएस ने मुस्लिमों के घरों पर हमला किया और उनकी मस्जिदों और दुकानों में आग लगा दी। यह सीपीआई(एम) के कार्यकर्ता ही थे, जिन्होंने मुस्लिम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की और उन्हें आरएसएस के हमलों से बचाया। इस बचाव कार्य का नेतृत्व पिनाराई विजयन कर रहे थे, जो उस समय स्थानीय विधायक थे। तब से आरएसएस ने सीपीआई(एम) को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानना शुरू कर दिया और जब भी और जहाँ भी मुमकिन होता है, उन्हें शारीरिक हमलों और हत्या का निशाना बनाना शुरू कर दिया। पिनाराई, वह गाँव जहाँ से कॉमरेड विजयन आते हैं, इस हमले के इलाके के बीच में था। आरएसएस की भीड़ से लड़ते हुए दो सौ से ज़्यादा सीपीआई(एम) कार्यकर्ताओं ने अपनी जान दे दी। उस इलाके की कांग्रेस या तो मूकदर्शक बनी रही या आरएसएस के साथ मिली हुई थी।
तीसरा सबक 1984 का है। एक बार फिर यूडीएफ सरकार सत्ता में थी, जिसके मुख्यमंत्री श्री के. करुणाकरण थे। निलक्कल में, जो सबरीमाला से ज़्यादा दूर नही है, एक शिव मंदिर से सदियों पुराना एक पत्थर का क्रॉस मिला। सीरियन कैथोलिक चर्च उस जगह पर एक मस्जिद बनाना चाहता था, जिसका शिव मंदिर के अधिकारियों ने विरोध किया। आरएसएस और श्री कुम्मनम राजशेखरन (जो अभी राज्य के वरिष्ठ भाजपा नेता और मिज़ोरम के पूर्व राज्यपाल हैं) के नेतृत्व वाले अयप्पा सेवा संघम समेत सभी हिंदू संगठनों ने इसका विरोध किया। श्री राजशेखरन हिंदू आंदोलन के मुख्य संगठनकर्ता थे। यूडीएफ ने बीच-बचाव की बातें तो बहुत कीं, लेकिन असल में साथ हिंदुओं का दिया। आखिर में सीरियन चर्च को अपनी परियोजना छोड़नी पड़ी और उस जगह से पत्थर का क्रॉस हटाना पड़ा। यह शायद केरल में हिंदुत्व ताकतों की पहली जीत थी, जिसे यूडीएफ सरकार की ‘गुप्त’ मिलीभगत से हासिल किया गया था, जिससे असल में सांप्रदायिक ताकतों के पक्ष में एक बड़ा झुकाव आया, और इसके बाद हिंदुत्व की ताकतों का उदय हुआ।
चौथा सबक 1987 का है। एलडीएफ ने विधानसभा चुनाव एक खुले, समझौताहीन, सांप्रदायिकता विरोधी मंच से जीता था। एलडीएफ को हराने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ ने एलडीएफ के खिलाफ एक संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार उतारने का प्रयोग किया, जिसे सीएलबी (कांग्रेस-लीग-भाजपा) कहा जाने लगा। ऐसे उम्मीदवार बेपोर विधानसभा और वटकारा लोकसभा, दोनों सीटों पर खड़े किए गए थे। यह अनैतिक गठबंधन दोनों सीटें हार गया। वटकारा में एलडीएफ उम्मीदवार के रूप में जीतने वाले व्यक्ति के. पी. उन्नीकृष्णन थे, जो एक पुराने कांग्रेसी सांसद थे, जिनका हाल ही में निधन हो गया है। श्रीमान गांधी इस बात से खुश हो सकते हैं कि सभी कांग्रेसी ऐसे बेकार तरीकों का समर्थन नहीं करते थे!
पांचवां सबक काफ़ी नया है और बेशक, राहुलजी इससे अवगत है। कुछ भाजपाई वकीलों ने सबरीमाला मंदिर में मासिक-धर्म वाली लड़कियों को पूजा करने की इजाज़त दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर किया, जहां ऐसी पूजा पर रिवाज़ के तौर पर प्रतिबंध है। कोर्ट ने महिलाओं के प्रवेश की इजाज़त देते हुए अपना फ़ैसला सुनाया, और राज्य सरकार ने ऐसे फ़ैसले के साथ रहने का निर्णय किया। आरएसएस की मदद से अयप्पा भक्तों ने फ़ैसले के ख़िलाफ़ बहुत हंगामा किया, जिसमें बाद में यूडीएफ भी शामिल हो गई। असल में, 2019 का पूरा लोकसभा चुनाव का अभियान भक्तों के अधिकारों के लिए अभियान चलाकर चलाया गया था, और इस अभियान में यूडीएफ और भाजपा, दोनों ने हिस्सा लिया था।
इन छोटी-छोटी सीखों से यह बात साफ़ है कि केरल में सांप्रदायिक ताकतों को कौन बढ़ावा दे रहा है, और इस पूरे समय में सांप्रदायिक हिंसा का शिकार कौन हुआ है। पिछले स्थानीय स्वशासन चुनावों के दौरान भी, हमारे पास कम से कम एक अजीब मामला है, कि मट्टाथुर ग्राम पंचायत में, सभी कांग्रेसी वार्ड पार्षदों ने इस्तीफ़ा दे दिया और वे भाजपा में शामिल हो गए, ताकि भाजप सत्ता में आ सके, और एलडीएफ को सत्ता से बाहर रखा जा सके। केरल में कांग्रेस की इन मिलीभगतों और चालों के बाद भी राहुल गांधी में यह कहने की हिम्मत है कि सीजेपी केरल पर राज कर रही है! कांग्रेस जो कर रही है और जो वह सबसे अच्छे से कर रही है, वह है सांप्रदायिक ताकतों की पीठ पर सवारी करना, जबकि वह दिखावा यह कर रही है कि वह ‘नेहरूवादी’ हैं और ‘असली वामपंथी’ हैं। बेशक, जब 1959 में कांग्रेस के गुर्गों ने कम्युनिस्ट सरकार को हटाने में कामयाबी हासिल की, तो नेहरू और इंदिरा गांधी सबसे आगे थे। तब से, जातिवादी और सांप्रदायिक दक्षिणपंथी ताकतें हमेशा वामपंथी ताकतों को खत्म करने की फिराक में रही हैं, और कांग्रेस हमेशा उनके साथ रही है, यहां तक कि उन्हें हथियार भी दिए हैं। एलडीएफ सरकार के पिछले दस सालों में, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और संघवाद की रक्षा की लड़ाई में राज्य सरकार सबसे आगे रही है और केंद्र सरकार और राज्य में राजनीतिक विपक्ष, जिसके बारे में माना जाता है कि वह राष्ट्रीय विपक्ष का नेतृत्व कर रही है, दोनों के लगातार हमले झेल रही है! राष्ट्रीय नेता को पता होना चाहिए कि संसद के अंदर और बाहर, हिंदुत्व सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ाई में अपने एक अविचल सहयोगी के खिलाफ वह ऐसी बचकानी बात कर रहे हैं। हम ऐसे आरोपों को राजनीतिक बेवकूफी का उदाहरण कह सकते हैं, जो अपने लालची साथियों के बहकावे में आ गए हैं। लेकिन यह एक ऐसे व्यक्ति के खुद को धोखा देने का भी उदाहरण है, जिसके बयान कभी-कभी उसके अपने नियंत्रण में नहीं होते।
*(अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*


