तीन दिवसीय सम्मेलन “कुरुक्षेत्रः थ्रू द एजेस” ने इतिहास, संस्कृति और अध्यात्म को वैश्विक मंच पर दी नई पहचान
कुरुक्षेत्र/ 11 अप्रैल/ अटल हिन्द ब्यूरो
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में सीनेट हॉल में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “कुरुक्षेत्रः थ्रू द एजेस” ने इतिहास, संस्कृति, अध्यात्म और अकादमिक शोध के समन्वय का एक भव्य उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कुरुक्षेत्र की बहुआयामी विरासत को वैश्विक मंच पर सशक्त रूप से स्थापित किया। भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर), श्रीमद्भगवद्गीता अध्ययन केंद्र, स्वदेशी शोध संस्थान, जियो गीता तथा विजन कुरुक्षेत्र के सहयोग से आयोजित इस संगोष्ठी में देश-विदेश से लगभग 900 प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया, जिनमें से बड़ी संख्या में विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी करते हुए कुरुक्षेत्र के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक आयामों पर गंभीर विचार-विमर्श किया।
सम्मेलन निदेशक प्रो. भगत सिंह ने बताया कि तीन दिनों तक चले इस सम्मेलन में 24 से अधिक अकादमिक सत्रों का आयोजन किया गया, जिनमें 400 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। इन सत्रों में प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व, संस्कृत वाङ्मय, मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास, विधि अध्ययन तथा पंजाबी भाषा-साहित्य जैसे विविध विषयों को समाहित किया गया, जिससे यह संगोष्ठी बहुविषयी संवाद का एक सशक्त मंच बनकर उभरी।
प्रो. भगत सिंह ने बताया कि सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने श्रीमद्भगवद्गीता के सार्वभौमिक दर्शन को केंद्र में रखते हुए कहा कि यह ग्रंथ केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि मानव जीवन के प्रत्येक द्वंद्व का कर्तव्य, नैतिकता, संघर्ष, नेतृत्व और आत्मबोध का समाधान प्रस्तुत करता है। गीता के निष्काम कर्म, कर्तव्यनिष्ठा और लोक कल्याण के सिद्धांतों को आज के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी उतना ही प्रासंगिक बताया गया। वक्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि कुरुक्षेत्र केवल महाभारत की युद्धभूमि नहीं, बल्कि संवाद, चिंतन, ज्ञान और आध्यात्मिक जागरण की भूमि रही है, जहां से मानवता को धर्म और सत्य का मार्गदर्शन मिला।
विजन कुरुक्षेत्र के अध्यक्ष मदन मोहन छाबड़ा ने बताया कि विभिन्न सत्रों में विद्वानों ने कुरुक्षेत्र के इतिहास को व्यापक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करते हुए बताया कि इसकी ऐतिहासिकता महाभारत काल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र हड़प्पा सभ्यता, सरस्वती नदी तट की संस्कृति और वैदिक परंपराओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। शोधपत्रों में यह तथ्य सामने आया कि लगभग 10 हजार वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में स्थायी जीवन की शुरुआत हुई, जिसने आगे चलकर ग्रामीण से नगरीय सभ्यता के विकास को गति दी। इसी क्रम में सम्राट हर्षवर्धन के काल में कुरुक्षेत्र का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व चरम पर था, जब सूर्यग्रहण जैसे अवसरों पर यहां विशाल मेलों का आयोजन होता था और देश-विदेश से लोग यहां एकत्रित होते थे। विदेशी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांतों में भी इस क्षेत्र की समृद्ध सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक संरचना का उल्लेख मिलता है, जो इसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता को और मजबूत करता है।
आयोजन सचिव प्रो. आरके देसवाल ने बताया कि सम्मेलन में यह भी चर्चा का प्रमुख विषय रहा कि 1803 में अंग्रेजों के दिल्ली पर अधिकार के बाद प्रशासनिक संरचनाओं में बदलाव आए और आधुनिक काल में कुरुक्षेत्र ने पुनर्विकास की दिशा में कदम बढ़ाए। 1947 के भारत विभाजन के दौरान यह क्षेत्र शरणार्थियों के पुनर्वास का महत्वपूर्ण केंद्र बना, जिसने इसकी सामाजिक संरचना को नया रूप दिया। इस प्रकार कुरुक्षेत्र का इतिहास केवल प्राचीन गौरव तक सीमित नहीं, बल्कि मध्यकालीन और आधुनिक काल के संघर्षों और पुनर्निर्माण की गाथा भी समेटे हुए है।
लोक सम्पर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया ने बताया कि सम्मेलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि “कुरुक्षेत्र संग्रहालय” की अवधारणा का सामने आना रही, जिसे विद्वानों और आयोजकों ने भविष्य की एक ऐतिहासिक पहल के रूप में देखा। इस प्रस्तावित संग्रहालय में लगभग 10 हजार वर्षों के इतिहास को दो प्रमुख कालखंडोंकृमहाभारत पूर्व और महाभारत पश्चातकृमें विभाजित कर प्रस्तुत करने की योजना बनाई गई है। इस संग्रहालय के माध्यम से न केवल ऐतिहासिक घटनाओं, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक विकास की यात्रा को भी व्यवस्थित रूप में दर्शाया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संग्रहालय न केवल शोधार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा, बल्कि देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और आमजन को भी भारतीय संस्कृति की गहराई से परिचित कराएगा।
उन्होंने बताया कि सम्मेलन के दौरान इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले विद्वानों को “कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय इतिहास रत्न अवॉर्ड” से सम्मानित किया गया, जिनमें पद्मश्री प्रो. रघुवेंद्र तंवर, प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा और प्रो. देवेन्द्र हांडा शामिल रहे। इस सम्मान ने न केवल उनके अकादमिक योगदान को मान्यता दी, बल्कि युवा पीढ़ी के शोधार्थियों को भी प्रेरित करने का कार्य किया।
इसके अतिरिक्त, सम्मेलन के साथ आयोजित प्रदर्शनी ने भी विशेष आकर्षण का केंद्र बनकर लोगों का ध्यान खींचा। इस प्रदर्शनी में भारत विभाजन की ऐतिहासिक प्रक्रिया, सिंधु-सरस्वती सभ्यता का विस्तार, प्राचीन सिक्कों का दस्तावेजीकरण और सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया। विभाजन से जुड़े आंकड़ों, चित्रों और दस्तावेजों ने उस समय की त्रासदी और मानवीय संघर्ष को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा, जिससे दर्शकों को इतिहास को महसूस करने का अवसर मिला।
समापन सत्र में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि कुरुक्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ उसे आधुनिक तकनीकों और वैश्विक मंचों के माध्यम से प्रस्तुत करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि इस दिशा में संगठित प्रयास किए जाएं, तो कुरुक्षेत्र भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और शोध केंद्र के रूप में स्थापित हो सकता है।
प्रो. भगत सिंह ने कहा कि कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में आयोजित समग्र रूप से यह तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केवल एक अकादमिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह भारतीय इतिहास, संस्कृति और ज्ञान परंपरा को पुनः समझने, उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने और वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में एक सशक्त और दूरगामी पहल साबित हुआ।


