असम : भाजपा को हराने मजबूत विपक्षी एकता की दरकार
आलेख : इश्फाकुर रहमान, अनुवाद : संजय पराते
असम आज एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है। भाजपा के लगभग एक दशक के शासन के बाद, उसके खिलाफ पूरे राज्य में नाराज़गी दिख रही है। ज़रूरी चीज़ों की कीमतें बढ़ रही हैं, युवाओं में बेरोज़गारी बहुत ज़्यादा है और किसान, मज़दूर और छोटे व्यापारी बढ़ते आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। इन बुनियादी समस्याओं को हल करने के बजाय, भाजपा की सरकार अपने राजनीतिक आधार को मज़बूत करने के लिए विभाजनकारी राजनीति और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के साथ-साथ तानाशाही शासन पर ज़्यादा निर्भर है।
नफ़रत और ध्रुवीकरण की राजनीति मौजूदा सरकार की खासियत बन गई है। बार-बार भड़काऊ बयानों और समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की कोशिशों ने राज्य के सामाजिक माहौल को खराब कर दिया है। 26 फरवरी को गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को नोटिस जारी किया है, जिसमें राज्य सरकार को उन याचिकाओं पर जवाब देने का निर्देश दिया गया है, जिनमें पूर्वी बंगाल के मुसलमानों को ‘मिया’ कहकर निशाना बनाने वाले उनके कथित नफ़रती भाषण को चुनौती दी गई थी। ये याचिकाएं सीपीआई(एम) और सीपीआई ने और जाने-माने बुद्धिजीवी डॉ. हिरेन गोहेन और दो अन्य याचिकाकर्ताओं ने अलग-अलग दायर की है।
बिना किसी उचित पुनर्वास के राज्य के अलग-अलग हिस्सों में बेदखली की मुहिम चलाई जा रही है। कई इलाकों में, पूर्वी बंगाल मूल के मुस्लिमों और स्थानीय लोगों को इन कार्रवाईयों का सबसे ज़्यादा खामियाजा भुगतना पड़ा है। इन गरीबों की और हाशिए पर पड़े लोगों की ज़मीन, घर और रोज़ी-रोटी छिनी जा रही है। इसके साथ ही, भाजपा सरकार कॉर्पोरेटों के पक्ष में आर्थिक नीतियां लागू कर रही हैं। ज़मीन के बड़े हिस्से, जो कथित तौर पर लगभग पचास हज़ार बीघा हैं, विकास के नाम पर अडानी, अंबानी और रामदेव से जुड़ी कंपनियों जैसे कॉर्पोरेट ग्रुप्स को सौंप दिए गए हैं। इसके लिए अक्सर भूमिहीन ‘मियां’ और ‘मूल निवासी’ समुदायों को बेदखल किया गया है।
सरकार के बहु-प्रचारित विकास मॉडल की राज्य को भारी पर्यावरणिक कीमत भी चुकानी पड़ी है। सूचना के अधिकार से मिली जानकारी के अनुसार, मई 2016 से, जब भाजपा पहली बार सत्ता में आई थी, अब तक पूरे असम में 1,06,896 पुराने पेड़ काटे जा चुके हैं। हाल के वर्षों में पेड़ों को काटने की रफ़्तार तेज़ी से बढ़ी है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के समय में 2021 से 2025 के बीच 65,000 से ज़्यादा पेड़ काटे गए, जबकि सर्बानंद सोनोवाल की पिछली सरकार में यह संख्या लगभग 18,000 थी।
चुनावी प्रक्रिया की ईमानदारी पर भी सवाल उठ रहे हैं। चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों का जो विशेष पुनरीक्षण (एसआर) किया था, उसमें असम के करीब 2.52 करोड़ मतदाता शामिल थे। फरवरी, 2026 में प्रकाशित हुए अंतिम सूची में करीब 2.49 करोड़ मतदाता ही दर्ज थे, जिससे पता चलता है कि इस प्रक्रिया के दौरान करीब 2.4 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। हालांकि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक नियमित काम है, लेकिन नागरिकता से जुड़े विवादों के लंबे और संवेदनशील इतिहास वाले राज्य में, इतने बड़े पैमाने पर सत्यापन से आम मतदाताओं में चिंता ज़रूर बढ़ जाती है। ये चिंताएं 2023 में चुनाव आयोग द्वारा किए गए विधानसभा और संसदीय क्षेत्रों के विवादित पुनर्सीमांकन से और बढ़ जाती हैं, जिसके बारे में कई राजनीतिक पार्टियों और प्रेक्षकों का मानना है कि इससे सत्ताधारी भाजपा को बहुत ज़्यादा फायदा हुआ। इस काम में असम में विपक्षी पार्टियों और नागरिक समाज संगठनों की आपत्तियों को नज़रअंदाज़ करने के लिए चुनाव आयोग की बहुत आलोचना हुई थी। चुनावी प्रक्रिया को लोकतंत्र को मज़बूत करना चाहिए, न कि सत्ताधारी पार्टी को राजनीतिक मैदान को अपने पक्ष में करने में मदद करने का साधन बनना चाहिए।
इस बीच, सत्ताधारी पार्टी ने चुनावों से पहले लोक लुभावन योजनाओं को आगे बढ़ाया है। अरुणोदोई योजना-3.0 को लगभग 40 लाख लाभार्थियों तक बढ़ाया गया है और चुनाव की घोषणा से ठीक पहले 10 मार्च को 3,800 करोड़ रुपये बांटे गए हैं। कल्याण और राहत के उपाय ज़रूरी हैं, लेकिन चुनावी लालच के रूप में इन योजनाओं के विस्तार का समय और तरीका उनके इस्तेमाल को लेकर जायज़ चिंताएं पैदा करता है, खासकर तब जब असम सरकार पर कर्ज़ का बोझ खतरनाक रूप से बढ़ रहा है।
शासक गठबंधन के अंदर भी तनाव दिख रहा है। असम गण परिषद (एजीपी) के नेतृत्व ने सत्ता में बने रहने के लिए बार-बार भाजपा के सामने आत्मसमर्पण करके पार्टी के क्षेत्रीय वादों से समझौता किया है। इसके परिणामस्वरूप, भाजपा क्षेत्रीय पार्टी के सांगठनिक आधार को लगातार कमज़ोर करने में सफल रही है। भाजपा ने दूसरी जगहों पर भी ऐसा ही पैटर्न अपनाया है। महाराष्ट्र में शिवसेना, पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और यहाँ तक कि उत्तर-पूर्व में नागा पीपुल्स फ्रंट जैसे क्षेत्रीय सहयोगी पार्टियों को उसने कमज़ोर किया है। भाजपा ने बार-बार अपने सहयोगियों की कीमत पर अपनी पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए गठबंधन को एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया है। इस बार भाजपा द्वारा एजीपी को कुछ ही सीटें देने से, कहा जा रहा है कि उसके अनुयायियों और कार्यकर्ताओं के कुछ हिस्सों में नाराज़गी बढ़ रही है। इस बीच, बोडोलैंड टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट्स (बीटीएडी) क्षेत्र में, बोडो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) — ये दोनों पार्टियां अभी भी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के साथ हैं — के बीच तीखी दुश्मनी ने भी गठबंधन के अंदर सीट बंटवारे की बातचीत को मुश्किल बना दिया है।
हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों ने शासक गठबंधन और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के बीच बहुचर्चित ‘अपवित्र समझदारी’ के बारे में भी कुछ सवाल उठाए हैं। हाल ही में असम से हुए राज्यसभा चुनावों में, शासक एनडीए के तीनों उम्मीदवार उच्च सदन के लिए निर्विरोध चुने गए। नए चुने गए सदस्य भाजपा के के जोगेन मोहन और तेराश गोवाला और यूपीपीएल के प्रमोद बोरो हैं। कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने कोई उम्मीदवार नहीं उतारा। इस घटना से भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए और एआईयूडीएफ के बीच “गुप्त समझौता” के आरोप लगे हैं, जब एआईयूडीएफ के तीन विधायकों ने तीसरी सीट के लिए एनडीए उम्मीदवार प्रमोद बोरो का समर्थन करते हुए नामांकन पत्र पर हस्ताक्षर किए।
इसी समय, बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व वाली एआईयूडीएफ ने 10 मार्च को होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए नौ उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची जारी कर दी है और उम्मीद है कि वह असम विधानसभा की 126 सीटों में से करीब 25 पर चुनाव लड़ेगी। कांग्रेस के नेतृत्व वाले धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के मंच से किनारे लगने और खारिज होने के बाद, पार्टी अब अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी करती दिख रही है। भाजपा के साथ इसकी ‘मेलजोल’ की खबरों पर अभी भी किसी ने करीब से ध्यान नहीं दिया है।
दूसरी तरफ, विपक्ष का एक व्यापक मंच बनाने की कोशिशें चल रही हैं। कांग्रेस, सीपीआई(एम), लुरिन ज्योति गोगोई के नेतृत्व वाली असम जातीय परिषद (एजेपी) और जोन्स इंगती काथर के नेतृत्व वाली ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस (एपीएचएलसी) जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के बीच सीट बंटवारे पर बातचीत को लगभग अंतिम रूप दिया जा चुका है। अब तक बनी सहमति के मुताबिक, कांग्रेस एजेपी को नौ सीटें, एपीएचएलसी को दो, और सीपीआई(एम) को दो सीटें देने पर सहमत हो गई है। बहरहाल, गठबंधन की एकता को और व्यापक तथा मजबूत बनाने की जरूरत है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस रायजोर दल को 13 सीटें देने पर सहमत हो गई है, जिसमें चार सीटों पर दोस्ताना मुकाबला भी शामिल है। बहरहाल, कांग्रेस और अखिल गोगोई के नेतृत्व वाले रायजोर दल के बीच मतभेदों ने कुछ रुकावटें पैदा की हैं। लेकिन भाजपा और उनके सहयोगियों को हराने के व्यापक हित में इन रुकावटों को दूर करना जरूरी है। सीपीआई(एम) ने लगातार सभी संबंधित लोगों से रायजोर दल और दूसरी वाम और धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को शामिल करके अधिकतम संभव एकता बनाने की अपील की है।
पूरे राज्य में राजनीतिक लामबंदी तेज़ हो गई है। कांग्रेस ने ‘मार्च फॉर चेंज’ (परिवर्तन यात्रा) शुरू की है, जबकि भाजपा ‘पीपुल्स ब्लेसिंग कैंपेन’ (जन आशीर्वाद यात्रा) निकाल रही है। कई जगहों पर कांग्रेस के कार्यक्रमों में भाजपा समर्थकों द्वारा प्रशासन के कुछ हिस्सों के छुपे सहयोग से रुकावट डाले जाने की खबरें हैं।
9 मार्च को नलबाड़ी में, पुलिस ने कांग्रेस नेताओं को उस समय हिरासत में ले लिया, जब वे भाजपा समर्थकों द्वारा कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर किए गए हमलों का विरोध कर रहे थे। हिरासतियों में विधायक प्रत्याशी अशोक सरमा, असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी की सचिव दिव्यज्योति हालोई और 10 दूसरे कार्यकर्ता शामिल थे। ऐसी घटनाओं से यह बात और साफ होती है कि शासक पार्टी चुनावों से पहले आधिकारिक मशीनरी और पुलिस की ताकत का इस्तेमाल करके डर का माहौल बनाने की कोशिश कर रही है।
वहीं, भाजपा के कार्यक्रमों को जनता के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। कई जगहों पर ‘जन आशीर्वाद यात्रा’ को जनता द्वारा सांस्कृतिक सेलिब्रिटी ज़ुबीन गर्ग ‘हत्या प्रकरण’ में न्याय की मांग करते हुए विरोध का सामना करना पड़ा है, जो लोगों में बढ़ते गुस्से को दिखाता है। कई लोगों का मानना है कि सरकार ज़ुबीन गर्ग की रहस्यमयी हालात में हुई मौत के लिए ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने में हिचकिचा रही है और इसके बजाय आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रही है। इससे पहले, मुख्यमंत्री ने खुद असम असेंबली में कहा था कि ज़ुबीन की ‘हत्या’ की गई थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के असम के लगातार दौरे भी चुनावों से ठीक पहले हुए हैं। इन दौरों के साथ जल्दबाजी में परियोजनाओं का उद्घाटन के साथ विकास के बड़े-बड़े दावे भी किए गए हैं। बहरहाल, कई लोग इन घोषणाओं को शक की नज़र से देख रहे हैं और सवाल कर रहे हैं कि क्या इनसे लोगों की असली समस्याओं का हल होगा।
कुल मिलाकर, ये घटनाक्रम मौजूदा सरकार के बढ़ते तानाशाही चरित्र को दिखाते हैं। सरकारी मशीनरी का गलत इस्तेमाल, असहमति को दबाने की कोशिश, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और कॉर्पोरेट के पक्ष में नीतियां असम में लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक सद्भाव के लिए एक गंभीर खतरा हैं।
इस अहम मौके पर, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतों की व्यापक एकता ज़रूरी है। असम में लड़ाई सिर्फ़ एक चुनावी मुकाबला नहीं है। यह पूरे भारत में सांप्रदायिक-कॉर्पोरेट गठजोड़ और तानाशाही शासन के खिलाफ़ व्यापक संघर्ष का हिस्सा है। सिर्फ़ एक एकजुट विपक्ष ही, जो लोगों की आकांक्षाओं पर टिका हो, भाजपा के विभाजनकारी एजेंडे को परास्त कर सकता है और असम में एक लोकतांत्रिक और जन पक्षधर विकल्प की राह खोल सकता है।
*(इश्फाकुर रहमान असम माकपा के सचिवमंडल सदस्य हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*


