पश्चिम बंगाल की नई वोटर लिस्ट से 91 लाख बाहर
सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के बाद चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की फाइनल वोटर लिस्ट जारी कर दी है। छह अप्रैल को शीर्ष अदालत ने 24 घंटे में आयोग को फाइनल वोटर लिस्ट जारी करने का आदेश दिया था। पश्चिम बंगाल में विशेष गहन संक्षिप्त पुनरीक्षण के बाद अब यह बड़ा कदम उठा। 91 लाख वोटर्स के नाम हटा दिए गए। यह संख्या किसी भूकंप से कम नहीं। हर जिले की अलग सूची जारी की गई ताकि पारदर्शिता बनी रहे। आयोग ने स्पष्ट किया कि 60 लाख से अधिक मतदाता जांच के दायरे में थे। इनमें से 27 लाख से ज्यादा के नाम कट गए। ये पहले से संदिग्ध सूची में थे। मृतकों के नाम भी बड़ी संख्या में शामिल हैं। यह कदम लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने वाला है या राजनीतिक खेल का हिस्सा? गौरतलब हो, पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट लंबे समय से विवादों में थी। विधानसभा चुनावों के दौरान अवैध घुसपैठ के आरोप लगे। बांग्लादेश से आए कथित घुसपैठियों के नामों का मुद्दा गरमाता रहा। भाजपा ने बार-बार चेतावनी दी कि वोटर लिस्ट में फर्जी नाम भरे पड़े हैं। तृणमूल कांग्रेस ने इसे साजिश बताया। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि स्वच्छ वोटर लिस्ट बिना लोकतंत्र अधूरा है। आयोग को निर्देश दिया कि तत्काल कार्रवाई हो। 24 घंटे में लिस्ट जारी करो, वरना अवमानना का सामना करो। यह आदेश आयोग के लिए चुनौती था। पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य में लाखों नामों की जांच करना आसान नहीं। फिर भी आयोग ने कमर कस ली। विशेष पुनरीक्षण अभियान चलाया। क्षेत्रीय अधिकारियों को सक्रिय किया। परिणाम सामने आया 91 लाख नाम कट गए।
आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर साफ होती है। 60 लाख संदिग्ध मतदाता थे। जांच में 27 लाख कटे। बाकी 91 लाख में मृतक नाम प्रमुख हैं। आयोग ने कहा कि कई नाम ऐसे थे जो दशकों पुराने हैं। मालिक मर चुके, फिर भी लिस्ट में दर्ज। कुछ नाम डुप्लिकेट थे। एक ही व्यक्ति का कई जगह नाम। कुछ अवैध प्रवासियों के। जिले दर जिले सूची जारी हुई। कोलकाता में सबसे ज्यादा कटौती। उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना जैसे सीमावर्ती जिलों में संख्या डरावनी। वहां घुसपैठ का खतरा हमेशा रहता है। आयोग ने दावा किया कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष रही, राजनीतिक दबाव से मुक्त। हर नाम हटाने से पहले सत्यापन हुआ। जनप्रतिनिधियों को सूचना दी गई। फिर भी विपक्ष चिल्ला रहा है। तृणमूल का कहना है कि यह भाजपा की साजिश है। वोट बैंक कम करने का प्रयास। लेकिन आयोग के पास प्रमाण हैं। मृत्यु प्रमाण पत्र आधारित हटाए गए नाम। आधार कार्ड से जुटाई गई जानकारी। यह सफाई लोकतंत्र के लिए जरूरी थी। इस कदम के राजनीतिक निहितार्थ गहरे हैं। पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को विधानसभा चुनाव के लिये मतदान होना है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल का वर्चस्व है। ममता बनर्जी की सरकार पर घुसपैठियों को संरक्षण देने का आरोप। भाजपा इसे बड़ा मुद्दा बनाएगी। 91 लाख नाम कटने से तृणमूल का वोट बैंक प्रभावित होगा, खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में। आयोग का यह फैसला भाजपा के पक्ष में जाता दिखता है।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप स्वागतयोग्य है। लेकिन सवाल उठता है कि इतना बड़ा सफाया पहले क्यों नहीं हुआ। चुनाव आयोग पर पहले आलोचना हुई कि वह निष्क्रिय है। अब सक्रियता की तारीफ हो रही। फिर भी चुनौतियां बाकी हैं। हटाए गए नामों वाले लोग क्या करेंगे। अपील का रास्ता खुला है। आयोग ने कहा कि वैध साबित करने पर नाम वापस आ सकते हैं। लेकिन समय कम है। चुनावी माहौल में यह विवाद और भड़केगा। राजनीतिक दल सड़कों पर उतरेंगे। शांति भंग होने का खतरा। सामाजिक प्रभाव भी कम नहीं। पश्चिम बंगाल में गरीबी और बेरोजगारी ज्यादा। कई परिवार वोटर कार्ड पर निर्भर। नाम कटने से राशन कार्ड प्रभावित हो सकता। सरकारी योजनाओं का लाभ रुक सकता। मृतकों के नाम हटना तो सही, लेकिन जीवितों का क्या। कुछ निर्दोष कट सकते हैं। जांच में चूक हो सकती। ग्रामीण इलाकों में जागरूकता कम। लोग नाम कटने की सूचना भी न पाएं। आयोग को अब प्रचार अभियान चलाना चाहिए। हर गली मोहल्ले में सूचना पहुंचानी चाहिए। डिजिटल माध्यमों का सहारा लें। वोटर हेल्पलाइन सक्रिय रखें।
यह प्रक्रिया पूरे देश के लिए मिसाल बने। अन्य राज्यों में भी ऐसा हो। उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में फर्जी वोटरों की भरमार है। वहां भी सफाई जरूरी। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश राष्ट्रीय स्तर पर लागू हो। बहरहाल, चुनाव आयोग की यह कार्रवाई सराहनीय है। 91 लाख नाम हटाकर उसने विश्वास जीता। लेकिन पारदर्शिता बनाए रखनी होगी। हर कटे नाम का कारण सार्वजनिक करें। राजनीतिकरण न होने दें। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में आगे बढ़ें। पश्चिम बंगाल की जनता को लाभ मिलेगा। स्वच्छ वोटर लिस्ट से सच्चा जनादेश आएगा। लोकतंत्र मजबूत होगा। ममता बनर्जी सरकार को जवाब देना होगा। घुसपैठ पर स्पष्टीकरण दें। भाजपा को सतर्क रहना होगा कि यह राजनीतिक हथियार न बने। कुल मिलाकर यह सकारात्मक कदम है। वोट की अहमियत बढ़ेगी। फर्जी वोटरों का राज खत्म होगा। आने वाले चुनाव रोचक होंगे। सच्चाई की जीत होगी। आयोग का यह कदम भारतीय लोकतंत्र के लिए मील का पत्थर है। आयोग ने साबित किया कि वह निष्पक्ष है। सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक कर्तव्य निभाया। अब बारी जनता की। जागरूक बनें। अपना नाम चेक करें। वैध वोट दें। पश्चिम बंगाल से सबक लें। स्वच्छ मतदाता सूची ही सच्चे लोकतंत्र की गारंटी।
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