हरियाणा बीजेपी सरकार ने अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ केस वापस लिया
प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद को जेल भिजवाने में बीजेपी के रेनू भाटिया और योगेश जठेरी थे शामिल
चंडीगढ़ /16 मार्च/अटल हिन्द ब्यूरो
अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ दर्ज केस में बड़ा मोड़ आया है। हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह इस मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं देगी। यह केस बीजेपी से जुड़े नेताओं रेनू भाटिया और योगेश जठेरी की शिकायत के आधार पर दर्ज हुआ था।
हरियाणा सरकार ने सोमवार (16 मार्च) को सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि उसने अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से संबंधित सोशल मीडिया पोस्ट के मामले में मुकदमा चलाने की मंजूरी देने से इनकार कर दिया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, हरियाणा सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ को बताया कि उन्होंने प्रोफेसर महमूदाबाद के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं दी है.
गौरतलब है कि हरियाणा पुलिस ने पिछले साल 18 मई को अशोका विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद को गिरफ्तार किया था. ये मामला ऑपरेशन सिंदूर पर प्रेस ब्रीफिंग के बारे में उनकी टिप्पणी से जुड़ा था. उनके खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गई थी, प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ दोनों एफआईआर बीजेपी के मामूली से कार्यकर्ताओं जिनमे एक हरियाणा राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रेणु भाटिया और दूसरी भाजपा के युवा मोर्चा के महासचिव योगेश जठेरी, जो हरियाणा के एक गांव के सरपंच हैं, ने भावनाएं आहत होने के आरोप में दर्ज करवाई थीं. जिनमें भारत में अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले व्यवहार पर उनके सोशल मीडिया पोस्ट शामिल थे.ये पोस्ट कर्नल सोफिया कुरैशी द्वारा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की प्रेस ब्रीफिंग का नेतृत्व करने की सराहना के संदर्भ में किए गए थे.
जिसके चलते हरियाणा बीजेपी पार्टी की पुलिस में महमूदाबाद पर बीएनएस की धारा 152 (भारत की संप्रभुता या एकता एवं अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य), 353 (सार्वजनिक उपद्रव को बढ़ावा देने वाले बयान), 79 (किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से जानबूझकर की गई कार्रवाई) और 196 (1) (धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना) के तहत मामला दर्ज किया गया था.
यहाँ इस बात का उल्लेख कर जरूरी है की जुलाई 2025 की एक सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मामले में जांच के लिए गठित विशेष जांच दल को फटकार लगाते हुए पूछा था कि एसआईटी खुद को ही गुमराह क्यों कर रही है. अदालत ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया था कि एसआईटी खुद को गलत दिशा में क्यों ले जा रही है, जबकि उसकी जांच का दायरा सिर्फ दो एफआईआर तक ही सीमित क्यों है.
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 21 मई 2025 को महमूदाबाद को कड़ी शर्तों के तहत अंतरिम जमानत दे दी थी. कोर्ट ने उनके सोशल मीडिया पोस्ट की जांच के लिए एक विशेष जांच दल गठन करने का भी आदेश दिया था. इसके साथ ही कोर्ट ने कहा था कि वह इस मामले से जुड़े मुद्दों पर न तो लिख सकते हैं और न ही भाषण दे सकते हैं. इसेक अलावा अदालत ने महमूदाबाद को अपना पासपोर्ट भी जमा करने के लिए कहा था.
6 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने महमूदबाद के खिलाफ एफआईआर में हरियाणा एसआईटी द्वारा दायर आरोपपत्र पर निचली अदालत को संज्ञान लेने से रोकने वाले अपने आदेश को आगे बढ़ा दिया था.
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू द्वारा सूचित किए जाने के बाद पारित किया था, कि हालांकि इस मामले में अगस्त 2025 में आरोपपत्र दायर किया गया था, लेकिन हरियाणा सरकार द्वारा कोई स्वीकृति नहीं दी गई है.
मालूम हो कि अदालत प्रोफेसर महमूदाबाद द्वारा मामले को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से इस मामले पर पुनर्विचार करने और प्रोफेसर महमूदाबाद पर मुकदमा चलाने की अनुमति न देकर केस बंद करने का आग्रह किया था.उल्लेखनीय है कि पिछले साल मई में अदालत ने प्रोफेसर को अंतरिम राहत देते हुए सरकार को एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का निर्देश दिया था ताकि यह पता लगाया जा सके कि महमूदाबाद के पोस्ट में कोई आपराधिक गतिविधि थी या नहीं.6 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने महमूदाबाद के खिलाफ एफआईआर में हरियाणा एसआईटी द्वारा दायर आरोपपत्र पर निचली अदालत को संज्ञान लेने से रोकने वाले अपने आदेश को आगे बढ़ा दिया था.सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू द्वारा सूचित किए जाने के बाद पारित किया था, कि हालांकि इस मामले में अगस्त 2025 में आरोपपत्र दायर किया गया था, लेकिन हरियाणा सरकार द्वारा कोई स्वीकृति नहीं दी गई है.


