एआई समिट का गलगोटिया कांड : बीजेपी-मोदी के भारत में झूठ का पर्दाफाश

आलेख : अटल हिन्द /अपूर्वानंद
दिल्ली में लगे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence)मेले में गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा एक चीनी रोबोट(Orion) को अपना ‘आविष्कार’ बतलाकर प्रदर्शित किए जाने के बाद से देश और विदेश में गलगोटिया यूनिवर्सिटी(Galgotias University) की खिल्ली उड़ रही है। गलगोटिया यूनिवर्सिटी के साथ ही भारत भी हँसी का पात्र बन गया है। गलगोटिया के झूठ का पर्दाफाश हो जाने के बाद उसे धक्के देकर मेले से निकाल दिया गया।
लोग पूछ रहे हैं कि आखिर इतने प्रतिष्ठित आयोजन में, जिसमें प्रधानमंत्री की छवि दाँव पर लगी हो, इस तरह की धोखाधड़ी कैसे हो पाई? यह कहना इसलिए ज़रूरी है कि अब भारत में कुछ भी अब भारत के लिए नहीं होता, प्रधानमंत्री के लिए होता है। वह चाहे जी-20 का सम्मेलन हो या कोई खेल प्रतियोगिता या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence)का यह मेला। भारत में इसलिए ये सारे आयोजन नरेंद्र मोदी के कारण हो पा रहे हैं। वरना भारत को कौन पूछता था?
भारत में अब जो कुछ होता है, वह नरेंद्र मोदी के प्रताप से होता है और उन्हीं के लिए किया जाता है। इसलिए, मामला भारत की छवि का जितना नहीं, उतना नरेंद्र मोदी की छवि का है। गलगोटिया की घटना कुछ वैसी ही है, जैसे कोई झकाझक कुर्ता पहन कर निकले और कोई उस पर कीचड़ डाल दे। गलगोटिया को सज़ा इसके लिए दी गई कि उसने प्रधानमंत्री की छवि खराब की, इसलिए नहीं कि उसने धोखाधड़ी की। फिर यह सवाल भी है कि आखिर गलगोटिया ने यह धोखाधड़ी कैसे की? धोखाधड़ी का तो एकमात्र अधिकार इस देश के प्रधानमंत्री का है और इस सरकार का है!

किसने गलगोटिया यूनिवर्सिटी (Galgotias University)की अर्हता की जांच की थी और मेले में शामिल होने के लिए उसे इजाजत दी थी? यूनिवर्सिटी के दावे की पोल खुलने के पहले भारत सरकार के मंत्री ने खुद उसके इसी ‘आविष्कार’ की सार्वजनिक रूप से तारीफ भी की थी। मंत्री महोदय क्या बिना जांच के किसी के भी दावे पर अपनी मुहर लगा देते हैं?
मंत्री या सरकार से यह अपेक्षा लेकिन ग़लत है। आखिरकार इस मंत्री के नेता, यानी प्रधानमंत्री देशवासियों को कह चुके हैं कि नाले की गैस से वे चाय बना सकते हैं या पकौड़े तल सकते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया था कि कौरवों का जन्म इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन काल में भारत में स्टेम सेल की जानकारी थी। उन्होंने यह भी कहा था कि गणेश के धड़ पर हाथी का सर इस बात का सबूत है कि इस ब्रह्मांड का पहला अंग-प्रत्यारोपण भारत में हुआ था। जब देश का प्रधानमंत्री इस तरह की बेपर की उड़ा सकता है तो गलगोटिया ने क्या कसूर किया है?
गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने झूठा दावा किया। क्या हम इस वजह से उससे ख़फ़ा हैं? पिछले 12 साल से प्रधानमंत्री एक के बाद एक झूठ बोलते जा रहे हैं। हमें कोई उज्र नहीं, बल्कि उनके झूठ को उनकी मजबूरी बतलाया जाता है। बेचारे क्या करें, अगर झूठ न बोलें! चुनाव के वक्त जनता को अपनी तरफ़ गोलबंद करने के लिए झूठ बोलना पड़ता है, बाद में जनता में सकारात्मक भाव भरने के लिए उन्हें झूठ बोलना पड़ता है। हमें समझाया जाता है कि इरादा उनका नेक है, और वह है देश का गौरव गान करना और लोगों में उत्साह भरना, इसलिए हमें उनके शब्दों पर नहीं जाना चाहिए, बल्कि उनके इरादे की तारीफ करनी चाहिए।
गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने भी झूठ पकड़े जाने पर यही कहा कि उसकी ज़ुबान ज़रा फिसल गई थी या सुनने वालों की समझ का फेर था कि उसे गलत समझा गया। इरादा उसका नेक था। यूनिवर्सिटी ने कहा कि वह देश के लिए एक धरोहर है और इस एक गलतफहमी के चलते उसके सारे काम पर पानी नहीं फेरा जाना चाहिए। वह देश के युवाओं के लिए एक उदाहरण पेश कर रही है और इस तरह की आलोचना से उसका मनोबल टूटता है।
इस विवाद के बाद मैंने एक विद्यार्थी को विश्वविद्यालय के पक्ष में बोलते सुना। उसका कहना था कि बातचीत ग़लत दिशा में हो रही है, यूनिवर्सिटी विद्यार्थियों को इस रोबोट(Commercial robot dog Unitree Go2) के जरिए सिर्फ यह बतला रही थी कि क्या-क्या किया जा सकता है। एक विद्यार्थी ने यह भी कहा कि उनके विश्वविद्यालय की मान्यता समाप्त करने की बात क्यों की जा रही है, पहले जेएनयू की मान्यता रद्द करनी चाहिए, क्योंकि वहाँ देशद्रोही रहते हैं।
गलगोटिया के विद्यार्थियों को बात करते देख याद आया कि अभी कुछ समय पहले इसी संस्थान के विद्यार्थी राहुल गांधी के खिलाफ प्रदर्शन करने जंतर-मंतर आए थे। उनसे जब पूछा गया कि वे क्यों राहुल गांधी का विरोध कर रहे हैं, तो उनके पास कोई जवाब न था। उन्हें प्रशासन ने कहा था, इसलिए वे चले आए। शायद इसी वजह से यह ढिठाई गलगोटिया के प्रशासन और विद्यार्थियों में दिखलाई पड़ती है कि वे शर्मिंदा होने की जगह सीनाजोरी करें।
हमने भी झूठ के वातावरण में साँस लेना सीख लिया है। नोटबंदी हो या कोरोना में 4 घंटे की नोटिस पर लॉकडाउन या ऑपरेशन सिंदूर, हर मामले में सरकार के झूठ के पक्ष में हमने भारत की जनता के एक हिस्से को दलील देते सुना है। जनता कहती है, बुद्धिजीवी कहते हैं, मीडिया कहता है कि हमें प्रधानमंत्री की नीयत पर शक नहीं करना चाहिए। वे अच्छी नीयत से झूठ बोलते हैं।
गलगोटिया यूनिवर्सिटी इस झूठ की संस्कृति का सिर्फ़ एक, भले ही निर्लज्ज उदाहरण है। हमें अधिक चिंता इसलिए है कि वह शिक्षा संस्थान है। लेकिन यह मात्र एक शिक्षा संस्थान का मसला नहीं है। उच्च शिक्षा पर निगाह रखनेवाले महेश्वर पेरी ने लिखा कि यह तो गलगोटिया ने वही किया, जो यह व्यवस्था उसे कहने को कहती है। उन्होंने लिखा कि यह पूरी व्यवस्था तभी आपको पुरस्कृत करती है, जब आप दिखला सकें कि आपकी रैंकिंग कितनी ऊपर है, “स्वायत्तता, क्रमिक स्वायत्तता, नए परिसरों, नए पाठ्यक्रमों की शुरुआत, और ऑनलाइन डिग्रियाँ देने की अनुमति — सब कुछ को रैंकिंग से जोड़ दिया गया है।” सरकारी स्तर पर स्पष्ट आदेश यह है कि क्यू एस रैंकिंग में जगह बनानी है, ताकि भारत हर वर्ष बड़े दावे कर सके। रैंकिंग घोषित होने पर स्वयं प्रधानमंत्री भी ट्वीट करते हैं।
पेरी कहते हैं कि जब संस्थानों को कहा जाए कि उन्हें नए पाठ्यक्रम, नए परिसर, ऑनलाइन पाठ्यक्रम की इजाज़त मिल जाएगी, अगर वे यह दिखला सकें कि उनको ‘नैक’ ने 3.26 अंक दिया है या वे एनआईआरएफ़ की रैंकिंग में पहले 100 संस्थानों में शामिल हैं। इसके लिए उन्हें झूठे दावे करने ही हैं। शोध निबंध के प्रकाशन, शोध की संख्या, पेटेंट आदि के बारे में संस्थान झूठे आंकड़े पेश कर रहे हैं।
पेरी के मुताबिक़ हमें तभी चेत जाना चाहिए था, जब हमने देखा कि सभी आईआईटी मिलकर भी उतना शोध नहीं कर रहे हैं, जितना कुछ निजी विश्वविद्यालय अपने-अपने स्तर पर कर रहे हैं। उसी समय हमें शोध की गुणवत्ता पर प्रश्न उठाना चाहिए था। यह देखकर हमें ताज्जुब नहीं हुआ कि टीएचआई रैंकिंग में इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस का शोध स्कोर 51.6 है, जबकि पांच निजी विश्वविद्यालयों का स्कोर 90 से अधिक है।
पेटेंट आवेदनों की संख्या बढ़ती जा रही है, जबकि स्वीकृत पेटेंटों की संख्या कभी नहीं बढ़ी। चार निजी विश्वविद्यालय ऐसे थे, जो अलग-अलग, सभी आईआईटी को मिलाकर किए गए पेटेंट आवेदनों से भी अधिक आवेदन कर रहे थे।”
दुनिया भर में उच्च शिक्षा पर केंद्रित पत्रिकाएँ लिख रही हैं कि भारतीय उच्च शिक्षा संस्थान रैंकिंग प्रणाली के साथ खेल कर रहे हैं, कि भारत में शोध-अपराध बढ़ता जा रहा है। वैज्ञानिक सहकर्मी-समीक्षा प्रणाली के साथ खेल कर रहे हैं और प्रकाशित शोध पत्र वापस लिए जा रहे हैं क्योंकि वे जाली हैं। पेटेंट दाखिल करने की होड़ मची है, जबकि उनमें से शायद ही किसी पेटेंट का वास्तविक व्यावसायिक मूल्य है।
पेरी कहते हैं कि असल बात यह है कि सरकार यह दिखलाना चाहती है कि उसने उच्च शिक्षा में युवा जनसंख्या के 50% को दाखिल कर लिया है। यह तभी हो सकता है, जब हम सरकारी आँकड़ों की जाँच करना बंद दें, शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल करना बंद दें। इन झूठे और जाली आंकड़ों के सहारे शिक्षा संस्थानों को ऑनलाइन डिग्री देने की छूट दी जाएगी और डिग्री देने वाले कारखानों को बढ़ावा दिया जाएगा। इस तरह सरकार दावा कर पाएगी कि उसने 50% दाखिले का लक्ष्य पूरा कर लिया है। झूठ बोलकर यह यूनिवर्सिटी सरकार से पुरस्कार भी ले चुकी है। यह वही सरकार है, जिसने जिओ विश्वविद्यालय को इंस्टीट्यूट ऑफ एक्सीलेंस का तमग़ा तब दे दिया था, जब वह पैदा भी नहीं हुआ था। सरकार ने दलील यह दी थी कि यह श्रेष्ठता की संभावना देखते हुए किया गया है।
हम सब इस झूठ को क्यों बर्दाश्त कर रहे हैं? क्योंकि हम एक बड़े झूठ को पसंद करते हैं। वह बड़ा झूठ प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी पिछले कई दशकों से बोल रही है। भारत में मुसलमान हिंदुओं का हक़ छीन रहे हैं, हिंदुओं का जनसंख्या कम हो रही है, मुसलमान हिंदू औरतों को साजिशन मुसलमान बना रहे हैं, भारत में घुसपैठिए भर गए हैं, ईसाई हिंदुओं का धर्मांतरण कर रहे हैं, भारत के विश्वविद्यालयों में राष्ट्रविरोधी तत्त्व छिपे हुए हैं, संस्कृत सारी भाषाओं की जननी है, भारत विश्व गुरु था : इन सारे झूठों पर हम यक़ीन करना चाहते हैं, इसलिए गलगोटिया के झूठ को हमें बर्दाश्त करना होगा। ज़रा गहराई से हम विचार करें तो हमें मालूम होगा कि मुसलमान और ईसाई विरोधी घृणा ही गलगोटिया जैसे झूठ को सहने या नजरअंदाज करने के लिए हमें बाध्य करती है।
(लेखक नियमित स्तंभकार और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में कला संकाय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर हैं।)


