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गद्दार विधायक का नाम “निगल” गए विवेक बंसल

गद्दार विधायक का नाम “निगल” गए विवेक बंसल
सोनिया गांधी को दी रिपोर्ट में भी नहीं बताया वोट “खराब” करने वाले विधायक का नाम
कहा- हंगामे के कारण वोट “गड़बड़ी” करने वाले विधायक का नाम नहीं देख पाए
चंडीगढ़। राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस से “गद्दारी” करने वाले विधायक के नाम को लेकर जो “आशंका” जताई जा रहे थे वह सही साबित हुई है क्योंकि हरियाणा कांग्रेस प्रभारी विवेक बंसल ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को सौंपी रिपोर्ट से भी गद्दार विधायक का नाम “गायब” कर दिया है।
विवेक बंसल ने जिस तरह से कांग्रेस पार्टी के साथ विश्वासघात करने वाले विधायक का नाम “निगलने” का काम किया है वह वास्तव में ही “हैरतअंगेज” है क्योंकि इतने बड़े मुद्दे को इतनी “सफाई” के साथ “दबाना” आम बात नहीं की जा सकती।
कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि इस मामले में “बड़े” प्रेशर के चलते ही विवेक बंसल अपना मुंह “बंद” रखने को “मजबूर” हुए हैं।
विवेक बंसल साफ-साफ जानते हैं कि अगर उन्होंने उस विधायक का नाम ले लिया तो उसका “खामियाजा” उन्हें भी भुगतना पड़ेगा।
कांग्रेस पार्टी का राज्यसभा चुनाव में बंटाधार करने वाले विधायक का नाम उजागर नहीं होना बेहद आश्चर्यजनक है लेकिन उससे भी ज्यादा हैरत इस बात की है कि विवेक बंसल इस मामले को “उजागर” करने की बजाय “दबाने” की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
कुलदीप बिश्नोई के साल के खिलाफ तो कार्रवाई करने में विवेक बंसल ने 24 घंटे का भी समय नहीं लिया लेकिन दूसरे गद्दार विधायक का नाम छुपाना विवेक बंसल को भी सवालों के घेरे में खड़ा कर गया है।
अगर कोई आम विधायक होता तो अभी तक न केवल उसका नाम उजागर कर दिया जाता बल्कि उसके साथ-साथ कुलदीप विश्नोई की तरह उसके खिलाफ भी कार्रवाई कर दी जाती।
विवेक बंसल का खुद का “गऊ” कहना भी इस बात की तरफ इशारा करता है कि कहीं ना कहीं मामले को छुपाने और दबाने के लिए मजबूर हैं। विवेक बंसल खुद को निष्पक्ष और दबंग नेता के तौर पर कार्य करने का दावा करते हैं लेकिन दूसरी तरफ खुद को गाय का नाम देते हैं।
अगर वह सही मायने में दबंग होते तो गाय की बजाय खुद को सांड के तौर पर दर्शाते और बात को छुपाने की बजाय डंके की चोट पर सबके सामने रखते।
ऐसा करने की बजाय विवेक बंसल ने पूरे मामले को बड़े प्रेशर के चलते दबाना ही उचित समझा।
बात यह है कि विवेक बंसल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद ही अपना रंग “बदल” गए हैं। कहा जाता है कि उनके चुनाव में हरियाणा के बड़े नेता ने बड़ी आर्थिक मदद देकर उनकी निष्ठा की दिशा “बदलने” का काम किया।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले विवेक बंसल हाईकमान और शैलजा के साथ ज्यादा लगाव रखते थे लेकिन विधानसभा चुनाव के बाद विवेक बंसल यू-टर्न लेते हुए भूपेंद्र हुड्डा के पक्ष में “सॉफ्ट” हो गए।
विवेक बंसल का हाव-भाव और कार्यप्रणाली यह बता रही है कि वह “बड़े” फायदे के “लोभ” से खुद को बचा नहीं पाए हैं। इसलिए वे निष्पक्ष रहने के बजाय एक तरफ झुक गए हैं।
विवेक बंसल खुद को चाहे कितना भी ईमानदार जाहिर करने की कोशिश कर रहे हो लेकिन सच्चाई है कि राज्यसभा चुनाव में पार्टी से गद्दारी करने वाले विधायक का नाम छुपाने के चलते उनकी निष्ठा और ईमानदारी सवालों के घेरे में आ गई है।
हंगामे के नाम पर गद्दार विधायक का नाम छुपा कर विवेक बंसल बेशक अपनी जिम्मेदारी से बच गए हो लेकिन यह सभी कांग्रेसी नेता जानते हैं कि गड़बड़ करने वाले विधायक का नाम विवेक बंसल बखूबी जानते हैं लेकिन बड़े प्रेशर के चलते ही उन्होंने उस विधायक का नाम उजागर करने की बजाय दबाने के काम को अंजाम दिया है।
यानी विवेक बंसल अपने फर्ज पर खरा उतरने की बजाय बड़े नेता के प्रेशर में अपनी जिम्मेदारी से “विश्वासघात” कर गए हैं।
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