आध्यात्मिकता में ही जीवन का वास्तविक सुख – आलोक कुमार
आदि सनातन धर्म सभ्यता और दिव्यता का संदेश देता है
तीन दिवसीय अखिल भारतीय साधु-संत महासम्मेलन का शुभारम्भ
-बोहड़ाकला ब्रह्माकुमारीज़ के ओम शांति रिट्रीट सेंटर में हुआ आयोजन
-देश के विभिन्न प्रांतों से पहुंचे प्रकांड विद्वान सैकड़ों संत महात्मा
-आध्यात्मिकता द्वारा सनातन संस्कृति की रक्षा सम्मेलन का मुख्य विषय
बोहड़ाकला /फतह सिंह उजाला
ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान के ओम शांति रिट्रीट सेंटर में तीन दिवसीय अखिल भारतीय साधु-संत महासम्मेलन का शुभारम्भ दीप प्रज्वलित कर हुआ। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। परिसर के दादी प्रकाशमणि सभागार में आध्यात्मिकता द्वारा सनातन संस्कृति की रक्षा विषय पर उन्होंने अपने उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता ही जीवन का वास्तविक सुख है। ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान के जीवन में इसका स्वरूप नज़र आता है। उन्होंने कहा कि ब्रह्माकुमारीज़ द्वारा विश्व में आध्यात्मिक चेतना की जागृति सतयुग के आने की आहट पैदा कर रही है। उन्होंने कहा कि संस्थान में किसी विशेष धर्म से नहीं बल्कि अनेक धर्मों के लोग सम्मिलित हैं। आत्मा ईश्वरीय गुणों का स्वरूप है। प्रत्येक व्यक्ति में इन ईश्वरीय गुणों का सम्मान करना ही ईश्वर का सम्मान करना है। उन्होंने कहा कि दो वर्ष पूर्व वो संस्थान के मुख्यालय माउंट आबू में गए थे । जहां उन्हें अपार ऊर्जा का अनुभव हुआ।
ईश्वरीय प्रेम ही सर्व सुखों का आधार
दिव्य शक्ति अखाड़ा, सहारनपुर से महामंडलेश्वर कमल किशोर जी महाराज ने कहा कि कर्म का सबसे बड़ा महत्व है। उन्होंने कहा कि कर्मों का फल अवश्य मिलता है। पूर्व में किए कर्मों के प्रभाव से हम ईश्वरीय स्मृति से ही मुक्त हो सकते हैं। ईश्वरीय प्रेम ही सर्व सुखों का आधार है। मुंबई से महामंडलेश्वर स्वामी प्रेमानंद गिरि जी महाराज जी ने कहा कि ब्रह्माकुमारीज़ नारी शक्ति उत्थान का प्रमुख केंद्र है। उन्होंने कहा कि जहाँ संत हैं वहाँ बसंत है। ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान राजयोग के द्वारा विश्व में सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण का भगीरथ कार्य कर रहा है।
सनातन संस्कृति का मूल अहिंसा
जोधपुर से महामंडलेश्वर स्वामी शिव स्वरूपानंद जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि सनातन संस्कृति का मूल अहिंसा है। अहिंसा परम धर्म है। उन्होंने कहा कि शांति के लिए क्रांति जरूरी है। सबसे बड़ी क्रांति वैचारिक क्रांति है। विचारों के शुद्धिकरण से ही शांति का उद्गम होता है। मथुरा से श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने कहा कि अध्यात्म सनातन धर्म की आत्मा है। बिना आध्यात्म के सनातन धर्म की कल्पना नहीं की जा सकती। आध्यात्मिकता से ही विश्व में शांति स्थापन हो सकती है।
सनातन संस्कृति के महर्षि वाल्मीकि का विशेष महत्व
अमृतसर से प्रथम वाल्मीकि आदि शंकराचार्य गिरधारी जी महाराज ने कहा कि सनातन संस्कृति के महर्षि वाल्मीकि का विशेष महत्व है। क्योंकि उन्होंने श्रीराम के जीवन दर्शन से सनातन संस्कृति का परिचय दिया। हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष महामंडलेश्वर स्वामी प्रबोधानंद गिरी जी महाराज ने कहा कि धर्म केवल सनातन धर्म है। धर्म कभी किसी का अहित नहीं करता। मोदीनगर से आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री जी महाराज ने कहा कि अगर चेतना की जागृति नहीं है तो सोना और जागना तो केवल एक मशीन के समान है। हमारा मन हमारे जन्म का कारण है।

मनोविकार भी हिंसा के ही रूप
इस अवसर पर संस्थान की संयुक्त मुख्य प्रशासिका सुदेश दीदी ने अपना अध्यक्षीय संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि हिंसा केवल तलवार से ही नहीं होती। बल्कि मन और वचन से भी दूसरों को दुख देना हिंसा है। उन्होंने कहा कि देवी-देवताओं को दिखाए गए अस्त्र-शस्त्र बाहरी हिंसा नहीं बल्कि मनोविकारों पर ज्ञान और योग के द्वारा विजय प्राप्त करने के सूचक हैं। मनोविकार भी हिंसा के ही रूप हैं। क्योंकि उससे आत्मा की दिव्यता नष्ट हो जाती है। आदि सनातन धर्म हमें सभ्यता और दिव्यता का पाठ पढ़ाता है। ओआरसी की निदेशिका राजयोगिनी आशा दीदी ने कहा कि आध्यात्मिकता शक्ति के लिए तपस्या जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब सकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है तो नकारात्मक ऊर्जा स्वतः समाप्त हो जाती है। शुभ भावना की शक्ति से अशुभ समाप्त हो जाता है। जीवन में निर्मलता अथवा शुद्धता जरूरी है। मन जितना पवित्र होगा उतना ही शक्तिशाली होगा।
साधु-संतों सहित 800 लोगों ने शिरकत की।
प्रयागराज से पधारी राजयोगिनी मनोरमा दीदी ने कहा कि सनातन संस्कृति का पुनर्जागरण ही सम्मेलन का प्रमुख उद्देश्य है। पावनता और दिव्यता की धारणा से ही हम सनातन संस्कृति की स्थापना कर सकते है। जीबी पंत हॉस्पिटल के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. मोहित गुप्ता ने अपने आध्यात्मिक जीवन के अनुभव सबके साथ साझा किए। माउंट आबू से राजयोगिनी ऊषा दीदी ने भी सभा को संबोधित किया।बीके चांद ने गीत के द्वारा सभी का स्वागत किया। कार्यक्रम में मंच संचालन राजयोगिनी बीके बीना एवं बीके श्रीनिधि ने किया। कार्यक्रम में देशभर से सैकड़ों साधु-संतों सहित 800 से भी अधिक लोगों ने शिरकत की।


