नई दिल्ली/24 अप्रैल/अटल हिद ब्यूरो
मुख्य अतिथि आलोक कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि राम भारतीय जीवन-दृष्टि के केंद्र में स्थित आदर्श हैं, जो केवल आस्था के विषय नहीं, बल्कि आचरण और व्यवहार के मानक भी हैं। उन्होंने राम के चरित्र को त्याग, मर्यादा, न्याय और लोक कल्याण की सर्वोच्च परंपरा का प्रतीक बताया और कहा कि राम राष्ट्र की सामूहिक चेतना के प्रतिनिधि हैं, जो समाज को एक सूत्र में बांधने की क्षमता रखते हैं।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि राम भारतीय परंपरा में केवल ऐतिहासिक या धार्मिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों की सतत प्रवाहित धारा हैं। उन्होंने तुलसीदास के संदर्भ में कहा कि जिस प्रकार अतीत में समाज को दिशा देने हेतु रामकथा का पुनर्पाठ आवश्यक था, उसी प्रकार वर्तमान समय में भी राम के आदर्शों की प्रासंगिकता बनी हुई है। राम एक व्यापक जीवन-दृष्टि हैं, जो समय के साथ निरंतर विस्तृत होती रहती है। साथ ही उन्होंने यह भी इंगित किया कि राम कथा और रामायण भारतीय समाज की आत्मा हैं। राम मंदिर केवल एक धार्मिक संरचना नहीं, बल्कि भारत की अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। रामचरित मानस जैसा कोई दूसरा ग्रंथ नहीं और तुलसीदास जैसा कोई दूसरा रचनाकार नहीं यह भारतीय साहित्य की अद्वितीय धरोहर है।
विशिष्ट अतिथि प्रफुल्ल केतकर ने पुस्तक की वैचारिक गहराई और व्यापक दृष्टिकोण की सराहना करते हुए कहा कि आज के समय में बाहरी प्रभावों और वैचारिक आक्रमणों के कारण भारतीय संस्कृति की जड़ों को कमजोर करने के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे समय में यह पुस्तक सांस्कृतिक चेतना को पुनर्स्थापित करने का महत्वपूर्ण प्रयास है।
पुस्तक के संपादक प्रो. निरंजन कुमार ने अपने वक्तव्य में बताया कि रामकथा ने विभिन्न धर्मों और परंपराओं को प्रभावित किया है तथा राम, पंथनिरपेक्षता के सशक्त प्रतीक हैं।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह पुस्तक वैचारिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय जीवन मूल्य की दृष्टियों से भगवान राम पर केंद्रित दुर्लभ लेखों का एक महत्वपूर्ण संकलन है। इसमें स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, भारतेंदु हरिश्चंद्र, बी. आर. रामचंद्र दीक्षितार, वासुदेव शरण अग्रवाल, कामिल बुल्के, मुंशी प्रेमचंद जैसे मनीषियों के लेखक हैं वहीं राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक समरसता तथा जीवन मूल्यों के आलोक में मीडिया जगत, मैनेजमेंट, चिकित्सा विज्ञान, इतिहास, दर्शनशास्त्र, राजनीति शास्त्र, संस्कृत एवं हिंदी आदि के विद्वानों के लेख भी समाहित हैं।


