दुनिया को औपनिवेशिक दौर में ले जाने की कोशिश

आलेख : अटल हिन्द /जवरीमल्ल पारख
फ़रवरी 2026 के म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने पश्चिमी प्रभाव को फिर से स्थापित करने की दिशा में एक बदलाव की रूपरेखा पेश की थी। उन्होंने पश्चिमी शक्ति के ऐतिहासिक विस्तार का परोक्ष रूप से बचाव किया और आपूर्ति शृंखलाओं तथा औद्योगिक प्रभुत्व को सुरक्षित करने के लिए एकजुट मोर्चा बनाने का आह्वान किया। रूबियो ने तर्क दिया कि 1945 के बाद पश्चिमी प्रभाव में जो गिरावट आई — जिसे उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों ने तेज किया — वह एक ग़लती थी। इसके बजाय उन्होंने पश्चिमी सभ्यता के अधिक स्पष्ट और निस्संकोच पुनःप्रस्थापन की वकालत की। रूबियो के अनुसार, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी प्रभाव का सिमटना — जिसे “ईश्वर-विहीन कम्युनिस्ट क्रांतियों और उपनिवेश-विरोधी विद्रोहों” ने तेज़ किया था— एक नकारात्मक मोड़ था। रुबियो का वक्तव्य नव-उपनिवेशवाद या पश्चिमी साम्राज्यवाद की वापसी की पुकार के रूप में देखा जा सकता है। इसे ग्लोबल साउथ में महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों और आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित करने के लिए पश्चिमी प्रभाव बढ़ाने की रणनीति माना जा सकता है। इसे अमरीका को श्रेष्ठ बनाने से आगे जाकर अमरीकी साम्राज्य को श्रेष्ठ बनाने की दिशा में अपनाई जाने वाली रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। रूबियो के पूरे भाषण को इस रूप में देखा जा सकता है कि पश्चिम को अपने प्रतिद्वंद्वियों के प्रभाव का मुकाबला करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि 21वीं सदी के उद्योगों पर नियंत्रण पश्चिम के पास हो, न कि उसके प्रतिद्वंद्वियों के पास।
गाज़ा में इस्राइल द्वारा किए जा रहे जनसंहार और ईरान पर अमरीका-इस्राइल के हमले को, ग्लोबल साउथ पर पूर्ण नियंत्रण सुनिश्चित करने की इसी योजना के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
7 अक्टूबर 2023 को हुए हमास के हमले का बहाना बनाकर इस्राइल गाज़ा में फिलिस्तीनियों पर पिछले दो साल से जो हमले कर रहा है, वह नरसंहार से किसी भी अर्थ में कम नहीं है। हमास के हमले में लगभग 1100 लोग मारे गये थे और लगभग 250 लोगों को बंधक बनाया गया था। इसका बदला लेते हुए इस्राइल ने गाज़ा में अब तक 75 हजार फिलिस्तीनियों की हत्या कर दी है जिनमें लगभग तीस हज़ार औरतें और मासूम बच्चे शामिल हैं। फिलिस्तीनियों पर यह इस्राइल का पहला हमला नहीं था। पिछले सौ सालों से, जबसे यहूदियों को इस क्षेत्र में बसाया जाता रहा है, वे निरंतर वहाँ के अरबी-भाषी फिलिस्तीनी नागरिकों पर हमले करते आ रहे हैं। 1948 में पश्चिम की साम्राज्यवादी ताक़तों ने ज़ोर-ज़बर्दस्ती फिलिस्तीन में यहूदियों का एक अलग राष्ट्र इस्राइल के नाम से थोप दिया था। लेकिन जितना इलाका इस्राइल के लिए निर्धारित किया गया था, उसे वहाँ के शासकों ने कभी स्वीकार नहीं किया। अपने वजूद में आने के समय से ही इस्राइल फिलिस्तीनियों को उस पूरे क्षेत्र से खदेड़ने और हो सके तो, उनका सफ़ाया करने के लिए उन पर लगातार हमले करता रहा है। 1967 के हमले में इस्राइल ने गाज़ा पट्टी, वेस्ट बैंक, पूर्वी येरुशलम, गोलन हाइट आदि में फिलिस्तीनियों का नरसंहार करके या उन्हें वहाँ से खदेड़कर इस पूरे इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया था और वहाँ यहूदियों की बस्तियाँ बसा ली थीं। इस तरह फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर हमला करके उन्हें इस्राइल में ज़बरदस्ती मिलाने का अभियान चलता रहा है। इस्राइल की इस विस्तारवादी कार्रवाई को अमरीका और यूरोप के देशों का हर तरह से समर्थन मिलता रहा है।

इस्राइल के पड़ोसी मध्य एशिया के अधिकतर देशों की बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम है। अधिकतर देशों में राजशाही है ; बहुत कम देशों में लोकतंत्र रहा है और वह भी आधा-अधूरा। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, कुवैत, ओमान, जोर्डन, बहरीन इन सभी देशों में राजतंत्र हैं और जिनमें धार्मिक तत्ववाद की अहम भूमिका है। मिस्र, ईरान, इराक, सीरिया, लीबिया, लेबनान आदि देशों में राजतन्त्र तो नहीं रहा है, लेकिन तानाशाही और लोकतंत्र का मिला-जुला शासन तंत्र रहा है, जिनमें कोई एक नेता शक्तिशाली होता है और उसी का आदेश अंतिम होता है, या फिर धार्मिक तत्ववाद से संचालित धर्म-आधारित सीमित लोकतंत्र होता है। इन सभी देशों में तेल के बड़े-बड़े भंडार हैं और अमरीका सहित पश्चिम के साम्राज्यवादी देशों की नज़र शुरू से ही इन विशाल तेल भंडारों पर रही है। अमरीका इस पूरे क्षेत्र पर अपना वर्चस्व क़ायम करने की कोशिश करता रहा है। इस्राइल की स्थापना का एक बड़ा मक़सद यह भी था कि इसकी सुरक्षा के बहाने पूरे क्षेत्र पर प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण रखा जा सके। जिन देशों में राजतन्त्र था, उन्होंने इस डर से कि कहीं जनता विद्रोह करके उन्हें सत्ता से बेदख़ल न कर दे, अपनी संप्रभुता को तिलांजलि देकर अमरीका के साथ सामरिक और आर्थिक गठजोड़ कर लिया था। उन्होंने अपने देश की ज़मीन पर अमरीका को सैनिक अड्डे बनाने की अनुमति दे दी। अमरीका के लिए यह ज़्यादा अनुकूल था कि इन देशों में धार्मिक तत्ववाद की जड़ें मजबूत रहे और उसके चंगुल से जनता अपने को मुक्त न करे। दूसरी ओर, जो देश राजतन्त्र से मुक्त हो चुके थे, उनमें से कुछ देशों ने अमरीका के आगे घुटने टेक दिए और जिन्होंने ऐसा नहीं किया, उन पर अमरीका और नाटो देशों ने कोई न कोई बहाना बनाकर हमला किया, वहाँ के शासकों को सत्ता से हटाकर उन देशों में अपनी कठपुतली सरकारें क़ायम कर दीं और इस तरह वहाँ के तेल भंडारों पर कब्जा कर लिया गया।
ईरान के तेल भंडारों पर ब्रिटेन और अमरीका की काफ़ी पहले से नज़र थी। इसके लिए दूसरे विश्व युद्ध के बाद वहाँ की चुनी हुई सरकार का तख्ता पलटवाकर शाह रज़ा पहलवी को बैठा दिया गया था, जो ब्रिटेन और अमरीका के इशारे पर शासन करता था और इस तरह ईरान के तेल पर पश्चिम की तेल कंपनियों का एकाधिकार हो गया था। लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति के कारण रज़ा पहलवी को देश छोड़कर अमरीका भागना पड़ा। शियाओं के सबसे बड़े धार्मिक नेता अयातुल्ला खौमेनी के नेतृत्व में ईरान में इस्लामिक गणराज्य की स्थापना की गयी। यह कोई आदर्श लोकतान्त्रिक राज्य नहीं था। सामाजिक मामलों में बहुत से नियम-क़ायदे स्त्री-विरोधी थे। लेकिन ईरान के इस्लामिक गणराज्य ने पश्चिम के साम्राज्यवादी देशों को अपने यहाँ पैर जमाने का अवसर नहीं दिया और अपने तेल भंडारों का उपयोग उन देशों के पक्ष में किया, जो अमरीकी साम्राज्यवाद के पिछलग्गू नहीं थे। भारत और चीन को इसका फ़ायदा भी मिला। मध्य-पूर्व में अब ईरान ही अकेला ऐसा देश बचा है, जो फिलिस्तीनियों का समर्थन करता रहा है।
इराक का उदाहरण हमारे सामने है। जब वहाँ के शासक सद्दाम हुसैन अमरीका की शर्तों को मानने की बजाय तेल के बारे में अपने फ़ैसले खुद लेने लगे, तो उसे कभी ईरान से लड़वाकर, कभी कुवैत पर हमला करने के लिए उकसाकर पहले तो युद्धों में उलझाए रखा गया ; बाद में विनाशकारी हथियारों का बहाना बनाकर और जनता के लिए दमनकारी तानाशाही को कारण बताकर वहाँ लोकतंत्र स्थापित करने के लिए 2003 में हमला किया गया, जिसमें लगभग दो लाख इराक़ी नागरिक मारे गये। यह भी एक तरह का नरसंहार था। अमरीकी और नाटो फ़ौजों द्वारा इराक पर अधिकार कर लिया गया और सद्दाम हुसैन को फाँसी की सज़ा दे दी गई। इराक जैसी कहानी कमोबेश लीबिया और सीरिया में भी दोहराई गई। खाड़ी के अपेक्षाकृत आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक देशों की यही कहानी है, जिनको अमेरिका ने नाटो देशों की मदद से तबाह कर दिया था। इन देशों में लोकतंत्र तो स्थापित नहीं हुआ, लेकिन उनके तेल भंडारों पर अमरीकी कंपनियां अपना वर्चस्व स्थापित करने में कामयाब रहीं। पिछले तीन दशकों से अमरीका और नाटो देश खाड़ी के उन देशों में लगातार हिंसक हस्तक्षेप करके वहाँ तबाही मचाते रहे हैं, जिन्होंने अमरीका के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया था।
ऐसे देशों में केवल ईरान ही अब तक बचा हुआ था, जिसने न केवल अमरीका के आगे घुटने नहीं टेके, इस्राइल के यहूदीवादी शासन से भय खाए बिना फिलिस्तीन का समर्थन करता रहा। दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस्राइल की स्थापना सिर्फ़ इसलिए नहीं की गई थी कि हिटलर ने यूरोप में साठ लाख यहूदियों की हत्या कर दी थी और यूरोप से उजाड़े जाने के बाद उनका अपना कोई देश नहीं था। उस समय जब यहूदियों को यूरोप के किसी देश में शरण नहीं मिल रही थी, फिलिस्तीनियों ने उन्हें अपने यहाँ शरण दी थी। कुछ यहूदी पौराणिक कथाओं के अनुसार दो हजार साल से पहले यहूदी येरुशलम के आसपास उस क्षेत्र में रहते थे, जिसे शताब्दियों से फिलिस्तीन के नाम से जाना जाता है। यहूदीवादी यहूदियों ने फिलिस्तीन में शांतिपूर्वक रहने की बजाय यूरोप और अमरीकी साम्राज्यवाद की मदद से हिंसक रूप में फिलिस्तीनियों को ही वहाँ से खदेड़ना शुरू किया। उस समय महात्मा गाँधी ने सही कहा था कि हिटलर के कारण उजाड़े गए यहूदियों को उन्हीं देशों में वापस बसाया जाना चाहिए जहाँ से उन्हें उजाड़ा गया है। महात्मा गाँधी की बात तो नहीं मानी गयी, लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में इस बात पर सहमति बनी थी कि इस्राइल और फिलिस्तीन दो स्वतंत्र राष्ट्र एक दूसरे के पड़ोस में रहेंगे। लेकिन इस्राइल ने संयुक्त राष्ट्र संघ के इस प्रस्ताव को कभी स्वीकार नहीं किया और जो क्षेत्र फिलिस्तीन के अंतर्गत स्वीकार किए गए थे, हमला बोलकर उन पर क़ब्ज़ा करता रहा, वहाँ यहूदी बस्तियाँ बसाता रहा। फिलिस्तीन के विरुद्ध इस्राइल की सैन्य कार्रवाइयाँ लगभग आठ दशकों से जारी हैं और नेतन्याहू जैसे नेता हिटलर की तरह फिलिस्तीन का नामोनिशान मिटाकर और फिलिस्तीनियों को पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर केवल एक देश इस्राइल का अस्तित्व चाहते हैं, जहाँ केवल यहूदी रहते हों। यहूदीवादी मुसलमानों से वैसी ही नफ़रत करते हैं, जैसी नफ़रत भारत में हिंदुत्ववादियों में देखी जाती है। और यही वजह है कि यहूदीवादियों और हिंदुत्ववादियों में गहरा गठजोड़ दिखाई देता है। दोनों के दुश्मन एक हैं और दोनों के दोस्त एक हैं।
अमरीका को मध्य-पूर्व में अपने सम्पूर्ण वर्चस्व में ईरान ही एकमात्र अवरोध नज़र आता है। वह चाहता है कि इस्राइल के माध्यम से इस पूरे इलाक़े पर उसका नियंत्रण रहे। इस्राइल भी अपनी विस्तारवादी नीतियों के मार्ग में ईरान को ही अकेला अवरोध महसूस करता है और इसीलिए वह अमरीका को ईरान के विरुद्ध भड़काता रहता है। ईरान के विरुद्ध अमरीका और इस्राइल का यह अभियान चार दशकों से चल रहा है। लेकिन पूरे मध्य-पूर्व में ईरान ही अकेला ऐसा देश है, जो अपने पूरे इतिहास में कभी भी किसी अन्य देश का उपनिवेश नहीं बना है। अपने विरुद्ध होने वाले हमलों का लगातार साहसपूर्वक जवाब देता रहा है, चाहे उसकी कितनी भी बड़ी और लंबे समय तक क़ीमत क्यों न चुकनी पड़ी हो।
28 फरवरी 2026 की सुबह भारतीय समय के अनुसार 10 बजकर 40 मिनट पर पहले इस्राइल और उसके तत्काल बाद संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान की राजधानी और अन्य शहरों पर ज़बरदस्त हमला किया। जैसी कि इस्राइल के राष्ट्रपति बेंजामिन नेतन्याहू और अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की है, उनके हमले का मक़सद वर्तमान शासन व्यवस्था को ख़त्म करना है। ईरान की इस्लामी शासन व्यवस्था उनके सबसे बड़े धार्मिक नेता अयातुल्ला खामनेई से पहचानी जाती है, जिनकी इस हमले के पहले दिन ही उनके परिवार सहित हत्या कर दी गई और इसके साथ ही 40 से अधिक सेना और प्रशासन के उच्चतम अधिकारी भी मारे गये, जो खामनेई के साथ बैठक कर रहे थे। यह जानते हुए कि अमरीका और इस्राइल उनको मारना चाहते हैं, 86 वर्षीय खामनेई ने किसी बंकर में जाकर छुपने की बजाय अपने लोगों के बीच काम करते हुए मरना पसंद किया। उनकी मौत एक शहीद की मौत थी।
अमरीका-इस्राइल के इस हमले से पहले भी जून 2025 में इन दोनों देशों ने ईरान पर हमला किया था। उस समय किए गए हमले का कारण यह बताया गया था कि ईरान परमाणु बम बनाने के बिल्कुल नजदीक पहुँच गया है और उसका परमाणु-शक्ति-सम्पन्न होना इस्राइल और मध्य एशिया के पूरे क्षेत्र के लिए ख़तरनाक है, जबकि अमरीका और इस्राइल दोनों ही परमाणु-शक्ति-सम्पन्न देश हैं और वास्तव में पूरे मध्य-पूर्व के देशों को ख़तरा इन्हीं दोनों देशों से है। ईरान का लगातार यह कहना था कि वह परमाणु बम नहीं बना रहा है और यूरेनियम संवर्धन केवल विकास कार्यों के लिए किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों की कई बार जाँच भी की जा चुकी है और उनके प्रतिवेदनों में भी बार-बार यही बताया गया था कि ईरान परमाणु बम नहीं बना रहा है। इसके बावजूद अमरीकी हमले ईरान के उन कथित परमाणु ठिकानों पर किए गए थे, जिन्हें 12 दिन बाद यह कहते हुए रोक दिया गया था कि वे ठिकाने ख़त्म कर दिए गए हैं। इस बार के हमले के पीछे मकसद सत्ता-परिवर्तन के साथ-साथ ईरान की मिसाइल व्यवस्था को ख़त्म करना भी है। सत्ता परिवर्तन के पीछे एक ही प्रयोजन है, वहाँ एक कठपुतली सरकार को बैठाना, जैसा अमेरिका-इजरायल इराक, सीरिया और लीबिया में पहले कर चुके हैं।
इस्राइल और अमरीका 28 फरवरी से ईरान पर लगातार हमला कर रहे हैं। ये हमले सैनिक ठिकानों के साथ-साथ नागरिक ठिकानों पर भी किए जा रहे हैं। ऐसे ही एक हमले में पहले दिन ही अमरीका-इस्राइल ने लड़कियों के प्राथमिक स्कूल पर बमबारी की और उसमें 7 वर्ष से 12 वर्ष की 165 लड़कियों को और उनके अध्यापकों को मार डाला गया। ये हमले अस्पतालों पर भी किए गए जिनमें एक अस्पताल का नाम महात्मा गाँधी के नाम पर रखा गया था। इसी तरह ईरान के नौसेना के ‘आईआरआईएस देना’ जहाज़ पर, जो एक सैनिक अभ्यास के लिए भारत की यात्रा पर था और विशाखापट्टनम से वापस लौट रहा था, परमाणु हथियारों से लैस अमरीकन सबमरीन से हमला किया गया और उस पर सवार 148 ईरानी सैनिक मारे गए। 32 सैनिकों को श्रीलंका की नौसेना ने बचा लिया। सैनिक कार्रवाई करने से पहले अमरीका ने भारत को सूचना देना भी आवश्यक नहीं समझा, न ही भारत ने अमरीका से इसका विरोध किया और न ही ईरानी सैनिकों को बचाने की कोई कोशिश की। इस जहाज़ पर किसी तरह के अस्त्र-शस्त्र नहीं थे और वह युद्ध में भाग भी नहीं ले रहा था। वह हिन्द महासागर के ऐसे क्षेत्र में था, जो भारत की सीमा से ज़्यादा दूर नहीं है। अमरीका द्वारा उस जहाज़ पर हमला किया जाना और डूबते हुए नौसैनिकों को न बचाना अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन था। यह पूरी घटना भारत के लिए बहुत शर्मनाक है, जिस पर भारत अन्य मामलों की तरह चुप्पी साधे हुए है। इस घटना ने खाड़ी युद्ध को भारत की सीमाओं के पास तक पहुँचा दिया है।
इस्राइल और अमरीका के हमले का ईरान द्वारा जवाब दिया जाना स्वाभाविक था और ईरान ने अपने पर हुए हमले के कुछ ही घंटों बाद जवाबी हमले करने शुरू कर दिए थे। इस्राइल की तुलना में ईरान बड़ा देश है, लेकिन सैन्य शक्ति के लिहाज से वह इस्राइल और अमरीका की मिली-जुली ताक़त के सामने कहीं नहीं ठहरता। ईरान पर अभी जो हमले हो रहे हैं, वे हवाई हमले हैं। विमानों से बम-वर्षा, सैनिक अड्डों और सैनिक बेड़ों से मिसाइलों का हमला, और ये हमले इस्राइल और अमरीका द्वारा सैनिक ठिकानों के साथ-साथ नागरिक ठिकानों पर भी हो रहे हैं। इसके विपरीत ईरान के पास अपनी ठीक से वायुसेना भी नहीं है। सिर्फ़ मिसाइलें और ड्रोन हैं, जिनसे दो शक्तिशाली देशों का मुक़ाबला करना लगभग असंभव है। ईरान से अमरीका लगभग बारह हज़ार किलोमीटर दूर है। इतनी दूरी से दोनों देश एक-दूसरे पर हमला नहीं कर सकते, लेकिन अमरीका के सैनिक अड्डे पूरी दुनिया में फैले हुए हैं। खाड़ी के उन सभी देशों में, जहाँ राजतन्त्र है और जिनका अमरीका के साथ सैन्य समझौता है, वहाँ अमरीका के सैनिक अड्डे हैं और दुनिया भर में अमरीकन सैनिक बेड़े और सबमरीन चक्कर लगाते रहते हैं। जहाँ भी उन्हें युद्ध करना होता है या सैन्य कार्रवाई करनी होती है, उन्हें वहीं पहुँचा दिया जाता है। काफ़ी लंबे समय से अमरीका ने ईरान की घेराबंदी कर रखी है।
खाड़ी का कोई देश आज ईरान के साथ नहीं है। राजतन्त्र वाले देश, जिन्हें काफ़ी सुरक्षित समझा जाता है, उनके अमरीकन ठिकानों पर भी ईरान ने आत्मरक्षा में मिसाइल और ड्रोन से लगातार हमले किए हैं। इस्राइल और अमरीका को संभवतः ईरान को परास्त करना बहुत आसान लगता रहा होगा। उन्हें उम्मीद रही होगी कि अयातुल्ला खामनेई की मृत्यु के बाद ईरान की जनता वहाँ की इस्लामिक सत्ता के विरुद्ध सड़कों पर उतर आएगी और उसे उखाड़ फेंकेगी। लेकिन अभी तक तो ऐसा होता नज़र नहीं आ रहा है। इसके विपरीत अयातुल्ला खामनेई की हत्या की ख़बर फैलते ही ईरानी लोग शोक प्रकट करने के लिए सड़कों पर उतर आए। और जिस दिन 165 बालिकाओं को दफ़नाया गया, उस दिन शोकाकुल लोगों का समुद्र उमड़ पड़ा था। नरसंहार की यह बिल्कुल वैसी ही कार्रवाई थी, जो पिछले दो साल से इस्राइल गाज़ा में करता आ रहा है। ईरान पर अमरीका-इस्राइल के हमले को आठ दिन हो चुके हैं। पूरे ईरान के डेढ़ सौ शहरों और दो हज़ार से ज़्यादा ठिकानों पर अब तक हमले किए जा चुके हैं। इस्राइल जो अपने आयरन डोम के कारण अपने को सुरक्षित समझता था, ईरानी मिसाइलों ने उन्हें भेदकर हमला करने में कामयाबी हासिल की है।
ईरान ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, जोर्डन, बहरीन, इराक, ओमान, क़तर, कुवैत आदि देशों के अमरीकन ठिकानों पर हमले किए हैं, जिससे पूरे मध्य-पूर्व में हड़कंप मच गया है। वहाँ से उड़ानें बंद हो जाने से हज़ारों-हज़ार लोग फँस गए हैं। युद्ध के कारण होरमुज का समुद्री मार्ग सुरक्षित नहीं रहा है और इससे कई देशों से सामान की आवाजाही पर असर पड़ा है। भारत का 50 प्रतिशत तेल और 60 प्रतिशत गैस उसी रास्ते से आता है ; अगर इस रास्ते से आवाजाही नहीं हो पाती है और अगले दो-तीन सप्ताह में यह मार्ग नहीं खुलता है, तो भारत में बहुत गंभीर तेल संकट पैदा हो जाएगा। खाड़ी के देशों में लगभग 90 लाख भारतीय काम करते हैं, जो यदि एक ओर मिसाइल और ड्रोन हमलों से डरे हुए हैं, तो दूसरी ओर इस युद्ध का भविष्य में इन देशों की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पर क्या असर पड़ेगा, यह भी उनकी चिंता का विषय हो गया है। ईरान की ओर से लगातार गिरती मिसाइलों से सर्वाधिक सुरक्षित समझे जाने वाले इन देशों की छवि पर गहरा नकारात्मक असर पड़ा है। हालांकि ईरान की ओर से होने वाले हमले अमेरिकी ठिकानों पर ही हो रहे हैं।
ईरान की तुलना में इस्राइल बहुत छोटा देश है। लेकिन उसकी असली ताक़त अमरीका है, जो दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है और उस ताक़त के पीछे अमरीका का सबसे अमीर यहूदी गिरोह है, जो इस्राइल के अस्तित्व में आने के समय से ही अमरीका को इस्राइल के हर तरह के समर्थन के लिए उकसाता रहा है और इसके लिए अमरीकी प्रशासन और राजनीतिज्ञों को ख़रीदता रहा है। अमरीका की गुप्तचर संस्था सीआईए और इस्राइल की मोसाद मिल-जुलकर काम करते हैं। अभी एपस्टिन फ़ाइलों से यह तथ्य और गंदे और क्रूर रूप में उजागर हुआ है। ईरान पर अमरीका और इस्राइल के हमले को वैश्विक स्तर पर ज़्यादा समर्थन नहीं है। लेकिन यह भी सही है कि दुनिया में ऐसी कोई ताक़त भी नहीं है, जो उनका हाथ पकड़ सके। अपने-अपने कारणों से रूस और चीन अमरीका और इस्राइल की आलोचना करने से आगे नहीं बढ़े हैं। ईरान को अपनी लड़ाई अकेले ही लड़नी पड़ रही है, जिसका उसे लंबा अनुभव है। इस्राइल के द्वारा गाज़ा में की गयी हत्याओं के कारण इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट ने युद्ध-अपराधी घोषित कर दिया है और उसकी गिरफ़्तारी के लिए वारंट जारी कर रखा है। इसका अर्थ यह कि इस कोर्ट के सौ सदस्य देशों में से किसी भी देश की यात्रा करने पर उसे गिरफ़्तार किया जा सकता है।
इस्राइल को समर्थन, सुरक्षा और संरक्षण सबसे ज़्यादा अमरीका से ही मिलता रहा है। लेकिन जब से नरेंद्र मोदी सत्ता में आए हैं, भारत की नीति भी इस्राइल और अमरीका की तरफ़ बहुत अधिक झुकी हुई नज़र आती है। एपस्टिन फ़ाइल से भी स्पष्ट है कि 2014 में सत्ता में आने के पहले से ही आरएसएस-भाजपा जेफ्री एपस्टिन के माध्यम से इस्राइल और अमरीका के संपर्क में थे। एपस्टीन एक यहूदी था और मोसाद के लिए काम करता था। नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल मे शामिल होने से पहले हरदीप सिंह पुरी न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे थे। 2013 में सेवानिवृत्त होने के बाद 2014 में उन्होंने भाजपा की सदस्यता ले ली थी और उसी समय वे एपस्टीन के संपर्क में भी आए, जबकि 2008 में ही एपस्टिन की आपराधिक गतिविधियां दुनिया के सामने उजागर हो चुकी थीं, जिनमें घृणित यौन अपराध भी शामिल थे। उसके निजी द्वीप पर छोटी-छोटी बच्चियों को यौन हिंसा का शिकार बनाया जाता था। एपस्टिन को अमरीकी अदालत द्वारा सज़ा भी दी गयी थी और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
लेकिन अपने उच्चस्तरीय संबंधों के कारण वह जल्दी ही जेल से छूट गया था। एपस्टीन न केवल अमरीका, बल्कि इस्राइल और दूसरे कई देशों के शीर्ष पर बैठे राजनीतिज्ञों, अधिकारियों और अन्य प्रभावशाली लोगों के संपर्क में था और उनकी विकृत यौन इच्छाओं को पूरा करने का सामान मुहैया करता था। लेकिन राजनीतिक रूप से वह इजरायल और अमेरिका के हित में काम करता था। उसकी इसी छवि का लाभ उठाते हुए मोदी सरकार ने भी हरदीप सिंह पुरी और अनिल अंबानी के माध्यम से एपस्टीन से संपर्क साधा और नरेंद्र मोदी की पहुँच इन दोनों देशों के शीर्ष नेताओं तक करवाई। किसी देश के प्रधानमंत्री को एपस्टिन जैसे अपराधी के माध्यम से दूसरे देशों के शासकों से संपर्क साधने की ज़रूरत तभी हो सकती है, जब कुछ ऐसे काम किए जाने हों, जिन्हें उस देश की जनता से छुपाना हो और जिसमें कुछ न कुछ आपराधिक काम भी शामिल हो। जब से एपस्टिन की फ़ाइलों में हरदीप सिंह पुरी, अनिल अंबानी और नरेंद्र मोदी का नाम उजागर हुआ है, यह माना जा रहा है कि अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्लैकमेल किए जा रहे हैं। विपक्ष के नेता राहुल गाँधी का यह कहना बिल्कुल सही लगता है कि नरेंद्र मोदी एक ‘कॉम्प्रोमाइज्ड’ प्रधानमंत्री है, जिन्होंने अमरीका के आगे भारतीय हितों की बलि दे दी है। ट्रेड डील के पूरे मामले को नरेंद्र मोदी ने जिस तरह हैन्डल किया है, वह भारत के लिए अत्यंत अपमानजनक है। जिस रूस से भारत को सस्ता तेल मिलता था और जिसका भुगतान रुपये में करना होता था, अमरीका के कहने से रूस से तेल लेना बंद कर दिया गया। और अब जब अमरीका-इस्राइल के ईरान पर हमले के कारण तेल की आवाजाही पर असर पड़ा है और अमरीका से तेल की आपूर्ति नहीं हो रही है, तब रूस से तेल ख़रीदने के लिए भारत सरकार को अमरीका से अनुरोध करना पड़ा कि वह उसे रूस से तेल ख़रीदने की अनुमति दे और अमेरिका ने भारत पर दया करके एक महीने के लिए अनुमति प्रदान की है।
जब से ट्रम्प दोबारा राष्ट्रपति बने हैं, वे नरेंद्र मोदी और भारत का लगातार अपमान कर रहे हैं। अमरीका के दबाव में ही भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह परियोजना से बाहर आ चुका है, जिस पर भारत ने लगभग दो हजार करोड़ रुपये खर्च किए थे, ताकि ईरान से भारत को तेल की निर्बाध आपूर्ति होती रहे। अमरीका के दबाव में ही नरेंद्र मोदी ने यह स्वीकार कर लिया है कि अमरीका से आयात होने वाली किसी भी चीज़ पर टैरिफ शून्य होगा, जबकि भारत से अमरीका को निर्यात होने वाले सामान पर 19 प्रतिशत टैरिफ वसूल जाएगा। सर्वाधिक अपमानजनक घटना तब घटी, जब अमरीका में रहनेवाले भारतीयों को, जिनके पास वैध पेपर नहीं थे, ट्रम्प प्रशासन ने हाथों और पैरों में हथकड़ियाँ पहनाकर सेना के जहाज द्वारा भारत भेजा और भारत की सरकार की हिम्मत नहीं हुई कि वह अमरीका से विरोध कर सके, जबकि छोटे-से-छोटे देश ने अमरीका की ऐसी किसी भी कोशिश को स्वीकार नहीं किया। अमरीका का उप-विदेशमंत्री भारत की ही धरती पर खड़े होकर यह कहने की हिम्मत कर सका कि अमरीका वह ग़लती नहीं दोहराएगा, जो चीन के संबंध में बीस साल पहले की गयी थी। यानी वह भारत के लिए ऐसा कोई काम नहीं करेगा, जिसका चीन की तरह लाभ उठाकर भारत भी चीन की तरह अमरीका की बराबरी कर कर सके। उप-विदेशमंत्री की इस बात का अर्थ यह है कि अमरीका न टेक्नॉलजी के क्षेत्र में और न किसी अन्य क्षेत्र में भारत को आगे बढ़ने में मदद करेगा। अमरीका का हित इसी में है कि वह एक पिछड़ा हुआ देश रहे और अमरीका पर पूरी तरह से निर्भर रहे। अमरीकी उप-विदेशमंत्री के इस अपमानजनक वक्तव्य का विरोध करने का साहस भी नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं जुटा सकी।
आज हम औपनिवेशिक ग़ुलामी के एक नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। यह ग़ुलामी केवल अमरीका की नहीं है, बल्कि यहूदीवादी इस्राइल की भी है। अपने को राष्ट्रवादी कहने वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने सिर्फ़ राष्ट्रीय हितों की ही बलि नहीं दी है, बल्कि देश के सम्मान और गौरव की भी बलि दे दी है। यह जानते हुए कि अमरीका और इस्राइल कभी भी ईरान पर हमला कर सकते हैं, नेतन्याहू के बुलावे पर नरेंद्र मोदी इस्राइल पहुँच गए, जबकि अमरीका और जर्मनी को छोड़कर दुनिया का कोई देश गाज़ा में किए गए निरपराध नागरिकों के नरसंहार के कारण इस्राइल की यात्रा नहीं कर रहा है। नरेंद्र मोदी न केवल इस्राइल गए, बल्कि जिस तरह इस्राइल के प्रति अपना खुला समर्थन व्यक्त किया, वह उस भारत के लिए बहुत ही अपमानजनक था जो हमेशा से फिलिस्तीन की स्वतंत्रता और संप्रभुता का समर्थन करता रहा है। लेकिन अपनी इस इस्राइल यात्रा में नरेंद्र मोदी के ज़बान से न फिलिस्तीन का नाम निकला और न ही इस्राइल द्वारा किए गए अपराधों के लिए निंदा के दो शब्द निकले, बल्कि वहाँ जो भी कुछ परदे के पीछे हुआ, उसी का नतीजा था कि इस्राइल से लौटते ही अमरीका और इस्राइल ने ईरान पर हमला बोल दिया और वहाँ के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामनेई की हत्या कर दी। नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने न तो ईरान पर हुए इस हमले पर कोई बयान दिया और न ही अयातुल्ला खामनेई के प्रति शोक-संवेदना व्यक्त की। इसके विपरीत सऊदी अरब, कतर, बहरीन और जोर्डेन के शासकों को अवश्य फोन कर उन पर ईरान द्वारा हो रहे हमले को लेकर चिंता व्यक्त की। यही नहीं, भारत के पड़ोस में अमरीकी पनडुब्बी द्वारा डुबो दिए गए ईरानी जहाज पर भी किसी तरह का बयान देना ज़रूरी नहीं समझा। अब यह मान लिया गया है कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने ग्लोबल साउथ का साथ छोड़कर अमरीका और इस्राइल के साथ गठजोड़ कर लिया है। वैसे भी 2014 के बाद से ही भारत की विदेश नीति अमरीका और इस्राइल की तरफ़ झुकती चली गयी है। भारत ने सार्क से अपने को अलग कर लिया। ब्रिक्स से भी अपने को अलग कर लिया है। आज कोई देश भारत का मित्र नज़र नहीं आता। पड़ोस के सभी देशों के साथ संबंध तनावपूर्ण होते चले गए हैं। रूस, जिसने हमेशा भारत का साथ दिया है, अमरीका के दबाव में आकर हम उसका साथ छोड़ चुके हैं। अमरीका और इस्राइल के साथ गठबंधन भी बराबरी का नहीं है, बल्कि भारत उनका पिछलग्गू देश नज़र आता है, जिन्हें अमरीका जब चाहे तब, हड़का देता है।
ईरान से हमारे सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंध रहे हैं और ईरान के इस्लामिक गणराज्य ने संकट के समय सदैव भारत का साथ दिया है, उसी ईरान को उसके संकट के समय साथ देने की बजाय उसके शत्रुओं के साथ हमने नापाक गठजोड़ कर लिया है। आरएसएस-भाजपा दरअसल सांप्रदायिक फासीवादी संगठन है और मुसलमानों के प्रति उनमें वैसी ही नफ़रत और घृणा है जैसी आज के समय में यहूदीवादियों में और हिटलर की यहूदियों के प्रति थी। उस समय हिटलर आरएसएस का वैचारिक पथप्रदर्शक था और आज इस्राइल उनका पथप्रदर्शक है। ईरान के बजाय खाड़ी के उन देशों के हुक्मरानों को नरेंद्र मोदी ने फोन किया, जहाँ लोकतंत्र नहीं है और अब उनका नया-नया मित्र अफ़गानिस्तान की तालिबान सरकार बनी है, जिनकी कभी आरएसएस आतंकवादी कहकर भर्त्सना करता था। तालिबान जैसे आतंकवादी संगठन से केवल इसलिए दोस्ती गाँठी गयी है कि उसके माध्यम से पाकिस्तान में अशान्ति फैलाई जा सके।
आज हमारा देश स्वतंत्रता के बाद के सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा है। आज हमारी आज़ादी, हमारी संप्रभुता और लोकतंत्र सभी ख़तरे में है। सबसे बढ़कर हमारा संविधान ख़तरे में है। और इन ख़तरों से हम अपनी रक्षा तभी कर सकते हैं, जब वैश्विक स्तर पर अमरीकी साम्राज्यवाद और यहूदीवाद के विरुद्ध लड़ी जा रही लड़ाई को हम अपनी लड़ाई समझें, उसे पूरा समर्थन दें और देश के अंदर हिंदुत्ववादी ताक़तों के विरुद्ध एकजुट होकर तब तक संघर्ष करें, जब तक कि उन्हें पूरी तरह परास्त न कर दें।
(‘नया पथ’ से साभार। लेखक भारतीय साहित्य और संस्कृति के विद्वान समालोचक तथा इंदिरा गांधी खुला विश्वविद्यालय, दिल्ली के सेवा निवृत्त प्राध्यापक हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 98106-06751, ई-मेल : jparakh@gmail.com)


