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आरक्षण को लेकर हरियाणा में जाट, महाराष्ट्र में मराठा और गुजरात में पटेलों के लिए रास्ता आसान हो गया है?

========BY PANKAJ KUMAR=========

संसद में जैसे ही ओबीसी संशोधन बिल (OBC Amendment Bill) पास होगा महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पटेल और हरियाणा में जाट समुदाय के आरक्षण का रास्ता आसान हो जाएगा. मोदी सरकार (Modi Government) ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में जातियों को शामिल करने की शक्ति राज्यों को देने वाला संविधान संशोधन बिल सोमवार को लोकसभा में पेश कर दिया है. इस बिल के पक्ष में हर मुद्दे पर विरोध करने वाला विपक्ष भी खड़ा है. राज्य सभा और लोकसभा में पास होने और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की प्रक्रिया पूरी करने के बाद राज्य सरकारें अपने हिसाब से ओबीसी की लिस्ट तैयार कर सकती हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पटेल और हरियाणा में जाट समुदाय के लिए आरक्षण का रास्ता क्या अब आसान हो गया है? दरअसल राज्यों को इस बात पर ध्यान देना होगा कि 50 फीसदी आरक्षण की सीमा को वो पार नहीं कर सकते हैं. मराठा आरक्षण मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने 5 मई को एक आदेश देकर कहा था कि राज्यों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को नौकरी और एडमिशन में आरक्षण देने का अधिकार नहीं है. सर्वोच्च अदालत के जजों ने संविधान के 102वें संशोधन का हवाला देते हुए ये फैसला सुनाया था. कोर्ट ने महाराष्ट्र में मराठों को ओबीसी में शामिल कर आरक्षण देने के फैसले पर भी रोक लगाने का आदेश दिया था.
बिल के संसद में पेश होते ही राज्यों में फिर से ओबीसी आरक्षण की मांग ज़ोर पकड़ रही है
सर्वोच्च अदालत के इस फैसले के बाद आरक्षण मसले पर कई पेच फंसते दिखाई पड़ रहे हैं. दरअसल केन्द्र और राज्य ओबीसी की लिस्ट अलग-अलग है. मोदी सरकार संशोधन बिल लेकर आई है और 127वां संविधान संशोधन बिल पेश कर दिया है जिस पर लोकसभा में चर्चा हो रही है. इसी के साथ मराठा और जाट आरक्षण की मांग भी उठने लगी है. ओबीसी संविधान संशोधन बिल के पास होने के बाद राज्यों को पिछड़ी जातियों की सूचि बनाने का अधिकार मिल जाएगा.

संविधान के आर्टिकल 342ए ,आर्टिकल 338बी और 366 में संशोधन किए गए हैं. बिल पास होने के बाद राज्य सरकारें अपने तरीके से जातियों को ओबीसी कोटे में डाल सकेंगी लेकिन उनके लिए ये उतना आसान नहीं होगा क्योंकि आरक्षण की सीमा 50 फीसदी है. हरियाणा में जाट, राजस्थान में गुर्जर, महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पटेल, कर्नाटक में लिंगायत की मांग लंबे समय से है. राज्य सरकार के लिए इंदिरा साहनी का केस सबसे बड़ा बाधक होगा . इंदिरा साहनी केस के फैसले के मुताबिक 50 फीसदी की सीमा से ज्यादा आरक्षण देने पर सुप्रीम कोर्ट रोक लगा सकती है. इस वजह से कई राज्य इस सीमा को खत्म करने की मांग कर रहे हैं.
ओबीसी संविधान संशोधन बिल के पक्ष में गैर बीजेपी पार्टियां भी
कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने बिल का समर्थन करते हुए 50 फीसदी की बाध्यता पर गौर फरमाने की मांग की है. तमिलनाडु का हावाला देते हुए कहा गया कि वहां 69 फीसदी आरक्षण है. इसलिए उसी तर्ज पर बाकी राज्यों को भी अधिकार सौंपा जाना चाहिए. कांग्रेस मराठा आरक्षण को लेकर भी मुखर दिखी. हरियाणा में जाट, महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पटेल को समाहित करना राज्यों के लिए बड़ी चुनौती है. इसमें सुप्रीम कोर्ट का इंदिरा साहनी का फैसला कानूनी अड़चन पैदा करता है. वहीं पूर्व मंत्री बिहार सरकार और समाजवादी नेता राम जीवन सिंह ने कहा कि केंद्र के वर्तमान बिल के होने के बाद नॉर्थ इंडिया की राजनीति में कई उठापटक देखने को मिलेंगे. अब तमाम सियासी पार्टियां आरक्षण की सीमा को बढ़ाने पर जोर देंगी.

ऐसे में राज्यों को ओबीसी लिस्ट बनाने का आधिकार भले ही मिल गया हो, लेकिन आरक्षण के दायरे में दूसरी ओबीसी जाति को शामिल करना आसान नहीं होगा. गुजरात में अगर पटेलों को आरक्षण देने से अन्य ओबीसी जातियां नाराज हो सकती हैं तो ऐसा ही हाल हरियाणा में जाट को लेकर है जहां सैनी, गुर्जर जैसी जातियों की नाराजगी बढ़ सकती है. इसी तरह से महाराष्ट्र में मराठा समुदाय को लेकर है. इसीलिए 50 फीसदी के आरक्षण के दायरे को बढ़ाने की मांग हो रही है. लोकसभा में DMK सांसद टी.आर बालू ने संविधान संशोधन बिल का समर्थन करते हुए कहा कि आरक्षण में 50 फीसदी की बाध्यता भी खत्म होनी चाहिए.
अब राज्यों के पाले में ओबीसी आरक्षण की बॉल
हरियाणा में जाट, गुजरात के पटेल, कर्नाटक के लिंगायत और महाराष्ट्र के मराठा समुदाय का अपने राज्यों में दबदबा है. राजनीतिक पार्टियों के लिए इन जातियों को साधना मजबूरी है लंबे समय से यह जातियां अपने-अपने राज्यों में आरक्षण की मांग कर रही हैं, जिन्हें वहां की राज्य सरकारें किसी भी सूरत में नाराज नहीं करना चाहते हैं. डॉक्टर संजय कुमार कहते हैं कि राजनीति अब नब्बे के दशक जैसी आरक्षण के नाम पर नहीं की जा सकती क्योंकि तमाम सियासी पार्टियां ओबीसी को लेकर एक ही भाषा बोलने लगीं हैं.

महाराष्ट्र में मराठा समुदाय को फडणवीस सरकार ने साधने के लिए ओबीसी की कैटगिरी से बाहर आरक्षण दिया था. वहीं, हरियाणा में जाट समुदाय और गुजरात में पटेल समुदाय को ओबीसी में शामिल कर राज्य सरकार बड़ा दांव चल सकती है, लेकिन ओबीसी की दूसरी जातियों का रवैया सत्ताधारी दल के लिए काउंटर प्रोडक्टिव हो सकता है. ज़ाहिर है केन्द्र ने बॉल अब राज्य सरकार के कोर्ट में डालकर अपने हिसाब से फैसले लेने की छूट दे दी है.

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