अखिल भारतीय शाक्य महासभा ने मनाई त्रिविध पावनी बुद्ध जयंती ।
नरवाना 2 मई (नरेन्द्र जेठी)
त्रिविध पावनी बुद्ध जयंती अखिल भारतीय शाक्य महासभा द्वारा आजाद नगर नरवाना में धूम धाम से मनाई गई। कार्यक्रम की शुरुवात बुद्ध वंदना से की गई। पंचशील, अष्टांगिक मार्ग,मध्य मार्ग के बारे में विस्तार से चर्चा की गई।
तथागत गौतम बुद्ध द्वारा दी गई विपश्यना ध्यान विधि भी करवाई गई। गौतम बुद्ध ने पहली बार बताया कि मन और बुद्धि के अलग अलग है। बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया (मुंबई) हरियाणा के सचिव सुलेख मानव एडवोकेट ने मुख्य वक्ता के तौर पर गौतम बुद्ध के जीवन दर्शन पर विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने अपने वक्तव्य में बताया कि आज ही के दिन वैशाख पूर्णिमा दिन 563 ई.पू. कपिलवस्तु गणराज्य के राजा सुदोधन के घर सिद्धार्थ नाम के बालक का जन्म लुम्बनी वन में हुआ था। जन्म के सात दिन के बाद उनकी माता महामाया का देहांत हो गया था। उनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने उनका पालन पोषण किया। सिद्धार्थ गौतम का जन्म शाक्य वंश में हुआ था।
राजकुमार सिद्धार्थ बचपन से ही किसी भी तरह की हिंसा और शोषण के खिलाफ थे। वो न्याय प्रिय, करुणावान,मैत्री और बंधुत्व की नीति को मानते थे।कई सालों से शाक्य वंश और कोलिय वंश के बीच खेतों के पानी के बटवारें बारे विवाद होता रहता था।
दोनो वंशों के बीच युद्ध की घोषणा हो चुकीं थीं। परंतु अकेले राजकुमार सिद्धार्थ ने संघ के फैसले का जोरदार तरीके से विरोध किया। इसलिए संघ ने सिद्धार्थ को 29 वर्ष की उम्र में अपने सम्राज्य से निकाला दे दिया।
उन्होंने देश निकाला को सहर्ष स्वीकार किया और संघ के सामने घोषणा की मैं दुनिया के तमाम दुखों से मुक्ति के मार्ग की खोज करूंगा। वैशाख पूर्णिमा के दिन 35 वर्ष की उम्र में उरुवेला वन में निरंजना नदी के तट पर पीपल ( बौधी वृक्ष) के नीचे छ वर्ष गहन ध्यान साधना करते हुए संबोधि (परम ज्ञान) घटित हुई थी। परम ज्ञान के बाद राजकुमार सिद्धार्थ से बुद्ध हो गए।
बुद्धत्व उपलब्धि के बाद उन्होंने जाना की राजा, अमीर ,गरीब कोई सभी दुखी हैं। उन्होंने चार अरिय सूतों (आर्य सूत्र) को जाना। पहला दुख है। दूसरा: दुख का कारण है। तीसरा दुख का उपाय है। चौथा दुख का निदान भी है।
सबसे पहला उपाय पंचशील,अष्टांगिक मार्ग और मध्य मार्ग बताया। सरल भाषा में समझाते हुए बताया की वीणा के तार इतने ज्यादा ना कसो की टूट ही जाएं और ना इतने ढीले रखो की संगीत ही पैदा ना हो। ज्येष्ठ पूर्णिमा तक गौतम बुद्ध गया में ही गहन ध्यान साधना में रत रहे।
उसके बाद पैदल चलकर सारनाथ में पांच पुराने साधकों से मुलाकात की। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन सारनाथ में पहला उपदेश दिया। बौद्ध धम्म के इतिहास में उस दिन को धम्मचक्र परिवर्तन दिवस के नाम से जाना जाता है। संघ का निर्माण किया गया।अगले ही दिन बनारस के अमीर सेठ श्रेठी की दीक्षा दी ।फिर उस समय के राजा, मंत्रियों और अनेक साधना में रत साधु सन्यासीयों की दीक्षा हुई।
बहुत जल्दी ही बहुत बड़े संघ का कारवां आगे बढ़ता गया। आज ही के दिन 80 वर्ष की उम्र में कुशीनगर में वैशाख पूर्णिमा के दिन महापरिनिर्वाण हुआ था। संसार में इस तरह की तीन घटनाएं (जन्म ,मृत्यु और ज्ञान प्राप्ति)आध्यात्मिक जगत में किसी और के साथ नही घटित हुई है।
बौद्ध धम्म को आगे बढ़ाते हुए सम्राट अशोक महान ने पाली भाषा में 84,000 स्तूप और अनेक शिलालेख खुदवाए। शिलालेखों के माध्यम बौद्धों के धर्मग्रंथ धम्मपद की महत्वपूर्ण जानकारी देकर बौद्ध धम्म की जड़े मजबूत की गई। उस समयसौलह महाजनपदों में से एक कुरु जनपद होता था। जो आज का हरियाणा कहलाता है।
हरियाणा में भगवान बुद्ध चारिका करते 44 वें,55वें व 78 वें उम्र में आए थे। मृतप्राय: हो चुके बौद्ध धम्म को जिंदा करने वाले बोधिसत्व बाबा साहब डा. अंबेडकर को भी इस मौके पर याद किया और श्रद्धा सुमन अर्पित किए। अंत में संसार के अभी प्राणियों के कल्याण के लिए सामूहिक वंदना इस प्रकार की गई। सब्बे सता सुखी होंतु , सब्बे होंन्तू चखेमिनो। सब्बे भद्राणि पस्संतु मा किंच दुक्खमाग्गमा।
दुनिया के सभी प्राणी सुखी हो, सभी का कल्याण हो, सभी को कल्याण का मार्ग मिले, किसी को कोई दुख न होतो। भवतु सब्ब मंगलं । पायस खीर का प्रसाद ग्रहण किया गया। इस कार्यक्रम में समस्त शाक्य समाज के पुरुषों की बजाय महिलाओं की ज्यादा भागीदारी रही।
शाक्य महासभा ने हरियाणा सरकार से पुरजोर माँग रखी कि भगवान बुद्ध से जुड़े सभी पवित्र स्थलों को बुद्धिस्ट सर्किट घोषित किया जाए। इस मौके पर मुख्य रूप से जगदीश प्रधान,रामफल बौद्ध, सूरज, जयबीर, वेदप्रकाश, सुरेश,सोनू, श्रवण,रवि, रणबीर दलीप,रोशन लाल भीम आर्मी जिला प्रधान, पायल मानवी, महक मौजूद रहीं।


