ब्रिक्स बनाम अमेरिका: टैरिफ युद्ध की नई दस्तक
भारत की दोहरी चुनौती: ब्रिक्स की प्रतिबद्धता और अमेरिका की धमकी
वैश्विक मंच पर एक नया तूफान खड़ा हो चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ताजा चेतावनी ने ब्रिक्स देशों के साथ व्यापारिक और भू-राजनीतिक तनाव को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। 9 जुलाई 2025 को समाप्त होने वाली जवाबी टैरिफ की समयसीमा और ब्राजील में चल रहे 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच ट्रम्प का यह बयान कि ब्रिक्स की “अमेरिका विरोधी नीतियों” का समर्थन करने वाले देशों पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लगेगा, वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। यह केवल व्यापार युद्ध की शुरुआत नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में एक गहरी दरार का प्रतीक है।
अमेरिका द्वारा लगाए गए जवाबी टैरिफ की कहानी अप्रैल 2025 से शुरू होती है, जब ट्रम्प प्रशासन ने विश्व भर के व्यापारिक साझेदारों पर 10% से 49% तक टैरिफ की घोषणा की थी। भारत जैसे देशों पर 26% टैरिफ लगाया गया, जबकि चीन पर 34% और दक्षिण अफ्रीका पर 30% टैरिफ निर्धारित किया गया। हालांकि, वैश्विक दबाव के चलते इन टैरिफ को 90 दिनों के लिए निलंबित कर दिया गया, जिसकी समयसीमा अब 9 जुलाई को समाप्त हो रही है। ट्रम्प ने 7 जुलाई को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर ऐलान किया कि 12 देशों को टैरिफ पत्र भेजे जाएंगे, जिनमें कोई अपवाद नहीं होगा। यह कदम न केवल ब्रिक्स देशों को निशाना बनाता है, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था को भी चुनौती देता है।
ब्रिक्स समूह, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका के साथ-साथ मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे नए सदस्य शामिल हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक प्रभावशाली शक्ति बन चुका है। 2024 में चार नए देशों और 2025 में इंडोनेशिया के शामिल होने से इस समूह का दायरा और बढ़ गया है। ब्रिक्स देशों की कुल जनसंख्या विश्व की लगभग आधी है, और यह समूह वैश्विक जीडीपी का 40% और व्यापार व निवेश प्रवाह का 25% हिस्सा नियंत्रित करता है। ऐसे में, ब्रिक्स का बढ़ता प्रभाव अमेरिका के लिए असहजता का कारण बन रहा है, खासकर जब यह समूह अमेरिकी डॉलर की वैश्विक प्रभुता को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है।
17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन(BRICS Summit) में रियो डी जेनेरियो में जारी संयुक्त घोषणापत्र में ब्रिक्स देशों ने अमेरिका की एकतरफा टैरिफ नीतियों की कड़ी आलोचना की। घोषणापत्र में कहा गया कि टैरिफ(Tariff war) और गैर-टैरिफ उपाय वैश्विक व्यापार को विकृत करते हैं और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों का उल्लंघन करते हैं। ब्रिक्स ने एक खुले, निष्पक्ष, और नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली की वकालत की, जो वैश्विक मंदी और धीमी वृद्धि को रोकने के लिए आवश्यक है। इस बयान ने ट्रम्प के गुस्से को और भड़का दिया, जिन्होंने इसे “अमेरिका विरोधी” करार देते हुए 10% अतिरिक्त टैरिफ की धमकी दी।
ट्रम्प का यह रुख नया नहीं है। जनवरी 2025 में भी उन्होंने ब्रिक्स देशों को चेतावनी दी थी कि अगर वे डॉलर के विकल्प के रूप में नई मुद्रा विकसित करते हैं, तो 100% टैरिफ का सामना करना पड़ेगा। यह धमकी ब्रिक्स की उस महत्वाकांक्षा से जुड़ी है, जिसमें वह अमेरिकी डॉलर और यूरो पर वैश्विक निर्भरता को कम करने के लिए एक वैकल्पिक भुगतान प्रणाली या नई मुद्रा की दिशा में काम कर रहा है। 2022 के 14वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में इस विचार की नींव रखी गई थी, और रूस-चीन जैसे देशों ने रूबल और युआन में 95% व्यापार शुरू कर इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से जटिल है। एक ओर, भारत ब्रिक्स का एक प्रमुख सदस्य है, जो वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने और आर्थिक सहयोग बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। दूसरी ओर, अमेरिका के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी और 8 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार इसे टैरिफ युद्ध में नाजुक स्थिति में डालता है। भारत ने अप्रैल में लगाए गए 26% टैरिफ को पूरी तरह हटाने की मांग की है, और दोनों देशों के बीच सितंबर-अक्टूबर तक एक अंतरिम व्यापार समझौते की उम्मीद है। हालांकि, केंद्रीय वाणिज्य मंत्री ने स्पष्ट किया है कि भारत राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा और किसी भी डेडलाइन के दबाव में समझौता नहीं करेगा।
ट्रम्प की नीतियों का प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स और रत्न-आभूषण जैसे क्षेत्र, जो भारत के लिए 14 अरब और 9 अरब डॉलर के निर्यात बाजार हैं, इस टैरिफ युद्ध से बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, फार्मास्यूटिकल्स और ऊर्जा क्षेत्रों को फिलहाल छूट दी गई है, जो भारत के 12.2 अरब डॉलर के दवा निर्यात के लिए राहत की बात है। फिर भी, विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय में टैरिफ में बदलाव इन क्षेत्रों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
ब्रिक्स देशों का जवाबी रुख भी कम आक्रामक नहीं है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि ब्रिक्स का उद्देश्य किसी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि समावेशी और सहकारी विकास को बढ़ावा देना है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पिछले साल अमेरिका पर डॉलर को हथियार बनाने का आरोप लगाया था, और ब्रिक्स की नई मुद्रा की योजना को वैश्विक वित्तीय प्रणाली में अमेरिकी प्रभुत्व के खिलाफ एक कदम माना जा रहा है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इस टकराव का प्रभाव गहरा हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने 2025-26 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर को 6.2% अनुमानित किया है, जो वैश्विक अनिश्चितताओं और व्यापार तनाव के कारण 0.3% कम है। ब्रिक्स देशों का आंतरिक व्यापार 2025 में 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है, जो उनकी आर्थिक ताकत को दर्शाता है। लेकिन ट्रम्प की टैरिफ नीति इस वृद्धि को बाधित कर सकती है, जिससे वैश्विक मंदी का खतरा बढ़ सकता है।
इस तनाव का एक और आयाम ब्रिक्स की आतंकवाद के खिलाफ अटल एकजुटता है। 17वें शिखर सम्मेलन में, पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए ब्रिक्स ने आतंकवाद के खात्मे के लिए निर्णायक और ठोस कार्रवाई का आह्वान किया। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मंच का प्रभावी उपयोग कर पाकिस्तान को वैश्विक कटघरे में खड़ा किया, जिसने ब्रिक्स की भू-राजनीतिक प्रासंगिकता को और सशक्त किया।
यह टकराव केवल व्यापारिक नीतियों तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का एक गहन प्रश्न है। ट्रम्प की “अमेरिका पहले” नीति और ब्रिक्स की बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था की दमदार वकालत एक ऐसी वैचारिक जंग की शुरुआत कर रही है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व दिशाओं में ले जा सकती है। क्या यह संघर्ष एक नई विश्व व्यवस्था को आकार देगा, या यह वैश्विक मंदी का कारण बनेगा? यह सवाल भविष्य के गर्भ में छिपा है, मगर इतना निश्चित है कि आने वाले दिन वैश्विक मंच पर ऐतिहासिक बदलावों के साक्षी बनेंगे।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत