कहा-जीव जंतुओं के लिए चारा,दाना -पानी का प्रबंध जोहड़, तालाब और बावड़ी का निर्माण किया जाता रहा है।
आधुनिक जीवन शैली में जोहड़ तालाब एवं अन्य प्राकृतिक पानी के स्रोतों को किया प्रदूषित-चन्द्रकेान्त आर्य
नरवाना 17 मई (नरेन्द्र जेठी)
भारतीय जीवन शैली में ग्रीष्म ऋतु में निशुल्क पानी की सेवा का प्रावधान करने का विधान रहा है, यहां तक की जीव जंतुओं के लिए चारा,दाना -पानी का प्रबंध जोहड़, तालाब और बावड़ी का निर्माण किया जाता रहा है। आधुनिक जीवन शैली में जोहड़ तालाब एवं अन्य प्राकृतिक पानी के स्रोतों को प्रदूषित कर दिया है, और अतिक्रमण से उनको समाप्त कर दिया गया।
आज आर्य समाज नरवाना संबंद्धता आर्य प्रतिनिधि सभा हरयाणा दयानन्द मठ रोहतक ने प्रधान चंद्रकांत आर्य के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए आर्य समाज प्रधान चन्द्रकसन्त आर्य ने यह बात कही। उन्होने कहा कि इसीलिए ऋषियों ने योग साधना के द्वारा शारीरिक शुद्धि से मानसिक पवित्रता , बौद्धिक प्रखरता एवं आध्यात्मिक बल की सर्जनात्मक विधि विधान बताया है।
वर्तमान में अत्यधिक तापमान में वृद्धि का मूल कारण भौतिक विकास की आड़ में प्रकृति का महाविनाश और प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन है। किसानों से आह्वान किया गया की फसल अवशेषों को मिट्टी में मिलाकर प्राकृतिक खाद बनाकर भुमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाए। उत्तम आहार से श्रेष्ठ व्यवहार होता है।
इसलिए महर्षि दयानंद ने संतुलित जीवन शैली में पवित्रता प्रेम और शांति का उल्लेख करते हुए बताया है कि मनुष्य को अपने विवेक से विश्व परिदृश्य में पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन के लिए अनिवार्य रूप सर्व जन हिताय सर्वजन सुखाय के लिए कार्य करना चाहिए। प्रधान चंद्रकांत आर्य ने सांख्य दर्शन के सिद्धांत अनुसार बताया कि परमपिता परमात्मा ने आदिकाल में सतो,रजो तमो के संघात से सृष्टि का निर्माण सभी जीव जंतुओं के कर्म योग, भोग एवं कल्याण के लिए किया किया। प्रकृति में महत्व तत्व अहम,अहम से बुद्धि, पांच सूक्ष्म भूत, दस इंद्रियां, मन तथा पांच सूक्ष्म तन मात्राओं से पंचमहा तत्वों सहित 24 गुणों से सुक्ष्म शरीर का निर्माण किया।
सूर्य, चंद्र एवं नक्षत्र इत्यादि वसुओं का निर्माण प्रकृति के निमित्त कारण से किया। ऋषि मुनियों और दर्शनशास्त्रियों ने इसका उल्लेख सांख्य,योग,मीमांसा,वैशेषिक, दर्शन और उपनिषदों में विस्तृत रूप से किया हुआ है।महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के आठवें समुल्लास में सृष्टि की उत्पत्ति इत्यादि का विस्तृत विवरण वैज्ञानिक एवं धर्म आधारित सिद्धांतों का उल्लेख किया। पंचमहा तत्वों की पवित्रता से ही सृष्टि और प्रकृति की पवित्रता बनी रहती है।
पंचमहा तत्वों में असंतुलन के कारण ही प्रकृति में असंतुलन होने से प्राकृतिक आपदाएं और विपदाएं होती हैं। यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे के अनुसार मनुष्य में शारीरिक,मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक चिंतन एन प्रभावित होता है। धर्मपाल एवं यशपाल आर्य ने भजन एवं गीतों में ईश्वर स्तुति प्रार्थना उपासना और आराधना के साथ महर्षि दयानंद सरस्वती के समाज एवं राष्ट्र जागरण का उल्लेख किया।
इस अवसर पर मिथिलेश शास्त्री ने कहा कि वेद का ज्ञान के लिए योग साधना, उत्तम आचरण परोपकारी व्यवस्था में संपूर्ण मानवता का कल्याण समाहित है। इस अवसर पर पर्यावरण शुद्धि एवं समृद्धि के लिए यज्ञ हवन भी किया।इस अवसर पर वेदपाल आ रही है। संजीव, कर्ण, प्रेम ,प्रताप सिंह ,बलबीर सिंह इत्यादि आर्य उपस्थित रहे।


