AtalHind
टॉप न्यूज़राष्ट्रीय

न्यायपालिका कभी भी शासन के रास्ते में नहीं आएगी, अगर यह कानून के तहत चलता है तो.’-एनवी रमना

‘न्यायपालिका कभी भी शासन के रास्ते में नहीं आएगी, अगर यह कानून के तहत चलता है तो.’-एनवी रमना
सरकारें सबसे बड़ी मुक़दमेबाज़, कार्यकापालिका-विधायिका के चलते लंबित मामलों की भरमार: सीजेआई

नई दिल्ली: प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने शनिवार को सरकारों को ‘सबसे बड़ा वादी’ करार दिया और कहा कि 50 प्रतिशत लंबित मामलों के लिए वे जिम्मेदार हैं. उन्होंने कहा कि कार्यपालिका और विधायिका की विभिन्न शाखाओं के अपनी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं करने के कारण लंबित मामलों का अंबार लगा हुआ है.
Advertisement
प्रधान न्यायाधीश ने कार्यपालिका द्वारा न्यायिक आदेशों की अवहेलना से उत्पन्न अवमानना ​​​​मामलों की बढ़ती संख्या का उल्लेख किया और कहा कि ‘न्यायिक निर्देशों के बावजूद सरकारों द्वारा जान-बूझकर निष्क्रियता दिखाना लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है’.
प्रधान न्यायाधीश ने मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन में भारतीय न्यायपालिका के सामने प्रमुख समस्याओं जैसे लंबित मामले, रिक्तियां, घटते न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात और अदालतों में बुनियादी ढांचे की कमी को रेखांकित किया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त सम्मेलन का उद्घाटन किया.
प्रधान न्यायाधीश ने राज्य के तीन अंगों – कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका – को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय ‘लक्ष्मण रेखा’ के प्रति सचेत रहने की याद दिलाई. उन्होंने सरकारों को आश्वस्त किया कि ‘न्यायपालिका कभी भी शासन के रास्ते में नहीं आएगी, अगर यह कानून के तहत चलता है तो.’
Advertisement
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘हम लोगों के कल्याण के संबंध में आपकी चिंताओं को समझते हैं.’
उन्होंने कहा कि सभी संवैधानिक प्राधिकारी संवैधानिक आदेश का पालन करते हैं, क्योंकि संविधान तीनों अंगों के बीच शक्तियों के पृथक्करण, उनके कामकाज के क्षेत्र, उनकी शक्तियों और जिम्मेदारियों का स्पष्ट रूप से प्रावधान करता है.
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘यह एक अच्छी तरह से स्वीकार किया गया तथ्य है कि सरकारें सबसे बड़ी वादी (मुकदमेबाज) हैं, जो लगभग 50 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार हैं.’
Advertisement
उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे कार्यपालिका की विभिन्न शाखाओं की निष्क्रियता नागरिकों को अदालतों का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर करती है.
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘इन उदाहरणों के आधार पर कोई भी संक्षेप में कह सकता है कि, अक्सर, दो प्रमुख कारणों से मुकदमेबाजी शुरू होती है. एक- कार्यपालिका की विभिन्न शाखाओं का काम न करना. दूसरा- विधायिका का अपनी पूरी क्षमता को नहीं जानना.’
सीजेआई ने कहा कि अदालतों के फैसले सरकारों द्वारा वर्षों तक लागू नहीं किए जाते और इसका परिणाम यह है कि अवमानना ​​​​याचिकाएं अदालतों पर बोझ की एक नई श्रेणी बन गई हैं. उन्होंने कहा कि यह प्रत्यक्ष रूप से सरकारों द्वारा अवहेलना का परिणाम है.
Advertisement
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, रिक्तियों के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि आज की स्थिति में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्वीकृत 1,104 पदों में से 388 रिक्तियां हैं.
उन्होंने जजों के नामों को मंजूरी देने के लिए केंद्र को धन्यवाद दिया देते हुए कहा, ‘पहले दिन से न्यायिक रिक्तियों को भरने का मेरा प्रयास रहा है. हमने पिछले वर्ष के दौरान विभिन्न उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों के लिए 180 सिफारिशें की हैं. इसमें से 126 नियुक्तियां हो चुकी हैं.’
उन्होंने आगे कहा, ‘हालांकि, 50 प्रस्तावों को अभी भी भारत सरकार द्वारा मंजूरी का इंतजार है. उच्च न्यायालयों ने भारत सरकार को लगभग 100 नाम भेजे हैं. वे अभी तक हम तक नहीं पहुंचे हैं. आंकड़ों से पता चलता है कि न्यायपालिका द्वारा रिक्तियों को भरने के लिए किए जा रहे गंभीर प्रयास किया जा रहा है.’
Advertisement
सीजेआई ने मुख्यमंत्रियों से जिला न्यायपालिका को मजबूत करने के अपने प्रयास में ‘मुख्य न्यायाधीशों को पूरे दिल से सहयोग देने’ का भी आग्रह किया.
उन्होंने कहा कि 2016 में देश में न्यायिक अधिकारियों की स्वीकृत संख्या 20,811 थी और अब यह 24,112 है, जो छह वर्षों में 16 प्रतिशत की वृद्धि है.
प्रति 10 लाख में 20 न्यायाधीशों के जनसंख्या अनुपात को ‘बहुत खतरनाक’ करार देते हुए उन्होंने कहा, ‘दूसरी ओर इसी अवधि में जिला अदालतों में लंबित मामलों की संख्या 2.65 करोड़ से बढ़कर 4.11 करोड़ हो गई है, जो कि 54.64 प्रतिशत की वृद्धि है. यह आंकड़ा दिखाता है कि स्वीकृत संख्या में वृद्धि कितनी अपर्याप्त है.’
यह कहते हुए कि अदालतें नागरिकों को ‘ना’ नहीं कह सकती हैं, उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को इस बात का भी सामना करना पड़ता है कि कार्यपालिका स्वेच्छा से निर्णय लेने का बोझ उस पर स्थानांतरित कर रही है, इस तथ्य के बावजूद कि नीति बनाना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है.
Advertisement
जस्टिस रमना ने मुकदमों की बढ़ती संख्या के बारे में बात करते हुए कहा, ‘उदाहरण के लिए जनहित याचिका की अच्छी अवधारणा कभी-कभी व्यक्तिगत हित वाली मुकदमेबाजी में बदल जाती है.’
उन्होंने कहा, ‘न्याय वितरण प्रणाली का भारतीयकरण आम भारतीय आबादी की जरूरतों और संवेदनाओं के हिसाब से प्रणाली को ढालने के लिए आवश्यक है.’
उन्होंने यह भी कहा, ‘मैं इसे बहुत स्पष्ट कर दूं कि यह धन के बारे में नहीं है. मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि केंद्र सरकार उचित बजटीय आवंटन कर रही है. वर्तमान तदर्थ समितियों से अधिक सुव्यवस्थित, जवाबदेह और संगठित ढांचे की ओर बढ़ने का समय आ गया है.’
Advertisement
11वें मुख्य न्यायाधीशों और मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन छह साल के अंतराल के बाद आयोजित किया गया था. इसे “न्याय के प्रशासन को प्रभावित करने वाली समस्याओं पर चर्चा और पहचान करने के उद्देश्य के साथ आयोजित किया गया था.
‘न्यायालयों में स्थानीय भाषा के उपयोग जैसे सुधारों को एक दिन में लागू नहीं किया जा सकता’
प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने शनिवार को कहा कि अदालतों में स्थानीय भाषा का उपयोग करने जैसे सुधारों को एक दिन में लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि कई तरह की अड़चनों के कारण ऐसी चीजों के कार्यान्वयन में समय लगता है.
जस्टिस रमना ने कहा, ‘कई बार, कुछ न्यायाधीश स्थानीय भाषा से परिचित नहीं होते. मुख्य न्यायाधीश हमेशा बाहर के होंगे. वरिष्ठतम न्यायाधीश भी कई बार बाहर से होते हैं.’
Advertisement
केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू के साथ संयुक्त प्रेसवार्ता के दौरान एक सवाल के जवाब में जस्टिस रमना ने कहा, ‘स्थानीय भाषाओं को लागू करने में कई तरह की बाधाएं और अड़चनें हैं.’
मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन के बाद आयोजित प्रेसवार्ता के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि वर्ष 2014 के दौरान उच्चतम न्यायालय की पूर्ण पीठ ने उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें अदालतों में स्थानीय भाषा का उपयोग करने का अनुरोध किया गया था.
उन्होंने कहा, ‘इसके बाद से उच्चतम न्यायालय के समक्ष कोई भी ठोस प्रस्ताव नहीं आया है. हाल में, स्थानीय भाषाओं को अनुमति देने संबंधी बहस शुरू हुई है.’
Advertisement
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि तमिलनाडु ने न्यायिक कार्यवाही में स्थानीय भाषा के उपयोग की मांग उठाई है.
साथ ही उन्होंने कहा कि गुजरात के एक वरिष्ठ नेता ने भी ऐसा ही आग्रह किया है, लेकिन उन्होंने अभी तक इस संबंध में कोई प्रस्ताव नहीं मिला
Advertisement
Advertisement

Related posts

सड़क पर सरकार और बेरोजगार ! बिलासपुर चौराहा, दिल्ली जयपुर नेशनल हाईवे पर 8 घंटे जाम

atalhind

BMW में मिली युवती की लाश

editor

यूपी पुलिस के फेक एनकाउंटर मामलों को दबाया गया, एनएचआरसी ने भी नियमों का उल्लंघन किया: रिपोर्ट

atalhind

Leave a Comment

URL