नॉर्वे की साहसी महिला पत्रकार हेले ल्युंग (Helle Lyng)ने उन्हें घेर लिया और बेहद तीखा, साहसी और ललकार भरा सवाल दाग दिया — “आप दुनिया के सबसे स्वतंत्र प्रेस वाले देश में सवालों के जवाब क्यों नहीं देते?” याद रहे कि विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में नॉर्वे पहले स्थान पर है, जबकि मोदी राज वाला भारत 157वें स्थान पर खिसक चुका है, जो बेहद शर्मनाक, चिंताजनक, दुखद और लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
आलेख: राजेन्द्र शर्मा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बंगाल फतह करने के खुलेआम दर्प, घमंड और विजयी अहंकार के साथ, गुजरात के सोमनाथ मंदिर में आयोजित भव्य कार्यक्रम से मिली ‘हिंदू हृदय सम्राट’ वाली चमकदार छवि को चेहरे पर सजाए हुए यूएई और यूरोप की पांच दिन की यात्रा पर गए थे।
लेकिन विदेश की धरती पर पहुंचते ही उन्हें गहरा झटका लगा होगा। उनके शासन की कड़वी, कठोर और नंगी सच्चाई अब सात समंदर पार भी पहुंच चुकी है। चाहे कितना भी मीडिया प्रबंधन कर लें, कितने भी चमकदार नैरेटिव गढ़ लें, कितना भी प्रचार तंत्र चलाएं और कितनी भी झूठी सफलताओं का ढिंढोरा पीटें, दुनिया अब मोदी राज की असली हकीकत को साफ-साफ, बिना किसी पर्दे के देख रही है।
नीदरलैंड दौरे के दौरान संयुक्त प्रेस वक्तव्य के समय प्रधानमंत्री मोदी ने मीडिया को सवाल पूछने का कोई मौका नहीं दिया। यह अब उनकी स्थायी, अटल और बेहद सख्त नीति बन चुकी है — सवालों से बचना, पत्रकारों को अनसुना करना, असहमति को कुचलना और लोकतंत्र की मूल भावना को पूरी तरह ताक पर रख देना।
डच पत्रकारों ने इस रवैये का खुलकर, साहसी और बेहद तीखा विरोध जताया। इससे भी ज्यादा गंभीर, चिंताजनक और शर्मनाक बात यह थी कि यात्रा से ठीक पहले डी फोक्सक्राट जैसे प्रतिष्ठित डच प्रकाशन ने डच प्रधानमंत्री रॉब जेट्टकिन के हवाले से साफ-साफ लिख दिया था कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता के साथ-साथ अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर भी भारी, बढ़ता हुआ और खतरनाक दबाव है।
जब विदेश मंत्रालय द्वारा बुलाई गई पत्रकार वार्ता में डच पत्रकारों ने सीधा सवाल किया कि क्या डच प्रधानमंत्री ने इन गंभीर चिंताओं को मोदी के सामने उठाया था, तो भारत के विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने भारत की प्राचीन सभ्यता, उसकी महानता, विशालता और ‘सब कुछ ठीक है’ वाला लंबा-चौड़ा, उबाऊ, बचकाना और हास्यास्पद लेक्चर दे डाला।
सवाल पूछने वालों को भारत की हकीकत से पूरी तरह अनजान, अज्ञानी और बेहूदा बताकर चुप कराने की कोशिश की गई। जब पत्रकार ने याद दिलाया कि ये टिप्पणियां डच प्रधानमंत्री की थीं, तो भारतीय पक्ष के प्रवक्ता के पास कोई ठोस, तार्किक, विश्वसनीय या सच्चाई पर आधारित जवाब नहीं बचा। बस बगलें झांकने, मुंह फेरने, विषय बदलने और असहज होने की नौबत आ गई।
यह पूरा दृश्य मोदी राज की असहिष्णुता, कमजोर तर्क, लोकतंत्र विरोधी मानसिकता और सवालों से भागने की आदत का शर्मनाक प्रमाण था।नॉर्वे पहुंचकर स्थिति और ज्यादा स्पष्ट, शर्मनाक, उजागर और निंदनीय हो गई।
प्रधानमंत्री मोदी जब नॉर्वे की प्रधानमंत्री जोनास स्टोर के साथ प्रेस वक्तव्य जारी करने के बाद जाने लगे, तो नॉर्वे की साहसी महिला पत्रकार हेले ल्युंग ने उन्हें घेर लिया और बेहद तीखा, साहसी और ललकार भरा सवाल दाग दिया — “आप दुनिया के सबसे स्वतंत्र प्रेस वाले देश में सवालों के जवाब क्यों नहीं देते?” याद रहे कि विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में नॉर्वे पहले स्थान पर है, जबकि मोदी राज वाला भारत 157वें स्थान पर खिसक चुका है, जो बेहद शर्मनाक, चिंताजनक, दुखद और लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
मोदी ने इन सवालों को पूरी तरह अनसुना कर दिया और चुपचाप निकल गए। लेकिन नॉर्वे की प्रधानमंत्री ने खुद पत्रकारों के सामने आकर भारतीय और नॉर्वेजियन पत्रकारों के सवालों का जवाब दिया।
बाद में विदेश मंत्रालय की पत्रकार वार्ता में सिबी जॉर्ज ने फिर वही पुराना, थका हुआ, बेजान और दोहराया हुआ भाषण दोहराने की कोशिश की, लेकिन यूरोपीय पत्रकारों ने तीखा, सीधा और ललकार भरा हमला बोला — “मानवाधिकारों, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और प्रेस की आजादी के शर्मनाक रिकॉर्ड को देखते हुए हम आपके शासन वाले भारत पर भरोसा कैसे कर सकते हैं?”
मोदी राज की इस अंतरराष्ट्रीय बदनामी को पूरा करने का जिम्मा भाजपा आईटी सेल और अंधे मोदी भक्तों ने संभाल लिया।
उन्होंने नॉर्वे की उस महिला पत्रकार पर बेहद घिनौना, नीच, हमलावर और बेहद घटिया हमला बोल दिया। चूंकि सवाल एक महिला ने पूछा था, इसलिए भक्तों ने महिलाओं के खिलाफ अपने पुराने, जहर भरे, बेहद घटिया और हिंसक हथियार का इस्तेमाल करते हुए उसका फोन नंबर, घर का पूरा पता, निजी तस्वीरें, परिवार की जानकारियां तक सोशल मीडिया पर सार्वजनिक कर दीं।
उसके करियर पर सवाल उठाए गए और यह साबित करने की कोशिश की गई कि मोदी से सवाल पूछना किसी बड़े विदेशी षड्यंत्र का हिस्सा है। यह पूरा प्रकरण मोदी राज की असली और बेहद काली सच्चाई उजागर करता है। जहां एक ओर सरकार प्रेस की स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानवाधिकारों का बड़ा-बड़ा ढोंग रचती है,
वहीं दूसरी ओर असहमति रखने वालों को ट्रोल आर्मी के जरिए धमकाया, बदनाम किया, प्रताड़ित किया और मानसिक रूप से तोड़ा जाता है। यही वजह है कि भारत प्रेस स्वतंत्रता के मामले में 180 देशों में 157वें स्थान पर पहुंच गया है — पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल से भी नीचे। यह मोदीशाही की सबसे बड़ी विफलता और शर्म का सबूत है।
नाकामियों को युद्ध की आड़ में छुपाने की चाल
अब असली मुद्दे पर आते हैं। मोदी सरकार अपनी चौतरफा, गहरी, लगातार बढ़ती और खतरनाक नाकामियों को छुपाने के लिए युद्ध का सुविधाजनक, झूठा और सस्ता बहाना इस्तेमाल कर रही है। तेल का भयानक संकट, रुपए का तेजी से अवमूल्यन, बढ़ता व्यापार घाटा, औद्योगिक विकास दर में निरंतर मंदी, विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ता दबाव, बेरोजगारी का भयावह रूप और खेती-किसानी का गहराता संकट — इन सभी समस्याओं को ‘बाहरी परिस्थितियां’ और ‘पश्चिम एशिया युद्ध’ का नाम देकर जनता के सामने पेश किया जा रहा है।
विधानसभा चुनाव नतीजे आते ही नरेंद्र मोदी ने अचानक तेल संकट और बड़े आर्थिक संकट का एलान कर दिया। नीदरलैंड में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इस संकट से विश्व की दशकों की प्रगति डूब सकती है और करोड़ों लोग गरीबी की गहरी खाई में धंस जाएंगे। लेकिन चुनाव तक तो यही सरकार “सब चंगा सी” का झूठा, फर्जी और बेबुनियाद राग अलाप रही थी और संकट को पूरी तरह नकार रही थी।
चुनाव खत्म होते ही पेट्रोल और डीजल के दाम तीन-तीन रुपये बढ़ा दिए गए, सीएनजी के दाम दो रुपये बढ़ाए गए और अब तेल कंपनियों को छोटी-छोटी किस्तों में मनमाने दाम बढ़ाने की खुली छूट दे दी गई है।भारत अपनी 80 प्रतिशत तेल जरूरत का आयात करता है, यह सच है। लेकिन यह संकट पूरी तरह बाहरी नहीं है।
मोदी सरकार ने खुद तीन बड़े गुनाह किए हैं, जिनकी वजह से संकट और ज्यादा गहरा, भयानक, लंबा और जनता के लिए दुखदाई हो गया है।पहला गुनाह — विदेश नीति का दिवाला और आत्मसमर्पण। यूपीए सरकार के समय शुरू हुई अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को मोदी सरकार ने संघ-भाजपा की अंध अमेरिका भक्ति और इजराइल के प्रति अंधभक्ति में बदल दिया।
नतीजा यह हुआ कि ईरान से सस्ता तेल खरीदना बंद कर दिया गया, रूस से सस्ता तेल लेने में भी अमेरिका की इजाजत पर निर्भर रहना पड़ा। आज भारत अमेरिका-इजराइल की हमलावर नीतियों से पूरी तरह बंध चुका है। प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा ने इस गठबंधन पर आखिरी और शर्मनाक मुहर लगा दी।दूसरा गुनाह — रणनीतिक तेल भंडार न बनाना। मोदी राज के शुरुआती वर्षों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल काफी सस्ता था।
इस सुनहरे मौके का फायदा उठाकर भारत बड़े स्तर पर रणनीतिक भंडार बना सकता था, जैसा कि चीन ने बुद्धिमानी से किया। लेकिन मोदी सरकार ने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय निजी तेल कंपनियों को सस्ता तेल लेकर यूरोप में महंगे दाम पर बेचने का मुनाफा कमाने का मौका दिया गया और देश की आम जनता से डेढ़ गुना से भी ज्यादा दाम वसूले गए।तीसरा गुनाह — इजारेदार पूंजी के साथ गठजोड़ और जनता का शोषण।
जनता को निचोड़कर जमा की गई रकम को कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों को रियायतें, छूट और नुमाइशी परियोजनाओं के जरिए लुटाया गया। रोजगार सृजन और असली आर्थिक विकास की बजाय सिर्फ कुछ अमीरों की मांग पूरी की गई।रुपए की लगातार गिरावट, विदेशी पूंजी का पलायन, औद्योगिक मंदी, बेरोजगारी का बढ़ता ग्राफ और कृषि क्षेत्र का गहराता संकट — ये सारे संकट पश्चिम एशिया के युद्ध से बहुत पहले से मौजूद थे।
यूक्रेन-रूस युद्ध और कोरोना महामारी से भी पहले ये समस्याएं सिर उठा रही थीं। लेकिन मीडिया पर पूर्ण कब्जे और प्रचार मशीनरी के कारण इन्हें लगातार छुपाया और दबाया जाता रहा। अब जब सारे संकट एक साथ फूट पड़े हैं और जनता पर बोझ बन गए हैं, तो मोदीशाही इन्हें युद्ध की ओट में छुपाने की कोशिश कर रही है।
मोदीशाही की ये नाकामियां अकेले किसी एक व्यक्ति या एक फैसले की नहीं हैं। यह संघ-भाजपा की संकीर्ण विचारधारा, इजारेदार पूंजी के साथ गठजोड़ और पूरी तरह से अदूरदर्शी, जनविरोधी नीतियों का घातक नतीजा है।
युद्ध महज एक सुविधाजनक, अस्थायी और झूठा बहाना है, जो असली समस्याओं से जनता का ध्यान हटाने का काम कर रहा है।
लेखक: राजेन्द्र शर्मा
(वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपाद
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