जब भ्रष्टाचार के आरोप, राजनीतिक पुनर्जन्म और सत्ता की ‘वाशिंग मशीन’ एक ही कहानी में समा जाएं
भ्रष्ट को भ्रष्ट मत कहो, भ्रष्ट जाएंगे रूठ! :

हम पूछते हैं कि ये ध्रुव राठी है कौन? मतलब ब्लॉगर है, यह तो ठीक है और ऐसा ब्लॉगर है, जिसकी बात करोड़ों लोगों तक पहुंचती है, यह भी सही है। लेकिन, इसका मतलब यह थोड़े ही है कि बंदा किसी को कुछ भी कह देगा। बताइये, उधर मोदी जी कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में शुभेंदु अधिकारी की ताजपोशी करा रहे थे और इधर ध्रुव राठी ने भ्रष्टाचार का राग अलापना शुरू कर दिया। कहता है कि शुभेंदु अधिकारी देश के पहले मुख्यमंत्री हैं, जिन्हें बाकायदा वीडियो में रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया है।
अब प्लीज कोई हमें यह समझाने की कोशिश ना करे कि जैसे मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री, विजय शाह की जुबान ऐन मौके पर फिसल गयी थी और करने चले थे भारतीय फौज की प्रवक्ता कर्नल सोफिया कुरैशी की तारीफ, पर जुबान से किसी और की ही बात निकल गयी थी, जैसा कि देश की सबसे ऊंची अदालत को सोलिसिटर जनरल, तुषार मेहता ने समझाया था, वैसा ही मामला राठी का भी हो सकता है।
आखिर, राठी ने भी शुभेंदु अधिकारी को देश के मुख्यमंत्रियों में नंबर वन पर तो रखा ही है। पर ध्रुव राठी के मामले और विजय शाह के मामले में जमीन आसमान का अंतर है। विजय शाह की जुबान को फिसलने के मामले में बेनिफिट ऑफ डाउट इसलिए दिया जा सकता है कि उससे एक मुसलमान, सोफिया कुरैशी की तारीफ कराने की कोशिश की जा रही थी। शुभेंदु अधिकारी तो कट्टर मुस्लिम विरोधी ठहरे, उनकी तारीफ करने में किसी हिंदू की जुबान कैसे फिसल सकती है?
वैसे भी बात सिर्फ शुभेंदु अधिकारी तक ही रहती तो, फिर भी राठी को बेनिफिट ऑफ डाउट दिया भी जा सकता था। पर राठी की चोट तो इनडायरेक्टली मोदी जी तक पहुंचती है। ना खाऊंगा, ना ना खाने दूंगा वाले मोदी जी का आशीर्वाद और नतीजा, देश का पहला ऐसा मुख्यमंत्री जिसे बाकायदा कैमरे पर रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया था! उस पर तुर्रा यह कि भाई लोगों ने खुद मोदी जी का दस साल पुराना वीडियो और वायरल कर दिया,
जिसमें मोदी जी अपनी जुबान से इसका बखान करते नजर आ रहे थे कि पांच लाख रूपये की रिश्वत लेते हुए शुभेंदु अधिकारी की बॉडी लेंग्वेज कैसी थी — लगता था, ये तो रोज-रोज की आदत वाले हैं! राठी को कोई बेनिफिट ऑफ डाउट नहीं मिल सकता। यह तो सीधे-सीधे शुभेंदु अधिकारी को बदनाम करने की कोशिश थी, बंगाल की जनता का अपमान था,
जिसने अधिकारी के सिर पर ताज रखा है। सच पूछिए तो यह सिर्फ बंगाल की जनता का ही नहीं, एक सौ चालीस करोड़ से ज्यादा भारतवासियों का भी अपमान था, जिन्होंने अपना आशीर्वाद देकर मोदी जी को दुनिया का सबसे लोकप्रिय राजा बनाया है। मोदी जी जिसके सिर पर हाथ रख दें, उसके भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचार कहना चाहिए क्या?
वैसे भी नारदा-शारदा घोटालों की, उनके लिए मोदी जी के शुभेंदु आदि को घेरने की बातें दस साल पुरानी हो गयीं। दस साल में हुगली नदी में न जाने कितना पानी निकल चुका है। इस पानी में डुबकी लगाकर शुभेंदु समेत न जाने कौन-कौन, मोदी जी की स्पेशल वाशिंग मशीन तक पहुंच चुके हैं और उसमें से झक्क सफेद होकर निकल चुके हैं।
बाकी चीजों में राजनीति करना तो ठीक है, पर अब क्या विरोधी वाशिंग मशीन की धुलाई पर भी राजनीति करेंगे? विरोधी क्या यह कहना चाहते हैं कि पुराने और जिद्दी दाग वाशिंग मशीन में भी नहीं मिटेंगे? अब क्या मोदी जी का विरोध करते-करते, उनके विरोधी विज्ञान का भी विरोध करने लगेंगे? ऐसी अवैज्ञानिकता, मोदी जी के विरोधियों की! वैसे भी नारदा-शारदा तो सब शुभेंदु जी के पिछले जन्म की बातें हैं,
जब वह ममता बैनर्जी का दांया हाथ थे। पिछले जन्म के पाप, नये जन्म में यूं ही थोड़े ही खड़े रह जाएंगे। कम से कम भारत का संविधान और कानून ऐसा नहीं मानता है। तभी तो शुभेंदु हों या हिमांता विश्वशर्मा, सीबीआइ उनके पिछले जन्म के मामलों को, अनसुलझे मामलों की फाइल में डालकर, नये शिकारों की तलाश में निकल जाती है।
सुना है कि शुभेंदु के राजतिलक होने के साथ ही, चुनाव आयोग के बंगाल के सीईओ मनोज अग्रवाल, बंगाल के मुख्य सचिव बन गए हैं और बंगाल में पूरे देश से न्यारे एसआइआर का कमाल कर के दिखाने वाले सुब्रत गुप्ता, मुख्यमंत्री के सलाहकार बन गए हैं। पर ये नियुक्तियां पर्दे के पीछे से क्यों? मुख्यमंत्री के साथ ब्रिगेड में ही इनका भी शपथ ग्रहण क्यों नहीं करा दिया गया? असली सरकार बनवाने वालों के साथ ये सरासर अन्याय क्यों?
(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)


