हाईकोर्ट ने वर्ष 2002 के इस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा 2004 में सुनाई गई महिला की दोष सिद्धि और सजा को रद्द कर दिया।
चंडीगढ़ /15 मई /अटल हिन्द ब्यूरो
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 24 साल पुराने दुष्कर्म मामले में आपराधिक साजिश के आरोप में दोषी ठहराई गई एक महिला को बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल शक, सीमित भूमिका या परिस्थितिजन्य आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को आपराधिक साजिश का दोषी नहीं माना जा सकता। इसके लिए ठोस, स्पष्ट और विश्वसनीय साक्ष्य होना जरूरी है।
न्यायमूर्ति रुपिंद्रजीत चहल ने फैसले में कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि जितना गंभीर और घिनौना अपराध होगा, उसे साबित करने के लिए उतने ही मजबूत प्रमाणों की आवश्यकता होगी। अदालत ने यह भी कहा कि अपराध चाहे कितना भी संवेदनशील और विचलित करने वाला क्यों न हो, केवल संदेह कानूनी सबूत का स्थान नहीं ले सकता।
हाईकोर्ट ने वर्ष 2002 के इस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा 2004 में सुनाई गई महिला की दोष सिद्धि और सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहा कि महिला ने जानबूझकर दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिलाने में सहायता की थी या उसकी मुख्य आरोपी के साथ पहले से कोई आपराधिक साजिश थी।
अभियोजन के अनुसार महिला पीड़िता को एक कमरे तक लेकर गई थी और उससे कहा था कि वह अंदर जाकर देखे कि सह आरोपी सुधीर कुमार (अब मृत) कमरे में मौजूद है या नहीं। आरोप था कि जैसे ही पीड़िता कमरे में गई, आरोपी ने चाकू दिखाकर धमकाया और उसके साथ दुष्कर्म किया। मामले में दुष्कर्म का सीधा आरोप सुधीर कुमार पर था, जबकि महिला को इस आधार पर आरोपी बनाया गया था कि उसने कथित तौर पर घटना को संभव बनाने में मदद की और साजिश का हिस्सा थी।
रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि महिला के खिलाफ केवल इतना ही आरोप था कि वह पीड़िता को कमरे तक लेकर गई और उसे अंदर देखने के लिए कहा। अदालत ने माना कि इससे यह साबित नहीं होता कि उसे किसी आपराधिक योजना की पूर्व जानकारी थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि घटना के समय महिला की मौजूदगी को लेकर कोई स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। जिरह के दौरान स्वयं पीड़िता ने स्वीकार किया था कि उसे यह जानकारी नहीं थी कि महिला कमरे के बाहर खड़ी थी या वहां से जा चुकी थी। अदालत ने दोहराया कि शक कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह सबूत का विकल्प नहीं बन सकता।


