आलेख : बादल सरोज
31 मार्च तक कथित रूप से देश को नक्सल (Naxalism)मुक्त बना देने की घोषणा के लिए संसद में गृहमंत्री अमित शाह का 85 मिनट लंबा भाषण ‘बात बागड़ की मगर निगाह खेत पर’ (Speaking of the Fence, but Eyes Fixed on the Field)का नमूना था। इसमें वे विवरण भले कथित रेड कोरिडोर का, सो भी खूब बढ़ा-चढ़ाकर दे रहे थे, मगर उसके बहाने आमतौर पर उनका निशाना देश के जनवाद, उसमें समाहित राजनीतिक, लोकतांत्रिक और मानवीय अधिकारों पर था : उस ढांचे पर था, जिसे भारत के संविधान में दर्ज किया गया है। उसमें भी खासतौर पर वामपंथ और कम्युनिस्टों (Left and the Communists)पर था – जो उनके कहे के हिसाब से तो देश-दुनिया सब जगह से ख़त्म हो चुके हैं, मगर इसके बाद भी उनकी नींद हराम किये हुए हैं। इस भाषण में दिए गए तथ्य, जानकारियाँ, सूचनाएं, अर्धसत्य और पूर्वाग्रह एक बार फिर इस बात की ताईद करता है कि भाजपा निराधार और मनगढ़ंत बातें रखने के मामले में संसद जैसी संस्था की गरिमा की परवाह करना मीलों पीछे छोड़ आई है।
उनके कहे की असलियत के विस्तार में जाने की बजाय अभी एक घंटा पच्चीस मिनट के इस अनर्गल प्रलाप के उन कुछ पहलुओं को ही ले लेते हैं, जिन्हें रखने में अमित शाह कुछ ऐसे प्रमुदित हो रहे थे, जैसे न जाने कितनी विद्वत्ता की बात कह रहे हैं। वामपंथी विचारधारा (Leftist Ideology)को कोसते-कोसते नक्सलबाड़ी से होते हुए वे कम्युनिस्ट पार्टियों के इतिहास की व्हाट्सएप्पियां व्याख्या करने तक पहुँच गए और इसे आयातित विचारधारा, और कहीं और से प्रेरणा लेकर बनी पार्टियां बताने तक पहुँच गए। ज्ञान दिया कि 1925 में जब रूस के राजा निकोलस द्वितीय ने सत्ता छोड़ दी, तब लेनिन – उन्होंने लेलिन बोला था – सत्ता में आये। इसी तरह का ज्ञानोदय उन्होंने चीन के बारे में भी दिया और रूस में सत्ता मिलते ही यहाँ भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना होने का दावा किया।
इस तरह का दावा वही कर सकता है, जिसे न भारत की वैचारिक परम्परा के बारे में कुछ पता है, ना ही इस देश के इतिहास की ही कोई जानकारी है। हालांकि वामपंथ को न तो अमित शाह जैसों के सर्टिफिकेट की आवश्यकता है, ना हीं अपना देशजत्व प्रमाणित करने की ही दरकार है : फिर भी इनकी जानकारी बढ़ाने के लिए इतना बताना सामयिक होगा कि धरती के इस हिस्से की कोई 7-8 हजार वर्षों की सभ्यता में जो भी सकारात्मक है, उसके पीछे वाम है। इसे, जितनी यह सहनीय और सुथरी हुई है, बनाने के पीछे दार्शनिक, सामाजिक, सांस्कृतिक वाम से होते हुए आधुनिक काल में राजनीतिक वाम तक का ही योगदान है।
भारतीय आध्यात्म के प्रकांड समर्थक डॉ. राधाकृष्णन ने खुद इस बात को अनेक बार लिखा है कि जगत को सच मानने वाले भारतीय दर्शन की धाराएँ दर्शन की शुरुआत से ही मौजूद हैं और अपने जमाने के विज्ञान की खोजों से कहीं आगे की हैं। वामपंथ और मार्क्सवाद – जिससे अमित शाह और उनके कुनबे को भारी डर लगता है – उसी दार्शनिक परम्परा का अद्यतन रूप है, जिसे अपने जमाने में वृहस्पति से षड्दर्शन के कपिल, कणाद, गौतम अक्षपाद, पातंजलि होते हुए बरास्ते महावीर और बुद्ध के लोकायत ने अपने युगों में आगे बढ़ाया और उनके बाद के विचारकों ने यहाँ तक पहुंचाया। जिनकी समझ में भारतीय विचार परम्परा मनु से गौतम स्मृति होते नारद संहिता पर खत्म हो जाती है, उनकी समझ में धरा के इस हिस्से की शानदार समृद्ध विरासत कभी समझ नहीं आयेगी : उन अमित शाह को तो बिलकुल नहीं, जो बीच में बहस में स्वयं के हिन्दू होने की दुहाई देते हैं और इस तरह बता देते हैं कि वे सबसे पुराने नास्तिक धर्म जैन धर्म और हिन्दू धर्म तक में अंतर नहीं समझते।
जब दार्शनिक वाम राजनीतिक वामपंथ के रूप में संगठित हुआ, तब के रूस में हर तरह की गुलामी को समूल नष्ट करके मानव इतिहास की तब तक की दिशा और दशा दोनों बदल दी, तो दुनिया भर के जितने भी बेहतरीन लोग थे, उन सबको चमत्कृत और आकर्षित किया। बंकिम चंद्र चटर्जी, जिनके वन्दे मातरम् को बिना जाने ही यह कुनबा लट्ठ की तरह भांजता रहता है, उनने मार्क्स के जीवनकाल में ही लिखे अपने निबन्ध में साम्यवाद की अवधारणा दी थी। अमेरिका से दूसरी बार लौटने के बाद स्वामी विवेकानंद ने पूंजीवाद को नरक और अमेरिका को उस नरक का सबसे विकराल रूप बताते हुए समाजवादी क्रांति को ही मनुष्यता के लिए एकमात्र रास्ता बताया था। यह सब रूसी क्रांति से दसियों साल पहले की बात है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने क्रांति के बाद के सोवियत संघ को “मानव समाज की सबसे बेहतरीन व्यवस्था” करार दिया था। बाल गंगाधर तिलक ने मार्क्स के जीवन काल में ही – 1881 – में ही अपने अखबार केसरी में उनकी जीवनी का धारावाहिक प्रकाशन करते हुए लिखा था कि “मार्क्स की विचारधारा रौशनी देती है, यह एक ऐसा चमकता सूरज है, जो हमारी गुलामी के अंधेरों को दूर करने की क्षमता रखता है।“
गदर पार्टी के लाला हरदयाल 1912 में ही लेनिन की जीवनी लिख चुके थे। शहीदे आज़म भगत सिंह इस विचारधारा से कितने प्रभावित थे, यह उनके लिखे में दर्ज है : फांसी के ठीक पहले भी वे लेनिन की ही किताब पढ़ रहे थे। कुल जमा यह कि यह विचार दुनिया ही नहीं, देश के सभी सच्चे, ईमानदार और देशभक्त स्त्री-पुरुष को आकर्षित कर रहा था : अमित शाह जी को यह जानकार प्रसन्नता होगी कि वे जिस आरएसएस से जुड़े हैं, उस संघ के संस्थापक महासचिव – सरकार्यवाह – बालाजी हुद्दार संघ के छद्म राष्ट्रवाद और अंग्रेजपरस्ती को देखकर खुद कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बन गए थे।
भारत के बाहर उस समय दुनिया में क्रांतिकारियों के अनेक बड़े समूह और केंद्र थे ; ऐसे ही क्रांतिकारियों ने सबसे पहले कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। एक बर्लिन कमेटी थी, जिसका नेतृत्व सरोजिनी नायडू के भाई वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय के हाथ में था। स्वामी विवेकानंद के छोटे भाई भूपेंद्र नाथ दत्ता इसके सदस्य थे, उनने लेनिन से जाकर भेंट की। भारत की आजादी के बारे में परामर्श किया। वे करीब तीन महीने तक रूस में रहे। एक समूह ग़दर पार्टी का था, जिसके अध्यक्ष बाबा सोहन सिंह भकना और लाला हरदयाल थे, जो 1914 में 376 पंजाबी (55 मुस्लिम, बाकी सिख) क्रान्तिकारियों के साथ कामागाटामारू जहाज में सवार होकर भारत को आजाद कराने के लिए चले थे। भारत की वह पहली अंतरिम सरकार के नेता थे – जिसकी स्थापना 1 दिसंबर 1915 को काबुल में हुयी थी – जिसके राष्ट्रपति मुड़सांन के राजा महेंद्र प्रताप सिंह और प्रधानमंत्री भोपाल के मौलाना बरकतुल्ला थे। इस सरकार ने भी लेनिन से जाकर मुलाक़ात की।
क्रांतिकारियों का एक और हिस्सा था, जो जर्मनी को केंद्र बनाकर काम कर रहा था। बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े एम एन रॉय थे, जो मेक्सिको में रहकर वहां की कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे। बाद में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य बने। खिलाफत आंदोलन और उस पर हुआ दमन एक और फौरी कारण था, जिसके चलते काफी तादाद में मुहाजिर उस ओर गए — सोवियत संघ की व्यवस्था ने उन्हें आकर्षित और प्रभावित किया। इन सबने मिलकर वह कम्युनिस्ट पार्टी बनाई, जिससे अमित शाह और उनकी पार्टी को डर लगता है। वैसे तो कम्युनिस्ट पार्टी को भारत में बनाने की कामना रखने वाले, मार्क्स के जीवनकाल में ही भारत में थे। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की केंद्रीय कार्यकारिणी के लिए एक चिट्ठी 1871 में ही पहुँची थी। कलकत्ता के कुछ युवाओं ने मार्क्सवाद के बारे में जानकर यह चिट्ठी लिखी थी, जिसे 15 अगस्त 1871 को मार्क्स और एंगेल्स की मौजूदगी वाली बैठक में रखा गया था।
सिर्फ विचार के स्तर पर ही नहीं, व्यवहार के मोर्चे पर भी कम्युनिस्ट देश के स्वतन्त्रता संग्राम में महत्वपूर्ण तथा निर्णायक भूमिका निबाह रहे थे। दो कम्युनिस्टों मौलाना हसरत मोहानी और स्वामी कुमारानंद द्वारा 1921 में रखे पूर्ण स्वतन्त्रता के प्रस्ताव से आजादी की लड़ाई में मजदूर-किसानों को जोड़ने, उसे सामंतों की रियासतों तक पहुँचाने, मजदूरों की हड़तालों, किसानों की बगावतों, मुंबई से शुरू हुए नौसेना विद्रोह से लेकर भारत विभाजन के समय देश को साम्प्रदायिकता की आग में झुलसने से बचाने तक हर निर्णायक मुकाम पर कम्युनिस्ट थे, जो अगले मोर्चे पर रहे। आजादी के बाद भी ये कम्युनिस्ट ही थे, जिन्होंने अपने संघर्षों के जरिये जनता के हितों और देश की संप्रभुता को बचाने में भूमिका निबाही। राजनीति में शुचिता और ईमानदारी को ज़िंदा रखा। संघर्ष, जनता के प्रति समर्पण और कुर्बानियों की मिसालें कायम कीं। और आज भी यदि जनता में राजनीति के प्रति जो थोड़ा-बहुत विश्वास बचा है, वह कम्युनिस्टों की वजह से है। यह भारत के कम्युनिस्टों के गौरवशाली इतिहास की सिर्फ एक झलक भर है। ध्यान रहे, यह सब तब किया गया, जब इन पूरे 106 वर्षों में लगातार हर दिन उन्हें दमन और उत्पीड़न का शिकार बनना पड़ा।
कम्युनिस्ट पार्टी के गठन के आसपास ही, 1925 में ही उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी स्थापना हुई थी। अमित शाह चाहें तो इसे साधिकार आयातित बता सकते हैं। अमित शाह के दफ्तर से ज़रा-सी दूरी पर ही राष्ट्रीय अभिलेखागार है, जहां डॉ. मुंजे की डायरी रखी हुई है, जिसमे स्वयं उनकी हस्तलिपि में दर्ज है कि वे कैसे इटली के फासिस्ट मुसोलिनी और जर्मनी के नाज़ी हिटलर से न सिर्फ संगठन की दीक्षा लेकर आये थे, बल्कि संगठन का गणवेश, प्रणाम का तरीका, यहाँ तक कि नाम भी लेकर आये थे।
इन पूरे सौ साल में संघ ने क्या किया? 1925 से 1947 तक जब पूरा देश अंग्रेजों से आजादी के लिए उबाल पर था, भगत सिंह और उनके सहयोगियों जैसे नौजवान फांसी चढ़ रहे थे, चट्टगांव में युवा होते किशोर अंग्रेजों के हथियारों के जखीरे पर कब्जा कर रहे थे, तब अमित शाह का संघ क्या कर रहा था?
आजादी के लिए लड़ रही जनता को विभाजित करते हुए अंग्रेजों की खिदमत कर रहा था, इसके आराध्य इंग्लैंड की महारानी के लिए माफीनामे लिख रहे थे और उस समय कलेक्टर की तनखा से ज्यादा 60 रुपये महीने की गद्दारी पेंशन को बढ़ाने के लिए वायसरॉय और अंग्रेज हुकूमत को दरख्वास्तें लिख रहे थे, 15 अगस्त 1947 को पूरे देश में काला झंडा फहरा रहे थे और नवस्वाधीन देश को अस्थिर करने के लिए उसके सबसे बड़े नेता महात्मा गाँधी की हत्या करवा रहे थे। साम्राज्यवादी प्रभुओं का संरक्षण पाने के लिए लालायित संघ हमेशा ही शरणागत और चरणागत रहा है। उस समय अंग्रेजों के आगे नतमस्तक था : इन दिनों कातर भाव के साथ अमरीका की सेवा में हाजिर और प्रस्तुत है। कम्युनिस्टों को ऐसे कलंकित रिकॉर्ड और धूमिल इतिहास वाले कुटुंब के उपदेश और प्रमाणपत्रों की दरकार न थी, न है, न कभी होगी।
बस्तर और कथित माओवाद के बहाने मोदी-शाह के इरादे भारत को पुलिस स्टेट बनाने और जघन्यता को जायज ठहराने के सिवा कुछ नहीं है। विवादित सलवा जुड़म की शान में उन्होंने जो कसीदे काढ़े हैं, इस सरासर गैरकानूनी, आदिवासियों की हत्याएं आदिवासियों से ही करवाने वाली आपराधिक योजना की प्रशंसा करते हुए अमित शाह ने सुप्रीम कोर्ट को भी गरियाया और इस तरह देश की न्यायपालिका को भी संदेश दिया है : जो देश के संवैधानिक ढाँचे में पूरी तरह अस्वीकार्य है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का नाम ले-लेकर आलोचना करना भी एक रणनीति का हिस्सा है। असली इरादा इस सबके जरिये लोकतांत्रिक वातावरण को जहरीला बनाने, राजनीतिक दलों, संस्थाओं, यहाँ तक कि न्यायपालिका को भी डराने-धमकाने का है। इसके लिए सिर्फ कम्युनिस्टों को ही नहीं, प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को भी निशाना बनाया गया। बाकी दलों को भी नहीं बख्शा गया।
जहां तक माओवाद का संबंध है, तो बस्तर सहित देश भर की जमीनी सच्चाई यह थी कि माओवादी काफी कमजोर हो चुके थे। उनके रास्ते से सहमति-असहमति अलग प्रश्न है, तथ्य यह है कि वे भारत के ही नागरिक हैं और लोकतांत्रिक होने का दावा करने वाले हर देश में संवाद से सुलह और समाधान को प्राथमिकता देनी चाहिए, दी भी जाती रही है। अमित शाह ने खुद कहा कि यह एक राजनीतिक समस्या थी। दुनिया भर में राजनीतिक समस्याओं के समाधान बातचीत से ढूढे जाते हैं। भारत में भी संवाद के जरिये समाधान निकलने के अनगिनत उदाहरण हैं। असम, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा सहित सभी पूर्वोत्तर राज्यों में ही नहीं, आजादी के बाद जम्मू-कश्मीर से पंजाब तक, बंगाल के गोरखा बहुल क्षेत्र आदि अनेक इलाकों में आज जो स्थिति है, वह बंदूक की नोंक पर नहीं, वार्ताओं की टेबल पर बैठकर हासिल हुई है। उसके पीछे, कई मामलों में तो दशकों तक, धीरज के साथ किये गए संवाद है।
माओवादियों के राजनीतिक आंकलन, वैचारिक नजरिये और उस पर टिकी उनकी रणनीति और कार्यनीति से सहमत होने का सवाल नहीं उठता। उनके वैचारिक दिवालियेपन ने कब-कब, कैसे-कैसे करतब दिखाए हैं और ऐसा करते हुए जिनसे लड़ने का वे दावा करते हैं, उनका ही औजार बनकर देश के वास्तविक वाम और जनतांत्रिक जनआंदोलनों को कितना नुक्सान पहुंचाया है, इसके उदाहरणों की कमी नहीं है। पश्चिम बंगाल में टीएमसी और भाजपा के साथ मिलकर बुद्धदेब भट्टाचार्य की अगुआई वाली वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ कथित मुक्तियुद्ध छेड़ने और इस ‘क्रान्ति’ के बाद ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बनाने का नारा देने वाले यही माओवादी थे। यह अलग बात है कि ममता ने जीतने के बाद इन्हीं के प्रमुख किशन जी का एनकाउंटर करवा दिया। ऐसा नहीं कि अमित शाह राजनीतिक दलों में फर्क करना नहीं जानते – वे जानते हैं, मगर संगठित वामपंथ के खिलाफ नफरती मुहिम छेड़नी हो, तो ऐसी चतुराई दिखानी होती है।
बहरहाल इस सबके बावजूद रास्ता राजनीतिक समाधान निकालने का ही है, नरसंहार करके हल नहीं निकलते ; विचारधाराएँ विचारधाराओं से ही सुधारी जा सकती हैं। इसका बड़ा उदाहरण है : ज्योति बसु के मुख्यमंत्रित्व में 1977 में बनी वाम मोर्चे की पहली सरकार ने अमल में लाकर दिखाया था, जब उसने सबसे पहला फैसला सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का लिया। नतीजे में वे नक्सली भी रिहा हुए, जिन्होंने सिद्धार्थ शंकर राय के अर्ध-फासिस्ट आतंक के 5 वर्षों में शहीद हुए कोई 1200 सीपीएम कार्यकर्ताओं की हत्याओं में प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका निबाही थी। बाद में कोई ढाई दशक तक यह दुराग्रही भटकाव जहां जन्मा था, उस नक्सलबाड़ी सहित बंगाल से गायब हो गया। कुछ हद तक इस तरीके को अविभाजित आंध्रप्रदेश में भी अपनाया गया।
ऐसा संवाद करने की बजाय एक कमजोर हो चुके आन्दोलन को ‘निबटाने’ का श्रेय लेते हुए लोकसभा में अमित शाह ‘स्टेट’ के बस्तर के गाँव-गाँव में पहुँच जाने का जो बखान कर रहे थे, वह अडानी और अंबानी के लिए संदेश है। जिन 17 हजार करोड़ रुपयों की सड़कें बनाने का द़ावा वे कर रहे थे, वह भी इन्ही देसी-विदेशी कार्पोरेट्स की पहुँच को वर्चस्व में बदलने की शाहराहों का इंतजाम हैं। ठीक यही मुद्दे थे, जिन्हें लेकर बस्तर के आदिवासी लड़ रहे थे और मोदी-शाह उन्हें लगभग समाप्त हो चुके माओवादियों का ठप्पा लगाकर लोकतांत्रिक प्रतिरोध और असहमति की हर संभावना को बूटों तले रौंदकर पूरे देश के लिए मॉडल पेश कर रहे थे।
असली खतरा यह है – इसके खिलाफ एकजुट होना लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान में विश्वास करने वाले हर व्यक्ति का फ़र्ज़ है।
*(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)*


