बेरोजगार ‘कॉकरोच नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माणक
सौरभ वार्ष्णेय
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में शब्दों का महत्व केवल अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे समाज की सोच और संवेदनशीलता को भी दर्शाते हैं। हाल ही में बेरोजगार युवाओं को ‘कॉकरोच जैसी अपमानजनक उपाधि देने की घटना ने न केवल करोड़ों युवाओं की भावनाओं को आहत किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि सत्ता और समाज के कुछ वर्ग बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्या को किस नजर से देखते हैं। यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि उन लाखों संघर्षरत युवाओं के आत्मसम्मान पर चोट है, जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने और देश के बेहतर भविष्य के लिए प्रयासरत हैं।
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। यहां की युवा शक्ति को देश की सबसे बड़ी पूंजी माना जाता है। ऐसे में यदि यही युवा रोजगार के अभाव में निराश और हताश हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है। बेरोजगारी किसी व्यक्ति की योग्यता का प्रमाण नहीं होती, बल्कि यह आर्थिक नीतियों, अवसरों की कमी और व्यवस्था की विफलताओं का परिणाम भी हो सकती है।
इसलिए बेरोजगारों का उपहास उड़ाना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि सामाजिक विभाजन को और गहरा करना है।
आज देश का युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों लगा देता है। कई बार परीक्षाएं रद्द हो जाती हैं, पेपर लीक हो जाते हैं या भर्तियां वर्षों तक लंबित रहती हैं। इसके बावजूद युवा धैर्य बनाए रखते हैं और संघर्ष करते रहते हैं।
ऐसे युवाओं को अपमानित करना उनके मनोबल को तोडऩे जैसा है। राष्ट्र निर्माण केवल सत्ता या उद्योगपतियों से नहीं होता, बल्कि मेहनतकश युवाओं, किसानों, मजदूरों, शिक्षकों और आम नागरिकों के सामूहिक प्रयास से होता है। बेरोजगार युवा भी इसी राष्ट्र निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा हैं, क्योंकि वे भविष्य की संभावनाओं और ऊर्जा के प्रतीक हैं।
यह भी समझना होगा कि बेरोजगारी केवल आंकड़ों का खेल नहीं है। इसके पीछे टूटते सपने, बढ़ता मानसिक तनाव और परिवारों की आर्थिक परेशानियां छिपी होती हैं। जब समाज या नेता ऐसे युवाओं के प्रति असंवेदनशील भाषा का प्रयोग करते हैं, तो इससे युवाओं में व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ता है। लोकतंत्र में असहमति और आलोचना का अधिकार सभी को है, लेकिन किसी वर्ग की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली भाषा कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती।
सरकारों की प्राथमिकता युवाओं को सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराना होना चाहिए। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था को रोजगारोन्मुख बनाना, उद्योगों में निवेश बढ़ाना, छोटे और मध्यम उद्यमों को प्रोत्साहन देना तथा पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित करना आवश्यक है। साथ ही, राजनीतिक दलों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को भी अपनी भाषा की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। शब्दों से समाज बनता भी है और बिगड़ता भी।

भारत का युवा बोझ नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी ताकत है। बेरोजगार युवक-युवतियां ‘कॉकरोचÓ नहीं, बल्कि वे नागरिक हैं जो अवसर मिलने पर देश की अर्थव्यवस्था, विज्ञान, शिक्षा और विकास को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं। इसलिए आवश्यकता उन्हें अपमानित करने की नहीं, बल्कि उनके सपनों और संघर्षों को सम्मान देने की है। यही एक संवेदनशील और मजबूत राष्ट्र की पहचान भी होगी।
बेरोजगारों को सही दिशा की ज़रूरत
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। देश की बड़ी आबादी युवाओं की है, जिसे राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। लेकिन जब यही युवा बेरोजगारी की समस्या से जूझता है, तो यह केवल आर्थिक संकट नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक और मानसिक चुनौती भी बन जाता है। आज लाखों शिक्षित युवा डिग्री हाथ में लेकर नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं। ऐसे समय में बेरोजगारों को निराशा नहीं, बल्कि सही दिशा और अवसर की आवश्यकता है।
बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण केवल नौकरियों की कमी नहीं, बल्कि कौशल और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी भी है। आज के दौर में उद्योगों और कंपनियों को तकनीकी ज्ञान, व्यावहारिक अनुभव और नई सोच वाले युवाओं की जरूरत है, जबकि हमारी शिक्षा व्यवस्था अभी भी काफी हद तक पारंपरिक ढांचे में फंसी हुई है।
परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में युवा डिग्री तो प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन रोजगार के लिए जरूरी कौशल से वंचित रह जाते हैं।इसके साथ ही समाज में सरकारी नौकरी को ही सफलता का पर्याय मानने की सोच भी युवाओं को सीमित कर रही है। लाखों युवा वर्षों तक केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे रहते हैं और असफल होने पर निराशा के शिकार हो जाते हैं। जबकि आज स्वरोजगार, स्टार्टअप, डिजिटल प्लेटफॉर्म, कृषि आधारित उद्योग और छोटे व्यवसाय भी रोजगार के बड़े माध्यम बन सकते हैं। जरूरत है युवाओं को नई संभावनाओं के प्रति जागरूक करने की।
सरकार ने कौशल विकास, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसी कई योजनाएं शुरू की हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। लेकिन इन योजनाओं का लाभ तभी मिलेगा, जब उन्हें गांव-गांव और छोटे शहरों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जाए। साथ ही प्रशिक्षण केंद्रों की गुणवत्ता और रोजगार से जुड़ाव सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
परिवार और समाज की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। बेरोजगार युवाओं को तानों और उपहास का नहीं, बल्कि सहयोग और प्रेरणा का वातावरण मिलना चाहिए। लगातार असफलता व्यक्ति के आत्मविश्वास को कमजोर कर देती है। ऐसे में सकारात्मक मार्गदर्शन और मानसिक समर्थन युवाओं को नई ऊर्जा दे सकता है।
यह भी सच है कि केवल सरकार के भरोसे बेरोजगारी की समस्या समाप्त नहीं हो सकती। युवाओं को भी बदलते समय के अनुसार स्वयं को तैयार करना होगा। नई तकनीक सीखना, छोटे कार्यों को सम्मान देना और आत्मनिर्भर बनने की सोच अपनाना समय की मांग है।
बेरोजगार युवा देश पर बोझ नहीं, बल्कि अपार संभावनाओं का स्रोत हैं।
यदि उन्हें सही दिशा, उचित अवसर और सकारात्मक वातावरण मिले, तो वही युवा भारत के विकास की सबसे बड़ी शक्ति बन सकते हैं। इसलिए आज आवश्यकता बेरोजगारों को हतोत्साहित करने की नहीं, बल्कि उन्हें सही मार्ग दिखाने और उनके सपनों को नई उड़ान देने की है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।


