नई विनिवेश नीति : केंद्रीय उद्यमों की 74% हिस्सेदारी बेचने की साजिश
नरेंद्र मोदी की उस कुख्यात घोषणा को लागू करने की कार्ययोजना है, जो उन्होंने चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए की थी : “सार्वजनिक क्षेत्र तो मरने के लिए ही पैदा हुआ है।”

केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों पर हो रहे विनाशकारी हमलों के इस मौजूदा दौर में, हमें केंद्र की मौजूदा राजग सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र को नीचा दिखाने वाली नीति के पीछे के आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक पहलुओं को स्पष्ट रूप से समझना होगा।
पूंजीवाद का व्यवस्थागत संकट
निजीकरण के इस आक्रामक अभियान के आर्थिक पहलू को, पूंजीवाद के उस लगातार गहराते जा रहे व्यवस्थागत संकट के परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए, जिसने पूरे पूंजीवादी विश्व को अपनी जकड़ में ले लिया है। हमेशा की तरह, मौजूदा आर्थिक संकट में भी, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ही सरकार के सबसे आसान शिकार हैं, ताकि संकट से निपटने के लिए संसाधन जुटाए जा सकें। आर्थिक संकट को कम करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों को बेच देने की इस कवायद को बिल्कुल सही ही यह नाम दिया गया है कि “नौकर का वेतन चुकाने के लिए घर के कीमती बर्तन बेच देना।”
निजीकरण की विनाशकारी मुहिम के पीछे के राजनीतिक और वैचारिक पहलुओं की स्पष्ट अभिव्यक्ति राजीव कुमार के शब्दों में मिलती है, जो नीति आयोग के उपाध्यक्ष थे। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में सरकारी हिस्सेदारी बेचना, केवल राजस्व जुटाने का एक माध्यम भर नहीं है, यह निजी क्षेत्र को अधिक जगह और अवसर देने का भी एक माध्यम है। अब सबसे बड़ा बदलाव यह है कि सर्वोच्च स्तर पर मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व (यानी प्रधानमंत्री) ने भी यह स्पष्ट कर दिया है।
इसके अलावा, इस राजनीतिक मिशन का उद्देश्य निजी पूंजी — चाहे वह विदेशी हो या घरेलू — को यह संकेत देना है कि मोदी सरकार निजी पूंजी के लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना है, और सार्वजनिक क्षेत्र के प्रति उसकी नीति ‘शून्य सहनशीलता’ की है। यही नहीं, यह सरकार स्पष्ट रूप से नव-उदारवाद के सिद्धांत के प्रति समर्पित है, जो सार्वजनिक क्षेत्र के किसी भी अवशेष के भी सख्त खिलाफ है। इसके साथ ही, इसका मकसद यह प्रदर्शित करना है कि मोदी सरकार पूरी तरह से निजी क्षेत्र के लिए समर्पित है और निष्कर्षतः सार्वजनिक क्षेत्र के विरुद्ध है।
नरेंद्र मोदी द्वारा योजना आयोग को समाप्त करना और उसकी जगह कुख्यात ‘नीति आयोग’ का गठन करना भी नव-उदारवादी विचारधारा से ही प्रेरित है। ऐसे अकाट्य तथ्य और आंकड़े मौजूद हैं, जो यह दर्शाते हैं कि 1951 से लेकर अब तक भारत में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की योजना बनाने, उन्हें वित्त पोषित करने और उनके निर्माण में — विशेषकर बुनियादी रणनीतिक क्षेत्रों में — योजना आयोग ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
‘गई गुजरी नयी विनिवेश नीति’
वर्तमान सरकार का यह हताश इरादा है कि वह केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का पूरी तरह से निजीकरण कर देगी। यह ‘नई सार्वजनिक क्षेत्र नीति’ दस्तावेज के इस उद्धरण से बिल्कुल स्पष्ट है : रणनीतिक क्षेत्र/गैर-रणनीतिक क्षेत्र में आने वाले केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का निजीकरण किया जाएगा, विलय किया जाएगा, उन्हें किसी अन्य केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम के साथ मिला दिया जाएगा, उनकी सहायक कंपनियां बनाई जाएगी या उन्हें बंद कर दिया जाएगा। उपर्युक्त रणनीतिक क्षेत्र में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की उपस्थिति केवल नाम मात्र की ही रखी जाएगी।
केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों के 74% शेयर निजी व्यवसायों को बेचने के उद्देश्य से, वित्त मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत 2025-26 के ‘आर्थिक सर्वेक्षण’ में इस राष्ट्र-विरोधी ‘निजीकरण परियोजना’ को आगे बढ़ाने के लिए कई विनाशकारी कदम सुझाए गए हैं। सरकार कंपनी अधिनियम में संशोधन करेगी, जिसके तहत केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की 74% हिस्सेदारी बेचने के बाद भी, यदि उनके पास केवल 26% हिस्सेदारी बचती है, तो भी उन्हें ‘सरकारी कंपनी’ के रूप में ही परिभाषित किया जा सकेगा।
अधिनियम के मौजूदा प्रावधान के अनुसार, कोई भी फर्म तभी ‘सरकारी कंपनी’ मानी जाती है, जब उसकी कम से कम 51% हिस्सेदारी सरकार के पास हो। यह सरकार की हताशा को दर्शाता है — यह देश की जनता को धोखा देने की कोशिश है, और साथ ही खुद को भी भ्रम में रखने जैसा है। यहाँ तक कि एक मूर्ख भी यह जानता है कि किसी भी कंपनी में सबसे ज्यादा इक्विटी रखने वाला ही उसका असली मालिक होता है।
12-13 फरवरी, 2026 को, भाजपा सांसद भर्तृहरि महताब की अध्यक्षता वाली एक संसदीय स्थायी समिति ने सरकार से नई सार्वजनिक क्षेत्र नीति के क्रियान्वयन में तेजी लाने का आग्रह किया है।
समिति ने कथित तौर पर कहा है कि इस नई नीति को राजकोषीय अनुशासन की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। लेकिन साथ ही यह भी टिप्पणी की कि इसके ठोस परिणाम अभी तक सुस्त रहे हैं ; इसलिए, नीतिगत लक्ष्यों और उनके क्रियान्वयन के बीच के अंतर को पाटने के लिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है!
इस बीच, पूरे देश में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयों की विशाल जमीन-जायदाद से पैसा कमाने के लिए, सरकार ने पहले ही एक खास ज़मीन-हथियाने वाली संस्था बना दी है, जिसका नाम है ‘नेशनल लैंड मोनेटाइजेशन कॉर्पोरेशन’ (एनएलएमसी)। ज़ाहिर है कि केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयों की सबसे कीमती जमीन राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन-02 का मुख्य निशाना होगी। राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन-02 के लिए चुने गए पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइज़ में हाईवे, रेलवे, सिविल एविएशन, बंदरगाह, पेट्रोलियम, बिजली, कोयला खदानें, दूसरी खदानें, टेलीकॉम और पर्यटन आदि शामिल हैं।
इस संशोधित सार्वजनिक क्षेत्र नीति के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के 74% शेयर बेचने का मोदी सरकार का फ़ैसला, देश में सार्वजनिक क्षेत्र के अस्तित्व को पूरी तरह से समाप्त कर देगा। और निजीकरण की इस परियोजना को साकार करने के लिए राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन-02 के तहत तैयार किया गया रोडमैप, घरेलू और विदेशी — दोनों ही तरह के निजी व्यापारिक दिग्गजों के लिए एक बड़ा फायदा साबित होगा।

राष्ट्रीय परिसंपत्ति मौद्रीकरण पाइपलाइन नीति – 02
राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन निस्संदेह एक पूरी तरह से राष्ट्र-विरोधी नीति है, जिसे मोदी सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे अधिक व्यावसायिक रूप से लाभदायक परिसंपत्तियों को, मोदी की पसंद के बड़े निजी व्यापारिक घरानों को सौंपने के लिए घोषित किया है। यह हस्तांतरण एक संदिग्ध तंत्र के माध्यम से किया जाएगा, जिसे किसी और ने नहीं, बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र के विध्वंसक — नीति आयोग — ने तैयार किया है। राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन- 02 को मोदी सरकार की संशोधित सार्वजनिक नीति को साकार करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
हालांकि सरकार द्वारा भ्रामक प्रचार किया जा रहा है और पूंजीपति वर्ग के कलमघिस्सुओं द्वारा ‘राष्ट्रीय परिसंपत्ति मौद्रीकरण पाइपलाइन’ (एनएमपी) के आर्थिक लाभों के बारे में कपटपूर्ण बातें कही जा रही हैं, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि एनएमपी बड़े निजी कॉर्पोरेटों— चाहे वे घरेलू हों या विदेशी — के लिए एक तोहफा है। यह उन्हें बिना किसी निवेश के और बिना किसी प्रतीक्षा के, तत्काल मुनाफ़ा कमाने की सुविधा प्रदान करता है। जिन सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, वे मूल और रणनीतिक प्रकृति की हैं ; इनका भौतिक और वित्तीय प्रदर्शन लगातार बेहतर रहा है, और इनके लिए बाजार भी पूरी तरह से सुनिश्चित है।
केंद्रीय बजट 2025-26
केंद्रीय बजट 2025-26 में एनएमपी 2.0 को शुरू करने की घोषणा की गई है। इसमें कहा गया है कि 2021 में घोषित पहली परिसंपत्ति मौद्रीकरण योजना की सफलता को आगे बढ़ाते हुए, दूसरी योजना को समर्थन देने के लिए नियामक और राजकोषीय उपायों को और बेहतर बनाया जाएगा। एमएनपी 2.0 का लक्ष्य वित्तीय वर्ष 2026 से 2030 के दौरान परिसंपत्तियों के मौद्रीकरण से 16.72 लाख करोड़ रुपये जुटाना है। एनएमपी-02 के क्रियान्वयन के लिए एक विस्तृत ब्लूप्रिंट और रोडमैप नीति आयोग द्वारा पहले ही तैयार और प्रकाशित किया जा चुका है।
आयोग के अनुसार, एनएमपी 1.0 ने अपने लक्ष्य का 89% हिस्सा हासिल किया है, जो कि 5.3 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। इस पूंजी का सबसे बड़ा हिस्सा, अधिक मुनाफा कमाने वाली संपत्तियों को निजी क्षेत्र को आउटसोर्स करके जुटाया गया है।
एनएमपी-01 की तरह ही, एनएमपी 2.0 भी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयों की संपत्तियों के हस्तांतरण, उनके हिस्से की बिक्री, सुरक्षित नकद प्रवाह या रणनीतिक व्यावसायिक नीलामी के ज़रिए संपत्ति के मौद्रीकरण का सहारा लेगा। एनएमपी-02 के तहत पहचाने गए क्षेत्रों में हाईवे, कोयला खदानें, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस पाइपलाइन, बंदरगाह और दूरसंचार शामिल हैं।
सरकार का दिवालियापन और हताशा इस चौंकाने वाले तथ्य से उजागर होता है कि एनएमपी-2.0 का ध्यान केवल मुख्य संपत्तियों पर ही होगा। विभिन्न मुख्य संपत्तियों में से, उन संपत्तियों पर ध्यान दिया जाएगा, जो वर्तमान में राजस्व कमा रही हैं या जिनकी सुविधाएं काफी हद तक पूरी हो चुकी है और जिन्हें उचित रूप से बढ़ाया जाएगा। इसलिए, एनएमपी-01 की तरह ही, इस बार भी बेहतरीन ढंग से संचालित और मुनाफ़ा कमाने वाली सार्वजनिक इकाइयों को ही निशाना बनाया गया है।
सकल राजस्व, शुद्ध लाभ और राजकोष में योगदान
वित्त वर्ष 2023-24 की तुलना में, वित्त वर्ष 2024-25 में सकल राजस्व 36.08 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 37.01 लाख करोड़ रुपये हो गया। कार्यरत केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों का शुद्ध लाभ लगातार बढ़ रहा है। पाँच वर्षों की अवधि (वित्त वर्ष 2020-21 से वित्त वर्ष 2024-25 तक) के दौरान, शुद्ध लाभ 1.66 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2.91 लाख करोड़ रुपये हो गया है।
सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों द्वारा केंद्रीय खजाने में किए जा रहे लगातार बढ़ते और टिकाऊ योगदान को देखते हुए, सरकार की बिना सोचे-समझे अपनाई गई विनिवेश नीति पूरी तरह से आत्मघाती है।
ये इकाइयों उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क, जीएसटी, कॉर्पोरेट टैक्स, केंद्र सरकार के कर्ज पर ब्याज, लाभांश और अन्य शुल्कों व करों के रूप में सरकार को भारी मात्रा में पूंजी का भुगतान करते रहे हैं। ‘सार्वजनिक उद्यम सर्वेक्षण 2024-25’ के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में इनका कुल योगदान 24.03 लाख करोड़ रुपये रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में, इन इकाइयों ने केंद्रीय खजाने में 4.94 लाख करोड़ रुपयों का योगदान दिया है।
केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा 2024-25 के लिए किए गए सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम सर्वे में सरकार ने खुद यह माना है कि, “केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व में अपना योगदान देने में अहम भूमिका निभाते हैं।
कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत आने वाली गतिविधियों में शामिल हैं : भूख और गरीबी मिटाना, स्वास्थ्य सेवा और स्वच्छता, ग्रामीण विकास, शिक्षा और कौशल विकास, केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए फंड में योगदान, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण की रक्षा, महिलाओं और अन्य आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों का सशक्तिकरण, खेल, कला और संस्कृति, सशस्त्र बलों का कल्याण आदि। पिछले 5 सालों में, इन उपक्रमों ने सीएसआर में कुल मिलाकर 24,520 करोड़ रुपयों का योगदान दिया है।”
आज जब भारतीय रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया है, तो यह कहना बेहद महत्वपूर्ण है कि ये सार्वजनिक उपक्रम बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करने में योगदान दे रहे हैं। पिछले 5 वर्षों के दौरान इन उपक्रमों ने कुल मिलाकर 6.95 लाख करोड़ रुपयों की राशि अर्जित की है। अकेले वित्त वर्ष 2024-25 में ही, इन्होंने विदेशी मुद्राओं में 1.57 लाख करोड़ रुपये कमाए।
सार्वजनिक क्षेत्र के संबंध आत्मघाती नीतियों का पर्दाफाश करो!
सरकार द्वारा शुरू की गई ‘नई सार्वजनिक क्षेत्र नीति’ , असल में नरेंद्र मोदी की उस कुख्यात घोषणा को लागू करने की कार्ययोजना है, जो उन्होंने चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए की थी : “सार्वजनिक क्षेत्र तो मरने के लिए ही पैदा हुआ है।” ज़ाहिर है, ऐसी नीतियों व्यवस्थागत संकट से गहराई से जुड़ी हुई हैं, और यह पूंजीवाद के उस एकाधिकारवादी चरण का ही एक परिणाम हैं, जिस पर सत्ताधारी वर्ग के चहेते पूंजीपतियों का वर्चस्व है।
यह आक्रामक नव-उदारवादी सरकार राष्ट्रीय संपत्तियों की लूट-खसोट की नीति को पूरी ज़ोर-शोर से, और वह भी बिना किसी रोक-टोक के, आगे बढ़ा रही है, जो उसकी वैचारिक और वर्गीय हताशा को दर्शाती है। सत्ता में काबिज दक्षिणपंथी पार्टी की विभाजनकारी चालों ने उन लोगों की चेतना को ही सुस्त कर दिया है,
जिन्होंने इन संपत्तियों का निर्माण किया है और जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे ऐसी राष्ट्र-विरोधी नीतियों को हराने के लिए निर्णायक संघर्ष करेंगे। जिस तरह हमें अपने देश के प्रगतिशील इतिहास को याद रखना चाहिए और उसकी रक्षा करनी चाहिए, ठीक उसी तरह हमें आज़ादी के बाद भारत के आर्थिक पुनर्निर्माण में सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा निभाई गई भूमिका को भी याद रखना चाहिए और सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों की रक्षा के लिए संघर्ष करना होगा।
(लेखक सीटू के राष्ट्रीय सचिव हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)


