थाने में मौत और एनकाउंटर का खौफ: जानिए क्या कहता है संविधान और आपके अधिकार?
पुलिस जनता की नौकर है, नेताओं की नहीं
लेखक: राजकुमार अग्रवाल/दिनांक: 23 जून 2026
प्रकाशन: अटल हिन्द सम्पादकीय
प्रस्तावना: वर्दी का खौफ और कराहती न्याय-व्यवस्था
आज स्वतंत्र भारत के नागरिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस पुलिस को उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वही पुलिस आज उनके भय का सबसे बड़ा कारण क्यों बन गई है? सोशल मीडिया के इस दौर में हर रोज ऐसे वीडियो और समाचार सामने आते हैं जो किसी भी संवेदनशील नागरिक की आत्मा को झकझोर कर रख देते हैं। कहीं किसी रेहड़ी-पटरी वाले को सरेआम पीटा जा रहा है, कहीं किसी युवक को थाने के भीतर बर्बर यातनाएं दी जा रही हैं, तो कहीं ‘पुलिस मुठभेड़’ (एनकाउंटर) के नाम पर कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
ये घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं, बल्कि हमारी कानून-व्यवस्था का एक परिलक्षित हिस्सा बनती जा रही हैं। आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारा संविधान पुलिस को किसी भी नागरिक के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार करने का अधिकार देता है? जवाब बहुत सीधा और स्पष्ट है—बिल्कुल नहीं।
भारतीय संविधान के तहत पुलिस जनता की सेवक है, न कि सत्ता के गलियारों में बैठे राजनेताओं की निजी जागीर। जब पुलिस अपनी कानूनी सीमाओं को लांघकर नेताओं के मौखिक या अनौपचारिक आदेशों पर नाचने लगती है, तब लोकतंत्र का गला घुटने लगता है। यह आलेख किसी दुर्भावना से नहीं, बल्कि देश के आम नागरिक को जागरूक करने, उसे कानूनी अधिकारों से लैस करने और हमारे लोकतंत्र की रक्षा के उद्देश्य से लिखा गया है।

हिरासत में मौतों के आंकड़े: सरकारी दस्तावेज क्या कहते हैं?
जब हम पुलिसिया तंत्र की क्रूरता की बात करते हैं, तो हमारे पास सबसे बड़ा और अचूक हथियार खुद सरकारी एजेंसियों और संसद के पटल पर रखे गए आंकड़े होते हैं। इन आंकड़ों को कोई भी सरकार या अधिकारी झुठला नहीं सकता।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और भारत सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार, हिरासत में होने वाली मौतें (कस्टोडियल डेथ्स) एक गंभीर राष्ट्रीय संकट बन चुकी हैं।
वर्षवार पुलिस हिरासत में मौतों का विवरण
नीचे दिए गए आंकड़े यह दर्शाते हैं कि देश में पुलिसिया बर्बरता का ग्राफ किस तरह लगातार बना हुआ है:
| वित्तीय वर्ष / समयावधि | पुलिस हिरासत में दर्ज मौतें | प्रमुख प्रभावित क्षेत्र/राज्य |
| वर्ष 2021-22 | 176 | उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार |
| वर्ष 2022-23 | 163 | गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश |
| वर्ष 2023-24 | 157 | उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात |
| वर्ष 2024-25 | 140 | राजस्थान, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र |
| वर्ष 2025-26 (शुरुआती 6 महीने) | 170 | उत्तर प्रदेश, असम, बिहार |
ध्यान देने योग्य तथ्य: यदि हम पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत (जेल) दोनों के आंकड़ों को मिला दें, तो यह संख्या हजारों में पहुंच जाती है। अकेले वर्ष 2024 के भीतर पूरे देश में लगभग 2,739 लोगों की कस्टडी (हिरासत) में मौत दर्ज की गई।
पहले 48 घंटों का सच और ‘सजा से मुक्ति’ की संस्कृति
‘टॉर्चर के खिलाफ राष्ट्रीय अभियान’ (नेशनल कैंपेन अगेंस्ट टॉर्चर) जैसी स्वतंत्र संस्थाओं की विस्तृत रिपोर्ट्स का विश्लेषण करने पर एक बेहद डरावना सच सामने आता है। हिरासत में होने वाली कुल मौतों में से लगभग 80 प्रतिशत मौतें आरोपी को पकड़ने के पहले 48 घंटों के भीतर होती हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि पुलिस गिरफ्तारी के तुरंत बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले ही आरोपी पर इस कदर ‘थर्ड डिग्री’ यानी बर्बर शारीरिक यातनाओं का इस्तेमाल करती है कि उसका शरीर उसे बर्दाश्त नहीं कर पाता।
इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि पुलिस विभाग में अपराधियों को मिलने वाले आंतरिक संरक्षण के कारण ‘जवाबदेही से मुक्ति’ (इम्प्यूनिटी) की एक खतरनाक संस्कृति पनप चुकी है।

यह आलेख के ‘वायरल घटनाएं और वास्तविकता’ वाले हिस्से को दर्शाता है, जहाँ ज़िक्र है कि कैसे रोज़मर्रा कमाकर खाने वाले गरीब लोग पुलिसिया बर्बरता के सबसे आसान शिकार बनते हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के वर्ष 2011 से 2022 के बीच के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पूरे देश में पुलिस हिरासत में हुई 1,107 मौतों के मामलों में एक भी पुलिस अधिकारी या कर्मचारी को अदालत द्वारा दोषी साबित नहीं किया जा सका।
पिछले पांच वर्षों के इतिहास को देखें तो केवल एक मामले में दोषी पुलिसकर्मियों पर वास्तविक अनुशासनात्मक या विभागीय कार्रवाई हुई, और वह मामला तमिलनाडु का था।
ज्यादातर मामलों में पुलिस विभाग अपने साथी कर्मचारियों को बचाने के लिए मौत का कारण ‘अचानक बीमारी’, ‘दिल का दौरा’ या ‘आत्महत्या’ बताकर फाइलों को बंद कर देता है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट: वैश्विक मंच पर भारत की छवि
भारत खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, लेकिन जब वैश्विक मानवाधिकार संगठन हमारे पुलिसिया तंत्र की पड़ताल करते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को गहरा धक्का लगता है।
वर्दी का नंगा नाच और लोकतंत्र की कराहती न्याय-व्यवस्था: पुलिस जनता की नौकर है, नेताओं की नहीं!

संयुक्त राष्ट्र (UN) की गंभीर चेतावनी
फरवरी 2026 में, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भारत सरकार को एक आधिकारिक पत्र भेजकर अत्यंत गंभीर चिंता व्यक्त की। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत के कुछ राज्यों, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और असम में, “मुठभेड़” (एनकाउंटर) और “हाफ-एनकाउंटर” (पैरों में गोली मारना) के नाम पर अत्यधिक बल प्रयोग और प्रताड़ना का एक व्यापक और खतरनाक पैटर्न (परवेसिव पैटर्न) बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने इन मामलों की किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने और भारत में तत्काल पुलिस सुधार लागू करने की मांग की है।
अंतरराष्ट्रीय संधि पर हिचकिचाहट: दुनिया के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों ने संयुक्त राष्ट्र के ‘यातना के खिलाफ वैश्विक समझौते’ (कन्वेंशन अगेंस्ट टॉर्चर – UNCAT) को कानूनी रूप से मंजूर कर लिया है। भारत ने 1997 में इस पर हस्ताक्षर तो किए थे, लेकिन आज लगभग तीन दशक बीत जाने के बाद भी हमारी संप्रभु संसद ने इसे औपचारिक रूप से स्वीकार या मंजूर (रैटिफाई) नहीं किया है। इसका कारण यह है कि इसे मंजूर करते ही भारत को अपने घरेलू कानूनों में बदलाव कर यातना देने वाले पुलिसकर्मियों को कड़ी सजा देने का प्रावधान करना होगा।
मानवाधिकार संगठनों के निष्कर्ष
ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW): इस संस्था की कई वर्षों की रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारतीय पुलिस आधुनिक वैज्ञानिक जांच पद्धतियों (जैसे फोरेंसिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण) को सीखने के बजाय आज भी औपनिवेशिक काल की ‘मारपीट और डराने’ की तकनीक पर निर्भर है। उनके शोध के अनुसार, हिरासत में मरने वाले अधिकांश लोगों के परिवारों को डरा-धमका कर चुप करा दिया जाता है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल: एमनेस्टी की रिपोर्टों में साफ कहा गया है कि पुलिसिया बर्बरता का शिकार होने वाले लोगों में एक बहुत बड़ा हिस्सा गरीब, अल्पसंख्यक समुदायों, दलितों, आदिवासियों और प्रवासियों का होता है। समाज के इस तबके के पास न तो महंगे वकीलों को देने के लिए पैसे होते हैं और न ही राजनीतिक पहुंच, जिसके कारण पुलिस इन्हें आसानी से अपना शिकार बना लेती है।
विश्व मानवाधिकार संगठन (OMCT) का ‘वैश्विक प्रताड़ना सूचकांक 2025’: इस अंतरराष्ट्रीय सूचकांक में भारत को मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले में ‘उच्च जोखिम वाली श्रेणी’ (हाई रिस्क कैटेगरी) में रखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कानून का राज कई जगहों पर पुलिसिया राज में तब्दील हो चुका है।
भारतीय स्वतंत्र संस्थानों की रिपोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
ऐसा नहीं है कि इस बर्बरता पर केवल विदेशी संस्थाएं ही सवाल उठा रही हैं। खुद भारत की अपनी संवैधानिक और अर्ध-न्यायिक संस्थाओं ने पुलिस तंत्र की इस सड़न को उजागर किया है।
‘स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट’ (SPIR 2025)
थाने के भीतर पुलिसकर्मियों की मानसिकता को समझने के लिए किए गए इस व्यापक राष्ट्रव्यापी अध्ययन में चौंकाने वाले निष्कर्ष सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार:
भारत के कई राज्यों में तैनात पुलिसकर्मियों का एक बड़ा हिस्सा यह मानता है कि अपराधियों से सच उगलवाने के लिए ‘यातना देना’ (थॉर्चर करना) एक जरूरी और सही प्रक्रिया है।
उदाहरण के लिए, गुजरात में किए गए सर्वेक्षण में लगभग 63 प्रतिशत पुलिसकर्मियों ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि पुलिस द्वारा मारपीट या प्रताड़ना दिया जाना पूरी तरह से स्वीकार्य है। यह मानसिकता दर्शाती है कि पुलिस खुद को कानून से ऊपर समझने लगी है।

लेख से जुड़ाव: यह आलेख के निष्कर्ष: जागो भारत और “चुप्पी हत्यारी है” वाले संदेश को पूरी ताकत से बयां करता है। यह पीड़ितों को याद रखने और न्याय की लड़ाई को जिंदा रखने का प्रतीक है।
राष्ट्रीय पुलिस आयोग और प्रशासनिक सुधार आयोग की धूल खाती सिफारिशें
आज से लगभग पांच दशक पहले, राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977-81) ने अपनी 8 विस्तृत रिपोर्ट्स में पुलिस को आधुनिक और जवाबदेह बनाने के लिए क्रांतिकारी सिफारिशें की थीं। आयोग ने साफ कहा था कि:
पुलिस को नेताओं और मंत्रियों के राजनीतिक हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त किया जाए।
पुलिस की कार्यप्रणाली की जांच के लिए एक पूरी तरह से ‘स्वतंत्र पुलिस शिकायत प्राधिकरण’ बनाया जाए, जिसमें पुलिस विभाग का कोई हस्तक्षेप न हो।
इसके बाद आए ‘द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग’ ने भी जोर देकर कहा था कि पुलिस को “सरकार का नौकर” बनने के बजाय “कानून का सेवक” (सर्वेंट ऑफ लॉ) बनना चाहिए। दुर्भाग्य से, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण ये तमाम सिफारिशें आज भी सरकारी दफ्तरों की अलमारियों में धूल खा रही हैं।
डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997): ऐतिहासिक कानूनी कवच
जब कार्यपालिका (सरकार) और पुलिस अपने कर्तव्यों को भूल गए, तब देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों की जान की रक्षा के लिए कदम बढ़ाया। डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 11 बेहद सख्त और अनिवार्य दिशा-निर्देश (गाइडलाइंस) जारी किए, जो आज भी हर नागरिक के लिए सुरक्षा कवच हैं।
ये दिशा-निर्देश केवल कागजी नियम नहीं हैं, बल्कि इन्हें संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने के अधिकार) का हिस्सा माना गया है। इनका उल्लंघन करने वाले किसी भी पुलिस अधिकारी के खिलाफ सीधे अदालत की अवमानना का मुकदमा चलाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के 11 मुख्य दिशा-निर्देश:
1. गिरफ्तारी करने वाले पुलिसकर्मी की वर्दी पर उसका नाम और पद (नेम टैग) साफ-साफ दिखना चाहिए।
2. गिरफ्तारी के समय एक ‘गिरफ्तारी ज्ञापन’ (अरेस्ट मेमो) तैयार किया जाएगा, जिस पर इलाके के कम से कम एक सम्मानित गवाह या परिवार के सदस्य के हस्ताक्षर होंगे।
3. गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपने किसी रिश्तेदार या मित्र को अपनी गिरफ्तारी और स्थान की सूचना तुरंत भिजवाए।
4. यदि व्यक्ति का मित्र या रिश्तेदार दूसरे जिले में रहता है, तो पुलिस को गिरफ्तारी के 8 से 12 घंटे के भीतर कानूनी सहायता केंद्र के माध्यम से सूचना देनी होगी।
5. गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के समय अपने शरीर पर मौजूद किसी भी चोट को दर्ज कराने का अधिकार है, जिसे ‘निरीक्षण ज्ञापन’ (इन्स्पेक्शन मेमो) कहा जाता है।
6. हिरासत में बंद व्यक्ति का हर 48 घंटे में एक मान्यता प्राप्त डॉक्टर द्वारा अनिवार्य रूप से स्वास्थ्य परीक्षण (मेडिकल एग्जामिनेशन) कराया जाएगा।
7. सभी दस्तावेजों की प्रतियां (कॉपी) इलाके के मजिस्ट्रेट के पास भेजी जानी अनिवार्य हैं।
8. पूछताछ के दौरान गिरफ्तार व्यक्ति को अपने वकील से मिलने की अनुमति दी जानी चाहिए, भले ही पूरी पूछताछ के दौरान न सही।
9. सभी पुलिस थानों और जिला मुख्यालयों पर एक ‘पुलिस नियंत्रण कक्ष’ (कंट्रोल रूम) होना चाहिए, जहां गिरफ्तारी की जानकारी बोर्ड पर लिखी हो।
10. गिरफ्तारी की सूचना देने वाले पुलिसकर्मी की डायरी में पूरा विवरण दर्ज होना चाहिए।
11. इन नियमों का पालन न करने वाले अधिकारी को निलंबित कर जेल भेजा जा सकता है।
संवैधानिक प्रावधान और कानूनी स्थिति: क्या कहता है हमारा मूल कानून?
भारत का संविधान देश का सर्वोच्च कानून है। इस संविधान में कहीं भी, एक शब्द भी ऐसा नहीं लिखा है जो पुलिस को यह शक्ति देता हो कि वह किसी नागरिक को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के प्रताड़ित करे, उसे गाली दे या किसी राजनेता के मौखिक आदेश पर किसी का घर ढहा दे या उसे उठा ले।
अनुच्छेद 21 (जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार): यह अधिकार देश के हर नागरिक को, यहां तक कि एक खूंखार अपराधी को भी, यह गारंटी देता है कि कानून द्वारा स्थापित उचित प्रक्रिया के बिना उसकी जान या स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती। पुलिस द्वारा किया जाने वाला कोई भी अत्याचार इस मौलिक अधिकार का सीधा और नंगा उल्लंघन है।
अनुच्छेद 22 (मनमानी गिरफ्तारी के खिलाफ संरक्षण): यह अनुच्छेद व्यवस्था देता है कि किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। साथ ही, गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर (यात्रा के समय को छोड़कर) उसे नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना पुलिस का संवैधानिक दायित्व है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS – जो पहले CrPC थी) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम: हमारा कानून यह स्पष्ट मानता है कि पुलिस हिरासत में डरा-धमका कर या मारपीट कर लिखवाया गया कोई भी कबूलनामा (coerced confession) अदालत में सबूत के तौर पर कतई मान्य नहीं है। जब कानून खुद पुलिस के सामने दिए गए बयान को सबूत नहीं मानता, तो फिर पुलिस किस हक से थानों में सच उगलवाने के नाम पर लोगों की हड्डियां तोड़ती है?
वास्तविकता यह है कि आज भी हमारा पुलिस तंत्र ‘पुलिस अधिनियम 1861’ के ढर्रे पर चल रहा है। यह कानून अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति के बाद भारतीय जनता को गुलाम बनाए रखने और उनका दमन करने के लिए बनाया था। आजादी के 79 साल बाद भी हम उसी दमनकारी औपनिवेशिक कानून को ढो रहे हैं, जिसे तत्काल बदलना और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप ढालना बेहद जरूरी है।
सोशल मीडिया, वायरल वीडियो और जमीनी हकीकत
आज के दौर में सोशल मीडिया ने एक सजग प्रहरी की भूमिका निभाई है। यदि आज हमारे पास स्मार्टफोन और इंटरनेट न हो, तो थानों के भीतर होने वाले न जाने कितने अपराध कभी दुनिया के सामने ही न आ पाएं।
हाल के दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी भयावह घटनाएं सामने आई हैं, जहां किसी सब्जी बेचने वाले को मामूली बात पर पुलिसकर्मियों ने इस कदर पीटा कि अस्पताल में उसकी मौत हो गई, कहीं किसी मंदिर के सुरक्षाकर्मी को रसूखदारों के इशारे पर प्रताड़ित किया गया, तो कहीं शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं और दलित युवाओं को थानों में बंद कर अमानवीय यातनाएं दी गईं।
मुठभेड़ संस्कृति’ (एनकाउंटर कल्चर) का खतरनाक चलन
सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि समाज का एक हिस्सा और कुछ राजनेता इन ‘फर्जी मुठभेड़ों’ या त्वरित न्याय की सरेआम तारीफ करते हैं। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग कानून की स्थापित प्रक्रिया को दरकिनार कर ‘ठोक देने’ की नीति का महिमामंडन करते हैं, तो वे अनजाने में कानून के शासन (रूल ऑफ लॉ) की नींव को कमजोर कर रहे होते हैं। आज अगर पुलिस किसी एक कथित अपराधी को बिना अदालत के दोषी ठहराए गोली मार देती है, तो कल यही पुलिस किसी भी आम निर्दोष नागरिक को निशाना बना सकती है।
संवैधानिक प्रावधान और कानूनी स्थिति: क्या कहता है हमारा मूल कानून?
भारत का संविधान देश का सर्वोच्च कानून है। इस संविधान में कहीं भी, एक शब्द भी ऐसा नहीं लिखा है जो पुलिस को यह शक्ति देता हो कि वह किसी नागरिक को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के प्रताड़ित करे, उसे गाली दे या किसी राजनेता के मौखिक आदेश पर किसी का घर ढहा दे या उसे उठा ले।
अनुच्छेद 21 (जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार): यह अधिकार देश के हर नागरिक को, यहां तक कि एक खूंखार अपराधी को भी, यह गारंटी देता है कि कानून द्वारा स्थापित उचित प्रक्रिया के बिना उसकी जान या स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती। पुलिस द्वारा किया जाने वाला कोई भी अत्याचार इस मौलिक अधिकार का सीधा और नंगा उल्लंघन है।
अनुच्छेद 22 (मनमानी गिरफ्तारी के खिलाफ संरक्षण): यह अनुच्छेद व्यवस्था देता है कि किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। साथ ही, गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर (यात्रा के समय को छोड़कर) उसे नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना पुलिस का संवैधानिक दायित्व है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS – जो पहले CrPC थी) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम: हमारा कानून यह स्पष्ट मानता है कि पुलिस हिरासत में डरा-धमका कर या मारपीट कर लिखवाया गया कोई भी कबूलनामा (coerced confession) अदालत में सबूत के तौर पर कतई मान्य नहीं है। जब कानून खुद पुलिस के सामने दिए गए बयान को सबूत नहीं मानता, तो फिर पुलिस किस हक से थानों में सच उगलवाने के नाम पर लोगों की हड्डियां तोड़ती है?
वास्तविकता यह है कि आज भी हमारा पुलिस तंत्र ‘पुलिस अधिनियम 1861’ के ढर्रे पर चल रहा है। यह कानून अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति के बाद भारतीय जनता को गुलाम बनाए रखने और उनका दमन करने के लिए बनाया था। आजादी के 79 साल बाद भी हम उसी दमनकारी औपनिवेशिक कानून को ढो रहे हैं, जिसे तत्काल बदलना और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप ढालना बेहद जरूरी है।
सोशल मीडिया, वायरल वीडियो और जमीनी हकीकत
आज के दौर में सोशल मीडिया ने एक सजग प्रहरी की भूमिका निभाई है। यदि आज हमारे पास स्मार्टफोन और इंटरनेट न हो, तो थानों के भीतर होने वाले न जाने कितने अपराध कभी दुनिया के सामने ही न आ पाएं।
हाल के दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी भयावह घटनाएं सामने आई हैं, जहां किसी सब्जी बेचने वाले को मामूली बात पर पुलिसकर्मियों ने इस कदर पीटा कि अस्पताल में उसकी मौत हो गई, कहीं किसी मंदिर के सुरक्षाकर्मी को रसूखदारों के इशारे पर प्रताड़ित किया गया, तो कहीं शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं और दलित युवाओं को थानों में बंद कर अमानवीय यातनाएं दी गईं।
‘मुठभेड़ संस्कृति’ (एनकाउंटर कल्चर) का खतरनाक चलन
सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि समाज का एक हिस्सा और कुछ राजनेता इन ‘फर्जी मुठभेड़ों’ या त्वरित न्याय की सरेआम तारीफ करते हैं। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग कानून की स्थापित प्रक्रिया को दरकिनार कर ‘ठोक देने’ की नीति का महिमामंडन करते हैं, तो वे अनजाने में कानून के शासन (रूल ऑफ लॉ) की नींव को कमजोर कर रहे होते हैं। आज अगर पुलिस किसी एक कथित अपराधी को बिना अदालत के दोषी ठहराए गोली मार देती है, तो कल यही पुलिस किसी भी आम निर्दोष नागरिक को निशाना बना सकती है।
आम जनता के अधिकार: आत्मरक्षा और कानूनी लड़ाई का रास्ता
अगर कोई पुलिस अधिकारी आपके साथ गुंडागर्दी करता है, तो आम नागरिक के तौर पर आपको डरने की जरूरत नहीं है। संविधान ने आपको खुद की रक्षा के लिए मजबूत कानूनी अधिकार दिए हैं।
1.कारण पूछें और ‘अरेस्ट मेमो’ की मांग करें:
गिरफ्तारी के तुरंत बाद.
यदि पुलिस आपको हिरासत में लेती है, तो सबसे पहले शांत रहकर गिरफ्तारी का लिखित कारण पूछें। पुलिस से कहें कि वे तुरंत मौके पर ‘अरेस्ट मेमो’ (गिरफ्तारी का दस्तावेज) तैयार करें और आपके किसी परिजन या मित्र के हस्ताक्षर करवाएं।
2.मौन रहने के अधिकार का प्रयोग करें:
पूछताछ के दौरान.
संविधान के अनुच्छेद 20(3) के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को खुद के खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यदि पुलिस आपके साथ मारपीट करती है या जबरन किसी कागज पर दस्तखत मांगती है, तो आप चुप रहने और अपने वकील की मौजूदगी की मांग करने के अधिकार पर अड़े रहें।
3.अनिवार्य मेडिकल चेकअप की जिद करें:
मजस्ट्रेट के सामने पेशी से पहले.
थाने से निकलते ही या मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने से पहले सरकारी डॉक्टर से अपना मेडिकल चेकअप कराने की मांग करें। अगर पुलिस ने आपके साथ मारपीट की है, तो डॉक्टर के सामने उन चोटों को दर्ज करवाएं। यह आपकी कोर्ट में सबसे बड़ी सुरक्षा होगी।
4.मजिस्ट्रेट के सामने खुलकर सच बोलें:
पेशी के वक्त.
जब आपको 24 घंटे के भीतर कोर्ट में जज (मजिस्ट्रेट) के सामने पेश किया जाए, तो बिना डरे जज को बताएं कि पुलिस ने आपके साथ थाने में क्या व्यवहार किया। अपनी चोटें जज को दिखाएं। जज तुरंत पुलिस के खिलाफ जांच के आदेश दे सकते हैं।
अत्याचार के खिलाफ शिकायत कहां और कैसे करें?
यदि आपके या आपके किसी परिचित के साथ पुलिस ने अवैध व्यवहार किया है, तो आप निम्नलिखित लोकतांत्रिक और कानूनी रास्तों का इस्तेमाल कर सकते हैं:
मानवाधिकार आयोग को शिकायत: आप सीधे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) या अपने राज्य के मानवाधिकार आयोग की वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए किसी वकील की जरूरत नहीं होती, एक सादे कागज पर लिखी शिकायत भी मान्य होती है।
न्यायालय में याचिका (RIT Petition): आप अपने अधिकारों के हनन के खिलाफ सीधे उच्च न्यायालय (High Court) या सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में अनुच्छेद 226 या अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर कर सकते हैं।
डिजिटल साक्ष्य: यदि संभव हो, तो सुरक्षित तरीके से पुलिस की अवैध गतिविधि का वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग बना लें। यह सोशल मीडिया और अदालत दोनों जगह पुलिस की मनमानी को बेनकाब करने का सबसे अचूक हथियार है। याद रखें, आपको हिंसा का रास्ता बिल्कुल नहीं अपनाना है—हमारी लड़ाई पूरी तरह से कानूनी और लोकतांत्रिक होनी चाहिए।
व्यवस्था में बदलाव के लिए जरूरी समाधान
केवल आलोचना करने से व्यवस्था नहीं सुधरेगी। यदि हमें वास्तव में भारत को एक सच्चा लोकतांत्रिक देश बनाना है, तो हमें बुनियादी स्तर पर निम्नलिखित सुधारों को लागू करने के लिए सरकार पर दबाव बनाना होगा:
सर्वोच्च न्यायालय के प्रकाश सिंह फैसले का क्रियान्वयन: सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में पुलिस सुधारों को लेकर जो ऐतिहासिक दिशा-निर्देश दिए थे, उन्हें हर राज्य में कड़ाई से लागू किया जाए।
स्वतंत्र पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन: हर जिले और राज्य स्तर पर एक स्वतंत्र संस्था हो, जिसमें रिटायर्ड जज और समाज के प्रतिष्ठित लोग शामिल हों। यह संस्था पुलिस के खिलाफ आने वाली शिकायतों की निष्पक्ष जांच करे।
मानवाधिकारों का प्रशिक्षण: पुलिसकर्मियों की ट्रेनिंग में केवल लाठी चलाना या बंदूक चलाना न सिखाया जाए, बल्कि उन्हें मानवाधिकारों, मनोवैज्ञानिक कूटनीति और आधुनिक वैज्ञानिक जांच का गहन प्रशिक्षण दिया जाए।
अंतरराष्ट्रीय संधि (UNCAT) को मंजूरी: भारत सरकार तत्काल संयुक्त राष्ट्र के प्रताड़ना विरोधी समझौते को संसद से मंजूर करे ताकि देश में यातना देना एक गंभीर, गैर-जमानती और दंडनीय अपराध बन सके।
पारदर्शिता और सीसीटीवी: देश के हर थाने के हर कोने में, विशेष रूप से पूछताछ कमरों में, 24 घंटे चलने वाले हाई-डेफिनिशन सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं, जिनकी फुटेज सीधे राज्य मुख्यालय और स्थानीय मजिस्ट्रेट की पहुंच में हो।
जागो भारत, जागो!
पुलिसिया अत्याचार केवल किसी एक व्यक्ति पर हुआ हमला नहीं है, बल्कि यह हमारे देश के संविधान, हमारी न्याय व्यवस्था और हमारे पूरे लोकतंत्र की आत्मा पर हुआ हमला है। ऐसे में आम जनता की चुप्पी सबसे ज्यादा खतरनाक और ‘हत्यारी’ साबित होती है। जब हम किसी दूसरे के साथ होते अन्याय को देखकर चुप रह जाते हैं, तो हम अनजाने में उस अत्याचारी तंत्र का हौसला बढ़ा रहे होते हैं।
संविधान ने इस देश के नागरिकों को मालिक बनाया है और सरकारी तंत्र को उनका सेवक। हमें इस बुनियादी सच्चाई को कभी नहीं भूलना चाहिए।
हमारा संकल्प हो:
पुलिस जनता की सच्ची सेवक बने, वर्दी की आड़ में गुंडागर्दी करने वाली संस्था नहीं।
देश के नेता जनता के सेवक बनें, खुद को कानून से ऊपर समझने वाले मालिक नहीं।
देश की अदालतें पूरी मुस्तैदी से न्याय की रखवाली करें ताकि किसी भी गरीब की चीख थानों के भीतर दम न तोड़े।
अपने अधिकारों को जानिए, इस आवाज को बुलंद कीजिए, इस लेख को देश के हर नागरिक तक पहुंचाइए और एक जागरूक, सुरक्षित और न्यायपूर्ण भारत के निर्माण में अपना योगदान दीजिए।
जय हिंद, जय संविधान!
लेखक परिचय: राजकुमार अग्रवाल वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक चिंतक और ‘अटल हिन्द’ के संपादक हैं। वे देश में संवैधानिक अधिकारों और पुलिस सुधारों के लिए लगातार मुखर रहे हैं।
स्रोत संदर्भ: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB), संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उपायुक्त कार्यालय (UN OHCHR), ह्यूमन राइट्स वॉच, एमनेस्टी इंटरनेशनल, स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट (SPIR 2025), एवं भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय।
आपके विचार हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं:
क्या आप मानते हैं कि पुलिस सुधारों के लिए उच्च न्यायपालिका के अधीन एक पूरी तरह स्वतंत्र जांच एजेंसी होनी चाहिए?


