अमेरिका -ईरान की वार्ता फेल के मायने
सौरभ वार्ष्णेय
अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता का असफल होना केवल दो देशों के रिश्तों में दरार भर नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता, वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर पडऩे वाला है। यह विफलता कई स्तरों पर गंभीर संकेत देती है। यह पश्चिम एशिया की जटिल भू-राजनीति, अविश्वास और क्षेत्रीय शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का भी प्रतिबिंब है। ऐसे में यह कहना कि इस विफलता के लिए पाकिस्तान पूरी तरह जिम्मेदार है, एक अतिसरलीकरण होगा—हालांकि उसकी भूमिका को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। यह वार्ता ही बेईमानी थी कि क्योंकि लेबनान में इजरायल की बमबारी कर रहा था जिस पर ईरान ने अपना विरोध दर्ज कराया था। वहीं ईरान की दस सूत्री बातें जो कि अमेरिका शुरु से मानने से इंकार कर रहा था। अब ऐसे में वार्ता हुई जो बताया जा रहा है पाकिस्तान ने एक दूसरे देश की बातें साझा की जो वार्ता का हल ही अस्पष्ट कर देती है। पाकिस्तान से जाते समय अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी बेंस ने भी वार्ता फेल की जानकारी दी। इस शांति वार्ता के फेल होने के कई कारण हैं।
सबसे पहले, यह क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ाने का संकेत है। पहले से ही इजऱायल, लेबनान, यमन और खाड़ी क्षेत्र में तनाव मौजूद है। ऐसे में वार्ता का टूटना टकराव की संभावना को और बढ़ा सकता है। ईरान समर्थित समूहों और अमेरिका समर्थित शक्तियों के बीच परोक्ष संघर्ष तेज हो सकता है।दूसरा बड़ा प्रभाव वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है। ईरान एक बड़ा तेल उत्पादक देश है, और उस पर लगे प्रतिबंधों में ढील की उम्मीद से बाजार में संतुलन बन सकता था। लेकिन वार्ता विफल होने से तेल की कीमतों में अस्थिरता बढ़ सकती है, जिसका असर भारत जैसे आयातक देशों पर सीधे पड़ेगा।तीसरा, यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की सीमाओं को उजागर करता है। वर्षों से चल रही बातचीत के बावजूद यदि कोई ठोस परिणाम नहीं निकलता, तो यह दर्शाता है कि आपसी अविश्वास और राजनीतिक हित शांति के रास्ते में बड़ी बाधा बने हुए हैं। इससे भविष्य में अन्य वैश्विक वार्ताओं पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।चौथा, परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंताएं और बढ़ेंगी। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने का उद्देश्य इस वार्ता का मुख्य आधार था। अब इसके विफल होने से परमाणु हथियारों की होड़ तेज होने का खतरा है, जिससे वैश्विक सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। यह विफलता एक चेतावनी है कि केवल बातचीत की मेज पर बैठना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि विश्वास निर्माण और ठोस राजनीतिक इ’छाशक्ति भी जरूरी है। यदि विश्व शक्तियां समय रहते समाधान नहीं निकाल पातीं, तो इसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ सकता है।
वहीं पािकस्तान की भूमिका की बात की जाये तो पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संतुलन साधने की कोशिश करता रहा है। एक ओर वह अमेरिका का रणनीतिक साझेदार रहा है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ उसकी भौगोलिक निकटता और ऊर्जा हित जुड़े हुए हैं। हाल के वर्षों में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाने की इ’छा जताई है, लेकिन उसकी आंतरिक अस्थिरता, सीमित कूटनीतिक प्रभाव और सुरक्षा चुनौतियाँ उसे एक प्रभावी मध्यस्थ बनने से रोकती हैं।इसके अलावा, पाकिस्तान की भूमिका को लेकर संदेह भी बना रहता है। अमेरिका को यह आशंका रही है कि पाकिस्तान क्षेत्र में अपने हितों को साधने के लिए ईरान के साथ दोहरी नीति अपनाता है, जबकि ईरान भी पाकिस्तान की सऊदी अरब के साथ निकटता को लेकर सतर्क रहता है। ऐसे में यदि वार्ता के दौरान पाकिस्तान की कोई अप्रत्यक्ष भूमिका रही भी हो, तो वह निर्णायक नहीं कही जा सकती।वास्तव में, अमेरिका और ईरान के बीच अविश्वास की खाई बहुत गहरी है—परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध, और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से टकराव चला आ रहा है। इन मूल मुद्दों का समाधान किए बिना किसी तीसरे देश को दोष देना वास्तविकता से मुंह मोडऩे जैसा होगा। पाकिस्तान इस कूटनीतिक परिदृश्य में एक सीमित और परोक्ष भूमिका निभाता है, लेकिन वार्ता की विफलता का मुख्य कारण नहीं है। यह विफलता अधिकतर अमेरिका और ईरान के बीच गहरे मतभेदों और पारस्परिक अविश्वास का परिणाम है, जिसे किसी एक बाहरी कारक पर थोपना न तो उचित है और न ही व्यावहारिक।
अमेरिका का अब आगे का रुख क्या ?
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका का ईरान के प्रति रुख एक जटिल रणनीतिक संतुलन पर टिका हुआ दिखाई देता है। एक ओर वह प्रत्यक्ष युद्ध से बचना चाहता है, तो दूसरी ओर ईरान की क्षेत्रीय गतिविधियों और परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर सख्त नियंत्रण भी बनाए रखना चाहता है। यही द्वंद्व आने वाले समय में उसकी नीति की दिशा तय करेगा।
सबसे पहले, अमेरिका की प्राथमिकता पूर्ण युद्ध से बचाव है। इराक, अफगानिस्तान जैसे लंबे और महंगे सैन्य अभियानों के अनुभव ने उसे सिखाया है कि मध्य-पूर्व में सीधा युद्ध केवल अस्थिरता बढ़ाता है। इसलिए वह ईरान के साथ सीधे सैन्य टकराव के बजाय नियंत्रित दबाव की नीति अपना रहा है।
दूसरा, अमेरिका आर्थिक और कूटनीतिक प्रतिबंधों को और सख्त कर सकता है। ईरान के तेल निर्यात, बैंकिंग प्रणाली और रक्षा सहयोग पर रोक लगाकर वह उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिश करेगा। साथ ही, वह यूरोपीय देशों और खाड़ी सहयोगियों को भी अपने साथ जोड़कर एक संयुक्त मोर्चा बनाने की दिशा में काम करेगा।
तीसरा, अमेरिका की रणनीति में प्रत्यक्ष नहीं, परोक्ष सैन्य उपस्थिति भी महत्वपूर्ण रहेगी। खाड़ी क्षेत्र में अपने सैन्य ठिकानों को मजबूत करना, इजऱायल और सऊदी अरब जैसे सहयोगियों को समर्थन देना, और जरूरत पडऩे पर सीमित सैन्य कार्रवाई करना—ये सभी कदम उसकी डिटरेंस नीति का हिस्सा होंगे।
चौथा, कूटनीति के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं होंगे। अमेरिका यह समझता है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी तरीका बातचीत ही है। इसलिए भविष्य में नई शर्तों के साथ किसी नए परमाणु समझौते की संभावना बनी रहेगी, भले ही वर्तमान हालात तनावपूर्ण क्यों न हों। अमेरिका का रुख एक दोहरी रणनीति पर आधारित रहेगा—एक तरफ दबाव और प्रतिबंध, दूसरी तरफ संवाद और समझौते की कोशिश। यह नीति तत्काल समाधान तो नहीं देगी, लेकिन क्षेत्र में बड़े युद्ध को टालने और अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करने का प्रयास अवश्य करेगी।
देखना होगा कि युद्व किसी मसले का हल नहीं है जबकि ऐसे में जब ईरान होर्मूज पर कब्जा कर बैठा है। अगर जैसा कि ईरान धमकी दे रहा है कि उसने होर्मूज में अपनी माइंस की लोकेशन मिल नहीं रही या इंटरनेट की केबिल काट देगा? यानी फिलाहल विश्व का ऊर्जा संकट टालने हेतू ईरान से शांति वार्ता बेहद जरूरी है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।)


