
लेखक- डॉ अशोक कुमार वर्मा
चार दीवारों और ईंटों से बना हर भवन “घर” नहीं होता।घर वह होता है, जो परिवार के प्रेम, अपनत्व और आपसी सामंजस्य से सजीव बनता है। अन्यथा वह केवल एक “मकान” रह जाता है। सामान्य भाषा में कहें तो मकान और घर के बीच मुख्य अंतर भौतिक संरचना और भावनात्मक जुड़ाव का है। मकान ईंट, सीमेंट और लोहे से बनी एक निर्जीव इमारत है, जबकि घर उसमें रहने वाले लोगों के स्नेह, विश्वास और संस्कारों से निर्मित होता है। मकान ख़रीदा या किराए पर लिया जा सकता है, लेकिन घर बसाया जाता है। घर एक मंदिर है। जी हाँ, वास्तव में घर एक मंदिर ही है। भारतीय संस्कृति में घर को केवल ईंट–पत्थर से बना एक भवन नहीं माना गया है अपितु यह एक अति पवित्र स्थान है। यह व्यक्तियों के रहने का ही स्थान नहीं है अपितु सुरक्षित आश्रय है जहाँ व्यक्ति आकर सुख और शांति का अनुभव करता है। ऐसे पवित्र स्थान की स्वच्छता और गरिमा बनाए रखना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।
इसी संदर्भ में घर की स्वच्छता के बारे जब चर्चा होती है तो लोग घर की स्वच्छता को लेकर बहुत अधिक संवेदनशील होते हैं।घरों के प्रत्येक कक्ष को सजाकर रखते हैं। सुगन्धित पुष्प, सजावटी पौधे, इत्र और कपूर आदि से घर की ऊर्जा को सकारात्मक बनाने का हर संभव प्रयास करते हैं लेकिन एक चूक कर जाते हैं। यह चूक बहुत ही छोटी लेकिन बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। यह चूक है घर में प्रवेश करते समय जूते चप्पल लेकर प्रवेश करना। इस और लोगों का ध्यान न के बराबर है। कुछ वर्ष पूर्व प्राय: मैं स्वयं यह चूक करता था। घर में ही नहीं अपितु रसोई में भी बाहर के जूते चप्पल पहनकर प्रवेश करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं लगती थी।
लेकिन मेरी सोच में भी परिवर्तन हुआ। यह घटना कुछ वर्ष पूर्व की है। मैं पानीपत किसी कार्यक्रम से गया हुआ था। वहां मुझे एक परिचित परिवार मिल गया और मुझे अपने घर आमंत्रित ही नहीं किया बल्कि साथ लेकर चले गए। जैसे ही मैंने उनके साथ उनके घर में प्रवेश किया उन्होंने अपने जूते बाहर निकाल दिए और मुझे भी जूते निकालने के लिए कहा। मुझे कुछ विचित्र सा लगा लेकिन मर्यादा के कारण मैंने जूते बाहर निकाल दिए और कक्ष में प्रवेश किया तो एक अलग से सकारात्मकता का बोध हुआ। उन्होंने मुझे बताया कि उनकी धर्मपत्नी दक्षिण भारत से है और वहां पर बहुत अधिक नियमों का पालन किया जाता है। जब से उनका विवाह हुआ है तब से घर में कुछ नियम बनाए गए हैं जिनका पालन सबको करना होता है। मैंने उनकी परम्परा और संस्कृति को जाना और यह निर्णय लिया कि हम भी अपने घर में ऐसा कुछ नियम बनाएंगे। एक अच्छी प्रेरणा मुझे वहां से मिली।
घरों में जूते–चप्पल घर के बाहर उतारने की परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण है।यह केवल एक सामाजिक या धार्मिक नियम नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और संस्कार से जुड़ा हुआ व्यवहार है। सबसे पहले यदि हम स्वच्छता के दृष्टिकोण से विचार करें, तो जूते–चप्पल दिनभर हमारे साथ सड़कों, गलियों, कार्यालयों, अस्पतालों, बाजारों और सार्वजनिक स्थलों पर घूमते हैं। इन स्थानों पर धूल, मिट्टी, कीचड़, बैक्टीरिया, वायरस और अनेक प्रकार के हानिकारक रसायन उपस्थित रहते हैं। जब हम उन्हीं जूतों को पहनकर घर में प्रवेश करते हैं, तो अनजाने में वही मलिनता अपने घर के फर्श, कालीन और कमरों में फैला देते हैं। घर का फर्श केवल चलने की स्थान नहीं होता; वहीं छोटे बच्चे खेलते हैं, बैठते हैं और कई बार रेंगते भी हैं। यदि फर्श मलिन होगा तो बच्चों के स्वास्थ्य पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए जूते बाहर उतारना घर की स्वच्छता बनाए रखने का सबसे सरल और प्रभावी उपाय है।
दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है।वैज्ञानिक अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि जूतों के तलवों में अनेक प्रकार के हानिकारक जीवाणु चिपके रहते हैं। इनमें ऐसे कीटाणु भी हो सकते हैं जो पेट संबंधी रोग, त्वचा संक्रमण या श्वसन संबंधी समस्याएं उत्पन्न कर सकते हैं। विशेषकर आज के समय में, जब विभिन्न प्रकार के संक्रमण तेजी से फैलते हैं, हमें अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता है। यदि हम जूते बाहर उतारने की प्रथा और स्वभाव बना लें, तो संक्रमण के प्रसार की संभावना एक सीमा तक कम की जा सकती है। यह एक छोटी-सी सावधानी है, परंतु इसका लाभ बहुत बड़ा है।
तीसरा पक्ष मानसिक और आध्यात्मिक है। भारतीय परंपरा में शुद्धता को अत्यंत महत्व दिया गया है।मंदिरों, गुरुद्वारों, मस्जिदों और अन्य पूजा स्थलों में जूते बाहर उतारने की प्रथा इसलिए है ताकि भीतर की पवित्रता बनी रहे। उसी प्रकार घर में भी पूजा स्थल, रसोई और शयनकक्ष जैसे स्थान पवित्र माने जाते हैं। जूते बाहर उतारना इस भावना का प्रतीक है कि हम घर को सम्मान देते हैं। यह व्यवहार हमारे मन में विनम्रता और मर्यादा का भाव भी उत्पन्न करता है।
चौथा पक्ष संस्कारों से जुड़ा हुआ है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने बड़ों को करते हुए देखते हैं। यदि माता-ता और परिवार के अन्य सदस्य नियमित रूप से घर के बाहर जूते उतारते हैं, तो बच्चों में भी स्वच्छता और अनुशासन की प्रवृत्ति विकसित होती है। छोटी-छोटी बातें ही भविष्य में बड़े संस्कारों का रूप लेती हैं। जब हम बच्चों को बताते हैं कि घर में स्वच्छता क्यों आवश्यक है, तो वे भी इस नियम का पालन स्वेच्छा से करते हैं। इस प्रकार एक साधारण-सा नियम पूरे परिवार में अनुशासन और व्यवस्था की भावना को सुदृढ़ करता है।
इसके अतिरिक्त, जूते बाहर उतारने से घर की सजावट और सामान भी सुरक्षित रहता है।महंगे कालीन, सोफे और फर्श पर जूतों के निशान नहीं पड़ते। फर्श कम गंदा होता है, जिससे सफाई में कम समय और श्रम लगता है। यदि हर सदस्य इस नियम का पालन करे, तो घर की साफ-सफाई बनाए रखना कहीं अधिक सरल हो जाता है। यह समय और ऊर्जा की भी बचत करता है। आधुनिक जीवनशैली में कई लोग सुविधा के नाम पर इस नियम की अनदेखी करते हैं। वे सोचते हैं कि दिन में कई बार जूते उतारना और पहनना असुविधाजनक है।
परंतु यदि हम घर के प्रवेश द्वार पर एक निश्चित स्थान पर जूते रखने की व्यवस्था कर लें और घर के अंदर पहनने के लिए अलग चप्पल रख लें, तो यह समस्या आसानी से हल हो सकती है। थोड़ी-सी व्यवस्था बड़े लाभ दे सकती है। कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं कि यदि घर की सफाई नियमित रूप से की जाती है, तो जूते पहनकर आने में कोई हानि नहीं। परंतु यह समझना आवश्यक है कि सफाई का उद्देश्य मलिनता को हटाना है, न कि उसे अनावश्यक रूप से बढ़ाना। यदि हम गंदगी को घर में आने से ही रोक दें, तो सफाई का कार्य अधिक प्रभावी और सरल हो जाता है।अंततः, जूते–चप्पल घर के बाहर उतारना एक छोटा-सा नियम है, परंतु इसके लाभ बहुआयामी हैं। यह स्वच्छता, स्वास्थ्य, संस्कार, अनुशासन और आध्यात्मिकता—सभी से जुड़ा हुआ है। हमें इसे केवल परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक आदत के रूप में अपनाना चाहिए। जब प्रत्येक परिवार इस नियम का पालन करेगा, तो समाज में स्वच्छता और स्वास्थ्य का स्तर भी स्वाभाविक रूप से ऊँचा उठेगा।इसलिए आइए संकल्प लें कि हम स्वयं भी जूते–चप्पल घर के बाहर उतारेंगे और अपने परिवार व समाज को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे। स्वच्छ घर, स्वस्थ जीवन और सुदृढ़ संस्कार — यही इस छोटी-सी आदत का महान संदेश है।


