भारत में बदलती पारिवारिक सोच और स्वास्थ्य क्रांति का नया अध्याय
लेखक- राजकुमार अग्रवाल-
भारत लंबे समय तक दुनिया में उस देश के रूप में देखा जाता रहा, जहां बड़ी आबादी, सीमित संसाधन और पारंपरिक सामाजिक संरचनाएं स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण की सबसे बड़ी चुनौतियां थीं। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। नई पीढ़ी का भारत केवल आर्थिक विकास या डिजिटल क्रांति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने परिवार, स्वास्थ्य, मातृत्व, महिला अधिकारों और जीवन की गुणवत्ता को लेकर भी तेजी से जागरूक हो रहा है।
स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) इसी बदलते भारत की एक विस्तृत तस्वीर सामने रखता है। यह केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि भारतीय समाज के भीतर चल रहे उस बड़े सामाजिक परिवर्तन का प्रमाण है जिसमें महिलाएं अधिक शिक्षित हो रही हैं, परिवार अधिक जिम्मेदार निर्णय ले रहे हैं और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच धीरे-धीरे मजबूत हो रही है।
सर्वेक्षण का सबसे चर्चित तथ्य यह है कि भारत में हर 100 योग्य दंपतियों में से 69 जोड़े अब किसी न किसी आधुनिक या पारंपरिक गर्भनिरोधक उपाय का उपयोग कर रहे हैं। यह आंकड़ा पहली नजर में केवल एक प्रतिशत जैसा दिख सकता है, लेकिन वास्तव में यह भारतीय समाज की मानसिकता में आए गहरे बदलाव का संकेत है।
परिवार नियोजन: अब शर्म नहीं, समझदारी का विषय
कुछ दशक पहले तक भारत में गर्भनिरोधक या परिवार नियोजन पर खुलकर बात करना सामाजिक संकोच का विषय माना जाता था। गांवों से लेकर शहरों तक, महिलाएं अक्सर अपने शरीर और प्रजनन से जुड़े निर्णय स्वयं नहीं ले पाती थीं। परिवार का आकार तय करने का अधिकार अधिकतर पुरुषों या संयुक्त परिवारों के हाथों में होता था।
लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही हैं।
आज का युवा दंपति केवल बच्चे पैदा करने के बारे में नहीं सोचता, बल्कि यह भी सोचता है कि वह अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा, पोषण और सुरक्षित भविष्य कैसे देगा। यही कारण है कि परिवार नियोजन अब “जनसंख्या नियंत्रण” का सरकारी नारा नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा व्यक्तिगत निर्णय बन चुका है।
NFHS-6 के अनुसार, गर्भनिरोधक उपयोग का स्तर 67 प्रतिशत से बढ़कर 69 प्रतिशत हो गया है। यह वृद्धि भले ही मामूली लगे, लेकिन भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यह करोड़ों परिवारों की बदलती सोच को दर्शाती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका सीधा संबंध महिलाओं की शिक्षा, इंटरनेट की पहुंच, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और सामाजिक जागरूकता से है। आज ग्रामीण भारत की महिलाएं भी मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और आशा कार्यकर्ताओं के जरिए स्वास्थ्य संबंधी जानकारी प्राप्त कर रही हैं।
महिला अब केवल “मां” नहीं, निर्णय लेने वाली नागरिक भी
भारत में लंबे समय तक महिला स्वास्थ्य को केवल मातृत्व तक सीमित करके देखा गया। लेकिन नई रिपोर्ट बताती है कि अब महिलाओं को केवल बच्चे जन्म देने वाली भूमिका तक सीमित नहीं देखा जा रहा।
महिलाओं के बैंक खाते बढ़े हैं। मोबाइल फोन रखने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ी है। इंटरनेट का उपयोग करने वाली महिलाओं की संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है। यह केवल डिजिटल विकास नहीं, बल्कि सामाजिक स्वतंत्रता का संकेत है।
जब एक महिला के पास अपना मोबाइल होता है, इंटरनेट होता है और बैंक खाता होता है, तब वह स्वास्थ्य, गर्भनिरोधक, शिक्षा और आर्थिक फैसलों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाती है।
यही कारण है कि परिवार नियोजन की सफलता का सबसे बड़ा आधार महिला सशक्तिकरण को माना जा रहा है।
गर्भनिरोधक: जिम्मेदारी केवल महिलाओं की नहीं
भारतीय समाज में लंबे समय तक गर्भनिरोधक का बोझ मुख्यतः महिलाओं पर डाला गया। नसबंदी से लेकर गोलियों तक, अधिकतर उपाय महिलाओं के हिस्से आए। लेकिन अब पुरुष भागीदारी को लेकर भी चर्चा तेज हो रही है।
कंडोम को आज सबसे आसान और सुरक्षित गर्भनिरोधक उपायों में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल अनचाहे गर्भ से ही नहीं बचाता, बल्कि यौन संचारित बीमारियों से भी सुरक्षा प्रदान करता है।
फिर भी भारत में यौन स्वास्थ्य पर खुली चर्चा अभी भी सीमित है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो कई बार लोग मेडिकल स्टोर से कंडोम खरीदने में भी झिझक महसूस करते हैं। यही सामाजिक झिझक कई बार स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को बढ़ा देती है।
फीमेल कंडोम: महिलाओं के हाथ में सुरक्षा का अधिकार
भारतीय समाज में अधिकांश लोग पुरुष कंडोम के बारे में जानते हैं, लेकिन फीमेल कंडोम के बारे में जागरूकता अभी भी बेहद कम है।
फीमेल कंडोम महिलाओं को अपने शरीर और सुरक्षा पर अधिक नियंत्रण देता है। यह पॉलीयुरेथेन या नाइट्राइल से बना होता है और शारीरिक संबंध से कई घंटे पहले उपयोग किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि फीमेल कंडोम को लेकर जागरूकता बढ़े तो महिलाओं को यौन स्वास्थ्य और गर्भनिरोधक फैसलों में अधिक स्वतंत्रता मिल सकती है।
लेकिन यहां सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक चुप्पी है। स्कूलों, परिवारों और सार्वजनिक विमर्श में यौन शिक्षा की कमी के कारण बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष अभी भी बुनियादी प्रजनन स्वास्थ्य जानकारी से वंचित हैं।
मातृ स्वास्थ्य में सुधार: बदलती तस्वीर
NFHS-6 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में गर्भवती महिलाओं तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
95 प्रतिशत से अधिक गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व देखभाल मिली। पहले तीन महीनों में जांच कराने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ी है। कम से कम चार बार स्वास्थ्य जांच कराने वाली महिलाओं का प्रतिशत भी तेजी से बढ़ा है।
यह सुधार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गर्भावस्था के दौरान शुरुआती जांच मां और बच्चे दोनों की जान बचा सकती है। एनीमिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और अन्य जटिलताओं की समय रहते पहचान होने से मातृ मृत्यु दर कम होती है।
सरकारी योजनाओं — जैसे जननी सुरक्षा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम — ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है।
अस्पतालों में बढ़ते प्रसव: भरोसे की वापसी
एक समय था जब भारत के ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में प्रसव घरों में होते थे। प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की कमी और अस्पतालों की दूरी के कारण मातृ और शिशु मृत्यु दर अधिक रहती थी।
लेकिन अब संस्थागत प्रसव 90 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुका है। इसका मतलब है कि अधिक महिलाएं अस्पतालों या स्वास्थ्य केंद्रों में सुरक्षित प्रसव करा रही हैं।
यह केवल चिकित्सा सुविधा का विस्तार नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ते भरोसे का संकेत भी है।
बच्चों का स्वास्थ्य: पोषण और टीकाकरण में प्रगति
भारत लंबे समय तक कुपोषण की समस्या से जूझता रहा है। दुनिया के सबसे अधिक कुपोषित बच्चों में बड़ी संख्या भारत में पाई जाती थी।
लेकिन नए आंकड़े उम्मीद जगाते हैं।
पांच साल से कम उम्र के बच्चों में नाटापन कम हुआ है। गंभीर कुपोषण में कमी आई है। स्तनपान की स्थिति बेहतर हुई है। बच्चों को समय पर ठोस आहार मिलने की दर बढ़ी है।
इसके पीछे पोषण अभियान, आंगनवाड़ी सेवाओं और मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों की बड़ी भूमिका मानी जा रही है।
टीकाकरण में भारत की बड़ी छलांग
कोविड महामारी के बाद भारत ने स्वास्थ्य ढांचे को लेकर वैश्विक स्तर पर अपनी क्षमता दिखाई। NFHS-6 के आंकड़े बताते हैं कि बच्चों का पूर्ण टीकाकरण बढ़कर 87 प्रतिशत से अधिक हो गया है।
रोटावायरस वैक्सीन कवरेज में भारी वृद्धि दर्ज की गई है। खसरे के टीके की दूसरी खुराक का दायरा भी बढ़ा है।
यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत जैसे विशाल देश में दूर-दराज के गांवों तक टीकाकरण पहुंचाना दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक माना जाता है।
स्वास्थ्य बीमा: गरीब परिवारों को सुरक्षा
स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे बड़ी समस्या केवल अस्पतालों की उपलब्धता नहीं, बल्कि इलाज का खर्च भी होता है।
भारत में लाखों परिवार हर साल इलाज के कारण आर्थिक संकट में चले जाते हैं। लेकिन स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का विस्तार इस स्थिति को बदलने की कोशिश कर रहा है।
NFHS-6 के अनुसार स्वास्थ्य बीमा का दायरा 41 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत से अधिक हो गया है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने गरीब और कमजोर वर्गों को बड़ी राहत दी है।
मासिक धर्म और स्वच्छता: टूटती चुप्पी
भारत में मासिक धर्म लंबे समय तक सामाजिक वर्जना का विषय रहा। कई ग्रामीण इलाकों में आज भी लड़कियां पीरियड्स के दौरान स्कूल छोड़ देती हैं या असुरक्षित साधनों का उपयोग करती हैं।
लेकिन अब स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है।
सरकारी योजनाओं और सस्ते सैनिटरी उत्पादों की उपलब्धता के कारण सुरक्षित मासिक धर्म स्वच्छता का उपयोग बढ़ा है। यह बदलाव केवल स्वास्थ्य सुधार नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा और आत्मविश्वास से भी जुड़ा है।
लेकिन चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुईं
इन सकारात्मक उपलब्धियों के बावजूद भारत के सामने कई गंभीर चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं।
एक तरफ कुपोषण है, तो दूसरी तरफ तेजी से बढ़ता मोटापा और मधुमेह भी चिंता का विषय बन रहे हैं। ग्रामीण और शहरी स्वास्थ्य सुविधाओं के बीच अंतर अभी भी बड़ा है। मानसिक स्वास्थ्य, यौन शिक्षा और किशोर स्वास्थ्य जैसे विषय अभी भी पर्याप्त प्राथमिकता नहीं पा सके हैं।
इसके अलावा, सामाजिक असमानता भी एक बड़ी चुनौती है। शहरों में रहने वाली शिक्षित महिलाओं और दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के बीच स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच में बड़ा अंतर बना हुआ है।
नया भारत किस दिशा में जा रहा है?
NFHS-6 केवल स्वास्थ्य रिपोर्ट नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जो धीरे-धीरे अपनी पुरानी झिझकों से बाहर निकल रहा है।
यह वह भारत है जहां महिलाएं अपने स्वास्थ्य को लेकर आवाज उठा रही हैं। जहां युवा दंपति जिम्मेदार पैरेंटिंग को महत्व दे रहे हैं। जहां मातृत्व को केवल “कर्तव्य” नहीं, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक अधिकार के रूप में देखा जा रहा है।
यह बदलाव केवल सरकारी योजनाओं से नहीं आया। इसके पीछे करोड़ों आशा कार्यकर्ताओं, नर्सों, डॉक्टरों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक परिवारों की सामूहिक भूमिका है।
भारत की यह स्वास्थ्य यात्रा अभी अधूरी है, लेकिन दिशा बदल चुकी है।
और शायद यही इस रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश भी है —
एक ऐसा समाज, जहां स्वास्थ्य, सम्मान, जागरूकता और समानता धीरे-धीरे नई सामाजिक पहचान बनते जा रहे हैं।
यह लेख लेखक के निजी विचारों को प्रस्तुत करता है तथा पूर्णतः मौलिक एवं अप्रकाशित है।
भवदीय,
राजकुमार अग्रवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
संपादक – अटल हिन्द
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