दिल्ली दंगे: ताहिर को तो सजा, पर भड़काने वाले ‘कपिल’ आज भी आजाद क्यों? न्यायपालिका और पुलिस की भूमिका पर तीखे सवाल
दिल्ली दंगों में कपिल मिश्रा की बड़ी भूमिका थी जाफराबाद में कपिल मिश्रा के भड़काऊ भाषण ने दंगों की आग में घी डालने का काम किया था और उस समय दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस हरिहरन ने पुलिस को कपिल मिश्रा के खिलाफ FIR दर्ज करने को कहा था!
नई दिल्ली/13 जुलाई 2026 /अटल हिन्द ब्यूरो
साल 2020 की कड़कड़ाती ठंड में उत्तर-पूर्वी दिल्ली जो जख्म दिए गए थे, उनकी टीस आज भी न्याय की दहलीज पर सुलग रही है। कड़कड़डूमा कोर्ट के एडिशनल सेशंस जज प्रवीण सिंह की अदालत ने इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के जांबाज अधिकारी अंकित शर्मा की बर्बर हत्या के मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व निगम पार्षद ताहिर हुसैन समेत 5 आरोपियों को दोषी करार दे दिया है। 6 अन्य को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।
इस फैसले से अंकित शर्मा के परिवार को कानूनी न्याय तो मिलता दिख रहा है, लेकिन दिल्ली दंगों की पूरी पटकथा को देखें तो यह फैसला एकतरफा न्याय और जांच एजेंसियों की चुनिंदा खामोशी पर कई तीखे और तल्ख़ सवाल खड़े करता है।
दिल्ली दंगे और कपिल मिश्रा
दंगों की शुरुआत से ठीक पहले (23 फरवरी 2020),
23 फ़रवरी 2020 की दोपहर, जाफ़राबाद-मौजपुर सीमा पर बीजेपी नेता और विधानसभा चुनाव में मॉडल टाउन सीट से उम्मीदवार रहे कपिल मिश्रा पहुँचते हैं. उनके पहुँचने से पहले उनके तमाम समर्थक और लोगों की भीड़ जमा रहती है. ‘जय श्री राम के नारे’ गूंजते हैं. कपिल मिश्रा लोगों को संबोधित करते हुए कहते हैं, “डीसीपी साहब हमारे सामने खड़े हैं, मैं आप सबके बिहाफ़ (की ओर से) पर कह रहा हूं, ट्रंप के जाने तक तो हम शांति से जा रहे हैं लेकिन उसके बाद हम आपकी भी नहीं सुनेंगे, अगर रास्ते ख़ाली नहीं हुए तो. ट्रंप के जाने तक आप (पुलिस) जाफ़राबाद और चांदबाग़ ख़ाली करवा लीजिए, ऐसी आपसे विनती है, वरना उसके बाद हमें रोड पर आना पड़ेगा.”
दिल्ली दंगे: IB अफसर अंकित शर्मा हत्याकांड में पूर्व AAP पार्षद ताहिर हुसैन समेत 5 दोषी करार, 6 बरी
जब कपिल मिश्रा तीन दिन का अल्टीमेटम देते हैं और पुलिस की भी ना सुनने की बात कर रहे थे तो उनके बग़ल में उत्तर पूर्वी दिल्ली के डिप्युटी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (डीसीपी) वेद प्रकाश शौर्य मौजूद थे. लेकिन कपिल मिश्रा ने इसे स्पीच मानने से ही इंकार कर दिया है.
जिस दिन कपिल मिश्रा ने उस इलाक़े में जा कर रोड ख़ाली कराने का अल्टीमेटम दिया (जिसे अब वह भाषण मानने से इंकार कर रहे हैं.) उसी दिन यानी 23 फ़रवरी की शाम को उत्तर-पूर्वी दिल्ली जलने लगी. पूरे इलाक़े से एक के बाद एक हिंसा की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो सामने आने लगे. इसके साथ ही सोशल मीडिया पर इस विवादित भाषण की चर्चा शुरू हो गई, और एक तबक़े ने इस भाषण को हेट स्पीच और हिंसा भड़काने वाला बताया और कपिल मिश्रा की गिरफ़्तारी की माँग तेज़ हो गई. दंगों के लगभग सात महीने बाद भी कपिल मिश्रा को लेकर हुई तमाम शिकायतों के बावजूद कुल 751 एफ़आईआर में एक भी एफ़आईआर ऐसी नहीं है जो कपिल मिश्रा के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस ने दर्ज की हो.
एफआईआर की मांग: याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दावा किया कि कपिल मिश्रा की मौजूदगी और उनके भाषणों के कारण दंगे भड़के, इसलिए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज होनी चाहिए।दंगों के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने भी पुलिस को फटकार लगाते हुए कपिल मिश्रा के कथित भड़काऊ वीडियो पर संज्ञान लेने को कहा था।
अदालत का रुख: अप्रैल 2025 में एक निचली अदालत (राउज एवेन्यू कोर्ट) ने दिल्ली पुलिस को कपिल मिश्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। हालाँकि, नवंबर 2025 में एक सेशंस कोर्ट ने उस आदेश को रद्द (set aside) कर दिया। इसके बाद, अप्रैल 2026 में याचिकाकर्ता के पेश न होने के कारण अदालत ने कपिल मिश्रा के खिलाफ दायर शिकायत को खारिज कर दिया।
बर्बरता की कहानी: 51 घाव और ताहिर हुसैन का ‘मास्टरमाइंड’ होना
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की चार्जशीट और अदालत के फैसले ने साफ कर दिया कि 25 फरवरी 2020 को चांद बाग पुलिया के पास जो हुआ, वह कोई सामान्य हिंसक झड़प नहीं बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी।
- टारगेट किलिंग: ताहिर हुसैन ने अपने घर और पास की मस्जिद से हिंसक भीड़ का नेतृत्व किया। अंकित शर्मा को विशेष रूप से निशाना बनाकर खींचा गया।
- अमानवीय क्रूरता: पोस्टमार्टम रिपोर्ट की वो बातें आज भी रोंगटे खड़ी कर देती हैं—अंकित के शरीर पर धारदार हथियार के 51 घाव थे। हत्या के बाद उनके शव को नाले में फेंक दिया गया था।
- छत पर बना ‘वॉर ज़ोन’: ताहिर हुसैन के घर की छत से मिले पत्थरों, पेट्रोल बमों और तेजाब की बोतलों ने साबित किया कि दंगे की तैयारी बड़े स्तर पर थी।
न्याय के तराजू पर ताहिर हुसैन और उसके साथियों (नाजिम, कासिम, अनस और जावेद) को दोषी ठहराया जाना बिल्कुल सही और तार्किक है। लेकिन क्या दिल्ली दंगों का सच सिर्फ ताहिर हुसैन की छत तक ही सीमित था?
तल्ख़ सवाल: पुलिस की मौजूदगी में कपिल मिश्रा की धमकी और ‘सरकारी’ खामोशी
अदालत के इस फैसले के बाद यह सवाल उठना लाजिमी है कि दंगा भड़काने के आरोपियों की फेहरिस्त में पुलिस और न्यायपालिका ने कुछ खास चेहरों को ‘अभयदान’ क्यों दे दिया?
क्या दंगों की असली चिंगारी कपिल मिश्रा ने नहीं सुलगाई थी? 23 फरवरी 2020 को मौजपुर चौक पर तत्कालीन डीसीपी वेद प्रकाश सूर्या की मौजूदगी में भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने सरेआम धमकी दी थी कि “अगर पुलिस तीन दिन में रास्ते खाली नहीं करवाती, तो हम खुद सड़कों पर उतरेंगे और फिर पुलिस की भी नहीं सुनेंगे।”
- पुलिस की मूकसहमति? जिस पुलिस अधिकारी के ठीक बगल में खड़े होकर यह धमकी दी गई, उसने कोई एक्शन नहीं लिया। क्या पुलिस ने अपनी निष्क्रियता से कपिल मिश्रा जैसों को शह दी?
- कार्रवाई से परहेज क्यों? पुलिस की एफआईआर और आज तक की जांच में कपिल मिश्रा के खिलाफ कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? कड़कड़डूमा कोर्ट के इस फैसले में भी इस नफरती भाषण (Hate Speech) का कोई जिक्र न होना यह दर्शाता है कि कानून की नजरें कुछ मामलों में जानबूझकर बंद कर ली गईं।
क्या सिर्फ एक पक्ष दोषी था?
53 मौतों और 200 से अधिक घायलों की बलि लेने वाले इन दंगों को क्या सिर्फ “एकतरफा मुस्लिम साजिश” के चश्मे से देखा जा सकता है? जमीनी हकीकत और स्वतंत्र रिपोर्ट्स बताती हैं कि नुकसान दोनों पक्षों का हुआ था। लेकिन जांच का रुख और गिरफ्तारियों का अनुपात लगातार एकतरफा रहा।
न्याय का बुनियादी सिद्धांत है कि वह निष्पक्ष दिखे भी। जब दंगों को भड़काने वाले दक्षिणपंथी नेताओं पर कार्रवाई के बजाय उन्हें क्लीन चिट मिल जाती है और दूसरी तरफ के नेताओं पर कड़े कानून (जैसे UAPA) थोप दिए जाते हैं, तब देश की सबसे मजबूत संस्था यानी भारतीय न्यायपालिका की दिशा और दशा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है।
फैसला: न्याय या चुनिंदा राजनीति का हिस्सा?
अंकित शर्मा हत्याकांड में आया यह फैसला निश्चित रूप से सबूतों और गवाहों के आधार पर दिया गया एक कानूनी सच है। ताहिर हुसैन और उसके गुर्गों को उनके घिनौने अपराध की सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन देश की जनता जब इस न्याय को समग्रता (In entirety) में देखती है, तो उसे यह अधूरा लगता है।
जब तक दंगों के मूल कारणों—सरेआम पुलिस के सामने धमकी देने वाले सफेदपोशों, नफरत का जहर घोलने वाले राजनेताओं और दंगों के दौरान मूकदर्शक बनी रहने वाली दिल्ली पुलिस की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे फैसले ‘चुनिंदा न्याय’ (Selective Justice) ही कहलाएंगे। अंकित शर्मा को न्याय मिला, यह सच है; लेकिन क्या दिल्ली दंगों के सभी पीड़ितों को निष्पक्ष न्याय मिला? इसका जवाब आज भी दिल्ली की गलियों में सन्नाटे के रूप में तैर रहा है।

