क्या ‘माई लॉर्ड’ से ‘न्यायिक सेवक’ तक बदल रहा है भारत का न्याय तंत्र? 10 जुलाई 2026 की एक घटना
भारत में अब My Lord नहीं My Judicial Servant चलेगा ?
यह घटना भले ही कानूनी और तकनीकी रूप से एक ‘दुर्व्यवहार’ है, लेकिन यह समाज में न्याय प्रणाली के प्रति गहराते अविश्वास और हताशा को भी रेखांकित करती है। सुप्रीम कोर्ट का संयम बरतना यह दिखाता है कि न्यायपालिका जनता के दर्द को समझती है, लेकिन कानून की लक्ष्मण रेखा का पालन करना भी अनिवार्य है।
क्या आपको लगता है कि भारतीय अदालतों में संबोधन की पुरानी परंपराओं को बदलकर उन्हें और अधिक सुलभ या आधुनिक बनाने की आवश्यकता है?
नई दिल्ली /10 जुलाई 2026 /अटल हिन्द टीम/एजेंसी
मिलार्ड, माई लॉर्ड, योर हॉनर जैसे शब्दों पर रोक लगनी चाहिए, सही शब्द है “My Judicial Servant” लेकिन “My Judicial Servant(मेरे न्यायिक सेवक) में आपको आदेश देता हूं कि ACP पर FIR दर्ज़ करे” यह शब्द बोलकर इस शख़्स ने पूरे देश का दिल जीत लिया है,आज घटना को देखते हुए
यह पहला वयक्ति है जिसने अदालत में बैठे नौकरो को जगाने का प्रयास किया और बता दिया की अब तारीख पे तारीख नहीं चलेगी ,,,,जनता के नौकर हो काम करो ,चाहे वो भारत का मुख्यन्यायधीश हो या किसी भी स्थानीय अदालत का जज क्योंकि भारत की जनता आज भी अदालतों पर विश्वाश करती है
और , पुलिस ,सरकार जगहों से न्याय नहीं मिलता तो दोनों पक्ष न्यायपालिका पर विश्वाश जताते हुए कहते है की कोई बात नहीं अदालत में मिलते है या फिर कोई बात नहीं भारत में अदालत है वही हमारे फैंसला करेगी लेकिन बीते 12 सालो में भारत की न्याय पालिका की गरिमा गिरी है और किसके कारण भारत की न्याय पालिका को जबरदस्त धक्का लगा

उसके लिए खुद अदालतों के जज दोषी है क्योंकि जज अदालत में आते है बैठ कर चले जाते है केस ,मुकदद्मे सुनते नहीं ,रिश्वत खोरी और जजों के पास से अकूत सम्पति मिलना भी को साबित करता है की भारत की न्यायपालिका भ्र्ष्ट हो चुकी है बिकायु हो चुकी है ,जनता अदालतों के चक्कर लगा लगा कर थक चुकी है ,
बहुत से फरियादी फैंसले के इन्तजार में भगवान को प्यारे हो गए लेकिन भारत की अदालतों में बैठे भगवान धन बटोरने और भारत को गृह युद्द की तरफ धकलने में , आज की इस घटना ने भारत की सभी अदालतों जजों ,भारत की सर्वोच्च अदालत के मुख्य जज को सचेत करने के लिए काफी है की अब जजों को काम करना शुरू कर देना चहिये भारत की जनता जागरूक हो रही है देख और समझ रही इसलिए न्यायपालिका को सुधर जाना चाहिए
शुक्रवार, 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एक बेहद असामान्य और चौंकाने वाली घटना सामने आई। अपनी याचिका पर खुद पैरवी कर रहे एक याचिकाकर्ता ने कोर्टरूम के भीतर भारी हंगामा किया, केस की फाइलें हवा में उछाल दीं और जजों के प्रति अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया। हालांकि, अदालत ने इस दुर्व्यवहार के बावजूद बड़ा दिल दिखाते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई करने से इनकार कर दिया।
‘न्यायिक सेवक’ कह जजों को ही देने लगा आदेश
यह पूरा वाकया सुबह करीब 11 बजे जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के सामने हुआ। उत्तर प्रदेश का रहने वाला याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।
सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ता ने खुद को ‘संप्रभु’ बताते हुए जजों को ‘माई लॉर्ड’ या ‘योर ऑनर’ के बजाय “मिस्टर ज्यूडिशियल सर्वेंट” (न्यायिक सेवक) कहकर संबोधित किया। उसने आक्रामक रुख अपनाते हुए बेंच से कहा, “मैं आपको आदेश देता हूं कि आप लखनऊ के पुलिस अधिकारी (ASP) के खिलाफ साइबर अपराध का सिंडिकेट चलाने के लिए FIR दर्ज करने का आदेश दें।”
इस पर हैरान होते हुए जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने पूछा, “क्या आप हमें आदेश दे रहे हैं?” इसके बाद याचिकाकर्ता ने कोर्ट रूम में केस की फाइलें हवा में फेंक दीं और मुख्य न्यायाधीश (CJI) का नाम लेकर अपशब्द कहे।
सुरक्षाकर्मियों ने किया काबू, हिरासत में लिया गया
अदालत की कार्यवाही में बाधा डालने के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट के सुरक्षाकर्मियों ने मोर्चा संभाला और याचिकाकर्ता को कोर्ट रूम से बाहर निकाला। इसके बाद उसे कोर्ट परिसर में ही डीएसपी (DSP) कार्यालय में सुरक्षा अधिकारियों की निगरानी में रखा गया, जहां दिल्ली पुलिस ने उससे पूछताछ की।
कोर्ट ने दिखाई सहानुभूति, याचिका खारिज
इस गंभीर दुर्व्यवहार के बावजूद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने संयम और संवेदनशीलता का परिचय दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता के खिलाफ अवमानना (Contempt of Court) या किसी अन्य सख्त कार्रवाई से इनकार कर दिया।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने टिप्पणी करते हुए कहा:
“वह व्यक्ति बहुत परेशान है। यह सब उसकी हताशा और निराशा का नतीजा है। हमारे मन में उसके लिए केवल सहानुभूति है और हम उसके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करना चाहते।”
हालांकि, मामले के गुण-दोष को देखते हुए अदालत ने कहा कि उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं मिला, जिसके बाद उसकी विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया गया।
क्या था मुख्य मामला?
याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप ने लखनऊ के स्पेशल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें पुलिस को FIR दर्ज करने का निर्देश देने के बजाय उसकी अर्जी को ‘निजी शिकायत’ (Private Complaint) के रूप में स्वीकार किया गया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस आदेश को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी थी और उसे उचित कानूनी मंच पर जाने की सलाह दी थी, जिससे नाराज होकर वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।
बार एसोसिएशन ने जताई आपत्ति, हो सकती है अनुशासनात्मक कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने भले ही याचिकाकर्ता को माफ कर दिया हो, लेकिन इस घटना पर कानूनी गलियारों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई है। सुप्रीम कोर्ट आर्ग्यूइंग काउंसिल एसोसिएशन ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर इस मामले में कड़ी नाराजगी जताई है। एसोसिएशन ने आरोप लगाया कि कुछ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और यूट्यूब चैनल कोर्टरूम की चुनिंदा क्लिप्स चलाकर न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं।
विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, यदि याचिकाकर्ता एक पंजीकृत वकील है, तो उसके इस पेशेवर कदाचार के लिए एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत बार काउंसिल सख्त कदम उठा सकती है। इसके तहत दोषी पाए जाने पर लाइसेंस निलंबन या वकालत से हमेशा के लिए रोक लगाने जैसी कार्रवाई हो सकती है।

