चानौत जल विवाद: व्यवस्था के नियम और प्यास के अधिकार के बीच सुलगते सवाल
हांसी | 24 जून 2026 | अटल हिन्द | राजकुमार अग्रवाल
हरियाणा के हांसी क्षेत्र का चानौत गांव इस भीषण गर्मी में केवल पानी की किल्लत से ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के बीच उपजे एक गंभीर अंतर्विरोध से भी जूझ रहा है। भाखड़ा पेयजल पाइपलाइन पर लगे ‘टी-कनेक्शन’ (T-connection) को हटाने के लिए 22-23 जून की आधी रात को हुई पुलिसिया कार्रवाई के बाद ग्रामीण पिछले 35 दिनों से धरने पर बैठे हैं। यह विवाद अब केवल एक अवैध कनेक्शन को हटाने का प्रशासनिक एक्शन नहीं रह गया है, बल्कि यह सार्वजनिक नीति, ग्रामीण बनाम शहरी संसाधन आवंटन और लोकतांत्रिक संवाद की कमी का एक बड़ा उदाहरण बन चुका है।
1. विवाद की जड़: जमीन हमारी, तो पानी पर पहला हक क्यों नहीं?
यह पूरा विवाद केंद्र सरकार की ‘अमृत’ (AMRUT) योजना के तहत बिछाई जा रही उस मुख्य पाइपलाइन से शुरू हुआ, जो राजली हेड से हांसी शहर तक पानी ले जाने के लिए बनाई गई है।
ग्रामीणों का तर्क: यह विशाल पाइपलाइन चानौत गांव की छाती को चीरकर, यानी उनकी अपनी जमीन से होकर गुजर रही है। ग्रामीणों का कहना है कि जब उनके खेतों और रास्तों का इस्तेमाल इस परियोजना के लिए हुआ, तो इस भीषण गर्मी में सबसे पहले उनकी प्यास बुझाई जानी चाहिए थी। इसी मांग के तहत वहां ‘टी-कनेक्शन’ लगाया गया था।
प्रशासन का पक्ष: हिसार रेंज के आईजी कुलदीप सिंह और उपायुक्त राहुल नरवाल का स्पष्ट कहना है कि मुख्य पाइप लाइन में किया गया यह कनेक्शन पूरी तरह अनधिकृत और सरकारी संपत्ति के साथ छेड़छाड़ था। कानूनन, किसी भी राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय परियोजना की मुख्य लाइन में इस तरह सीधे सुराख करना वर्जित है।
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2. आधी रात का एक्शन और ‘गोपनीय मध्यस्थता’ का खेल
इस विवाद में सबसे संवेदनशील मोड़ तब आया जब प्रशासन ने कार्रवाई के लिए आधी रात का वक्त चुना।
ग्रामीणों का आरोप है कि यह एक प्रशासनिक ‘धोखा’ है। आंदोलन के दौरान सोमेश कुमार नामक एक व्यक्ति ने खुद को सरकार का नुमाइंदा बताकर ग्रामीणों को आश्वस्त किया था कि सरकार ने इस कनेक्शन को मंजूरी दे दी है। इस आश्वासन पर ग्रामीणों ने एक बार धरना खत्म भी कर दिया था। लेकिन प्रशासन ने बाद में ऐसी किसी भी अनुमति से इनकार किया और भारी पुलिस बल, जेसीबी मशीनों, आंसू गैस और लाठीचार्ज के दम पर आधी रात को उस कनेक्शन को उखाड़ फेंका।

आईजी कुलदीप सिंह ने रात की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह कदम किसी भी संभावित टकराव को रोकने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाया गया था। इस मामले में 6 ग्रामीणों को नामजद कर अन्य अज्ञात लोगों पर मुकदमे दर्ज किए गए हैं।
पुलिस द्वारा पत्रकार को धमकाना
प्रेस वार्ता में पुलिस अधिकारी द्वारा एक पत्रकार द्वारा पूछे गए प्र्शन आधी रात को चोरो की तरह पुलिस गाँव में क्यों घुसी ,इसके जबाब में अफसर अपना आप खो बैठा क्योंकि चोर की चोरी पकड़ी गई ग्रामीण निःहथे थे और इस पुलिस असफर और इसके कर्मी निःहथे गाँव वालों पर अत्याचार कर रहे थे। भारत का सविधान हरियाणा पुलिस के इस अफसर की चनौत गाँव में आधी रात घुसने पर आपराधिक सजा देता है। लेकिन इस अफसर ने अपनी वर्दी और पद का धौंस देते और दिखाते हुए पत्रकार को शब्दों का चयन करने की सलाह दी। इस अफसर को शायद अपने पद का इतना घमंड है की यह जनता जिसका यह नौकर है जिसके टैक्स से यह और इसका पूरा महकमा तन्खा और रिश्वत लेता है उसी को आधी रात को मारने या उसका उत्पीड़न करने निकल पड़ा ?अगर पत्रकार एकजुट हो जाये और इस अफसर के खिलाफ आवाज उठाये मुकदद्मा दर्ज करवाएँ तो भविष्य में कोई भी अफसर इस तरह की घटिया भाषा का प्रयोग करने से पहले सौ बार सोचेगा।
3. बजट और वादे: कागज़ी आश्वासन बनाम वर्तमान की प्यास
सरकार और प्रशासन का दावा है कि वे चानौत गांव को पानी देने के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे इसे एक ‘वैकल्पिक व्यवस्था’ से देना चाहते हैं।
लोक निर्माण एवं जनस्वास्थ्य मंत्री रणबीर सिंह गंगवा के अनुसार, अमृत योजना का फंड केवल शहरी क्षेत्रों के लिए आरक्षित है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ‘जल जीवन मिशन’ के तहत काम होता है। नीतिगत मजबूरियों के कारण मुख्य लाइन से पानी नहीं दिया जा सकता।
उपायुक्त राहुल नरवाल ने बताया कि गांव की पेयजल व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ₹7.5 करोड़ की राशि स्वीकृत की जा चुकी है। राजली हेड या खरखड़ी ब्रांच से अलग पाइपलाइन बिछाने का काम और आरसीसी टैंक का निर्माण युद्धस्तर पर जारी है, जिसे अगले 3 महीने में पूरा कर हर घर तक पानी पहुंचा दिया जाएगा।
जनहित का रास्ता लाठी से नहीं, संवाद से निकलेगा
इस पूरे मामले को यदि निष्पक्षता के तराजू पर तौला जाए, तो इसमें कानून की लकीर और इंसानियत की जरूरत के बीच एक गहरी खाई नजर आती है।
नीतिगत पारदर्शिता का अभाव: अगर सरकार या प्रशासन ने शुरुआत में ही ग्रामीणों को यह स्पष्ट कर दिया होता कि ‘अमृत योजना’ के तहत तकनीकी या नीतिगत कारणों से मुख्य लाइन से पानी देना संभव नहीं है और उनके लिए ₹7.5 करोड़ की अलग योजना पाइप लाइन में है, तो शायद यह टकराव टल सकता था। बीच में आए ‘फर्जी’ या ‘गोपनीय’ मध्यस्थों ने अविश्वास की आग को और भड़काया।
आधी रात का बल प्रयोग कितना जायज?: किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में निहत्थे नागरिकों, महिलाओं और बुजुर्गों पर आधी रात को लाठियां भांजना या आंसू गैस छोड़ना अंतिम विकल्प नहीं होना चाहिए। कानून की रक्षा के नाम पर की गई ऐसी कार्रवाई प्रशासन के मानवीय चेहरे को संदिग्ध बनाती है।
राजनीतिकरण से बचे जनता: जहां एक तरफ मंत्री विपक्ष पर ग्रामीणों को भड़काने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं ग्रामीणों को भी समझना होगा कि पानी का मुद्दा किसी दलगत राजनीति का मोहरा नहीं बनना चाहिए।
समाधान का मार्ग:
समयबद्ध और पारदर्शी क्रियान्वयन: प्रशासन ने जो 3 महीने का समय मांगा है, उसकी साप्ताहिक प्रगति रिपोर्ट गांव की एक चुनिंदा नागरिक समिति के साथ साझा की जाए, ताकि अविश्वास खत्म हो।
अंतरिम पेयजल व्यवस्था: जब तक नई पाइपलाइन (3 महीने में) तैयार नहीं होती, तब तक प्रशासन चानौत गांव में टैंकरों या अन्य माध्यमों से बिना किसी बाधा के स्वच्छ पेयजल की मुफ्त और पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करे।
मुकदमों की समीक्षा: शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे ग्रामीणों पर दर्ज किए गए मुकदमों की निष्पक्ष समीक्षा हो, ताकि टकराव का माहौल पूरी तरह समाप्त हो सके।
कानून की सर्वोच्चता अपनी जगह है और सरकारी संपत्ति की सुरक्षा अनिवार्य है, लेकिन व्यवस्था को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि कानून इंसानों के लिए बनते हैं, इंसान कानून के लिए नहीं। चानौत के ग्रामीणों को शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में रहकर अपनी बात रखनी चाहिए, और प्रशासन को लाठी का रौब छोड़कर त्वरित समाधान की संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।


