1978 का वह खौफनाक रंगा-बिल्ला कांड: गीता-संजय चोपड़ा की शहादत, अपराध का क्रूरतम चेहरा और ‘राख’ वेब सीरीज के जरिए 48 साल बाद फिर जिंदा हुआ एक राष्ट्रीय जख्म
1978 का वह खौफनाक रंगा-बिल्ला कांड: एक विस्तृत संपादकीय विश्लेषण
चंडीगढ़ /22 जून 2026 / अटल हिन्द रिपोर्ट/राजकुमार अग्रवाल
भारतीय आपराधिक इतिहास के पन्नों को जब भी पलटा जाएगा, सन 1978 का वह काला दौर हमेशा देश की आत्मा को कचोटता रहेगा जब ‘रंगा’ और ‘बिल्ला’ नाम के दो दरिंदों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी थीं।
आज लगभग 48 साल बीत जाने के बाद, 12 जून को ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई अली फजल, सोनाली बेंद्रे, आमिर बशीर और राकेश बेदी स्टारिंग वेब सीरीज ‘राख’ ने उस दफन हो चुके खौफनाक ऐतिहासिक सच को एक बार फिर देश और दुनिया के जनमानस के सामने लाकर खड़ा कर दिया है।
कुल 8 एपिसोड की यह वेब सीरीज इन दिनों अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मीडिया में जबरदस्त चर्चा का विषय बनी हुई है क्योंकि यह सीरीज किसी काल्पनिक कहानी पर नहीं बल्कि 1978 के उस बदनाम रंगा-बिल्ला कांड से पूरी तरह प्रेरित है जिसने तत्कालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था की नींव हिला दी थी।
दो अत्यंत मासूम और होनहार भाई-बहनों, गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा की बेरहम किडनैपिंग, रूह कंपा देने वाले टॉर्चर, घिनौने रेप और दर्दनाक मर्डर ने उस समय देश में लॉ एंड ऑर्डर, चाइल्ड सेफ्टी, वीआईपी सुरक्षा और पुलिसिंग की पूरी व्यवस्था पर अत्यंत गंभीर और तीखे सवाल खड़े कर दिए थे।
लगभग आधी सदी के बाद, ‘राख’ सीरीज ने इस पुराने ठंडे पड़ चुके केस को फिर से लाइमलाइट में ला दिया है और पूरे देश के ड्राइंग रूम से लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक इस पर एक नई और बेहद संवेदनशील बहस छेड़ दी है।
यह सीरीज आज की नई पीढ़ी के सामने यह बड़ा सवाल उठाती है कि देश के सबसे बदनाम, क्रूर और जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले ये रंगा और बिल्ला असल में कौन थे, उनकी पृष्ठभूमि क्या थी, वे भारत में कहां रहते थे और किस तरह उनका खौफनाक अंत हुआ।
राख वेब सीरीज: क्या था 1978 का खौफनाक रंगा-बिल्ला कांड?

आपराधिक रिकॉर्ड के अनुसार, रंगा का असली नाम कुलजीत सिंह था और बिल्ला का असली नाम जसबीर सिंह था, और ये दोनों ही अपराधी मूल रूप से भारत के पंजाब प्रांत के रहने वाले थे।
शुरुआती दिनों में ये दोनों पंजाब के अपने छोटे-मोटे इलाकों से निकलकर दिल्ली और मुंबई जैसे देश के सबसे बड़े महानगरों की तरफ भागे थे ताकि कम समय में अपराध के जरिए बड़ी दौलत कमा सकें।
इन दोनों शातिर अपराधियों ने अपने करियर की शुरुआत दिल्ली और मुंबई की व्यस्त गलियों में जेब काटने, राहगीरों से छोटी-मोटी चोरियां करने, दुकानों में सेंधमारी करने और रात के अंधेरे में झपटमारी जैसी वारदातों को अंजाम देकर की थी।
समय बीतने के साथ-साथ इन दोनों अपराधियों की महत्वाकांक्षाएं और हौसले लगातार बढ़ते गए और वे इन छोटे-मोटे अपराधों की दुनिया से निकलकर लग्जरी कार चोरी करने, व्यापारियों से जबरन वसूली (एक्सटॉर्शन) करने और मोटी फिरौती के लिए रईस लोगों के बच्चों का अपहरण (किडनैपिंग) करने जैसे संगठित और गंभीर अपराधों के जाल में पूरी तरह लिप्त हो गए।
सन 1970 का वह दशक एक ऐसा दौर था जब देश में आज के आधुनिक युग की तरह अत्याधुनिक तकनीक, चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरे, मोबाइल फोन ट्रैकिंग, जीपीएस लोकेशन या फॉरेंसिक साइंस की आधुनिक सुविधाएं बिल्कुल भी मौजूद नहीं थीं।
तकनीक की इसी भारी कमी और तत्कालीन लचर पुलिस व्यवस्था का अनुचित फायदा उठाकर ये दोनों अपराधी बार-बार बड़ी से बड़ी वारदातों को अंजाम देने के बाद भी पुलिस की आंखों में धूल झोंककर एक राज्य से दूसरे राज्य फरार होने में कामयाब हो जाते थे।
अपनी इसी शातिर चालाकी, भागने की कला और तत्कालीन पुलिस प्रशासन की ढिलाई के कारण रंगा और बिल्ला के हौसले इस कदर बुलंद हो चुके थे कि वे खुद को भारत के कानून और व्यवस्था के शिकंजे से पूरी तरह ऊपर समझने की भारी भूल कर बैठे थे।
इसी अति-आत्मविश्वास और हैवानियत के नशे में चूर होकर उन्होंने सन 1978 की एक ऐसी मनहूस शाम को एक ऐसा खौफनाक जुर्म किया, जिसने न केवल दिल्ली बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की सामूहिक चेतना को हिलाकर रख दिया।
वह काली और ऐतिहासिक रूप से दर्दनाक तारीख थी 26 अगस्त 1978 की शाम, जब दिल्ली के अति-सुरक्षित माने जाने वाले धौला कुआं इलाके से दो मासूम और बेहद होनहार भाई-बहन अचानक गायब हो गए।
16 साल की गीता चोपड़ा और उसका छोटा भाई 14 साल का संजय चोपड़ा अपने घर से नई दिल्ली के संसद मार्ग (पार्लियामेंट स्ट्रीट) पर स्थित ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) के दफ्तर जाने के लिए बेहद उत्साह के साथ निकले थे।
गीता चोपड़ा ऑल इंडिया रेडियो के बेहद लोकप्रिय और प्रतिष्ठित ‘युववाणी’ कार्यक्रम में एक विशेष सत्र में हिस्सा लेने के लिए चुनी गई थीं और वह इस सुनहरे अवसर को लेकर बेहद खुश थीं।
चूंकि ये दोनों भाई-बहन भारतीय नौसेना के एक बेहद अनुशासित और सम्मानित अधिकारी कमांडर मदन मोहन चोपड़ा के बच्चे थे, इसलिए वे बचपन से ही समय के बेहद पाबंद थे और अनुशासित जीवन जीते थे।
रंगा-बिल्ला केस: 48 साल बाद फिर जिंदा हुआ गीता-संजय का दर्द
उस शाम दिल्ली का मौसम काफी अजीब था, हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और सड़कों पर सार्वजनिक परिवहन के साधनों की भारी कमी थी, जिसके कारण दोनों भाई-बहन सड़क किनारे खड़े होकर किसी सुरक्षित साधन का इंतजार कर रहे थे।
उसी समय उन्होंने सड़क पर एक सफेद रंग की फिएट कार को अपनी तरफ आते देखा, जिसे रंगा और बिल्ला चला रहे थे, और इन दोनों दरिंदों ने बच्चों की मजबूरी का फायदा उठाते हुए उन्हें बेहद शालीनता से लिफ्ट देने के बहाने अपनी गाड़ी में बिठा लिया।
सफेद फिएट कार में बैठते ही कुछ ही मिनटों के भीतर दोनों मासूम भाई-बहनों को इस बात का गहरा और डरावना अहसास हो गया कि वे किसी सामान्य गाड़ी में नहीं बल्कि एक बहुत बड़ी और जानलेवा मुसीबत के चंगुल में फंस चुके हैं और उनका अपहरण कर लिया गया है।
रंगा और बिल्ला का असली और प्राथमिक मकसद इन बच्चों का अपहरण करके इनके पिता, जो कि नेवी के बड़े अधिकारी थे, उनसे एक बहुत मोटी रकम फिरौती के रूप में वसूलना था।
लेकिन इन दोनों मूर्ख और क्रूर अपराधियों को इस बात का रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि वे देश के एक बेहद जांबाज, अनुशासित और देशभक्त सैन्य अधिकारी के बच्चों पर हाथ डाल चुके हैं जिनके खून में बहादुरी दौड़ती थी।
अपहरणकर्ताओं के इस बेहद खतरनाक चंगुल में फंसने के बावजूद, 14 साल के छोटे संजय चोपड़ा और 16 साल की गीता चोपड़ा ने डरकर रोने या अपराधियों के सामने घुटने टेकने के बजाय उनसे डटकर लोहा लेने का ऐतिहासिक फैसला किया।
चलती फिएट कार के भीतर ही इन दोनों बहादुर बच्चों ने रंगा और बिल्ला की पकड़ से खुद को छुड़ाने के लिए अपनी पूरी शारीरिक ताकत झोंक दी और उन दोनों खूंखार अपराधियों के साथ कार के भीतर ही एक जबरदस्त हाथापाई और खूनी संघर्ष शुरू कर दिया।
संजय चोपड़ा, जो अपनी स्कूल में बॉक्सिंग का बेहद शौकीन था और खेल में काफी सक्रिय था, उसने अपनी छोटी उम्र के बावजूद अदम्य साहस का परिचय देते हुए रंगा और बिल्ला के चेहरों पर ताबड़तोड़ घूंसे बरसाने शुरू कर दिए।
संजय कार के भीतर लगातार संघर्ष करते हुए गाड़ी का दरवाजा खोलने की पुरजोर कोशिश कर रहा था ताकि उसकी बड़ी बहन गीता किसी भी तरह सुरक्षित रूप से चलती कार से बाहर कूद सके और अपनी जान बचा सके।
दो छोटे बच्चों द्वारा किए गए इस बेहद अप्रत्याशित, आक्रामक और कड़े शारीरिक प्रतिरोध से रंगा और बिल्ला पूरी तरह बौखला गए और उनके भीतर यह गहरा डर बैठ गया कि अगर बच्चों ने चिल्लाकर शोर मचाया तो वे दिल्ली की व्यस्त सड़क पर रंगे हाथों पकड़े जाएंगे।
अपने पकड़े जाने के इसी डर, बौखलाहट और हिंसक गुस्से में आकर इन दोनों दरिंदों ने इंसानियत, मर्यादा और दया की सारी हदें पार करते हुए उन निहत्थे बच्चों पर धारदार हथियारों से जानलेवा हमला करना शुरू कर दिया।
वे बच्चों को लहूलुहान हालत में गाड़ी के भीतर दबाकर दिल्ली के कुख्यात रिज एरिया (एक बेहद सुनसान, घना और जंगली इलाका) की तरफ ले गए, जहां रात के घने अंधेरे और सन्नाटे का फायदा उठाकर उन्होंने अपनी आगे की खौफनाक और बर्बर साजिश को अंजाम दिया।
उस सुनसान जंगली इलाके में ले जाकर रंगा और बिल्ला ने सबसे पहले 14 साल के मासूम संजय चोपड़ा पर कई तीखे चाकू और भारी पत्थरों से ताबड़तोड़ वार किए ताकि उसे पूरी तरह बेबस और शांत किया जा सके।
वीर संजय चोपड़ा ने अपनी आखिरी सांस तक, अपने शरीर से बहते खून की परवाह न करते हुए, अपनी बहन की आबरू, सम्मान और जान बचाने के लिए उन दो खूंखार राक्षसों से जंग लड़ी, लेकिन अंततः कई गहरे घावों के कारण वह वीर गति को प्राप्त हो गया।
अपने छोटे भाई की इस दर्दनाक मौत को अपनी आंखों के सामने देखने वाली 16 साल की मासूम गीता चोपड़ा पर इसके बाद जो कयामत बीती, उसने आधुनिक भारत के इतिहास में क्रूरता और हैवानियत का एक ऐसा घिनौना पैमाना तय किया जिसे सोचकर आज भी रूह कांप जाती है।
रंगा और बिल्ला ने उस असहाय, डरी हुई और घायल लड़की गीता चोपड़ा के साथ सामूहिक बलात्कार (गैंगरेप) जैसी घिनौनी वारदात को अंजाम दिया और उसके बाद अत्यंत बर्बरतापूर्वक उसकी भी गर्दन काट कर हत्या कर दी ताकि कानून के सामने कोई गवाह जिंदा न बच सके।
इस रूह कपां देने वाली दोहरी हत्या को अंजाम देने के बाद, इन दोनों हत्यारों ने दोनों मासूम बच्चों के क्षत-विक्षत और खून से लथपथ शवों को दिल्ली के उसी रिज इलाके की घनी झाड़ियों में फेंक दिया और खुद बड़ी चालाकी से मौके से फरार हो गए।
वारदात के ठीक दो दिन बाद, यानी 28 अगस्त 1978 को जब एक स्थानीय गाय चराने वाले चरवाहे ने झाड़ियों में पड़े उन दोनों बच्चों के शवों को देखा और कांपते हाथों से दिल्ली पुलिस को सूचना दी, तो पूरे देश में हाहाकार मच गया।
घटनास्थल पर पहुंची पुलिस और डॉक्टरों की टीम ने जब दोनों बच्चों के शवों को बरामद किया और बाद में जो विस्तृत पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आई, उसने डॉक्टरों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के भी होश उड़ा दिए।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट से आधिकारिक तौर पर यह साफ हुआ कि दोनों बच्चों को मौत के घाट उतारने से पहले कितनी बुरी तरह पीटा गया था; संजय के पूरे शरीर पर चाकू के दर्जनों गहरे घाव थे और गीता की हड्डियों को बेरहमी से तोड़ा गया था।
जैसे ही यह वीभत्स खबर राष्ट्रीय मीडिया, अखबारों की सुर्खियों और रेडियो के जरिए देश की आम जनता के बीच पहुंची, पूरे भारतवर्ष में आक्रोश, गुस्से, आंसुओं और तीव्र शोक की एक ऐसी राष्ट्रव्यापी लहर दौड़ी जिसने तत्कालीन मोरारजी देसाई सरकार की राजनीतिक चूलें हिलाकर रख दीं।
देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर इतिहास में पहली बार हजारों-लाखों की संख्या में स्कूली छात्र, कॉलेज के युवा, महिलाएं और आम नागरिक कानून-व्यवस्था की इस घोर बदहाली को लेकर कड़े और हिंसक विरोध प्रदर्शनों पर उतर आए।
जनता का सामूहिक गुस्सा इस कदर अपने चरम पर था कि लोग संसद भवन के बाहर और पुलिस मुख्यालय का घेराव करके प्रशासन से तुरंत न्याय करने और रंगा-बिल्ला को बिना किसी अदालती देरी के सरेआम चौराहे पर फांसी देने की मांग कर रहे थे।
पूरे देश में मचे इस भारी बवाल और मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को खुद प्रोटोकॉल तोड़कर पीड़ित नौसेना अधिकारी कमांडर मदन मोहन चोपड़ा के घर जाकर अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करनी पड़ी।
प्रधानमंत्री ने रोते हुए परिवार और पूरे देश को यह कड़ा भरोसा दिलाया कि सरकार इस मामले को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखेगी और इन वहशी दरिंदों को दुनिया के किसी भी कोने से ढूंढकर सख्त से सख्त सजा दिलवाएगी।
इस ऐतिहासिक केस ने भारत में वीआईपी और राजनेताओं की सुरक्षा बनाम देश के एक आम नागरिक, विशेष रूप से महिलाओं और मासूम बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक बहुत बड़ी और गंभीर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया था।
इस भयावह दोहरे हत्याकांड को अंजाम देने के बाद, रंगा और बिल्ला दिल्ली पुलिस की धरपकड़ से बचने के लिए तुरंत राजधानी छोड़कर भाग निकले; वे पहले देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पहुंचे और वहां कुछ दिन अंडरग्राउंड रहने के बाद उत्तर प्रदेश के आगरा शहर की तरफ निकल गए।
उनकी तलाश में पूरे देश की पुलिस, खुफिया एजेंसियों और रेलवे सुरक्षा बल को हाई अलर्ट पर रखा गया था और इन दोनों अपराधियों के हूबहू स्कैच (चेहरे के चित्र) देश के हर छोटे-बड़े रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और सार्वजनिक दीवारों पर चिपका दिए गए थे।
सितंबर 1978 के शुरुआती हफ्ते में, जब वे आगरा से वापस दिल्ली लौटने की फिराक में थे, तब उनकी किस्मत ने उनका साथ छोड़ दिया और वे अनजाने में कालका मेल एक्सप्रेस ट्रेन के एक ऐसे डिब्बे में जबरन सवार हो गए जो भारतीय सेना (इंडियन आर्मी) के जवानों के लिए पूरी तरह आरक्षित था।
ट्रेन के उस रिजर्व डिब्बे के भीतर मौजूद देश के सजग, मुस्तैद और देशभक्त सैन्य जवानों को इन दोनों संदिग्ध सहयात्रियों की अजीब हरकतों, आपस में फुसफुसाहट और उनके चेहरों के डरे हुए हाव-भाव को देखकर गहरा संदेह हुआ।
जब आर्मी के जवानों ने कड़क आवाज में उनसे उनका मिलिट्री पास या कोई अन्य प्रामाणिक पहचान पत्र (आईडी कार्ड) दिखाने को कहा, तो रंगा और बिल्ला बुरी तरह हड़बड़ा गए, कांपने लगे और अगले स्टेशन पर उतरकर भागने का बहाना ढूंढने लगे।
सैनिकों ने बिना एक पल गंवाए मुस्तैदी दिखाते हुए उन दोनों को ट्रेन के भीतर ही मजबूती से दबोच लिया, और जैसे ही कालका मेल नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर आकर रुकी, सैनिकों ने उन्हें स्टेशन पर तैनात दिल्ली पुलिस की स्पेशल टीम के हवाले कर दिया।
यह गिरफ्तारी भारतीय आपराधिक इतिहास के सबसे बड़े और सबसे तेज ‘मैनहंट’ का एक बेहद सफल और फिल्मी अंत थी, जिसमें भारतीय सेना की सजगता ने एक बड़ी भूमिका निभाई थी।
गिरफ्तारी के बाद रंगा और बिल्ला पर दिल्ली की एक विशेष अदालत में बेहद तेजी से मुकदमा (फास्ट ट्रैक ट्रायल) चलाया गया ताकि देश के सुलगते हुए गुस्से को शांत किया जा सके और एक नजीर पेश की जा सके।
इस केस की जांच में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के जांबाज जांच अधिकारी वीपी गुप्ता और उनकी टीम ने दिन-रात एक करके अकाट्य वैज्ञानिक साक्ष्य, फॉरेंसिक सबूत और गवाहों के बयान अदालत के सामने पेश किए।
फॉरेंसिक जांच में यह साबित हुआ कि रंगा और बिल्ला की कार के टायरों की मिट्टी और उस फिएट कार के भीतर मिले खून के धब्बे पूरी तरह से रिज इलाके की मिट्टी और मृत बच्चों के कपड़ों के ब्लड ग्रुप से हूबहू मैच करते थे।
इसके साथ ही भगवान दास नाम के एक बेहद जागरूक नागरिक ने अदालत में गवाही दी, जिसने उस मनहूस शाम को बच्चों को उस सफेद फिएट कार में बैठते देखा था और सूझबूझ दिखाते हुए कार का नंबर अपनी डायरी में नोट कर लिया था।
इन तमाम पुख्ता और अकाट्य सबूतों, विस्तृत अदालती बहसों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर माननीय अदालत ने दोनों को इस जघन्यतम अपराध का मुख्य दोषी पाया और निचली अदालत ने उन्हें बिना किसी सहानुभूति के मौत की सजा (फांसी) सुना दी।
इस सख्त फैसले के खिलाफ रंगा और बिल्ला ने पहले दिल्ली हाई कोर्ट और फिर देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट में अपनी सजा को कम करने की अपील दायर की, लेकिन उनकी अमानवीय क्रूरता को देखते हुए देश की ऊपरी अदालतों ने भी उनकी फांसी की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा।
जब न्याय के सारे रास्ते बंद हो गए, तब रंगा और बिल्ला ने भारत के राष्ट्रपति के पास अपनी आखिरी उम्मीद के रूप में दया याचिका (मर्सी पेटिशन) भेजी, जिसे राष्ट्रपति ने जनभावनाओं और न्याय की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए तुरंत खारिज कर दिया।
राष्ट्रपति से दया याचिका खारिज होने के बाद, दोनों अपराधियों का डेथ वारंट जारी कर दिया गया और 31 जनवरी 1982 की वह ठंडी सुबह तय की गई जब इन दोनों राक्षसों का अंत होना था।
31 जनवरी 1982 की तड़के सुबह दिल्ली की तिहाड़ जेल में इन दोनों खूंखार अपराधियों को फांसी के फंदे पर लटकाने की सभी प्रशासनिक और कानूनी औपचारिकताएं जेल मैनुअल के अनुसार पूरी की गईं।
तिहाड़ जेल के तत्कालीन आधिकारिक दस्तावेजों और वहां मौजूद चश्मदीद जेल प्रहरियों के अनुसार, फांसी के तख्ते पर ले जाते समय रंगा का व्यवहार बिल्कुल शांत, सुन्न और सुस्त था, मानो वह अपनी मौत को स्वीकार कर चुका हो।
इसके विपरीत, अपनी पूरी जिंदगी दूसरों पर बेरहमी से जुल्म ढाने वाला और खुद को बड़ा डॉन समझने वाला बिल्ला मौत को अपने इतने करीब देखकर डर के मारे थर-थर कांप रहा था, बच्चों की तरह फूट-फूट कर रो रहा था और अपनी जान की भीख मांग रहा था।
सुबह के ठीक तय वक्त पर जैसे ही जेलर ने इशारा किया और जल्लाद ने फांसी का लीवर खींचा, रंगा और बिल्ला नाम के उन दो दरिंदों का खौफनाक और घिनौना अध्याय हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो गया और देश के दो मासूम बच्चों गीता और संजय चोपड़ा की पवित्र आत्माओं को आखिरकार पूर्ण न्याय मिला।
यह न्याय केवल एक परिवार की जीत नहीं थी, बल्कि पूरे देश की न्याय प्रणाली की जीत थी, जिसने यह साबित किया कि कानून के हाथ कितने भी लंबे क्यों न हों, वे अपराधियों की गर्दन तक जरूर पहुंचते हैं।
इस ऐतिहासिक और रूह कंपा देने वाले केस का भारतीय समाज और सरकार पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि इन दोनों बच्चों की बहादुरी और शहादत को देश के इतिहास में अमर बनाने के लिए भारत सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया।
भारत सरकार ने प्रतिवर्ष दिए जाने वाले राष्ट्रीय वीरता पुरस्कारों (National Bravery Awards) के तहत विशेष रूप से ‘गीता चोपड़ा पुरस्कार’ और ‘संजय चोपड़ा पुरस्कार’ की स्थापना की।
यह सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार आज भी हर साल गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर देश के उन चुनिंदा और जांबाज बच्चों को प्रदान किया जाता है जो अपनी जान की परवाह न करते हुए दूसरों की जान बचाते हैं या अपराधियों के खिलाफ अदम्य साहस का प्रदर्शन करते हैं।
आज करीब 48 साल बीत जाने के बाद, जब ओटीटी प्लेटफॉर्म पर ‘राख’ जैसी बेहतरीन और यथार्थवादी सीरीज दर्शकों के सामने आई है, तो वह केवल एक पुराने, धूल खा रहे आपराधिक मामले की कहानी को नहीं दोहराती।
बल्कि यह सीरीज वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर आज के आधुनिक समाज को यह कड़ा और कड़वा संदेश देती है कि अपराध की उम्र चाहे जितनी भी लंबी दिखे, उसका अंत हमेशा कानून के हाथों बेहद दर्दनाक, शर्मनाक और निश्चित ही होता है।
इस विस्तृत संपादकीय विश्लेषण का मूल और अंतिम संदेश यही है कि एक स्वस्थ, सुरक्षित और सभ्य समाज के निर्माण के लिए कानून का खौफ और न्याय की गति का तेज होना बेहद अनिवार्य है।
हजारों शब्दों में सिमटी यह पूरी दास्तान हमें आज के डिजिटल युग में भी यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपने बच्चों को एक पूरी तरह सुरक्षित माहौल दे पा रहे हैं, और यह केस हमेशा-हमेशा के लिए पूरे देश के लिए एक आत्ममंथन और बड़ी चेतावनी के रूप में जिंदा रहेगा।


