चानौत में आधी रात कार्रवाई पर उठे सवाल, क्या ग्रामीणों की आवाज दबाने उतरी थी सत्ता?
हांसी। भाखड़ा पाइपलाइन से पीने के पानी की मांग कर रहे चानौत गांव के ग्रामीणों पर आधी रात हुई प्रशासनिक कार्रवाई ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस गांव के लोग पिछले कई सप्ताह से पानी की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे थे, वहां रात के अंधेरे में भारी पुलिस बल, आंसू गैस और लाठीचार्ज की तस्वीरों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या ग्रामीणों की मांग का जवाब संवाद से नहीं बल्कि डंडे से दिया जाएगा?
हांसी /24 जून 2026 /अटल हिन्द /राजकुमार अग्रवाल
क्या लोकतंत्र में जनहित की मांग को ‘अवैध’ बताकर लाठियों के जोर पर दबाया जा सकता है? चानौत गांव में भाखड़ा जल आपूर्ति पाइपलाइन से पानी की मांग कर रहे ग्रामीणों पर आधी रात को हुई प्रशासनिक कार्रवाई और लाठीचार्ज ने स्थानीय स्वशासन और पुलिसिया बर्बरता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विकास या दमन?
ग्रामीण पिछले कई हफ्तों से अपनी जमीन से गुजर रही पाइपलाइन से पेयजल की मांग कर रहे थे। प्रशासन का कहना है कि यह ‘अमृत’ योजना की पाइपलाइन है और इसमें ग्रामीणों द्वारा लगाया गया ‘टी-कनेक्शन’ अवैध है। सवाल यह है कि यदि मांग जायज थी, तो क्या प्रशासन के पास ग्रामीणों को विश्वास में लेकर कोई ‘कानूनी विकल्प’ देने का समय नहीं था? रात के अंधेरे में जेसीबी और लाठियों का इस्तेमाल किस विकास के मॉडल को दर्शाता है?
संविधान बनाम अफसरशाही
भारतीय संविधान का 73वां संशोधन पंचायतों को ‘स्वशासन की इकाई’ का दर्जा देता है। ग्राम सभा गांव की सर्वोच्च सत्ता है। लेकिन क्या चानौत का मामला यह साबित नहीं करता कि हमारी पंचायतें आज भी फाइलों और प्रशासनिक आदेशों की मोहताज हैं? पुलिस की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न हैं—क्या पुलिस ‘कानून’ का पालन कर रही थी या किसी नेता के इशारों का? सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं कि बल प्रयोग केवल ‘अंतिम विकल्प’ होना चाहिए, न कि पहला।
अटल हिन्द की कलम से:
प्रशासन से सवाल: यदि ग्रामीणों की मांग अवैध थी, तो क्या उन्हें वैकल्पिक जल आपूर्ति का कोई ठोस समाधान पहले नहीं दिया जा सकता था? आधी रात को लाठीचार्ज की इतनी हड़बड़ी क्यों थी?
पंचायत से सवाल: क्या पंचायतें अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग कर राज्य सरकार से ग्रामीणों के लिए पेयजल की उचित व्यवस्था नहीं करवा सकतीं?
पुलिस से सवाल: क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग करना ‘कानून-व्यवस्था’ थी या शक्ति का प्रदर्शन?
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अधिकारों का आईना:
कानूनन, सरकारी संपत्ति में अनाधिकृत छेड़छाड़ दंडनीय है, लेकिन यह भी सत्य है कि संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन के अधिकार (जिसमें पेयजल शामिल है) की गारंटी देता है। लाठी से कानून का पालन तो कराया जा सकता है, पर जन-विश्वास नहीं जीता जा सकता।
जनहित में अपील:
अटल हिन्द शासन और प्रशासन से मांग करता है कि चानौत विवाद को ‘अवैधता’ के चश्मे से न देखकर ‘जनता की प्यास’ के नजरिए से देखा जाए। दमन से समाधान नहीं, केवल आक्रोश पैदा होता है। वक्त है कि प्रशासन अहंकार छोड़कर बातचीत की मेज पर आए और ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने का ठोस रास्ता निकाले।
लोकतंत्र लाठियों के दम पर नहीं, संवाद और जनभागीदारी से चलता है।


