कलायत उपमंडल कार्यालय में कर्मचारियों के प्रभाव का आरोप, जनता ने पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठाए सवाल
कलायत में साहब के कमरे से पहले किसकी चौखट पर रुकती है जनता ?
कलायत उपमंडल कार्यालय में कौन चला रहा है असली हुकूमत
अधिकारी मौजूद फिर भी व्यवस्था पर किसका कब्जा ?
कलायत हल्का मांग रहा जवाब ?
कलायत /24 जून 2026 /अटल हिन्द /तरसेम सिंह
कलायत उपमंडल कार्यालय में आमजन और कर्मचारियों के बीच लंबे समय से चल रही चर्चाएं अब गंभीर प्रशासनिक प्रश्न का रूप ले चुकी हैं। आरोप यह है कि कार्यालय में कुछ कर्मचारी अपने पद पहुंच और लंबे समय से बने प्रभाव का उपयोग कर आम नागरिकों की सुनवाई फाइलों की गति और अधिकारी तक पहुंच को प्रभावित कर रहे हैं।
यह केवल किसी एक कर्मचारी के आचरण का मामला नहीं है बल्कि संपूर्ण कार्यालयी नियंत्रण, निगरानी और जवाबदेही की विफलता का प्रश्न है।
किसी भी सरकारी कार्यालय में अंतिम प्रशासनिक जिम्मेदारी अधिकारी की होती है। यह नहीं माना जा सकता कि कार्यालय में रोजाना क्या हो रहा है। कौन जनता को रोक रहा है।
कौन किस फाइल को प्रभावित कर रहा है। कौन किस कर्मचारी या शिकायतकर्ता के बारे में क्या छवि बना रहा है । इसकी जानकारी जिम्मेदार अधिकारी को बिल्कुल न हो। यदि जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं ! यदि जानकारी नहीं है तो यह भी गंभीर प्रशासनिक चूक है।
जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि उपमंडल कार्यालय में शिकायतकर्ता को अधिकारी तक पहुंचने से पहले किन अनौपचारिक दरवाजों से गुजरना पड़ता है? क्या कोई कर्मचारी यह तय करेगा कि कौन अपनी पीड़ा रखेगा और कौन नहीं?
क्या लोकतांत्रिक शासन में आम नागरिक की सुनवाई किसी कर्मचारी की निजी इच्छा, प्रभाव या मानदंड पर निर्भर हो सकती है?
कार्यालय में कार्यरत पक्के और कच्चे कर्मचारियों में भी यह चर्चा है कि कुछ लोग स्वयं को प्रभावशाली बताकर अलग व्यवस्था चलाने का प्रयास कर रहे हैं।
जो कर्मचारी उनके अनुकूल नहीं चलते उनके बारे में अधिकारी के समक्ष नकारात्मक माहौल बनाया जाता है। यदि ऐसा है तो यह ईमानदार कर्मचारियों के मनोबल को तोड़ने वाला और कार्यालयी अनुशासन को कमजोर करने वाला आचरण है।
यह भी स्पष्ट है कि किसी अधिकारी को केवल व्यक्तिगत ईमानदारी का दावा पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे सकता। प्रशासन में ईमानदारी का अर्थ केवल स्वयं भ्रष्ट न होना नहीं हैं।
अपितु अपने अधीनस्थ तंत्र को भी अनुशासित, पारदर्शी और जवाबदेह रखना है। यदि अधीनस्थ कर्मचारी जनता को परेशान कर रहे हैं। कार्यालय में अनावश्यक प्रभाव चला रहे हैं या शिकायतों की निष्पक्ष सुनवाई में बाधा बन रहे हैं तो उनकी जिम्मेदारी तय करने के साथ साथ निगरानी करने वाले अधिकारी की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
कलायत उपमंडल कार्यालय जनता की सेवा का केंद्र है। किसी कर्मचारी विशेष की निजी पकड़ जुगाड़बाजी या अनौपचारिक सत्ता का अड्डा नहीं हैं। वर्षों से एक ही जगह टिके कर्मचारियों की भूमिका उनकी कार्यशैली आमजन से व्यवहार फाइलों के निस्तारण और अधिकारी तक जनता की पहुंच की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है।
अब प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि कार्यालय में वास्तविक नियंत्रण किसके हाथ में है। यदि अधिकारी के नाम पर कोई कर्मचारी प्रभाव चला रहा है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो। यदि अधिकारी सब जानते हुए भी मौन हैं तो यह मौन भी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकता।
जनता का सीधा सवाल
क्या शिकायतकर्ता को अपनी पीड़ा रखने के लिए किसी कर्मचारी की स्वीकृति चाहिए?
क्या कार्यालय में वर्षों से जमे लोग व्यवस्था से ऊपर हो गए हैं?
क्या अधिकारी अपने ही कार्यालय की गतिविधियों से अनभिज्ञ रह सकते हैं?
और यदि नहीं तो फिर कार्रवाई में देरी क्यों?
सरकार, जिला प्रशासन और संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों को इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच करवानी चाहिए। दोषी चाहे स्थायी कर्मचारी हो, कच्चा कर्मचारी हो या निगरानी में चूक करने वाला कोई जिम्मेदार अधिकारी किसी को भी जवाबदेही से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।
लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है। सरकारी कार्यालय जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए होते हैं न कि उसे दरवाजों और प्रभावशाली चेहरों के बीच उलझाने के लिए। कलायत उपमंडल कार्यालय में यदि व्यवस्था बिगड़ी है तो उसे सुधारना प्रशासन का कर्तव्य है।
समय आ गया है कि जिम्मेदारी तय हो जवाब मांगा जाए और जनता को यह भरोसा दिलाया जाए कि शासन किसी व्यक्ति विशेष के प्रभाव से नहीं कानून और पारदर्शिता से चलता है।


