राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS): विचार, इतिहास, कार्यप्रणाली और समकालीन विवादों का विस्तृत विश्लेषण
भारत सरकार की प्रतिबंधित संगठनों की सूची (जैसे सिमी, पीएफआई या लश्कर-ए-तैयबा) में आरएसएस का नाम शामिल नहीं है।
लेखक: राजकुमार अग्रवाल (वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं राजनीतिक विचारक)
समकालीन भारतीय राजनीति और पारदर्शिता का प्रश्न
आधुनिक भारत के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) एक ऐसा नाम है जो वैचारिक विमर्श के केंद्र में रहता है। एक ओर इसे विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन माना जाता है, जो भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद और सामाजिक सेवा के कार्यों में संलग्न है। दूसरी ओर, आलोचकों और विपक्षी दलों द्वारा इसे एक ऐसे अपंजीकृत संगठन के रूप में देखा जाता है जिसका देश की सत्ता और नीति-निर्माण पर गहरा प्रभाव है।
हाल के वर्षों में, विशेषकर २०१४ के बाद से, भारतीय राजनीति में एक बड़ा ध्रुवीकरण देखने को मिला है। आलोचकों का आरोप है कि सरकार विरोध की आवाजों को दबाने, अल्पसंख्यक संस्थानों को निशाना बनाने और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को प्रभावित करने के पीछे संघ की वैचारिक प्रेरणा काम कर रही है। इसी पृष्ठभूमि में, कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे सहित कई नेताओं द्वारा संघ की फंडिंग, संपत्तियों, आय-व्यय और कर अनुपालन की जानकारी को सार्वजनिक करने की मांग उठाई गई है।
यह लेख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास, उसकी कार्यप्रणाली, उसके पास मौजूद कथित हथियारों और सुरक्षा के औचित्य, उसकी कानूनी स्थिति, तथा वित्तीय पारदर्शिता से जुड़े गंभीर सवालों का एक निष्पक्ष और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का इतिहास और वैचारिक पृष्ठभूमि
आरएसएस की स्थापना २७ सितंबर १९२५ को विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार द्वारा नागपुर में की गई थी। उस समय भारत ब्रिटिश दासता से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रहा था। डॉ. हेडगेवार का मानना था कि भारत की गुलामी का मुख्य कारण हिंदुओं का बिखराव और संगठित न होना था। उन्होंने चरित्र निर्माण, अनुशासन और हिंदू समाज को एकजुट करने के उद्देश्य से इस संगठन की नींव रखी।
संघ के प्रमुख चरण और प्रतिबंध:
प्रारंभिक दौर: शुरुआत में संघ ने युवाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए ‘शाखा’ पद्धति की शुरुआत की।
प्रथम प्रतिबंध (१९४८): महात्मा गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि, बाद में संघ द्वारा अपना लिखित संविधान अपनाने और खुद को विशुद्ध रूप से सांस्कृतिक संगठन घोषित करने के बाद यह प्रतिबंध हटा लिया गया।
द्वितीय प्रतिबंध (१९७५): इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल (Emergency) के दौरान संघ पर दोबारा प्रतिबंध लगा। संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत होकर लोकतंत्र की बहाली के लिए आंदोलन किया।
तृतीय प्रतिबंध (१९९२): बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद संघ पर तीसरी बार प्रतिबंध लगाया गया, जिसे बाद में अदालत ने हटा दिया।

इसके जवाब में मोहन भागवत ने सरकार के रुख को राजनीति से प्रेरित बताते हुए कहा कि RSS को रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं है और पिछले 100 वर्षों में किसी भी सरकार ने इस तरह की मांग नहीं की है.
आरएसएस की कानूनी स्थिति: पंजीकरण और संरचना
एक बड़ा सवाल अक्सर यह उठता है कि क्या आरएसएस एक पंजीकृत संस्था है? तकनीकी और कानूनी रूप से, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम से केंद्रीय स्तर पर कोई एक पंजीकृत सोसायटी या ट्रस्ट नहीं है।
संगठनात्मक ढांचा और कानूनी स्वरूप:
स्वैच्छिक संगठन: संघ स्वयं को एक अनौपचारिक, स्वैच्छिक और सांस्कृतिक संगठन मानता है। संघ का तर्क है कि इसके सदस्य (स्वयंसेवक) स्वेच्छा से आते हैं, इसलिए इसके केंद्रीय पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है।
संबद्ध संस्थाओं का पंजीकरण: यद्यपि मुख्य संगठन ‘आरएसएस’ के नाम पर कोई केंद्रीय पंजीकरण नहीं है, लेकिन संघ से जुड़े सैकड़ों संगठन, ट्रस्ट, स्कूल (जैसे विद्या भारती) और सेवा समितियां देश के विभिन्न राज्यों के कानूनों (जैसे चैरिटी कमिश्नर या सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट) के तहत पूरी तरह पंजीकृत हैं।

सरसंघचालक को सरकारी सुरक्षा क्यों?
आलोचक अक्सर प्रश्न उठाते हैं कि एक गैर-सरकारी और अपंजीकृत संगठन के प्रमुख (सरसंघचालक) को ‘जस्टिस’ या ‘प्लस’ श्रेणी की कड़ी सुरक्षा (जैसे वर्तमान में मोहन भागवत को वीवीआईपी सुरक्षा प्राप्त है) जनता के पैसे पर क्यों दी जाती है?
सरकारी पक्ष: गृह मंत्रालय के नियमों के अनुसार, सुरक्षा किसी व्यक्ति के पद को देखकर नहीं, बल्कि उसकी ‘खतरे की आशंका’ (Threat Perception) और खुफिया एजेंसियों (IB) की रिपोर्ट के आधार पर दी जाती है। चूंकि संघ प्रमुख का पद अत्यधिक संवेदनशील है और वे विभिन्न आतंकवादी संगठनों के निशाने पर रहे हैं, इसलिए उन्हें सुरक्षा प्रदान की गई है।
शस्त्र पूजन, हथियार और उग्रवाद के आरोप
विजयदशमी के अवसर पर आरएसएस की शाखाओं में ‘शस्त्र पूजन’ की परंपरा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर अक्सर लाठियों (दंड), तलवारों और कभी-कभी बंदूकों के साथ स्वयंसेवकों की तस्वीरें सामने आती हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या यह एक सैन्यीकृत संगठन है?
हथियारों की वास्तविकता और उनका पंजीकरण:
परंपरागत शस्त्र: संघ की दैनिक शाखाओं में आत्मरक्षा और शारीरिक अनुशासन के लिए ‘दंड’ (लकड़ी की लाठी) का उपयोग किया जाता है। कानूनन लाठी रखना या उसका अभ्यास करना हथियार की श्रेणी में नहीं आता।
शस्त्र पूजन की परंपरा: विजयादशमी पर हिंदू परंपरा के अनुसार हथियारों की पूजा की जाती है। इस दौरान प्रदर्शित किए जाने वाले आग्नेयास्त्र (जैसे बंदूकें या पिस्तौल) आमतौर पर व्यक्तिगत स्वयंसेवकों के होते हैं, जिनके पास लाइसेंस होता है, या वे प्रतीकात्मक होते हैं।
कानूनी स्थिति: भारतीय सेना या पुलिस की तरह संघ के पास कोई अपनी आधिकारिक ‘आर्मरी’ (हथियारों का जखीरा) नहीं है। देश के कानून के दायरे से बाहर किसी भी प्रकार के अवैध हथियार रखने की अनुमति किसी संगठन को नहीं है।
क्या सरकार इसे आतंकी संगठन मानती है?
भारत सरकार की प्रतिबंधित संगठनों की सूची (जैसे सिमी, पीएफआई या लश्कर-ए-तैयबा) में आरएसएस का नाम शामिल नहीं है। अदालत ने भी संघ को एक नागरिक संगठन माना है। हालांकि, आलोचक इसके अनुषंगी संगठनों (जैसे बजरंग दल या विश्व हिंदू परिषद) पर उग्र प्रदर्शनों और भीड़ हिंसा (Mob Lynching) में शामिल होने का आरोप लगाते रहे हैं।
फंडिंग, संपत्ति और वित्तीय पारदर्शिता का विवाद
लोकतंत्र में पारदर्शिता किसी भी प्रभावशाली संस्था की विश्वसनीयता की रीढ़ होती है। चूंकि आरएसएस का भारतीय जनता पार्टी (BJP) और सरकार की नीतियों पर गहरा वैचारिक प्रभाव है, इसलिए इसकी फंडिंग को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
संघ का पक्ष: ‘गुरु दक्षिणा’
संघ का दावा है कि वह सरकार से कोई वित्तीय सहायता या विदेशी अनुदान (FCRA) नहीं लेता। संघ का पूरा खर्च ‘गुरु दक्षिणा’ उत्सव के माध्यम से चलता है। वर्ष में एक बार स्वयंसेवक ‘भगवा ध्वज’ को गुरु मानकर उसके सामने एक लिफाफे में अपनी सामर्थ्य अनुसार गुप्त दान देते हैं।
विवाद और चयनात्मक पारदर्शिता की बहस:
कर्नाटक के गृह मंत्री द्वारा संघ की संपत्तियों की जांच की मांग के दो पहलू हैं:
| दृष्टिकोण | मुख्य बिंदु / तर्क |
| पारदर्शिता के पक्ष में (विपक्ष का तर्क) |
* जब राजनीतिक दलों, एनजीओ और कॉरपोरेट्स से वित्तीय विवरण मांगे जाते हैं, तो नीति-निर्माण को प्रभावित करने वाले इतने बड़े संगठन को छूट क्यों?
* संघ से जुड़े विभिन्न ट्रस्टों के पास विशाल भूखंड और संपत्तियां हैं, जिनका ऑडिट सार्वजनिक होना चाहिए।
* वित्तीय पारदर्शिता से जनता का विश्वास मजबूत होगा। |
| संघ और समर्थकों का तर्क |
* संघ से जुड़े सभी कानूनी ट्रस्ट और सेवा संस्थान आयकर विभाग (Income Tax) को अपनी रिटर्न जमा करते हैं।
* विपक्ष द्वारा केवल एक विशेष वैचारिक संगठन को निशाना बनाना राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रेरित है।
* देश के अन्य धार्मिक और सामाजिक बोर्डों (जैसे वक्फ बोर्ड, चर्च संस्थाएं) की संपत्तियों पर भी समान नियम लागू होने चाहिए। |
समकालीन राजनीतिक परिदृश्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रभाव
२०१४ के बाद देश में यह विमर्श गहराया है कि सत्ता विरोधी आवाजों को दबाया जा रहा है। जंतर-मंतर पर होने वाले आंदोलनों (जैसे किसानों का आंदोलन या पहलवानों का प्रदर्शन) को लेकर गोदी मीडिया और सत्ता पक्ष द्वारा ‘देशद्रोही’ या ‘विदेशी फंडिंग से संचालित’ होने के ठप्पे लगाए जाने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
अदालतों और जांच एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोपों ने भी जन्म लिया है। इस माहौल में, आरएसएस की भूमिका को लेकर जनता का एक वर्ग आशंकित रहता है कि संगठन ‘एक राष्ट्र, एक संस्कृति’ के नाम पर भारत की बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक पहचान को बदलने का प्रयास कर रहा है।
लोकतांत्रिक सुशासन की कसौटी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को न तो पूरी तरह से खारिज किया जा सकता है और न ही उसकी आलोचनाओं को केवल राजनीतिक विरोध कहकर टाला जा सकता है। एक सामाजिक संगठन के रूप में आपदाओं (जैसे भूकंप, बाढ़ या कोरोना महामारी) के समय संघ के स्वयंसेवकों का सेवा कार्य प्रशंसनीय रहा है। परंतु, जब कोई संगठन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देश की राजनीतिक सत्ता का मार्गदर्शक बन जाता है, तो उसकी जवाबदेही भी बढ़ जाती है।
पारदर्शिता की मांग केवल चयनात्मक (Selective) नहीं होनी चाहिए। लोकतांत्रिक सुशासन (Good Governance) का यह तकाजा है कि:
चाहे वह आरएसएस हो, वामपंथी संगठन हों, या अल्पसंख्यक धार्मिक संस्थाएं हों—सभी के लिए वित्तीय पारदर्शिता के समान और सार्वभौमिक मानक होने चाहिए।
कानून के शासन में किसी भी संगठन को कानून से ऊपर होने का विशेषाधिकार नहीं मिल सकता।
आरएसएस यदि अपनी वित्तीय प्रणाली और संपत्तियों के विवरण को अधिक पारदर्शी और सार्वजनिक बनाता है, तो इससे न केवल लोकतंत्र मजबूत होगा, बल्कि स्वयं संगठन की विश्वसनीयता पर उठने वाले राजनीतिक सवाल भी हमेशा के लिए शांत हो जाएंगे।


