दंगाई कपिल मिश्रा केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बना
नई दिल्ली/28 फरवरी/अटल हिन्द/राजकुमार अग्रवाल
साल 2020…
राजधानी दिल्ली…
और अचानक भड़क उठी वो हिंसा, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया।
उत्तर-पूर्वी दिल्ली की गलियों में आग, पत्थरबाज़ी और गोलियों की आवाज़ें गूंजने लगीं।
नागरिकता संशोधन कानून के विरोध और समर्थन के बीच शुरू हुआ टकराव, देखते ही देखते सांप्रदायिक दंगों में बदल गया।
इस घटना को इतिहास में 2020 Delhi riots के नाम से दर्ज किया गया।
छह साल बीत चुके हैं…
लेकिन सवाल आज भी खड़े हैं।
कितनों को न्याय मिला?
कितने मामले अभी भी अदालतों में लंबित हैं?
और क्या राजनीति ने सच को ढक दिया?
दंगों में कई लोगों की जान गई, सैकड़ों घायल हुए और करोड़ों की संपत्ति जलकर राख हो गई।
जांच एजेंसियों ने चार्जशीट दाखिल की, कई गिरफ्तारियाँ हुईं, कुछ आरोपियों को जमानत मिली, तो कुछ मामलों में अब भी सुनवाई जारी है।
इन छह वर्षों में अदालतों ने कई अहम टिप्पणियाँ कीं…
लेकिन पीड़ित परिवार आज भी न्याय की प्रतीक्षा में हैं।
क्या दिल्ली हिंसा सिर्फ एक बीता हुआ अध्याय है?
या उसके जख्म आज भी समाज और राजनीति में दिखाई देते हैं?
ATAL HIND की यह विशेष रिपोर्ट —
दिल्ली हिंसा के छह साल का पूरा लेखा-जोखा आपके सामने रखती है।
2020 में दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों की छठी बरसी पर मैं दुख और आक्रोश के साथ लिख रहा हूं कि सरकार ने हिंसा के शिकार लोगों की किन-किन तरीकों से मदद नहीं की.
23 फरवरी, 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली जिले में अचानक भड़की सांप्रदायिक हिंसा की आग से लगा, जहां अधिकतर मजदूर वर्ग के लोग रहते हैं.
छह साल बाद भी आतंक फैलाने वाले दंगाई कपिल मिश्रा के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई है. एफआईआर दर्ज करने का ‘सही समय’ अब तक नहीं तक नहीं आया है. दिल्ली उच्च न्यायालय में मिश्रा के ख़िलाफ़ एफ़आईआर की मांग वाली मेरी पिटीशन पर सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने ‘सही समय’ का उल्लेख किया था.
इसके उलट दिल्ली पुलिस ने आतंकवादी विरोधी कानून यूएपीए के तहत केस दर्ज किया, जिसमें 18 एक्टिविस्ट और छात्र नेता पर साजिश रचने का आरोप लगाया गया, जिनमें से ज्यादातर मुस्लिम थे. जिसके बारे में मैंने ऊपर उल्लेख किया था कि इस एफआईआर का उद्देश्य नागरिकता कानून के खिलाफ होने वाले अहिंसक आंदोलन को सरकार बदलने की साजिश के रूप में पेश करना था.
एक तरफ था बहुसंख्यक हिंदू समुदाय था जिनकी मदद के लिए पुलिस उनके साथ थी और दूसरी तरफ उनके मुस्लिम पड़ोसी थे, जिनके बीच चार दिनों तक लड़ाई चलती रही. इसमें कम से कम 53 जानें चली गईं, संपत्तियों को बहुत ज्यादा नुकसान हुआ और अलग-अलग मोहल्लों में रहने वाले दोनों धर्मों के हजारों लोग बेघर हो गए.
दुख की बात है कि आजादी के बाद 1961 में जबलपुर में हुए पहले बड़े दंगे के बाद से ही कुछ अपवादों को छोड़कर, बड़े पैमाने पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों को न्याय और मुआवजा दिलाने में भारतीय सरकार का रिकॉर्ड बहुत खराब रहा है.
लेकिन इस शर्मनाक रिकॉर्ड को देखते हुए भी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुआ सांप्रदायिक नरसंहार सबसे अलग है. सरकार ने अपने नागरिकों को हिंसा से बचाने, उनकी ज़िंदगी फिर से पटरी पर लाने और न्याय दिलाने में मदद करने की अपनी जिम्मेदारियों से ख़ुद को अलग कर लिया. इस तरह दिल्ली में शासन कर रही केंद्र और राज्य सरकार ने गिरावट का एक नया आयाम स्थापित किया. यह मोदी के राज के सबसे शर्मनाक अध्याय में से एक है.‘देश के ग़द्दारों’ और भारतीय मुसलमानों को गोली मारने का आह्वान करने वालों में से एक को केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बना दिया गया. दूसरा आज दिल्ली सरकार की कैबिनेट में क़ानून और न्याय मंत्री है
नागरिकता संशोधन कानून, 2019 के खिलाफ देश भर में हुए अहिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद राष्ट्रीय राजधानी के इस इलाके में सांप्रदायिक आग फैली.
इसे भारत के संविधान पर सीधा हमला माना गया. यह तेज़ी से भारतीय गणराज्यका सबसे बड़ा अहिंसक आंदोलन बन गया, जो 1970 के दशक के मध्य में इमरजेंसी के खिलाफ जनता की बग़ावत से भी बड़ा था,
कई स्वतंत्र मीडिया और सिटीजन रिपोर्ट और यहां तक कि कोर्ट के फ़ैसलों से पता चलता है कि दिल्ली पुलिस लगातार गलत दिशा में कोशिश करती रही हैं. वह हिंसा करने वालों को बचाने और सज़ा देने तथा बेगुनाह पीड़ितों को अपराधी बनाने में लगी रही. 2020 की दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा के बाद, पुलिस ने 758 एफआईआर दर्ज की, जिसमें एक में यह दावा किया गया था कि नागरिकता संशोधन कानून 2019 के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले और राहत के काम में लगे लोग असल में साजिशकर्ता थे जिन्होंने सांप्रदायिक हिंसा की योजना बनाई थी.
जिसे ‘दिल्ली दंगा साजिश केस’ के नाम से जाना गया, उसमें दिल्ली पुलिस ने दावा किया कि नागरिकता संशोधन के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों ने असल में सरकार बदलने के लिए आतंकी कार्रवाई के तौर पर दंगों की साजिश रची थी. इस आरोप में 18 छात्र नेता, एक्टिविस्ट और एक नेता कई साल जेल में रहे, और सांप्रदायिक हिंसा के छह साल बाद भी उनके केस की कोई ट्रायल शुरू नहीं हुई. उनमें से पांच अभी भी जेल की सलाखों के पीछे हैं.
द इंडियन एक्सप्रेस ने पाया कि कई कोर्ट आदेशों में अभियोजन पक्ष के बनाए केस में कमियां निकाली गई हैं. एक जज ने कहा कि एक अहम गवाह का होना ‘शक के घेरे में है, और इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह व्यक्ति असल में हो ही नहीं.’ लगभग एक जैसे दो आदेश में, एक कोर्ट ने तो यह भी मान लिया कि पुलिस जानती थी कि उनका केस ‘फ़र्ज़ी’ है क्योंकि वे पहचान के लिए आरोपियों की परेड नहीं करा पाए.
उत्तर-पूर्वी दिल्ली के रहने वाले मोहम्मद इलियास ने भी दंगों में कपिल मिश्रा की भूमिका की जांच के लिए मजिस्ट्रेट से संपर्क किया. दिल्ली पुलिस ने कोर्ट में मिश्रा का मजबूती से बचाव करते हुए कहा कि बड़ी साजिश के मामले में उनकी पहले ही ‘जांच’ हो चुकी है और दंगों को भड़काने में उनका कोई रोल नहीं पाया गया है. पुलिस यहीं नहीं रुकी. उन्होंने आगे आरोप लगाया कि मिश्रा का नाम लेने की कोशिशें उन्हें बदनाम करने के लिए चलाए गए ‘झूठे प्रोपेगैंडा’ कैंपेन का हिस्सा थीं.
न्यायिक स्वतंत्रता की अद्वितीय मिसाल पेश करते हुए एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट वैभव चौरसिया ने इन दोनों दावों को खारिज कर दिया. उन्होंने पूछताछ के दौरान मिश्रा की भाषा में सांप्रदायिक रंग देखा. मिश्रा मुसलमानों को ‘वो’ और ‘उस तरफ’ कह रहे थे, जिससे सांप्रदायिक सोच का पता चलता है. साथ ही मिश्रा ने ख़ुद कोर्ट में माना कि जब उन्होंने अपना विवादित भाषण दिया, तो उनके साथ प्रदर्शन स्थल पर 50-60 समर्थकों का एक ग्रुप था, और यह एक गंभीर अपराध था.


