गुढ़ियारी के तंबू से फ्रांस के मंच तक पंडवानी के लिए आजीवन समर्पित रहीं तीजन बाई*
लेखक -डॉ. सुधीर सक्सेना- विभूति फीचर्स
सांझ ढल चुकी थी और आहिस्ता-आहिस्ता स्याही बस्ती पर पसर रही थी। रोशनी के नाम पर लैंपपोस्टों और घरों में रोशन बल्बों का ही सहारा था, अन्यथा बस्ती इतनी लकदक न थी कि आंखें चुंधिया जाएं। वो साल 1978 का सर्द दिसंबर महीना था। संभवत: दिसंबर का आखिरी हफ्ता था।
सर्दी नामालूम सी थी और फकत स्वेटर से उससे मोर्चा लिया जा सकता था। हम गुढ़ियारी में थे। यह रायपुर में रेलवे स्टेशन के आगे शहर के उलटी ओर बसी बस्ती थी। रिहायश जहां खत्म होती है, वहीं तालाब था। तालाब के किनारे एक तिकोना तंबू गड़ा था। तंबू जिस बांस की बल्ली पर गड़ा था, वहां एक लालटेन टंगी थी।
तंबू में जरूरत का घरेलू सामान बिखरा हुआ था जैसे चोट खाया टिन का बक्सा, कुछेक बर्तन, मिट्टी का अस्थायी चूल्हा,थोड़ा-बहुत मेकअप का सामान, जैसे लिपिस्टिक, काजल, पावडर, बिंदी, तेल-कंघी। झींगुरों और मेंढकों की आवाज बेरोक आ रही थी। जब तब रेलपांत से रेल गुजर जाती थी। और हां, एक तंबूरा भी वहां चारपाई के सहारे टिका हुआ था।
हम एक श्यामल बरन अच्छे सौष्ठव की, पांच फीट से कुछ इंच ऊपर कद की खुशमिजाज महिला के अस्थायी डेरे पर थे। महिला की आंखों में बला की चमक थी और बात करते हुए वे जब-तब और तीक्ष्ण हो जाती थीं। उसके होंठ पान की पीक से लाल थे और दांतों के किनारों पर लाल लकीरें थीं। जाहिर था कि वे पान की शौकीन थीं।
जिस चीज ने सबसे पहले आकर्षित किया, वो था उनका गजब का आत्मविश्वास। झिझक से उनका वास्ता न था। याद पड़ता है कि वो चटख लाल रंग की साड़ी पहने थी, बेमेल ब्लाउज के साथ। चटख बिंदी, चांदी के थोड़े से आभूषण,करीने से काढ़े हुए केश,हंसती तो दांत चमकते थे और साथ ही चमकता था उनका बिंदासपन। कोई बात काबिले-दाद होती तो वे बखुद अपनी जांघ पर थाप देकर आनंदित हो लेती थी।
तंबू में खटिया पर सामने बैठी इस साधारण छत्तीसगढ़िया औरत का कांफिडेंस-लेवल औसत से काफी ऊंचा था और वो बातचीत में बरबस छलकता था। वही हुआ। देखते ही देखते वो लोककला के परिदृश्य में छा गयी। उन्होंने सरहदें लांघी और उनकी ख्याति ने दिशायें। एक दशक के भीतर वे सेलिब्रिटी थीं। साल 1988 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया।
फिर तो पदकों की झड़ी लग गयी। यह वही स्त्री थी, जिसने आकाशवाणी से बतौर पारिश्रमिक पहला चेक लिया तो पावती में हस्ताक्षर न कर अंगूठा लगाया था। उस रात गुढ़ियारी में पहला दफा रूबरू हुई यह स्री थी तीजनबाई। इस साल की 24 अप्रैल को वह सत्तर साल की हुई थीं। अब वे दादी मां भी बन गई थीं।
उनकी ख्याति भी लंबा सफर तय कर चुकी थी। सन् 2003 में पद्मभूषण और सन् 2019 में भारत के राष्ट्रपति के हाथों पद्मविभूषण मिलना ,उनके यश को बढ़ाने के पड़ाव रहे। पद्म पुरस्कारों से उनका सम्मान उस लोक कला का भी सम्मान था, जिसे तीजन बाई ने तमाम तकलीफें उठाकर निबाहा।
रायपुर में गुढ़ियारी में सर्द दिसंबर में लालटेन की धुंधली रोशनी में लिया गया वो इंटरव्यू उनकी जिंदगी का विशेष साक्षात्कार था। इस इंटरव्यू के निमित्त बने थे लोककला मर्मज्ञ निरंजन महावर। जस की तस तो नहीं, मगर उसकी कही कुछ बातें स्मृति में हैं।
तीजन बाई का जन्मगांव इस्पात नगरी भिलाई से 14 किमी दूर गनियारी था जिसे अब भिलाई में ही मानिये। पिता चुनुक लाल। मां सुखमती। पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी। जाति की पारधी। उस अंत्यज समाज की जो मूलत: राजपूत समाज से संबद्ध होने के बावजूद जनजातियों में परिगणित है और आखेट तथा पक्षियों को पकड़ने के लिए जानी जाती है।
पारधी परिन्दों को पकड़ने के लिए भांति-भांति के जाल या फंदे बुनने में निपुण होते हैं। बहरहाल महाराष्ट्र-गुजरात की अपेक्षा छत्तीसगढ़ में इनकी आबादी कम है। पारधी घुमंतू जनजाति है। वे झाड़ू-चटाई, टोकरी आदि अच्छी बना लेते हैं।
विडंबना देखिये कि जब जात-बाहर विवाह के कारण तीजन पारधी-समाज से निष्कासित हुईं तो यही पेशा गांव के बाहर झोपड़ी बनाकर जीवनयापन में काम आया, मगर यह स्थिति ज्यादा दिन तक नहीं रही। कला ने उन्हें दो जून की रोटी दी, नौकरी दी, सम्मान और प्रतिष्ठा दी और उस पायदान पर लाकर खड़ा कर दिया, जहां तक पहुंचना विपन्न पारधियों के लिए ख्वाब में भी दूभर था।
तीजन बाई को पंडवानी विरासत में मिली। मातृकुल से। नाना बृजलाल पारधी पंडवानी गाते थे। बालपन में तीजन ने नाना से पंडवानी सुनी और जो उन्हें कंठस्थ हो गयी। तेरह की आयु में समीपवर्ती गांव चंदखुरी में उन्हें पहली बार पंडवानी गायन का मौका मिला। दक्षिणा या चढ़ावे में मिले दस रुपये उनकी पहली कमाई थी।
अनेक लोग रुष्ट हुए कि एक तो स्त्री और फिर पारधी होकर पवित्र कथा का वाचन। विरोध, लांछन, वर्जना का दौर चला। तीजन में हठ भी था और भगवान कृष्ण में अटूट भक्ति भी। वे उसके स्वप्न में आते थे।
जीवन कष्टों से बिंधा था। तीजन ने वैवाहिक जिंदगी में पीड़ा-प्रताड़ना सही लेकिन पंडवानी नहीं छोड़ी। पंडवानी में ही उनकी मुक्ति थी, पीड़ा से भी, दैन्य से भी, वर्जनाओं से भी। पंडवानी कला ही उन्हें स्याह बोगदे के बाहर उस ठौर ले गयी, जहां खुली हवा थी, रोशनी थी और उसे सराहती एक बड़ी दुनिया थी।
कला कोई भी हो, वो तैयारी या रियाज मांगती है। तीजन ने अपने को तैयार किया, परिष्कृत किया और सबसे बढ़कर उसे नवाचारित भी किया। सबलसिंह चौहान की छत्तीसगढ़ी महाभारत कंठस्थ करने के बाद उसने उमेद सिंह देशमुख से विधिवत प्रशिक्षण लिया। पंडवानी पुरूषों के वर्चस्व का क्षेत्र था।
बैठकर वाचन की वेदमती शैली उनके लिए उपयुक्त थी, लेकिन तीजन बाई ने इसकी विलोम कापालिक शैली चुनी। लगता है तीजन बाई का चयन सही था। कापालिक शैली में खड़े-खड़े ‘महाभारत’ गायी जाती थी। तबला, खड़ताल, ढोलक, मंजीरा, हार्मोनियम जैसे इने-गिने वाद्य। साथ में तंबूरा। तंबूरे से वो कईं प्रयोजन साधती थीं।
वह अर्जुन का बान है और भीम की गदा भी। तीजन वाचिक को आंगिक अभिनय से निखार देती थीं। माहौल के मुताबिक शब्द चयन में थोड़ा हेरफेर। वो गायन, नृत्य, प्रलाप, वादन, संवाद और अभिनय से अपना डोमेन खुद रचती थीं और दर्शकों को बांध लेती थीं। चीरहरण और दु:शासन वध उनके प्रिय प्रसंग थे। बुलंद आवाज और मंच पर तीव्र पदाघात अलग रस की वृष्टि करते थे। वो खूब जानती थीं कि मंच पर नाटकीयता का निर्वाह कैसे किया जाता है।
तीजन ताउम्र निरक्षर रहीं जिसका उन्हें मलाल नहीं था। उसके तईं सब प्रभु की माया है। मोरपंख जड़ा तंबूरा वाद्ययंत्र रहा, आयुध भी और साथी भी। तंबूरा हाथ में आते ही ओज आ जाता । अस्सी के दशक में उन पर रंगकर्मी हबीब तनवीर की निगाह पड़ी। कला-गुरू को कलासाधिका की प्रतिभा चीन्हते देर न लगी।
वो भारत महोत्सव में पहुंचीं। दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के सम्मुख पंडवानी प्रस्तुत की। उन्हें जगह-जगह से न्यौता मिला। दिशायें गौण हो गयीं। वो फ्रांस, जर्मनी, मॉरीशस, तुर्की, रोमानिया, बांग्लादेश और स्विट्जरलैंड गयी ही, माल्टा, ट्यूनीशिया और साइप्रस भी हो आई। फ्रांस सर्वप्रिय था। वहां वह कई बार हो आई । पहली फ्रांस यात्रा के बाद उन्होंने ‘आई-ब्रो’ बनाना सीख लिया । आधुनिक सौन्दर्य प्रसाधन भी उनके जीवन में आ गये। तुलसीराम देशमुख में उसे पति मिला और साथी भी। पेटी (हार्मोनियम) वादक देशमुख उसके कामों में हाथ भी बंटाते थे और उसे साइकिल से भिलाई इस्पात संयंत्र के उनके दफ्तर भी छोड़ आते थे।
‘‘हमारे यहां पढ़ाई का कोई रिवाज न था’’- तीजन बाई ने कहा था-‘‘मैं पढ़ी होती तो शायद पंडवानी गायिका नहीं बनती। बहुत दु:ख झेले, लेकिन सरस्वती मैया की कृपा कि पंडवानी मेरी जिंदगी हो गयी। सब उसी का दिया है।’’
तीजन अपने पति को ‘मिस्टर’ कहती थीं। गोदरेज का ‘डाई’ (खिजाब) उनको भाता था। पान के बिना वे रह नहीं सकती थीं। बंगला पान उन्हें पसंद रहा , अलबत्ता लवंग-इलायची युक्त सादा पत्ता भी चाव से चबाती थीं। अचार की भी वे शौकीन रहीं। खासकर आम का अचार। वह ठेठ छत्तीसगढ़िया है। एक जून बोरे बासी और चटनी उनकी आहारचर्या रही है।
तीजन के जीवन-वृत्त में पदकों की लंबी तालिका है। उन्हें देवी अहिल्या सम्मान भी मिला और संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार भी। सन् 2016 में उन्हें एस. सुब्बलक्ष्मी शताब्दी पुरस्कार मिला और 2018 में फुकुओका पुरस्कार।
उन्हें ईसुरी पुरस्कार से भी नवाजा गया। एक चरण के बाद पुरस्कार और सम्मान गौण हो जाते हैं। याद आता है श्याम बेनेगल का धारावाहिक ‘भारत : एक खोज’। नेहरू जी की कृति ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ पर आधारित इस सीरियल में बेनेगल ने महाभारत को साकार करने के लिये तीजनबाई को चुना था। यह तीजन की उपलब्धि थी और पुरस्कार भी।
तीजन निरक्षर रहीं, लेकिन वे जीवन और जगत के आखरों को बखूबी चीन्हती और सस्वर बांचती थीं। उसने लोककला को क्लासिकी ऊंचाइयां दी हैं। चीरहरण के प्रसंग से वे दर्शाती थीं कि नारी के अपमान में गौरवशाली वंशों का भी पतन या विनाश निहित है। मिथकों की शैली में बात करें तो तीजनबाई को विधि ने पंडवानी के लिये ही रचा था। *(विभूति फीचर्स)*

