पद्मभूषण पं. सूर्यनारायण व्यास: एक बहुआयामी व्यक्तित्व जिन्होंने भारतीय अस्मिता को दी नई पहचान
(देशना जैन-विभूति फीचर्स)
भारतीय इतिहास में ऐसे कम ही व्यक्तित्व हुए हैं, जिन्होंने ज्योतिष, साहित्य, पत्रकारिता और स्वाधीनता संग्राम में समान रूप से अपना योगदान दिया हो। पद्मभूषण पं. सूर्यनारायण व्यास ऐसे ही एक प्रखर राष्ट्रभक्त और विद्वान थे। उज्जैन की पावन धरा पर 2 मार्च 1902 को जन्मे पंडित व्यास ने न केवल अपनी विद्वता से राष्ट्र का मान बढ़ाया, बल्कि आधुनिक भारत की नींव में प्राचीन ज्ञान और सांस्कृतिक चेतना का समावेश किया।
स्वाधीनता संग्राम के योद्धा और ज्योतिष के ज्ञाता पंडित व्यास का जीवन संघर्ष और सृजन का अद्भुत संगम था। वे केवल एक ज्योतिषाचार्य नहीं थे, बल्कि 1921 से ही स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए थे। उन्होंने लॉर्ड मेयो की मूर्ति तोड़ने जैसे साहसिक कार्यों में नेतृत्व किया और 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान गुप्त रेडियो स्टेशन चलाने जैसे जोखिम भरे काम किए। उनकी ज्योतिषीय दूरदृष्टि का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 1930 में ही सटीक भविष्यवाणी कर दी थी कि भारत अगस्त 1947 में स्वतंत्र होगा।
आजादी का शुभ मुहूर्त और ऐतिहासिक भूमिका देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के आग्रह पर, पं. व्यास ने भारत की आजादी के लिए ज्योतिषीय गणना की थी। उन्होंने 14 अगस्त की रात के बजाय 15 अगस्त की मध्यरात्रि को ध्वजारोहण के लिए श्रेयस्कर बताया, जिसे स्वीकार किया गया। इसके अतिरिक्त, पाकिस्तान के लिए उनके द्वारा बताए गए मुहूर्त ने इतिहास में उस राष्ट्र की अस्थिरता की पुष्टि की, जो उनकी ज्योतिषीय क्षमता का प्रमाण है।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण और साहित्य पं. व्यास ने उज्जैन की खोई हुई सांस्कृतिक गौरव को वापस लाने में महती भूमिका निभाई। आज जो ‘अखिल भारतीय कालिदास समारोह’ उज्जैन की पहचान है, उसके पीछे पंडित जी का ही विजन था। वे ‘विक्रम’ मासिक पत्रिका के संपादक रहे और हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा के प्रारंभिक हस्ताक्षर माने जाते हैं। उनका यात्रा वृत्तांत ‘सागर प्रवास’ और व्यंग्य संग्रह ‘तू-तू, मैं-मैं’ हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।
सिद्धांतों के धनी: जब लौटा दिया पद्मभूषण पंडित जी अपने स्वाभिमान के लिए भी जाने जाते थे। 1958 में साहित्य के क्षेत्र में ‘पद्मभूषण’ मिलने के बाद, 1967 में जब सरकार ने अंग्रेजी को अनंत काल तक जारी रखने का विधेयक पारित किया, तो उन्होंने विरोध स्वरूप अपना सम्मान लौटा दिया। यह उनके अडिग राष्ट्रप्रेम और हिंदी-संस्कृत के प्रति लगाव को दर्शाता है।
अमर विरासत 22 जून 1976 को परलोक सिधारे पं. सूर्यनारायण व्यास आज भी अपनी रचनाओं, उनके द्वारा स्थापित संस्थाओं (जैसे विक्रम विश्वविद्यालय, कालिदास परिषद) और शिष्यों की परंपरा में जीवित हैं। 2002 में उनके सम्मान में भारत सरकार द्वारा डाक टिकट जारी किया गया। आज की युवा पीढ़ी के लिए उनका जीवन यह संदेश देता है कि आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों और संस्कृति को सुरक्षित रखना ही वास्तविक राष्ट्र निर्माण है।
पंडित जी का व्यक्तित्व महज एक स्मृति नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता का वह प्रकाश पुंज है, जो हमें सदैव अपनी गौरवशाली परंपराओं के प्रति गर्व करना सिखाता रहेगा। उनके 50वें पुण्य स्मरण दिवस पर उन्हें सादर नमन।


