हरियाणा कांग्रेस: एक युग का इतिहास, सत्ता का संघर्ष और भविष्य की चुनौतियाँ (1966–2026)
हुड्डा, सैलजा और सुरजेवाला के बीच सियासी जंग… क्या कांग्रेस फिर लिख पाएगी हरियाणा में जीत की कहानी?
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50 साल की राजनीतिक विरासत, कई मुख्यमंत्री और आज वापसी की जंग… हरियाणा कांग्रेस का पूरा सच
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सत्ता का स्वर्णकाल खत्म क्यों हुआ? हरियाणा कांग्रेस के पतन और संघर्ष की अनसुनी कहानी
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हरियाणा कांग्रेस की अग्निपरीक्षा: पुराने गौरव, नई चुनौतियां और 2029 की आखिरी बड़ी लड़ाई
चंडीगढ़ / दिनांक: 09 जुलाई 2026/अटल हिन्द विशेष / राजकुमार अग्रवाल
हरियाणा की राजनीति का इतिहास अगर किसी एक राजनीतिक धुरी के इर्द-गिर्द सबसे अधिक घूमता है, तो वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस है। 1 नवंबर 1966 को हरियाणा का एक अलग राज्य के रूप में जन्म हुआ, और तब से लेकर 2026 तक, कांग्रेस पार्टी इस राज्य की राजनीतिक प्रयोगशाला की मुख्य संचालक रही है।
हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी का गठन और शुरुआती दौर
हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी बनने के बाद कांग्रेस ने जिला, ब्लॉक और गांव स्तर तक संगठन को मजबूत करना शुरू किया।
कांग्रेस का आधार उस समय काफी मजबूत था क्योंकि—
- आजादी आंदोलन की विरासत उसके साथ थी।
- ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं का नेटवर्क था।
- किसान और कर्मचारी वर्ग में पकड़ थी।
- केंद्र में भी कांग्रेस की सरकार थी।
हरियाणा कांग्रेस के शुरुआती दौर में कई बड़े नेता सामने आए।
इनमें प्रमुख थे—
- पंडित भगवत दयाल शर्मा
- चौधरी बंसीलाल
- राव बीरेंद्र सिंह
- चौधरी भजनलाल
इन नेताओं ने अलग-अलग समय में हरियाणा की राजनीति की दिशा तय की।

विकास और राजनीति का सफर
हरियाणा के गठन के साथ ही कांग्रेस ने प्रशासनिक व्यवस्था की नींव रखी। 70 और 80 का दशक कांग्रेस के लिए ‘विकास के दौर’ के रूप में जाना जाता है, जहाँ चौधरी बंसीलाल ने आधुनिक हरियाणा की आधारशिला रखी, तो वहीं भजन लाल ने संगठनात्मक मजबूती प्रदान की। 2005 से 2014 के बीच भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में कांग्रेस ने प्रदेश के औद्योगिक और शैक्षणिक विकास को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।
हरियाणा कांग्रेस की स्थापना से लेकर बंसीलाल और भजनलाल युग तक (1966–1996)
हरियाणा की राजनीति को समझना हो तो कांग्रेस के इतिहास को समझना बेहद जरूरी है। हरियाणा केवल एक राज्य नहीं बना था, बल्कि इसके साथ एक नई राजनीतिक पहचान भी पैदा हुई थी। 1 नवंबर 1966 को जब हरियाणा पंजाब से अलग होकर देश का 17वां राज्य बना, तब यहां की राजनीति में कांग्रेस सबसे बड़ी ताकत थी। आज भले ही हरियाणा की राजनीति में भाजपा, इनेलो, जजपा और अन्य दलों का प्रभाव दिखाई देता है, लेकिन एक लंबा समय ऐसा था जब कांग्रेस ही हरियाणा की राजनीति की धुरी हुआ करती थी।
हरियाणा कांग्रेस की कहानी केवल एक राजनीतिक दल की कहानी नहीं है, बल्कि यह राज्य निर्माण, किसान राजनीति, विकास, सामाजिक समीकरण, बड़े नेताओं की महत्वाकांक्षा और बदलते जनमत की कहानी भी है।
आज जब जुलाई 2026 में हरियाणा कांग्रेस फिर से अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है, तब यह जानना जरूरी है कि आखिर कांग्रेस ने हरियाणा में इतनी लंबी पारी कैसे खेली, किन नेताओं ने पार्टी को मजबूत बनाया और किन कारणों से धीरे-धीरे उसका जनाधार कमजोर होता गया।
स्वतंत्रता आंदोलन से हरियाणा कांग्रेस की नींव
हरियाणा में कांग्रेस की जड़ें राज्य बनने से बहुत पहले की हैं। आजादी के आंदोलन के समय वर्तमान हरियाणा क्षेत्र संयुक्त पंजाब का हिस्सा था। उस समय यहां के लोग भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आंदोलनों से जुड़े हुए थे।
रोहतक, हिसार, करनाल, अंबाला, गुड़गांव (अब गुरुग्राम), सिरसा और जींद जैसे क्षेत्रों में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सक्रिय भूमिका निभाई।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुए—
असहयोग आंदोलन
नमक सत्याग्रह
भारत छोड़ो आंदोलन
जैसे आंदोलनों में हरियाणा क्षेत्र के लोगों की भागीदारी रही।
उस समय कांग्रेस केवल राजनीतिक दल नहीं बल्कि आजादी के आंदोलन का मुख्य माध्यम थी। यही कारण था कि आजादी के बाद भी कांग्रेस को जनता का स्वाभाविक समर्थन मिला।
संयुक्त पंजाब से अलग हरियाणा तक कांग्रेस का सफर
1947 में देश आजाद हुआ तो वर्तमान हरियाणा क्षेत्र संयुक्त पंजाब का हिस्सा रहा। उस समय अलग हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी नहीं थी। यहां के कांग्रेस नेता पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अंतर्गत काम करते थे।
1950 और 1960 के दशक में अलग हरियाणा राज्य की मांग तेज होने लगी।
इस मांग के पीछे मुख्य कारण थे—
- अलग भाषा और संस्कृति की पहचान
- प्रशासनिक सुविधा
- क्षेत्रीय विकास की आवश्यकता
कांग्रेस के कई नेताओं ने भी अलग हरियाणा राज्य की मांग का समर्थन किया।
आखिरकार लंबे आंदोलन और राजनीतिक प्रक्रिया के बाद पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के तहत 1 नवंबर 1966 को हरियाणा राज्य का गठन हुआ।
नए राज्य के गठन के साथ ही हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी (HPCC) का भी गठन हुआ।
कांग्रेस के सामने अब नई चुनौती थी—
“एक नए राज्य में संगठन खड़ा करना और जनता का विश्वास बनाए रखना।”
पंडित भगवत दयाल शर्मा: हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री और शुरुआती कांग्रेस चेहरा
हरियाणा बनने के बाद कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी नए राज्य को प्रशासनिक रूप से खड़ा करना।
1 नवंबर 1966 को हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री बने—
पंडित भगवत दयाल शर्मा।
वे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे थे।
उनके सामने कई बड़ी चुनौतियां थीं—
- नए राज्य का प्रशासन बनाना
- पंजाब से अलग सरकारी ढांचे को स्थापित करना
- विभागों का पुनर्गठन
- कर्मचारियों और अधिकारियों की व्यवस्था करना
उनका कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा, लेकिन इतिहास में उनका नाम हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज हो गया।
उनके समय में राज्य निर्माण की मूल प्रक्रिया शुरू हुई।
1967 का पहला विधानसभा चुनाव: कांग्रेस की पहली परीक्षा
हरियाणा बनने के बाद पहला विधानसभा चुनाव 1967 में हुआ।
इस चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।
कांग्रेस ने 48 सीटें जीतीं।
लेकिन राजनीतिक स्थिरता नहीं बन पाई।
यही वह दौर था जब हरियाणा की राजनीति में दल-बदल की शुरुआत हुई।
इसी समय विधायक गया लाल के बार-बार पार्टी बदलने की घटना ने पूरे देश में “आया राम, गया राम” मुहावरे को जन्म दिया।
इस घटना ने दिखाया कि हरियाणा की राजनीति में व्यक्तिगत प्रभाव और सत्ता समीकरण कितने महत्वपूर्ण थे।
चौधरी बंसीलाल: आधुनिक हरियाणा के निर्माण का दौर
1968 के बाद हरियाणा कांग्रेस को एक ऐसा नेता मिला जिसने राज्य की विकास दिशा बदल दी।
वह नेता थे—
चौधरी बंसीलाल।
बंसीलाल को हरियाणा के आधुनिक विकास का निर्माता कहा जाता है।
उनका जन्म भिवानी जिले के गोलागढ़ गांव में हुआ था।
वे केवल मुख्यमंत्री नहीं थे बल्कि एक मजबूत प्रशासक के रूप में पहचाने जाते थे।
बंसीलाल सरकार (1968–1975): विकास की राजनीति
बंसीलाल के कार्यकाल में हरियाणा में आधारभूत विकास पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया।
उनकी राजनीति का मुख्य आधार था—
“विकास के माध्यम से राज्य को मजबूत बनाना।”
उनके समय में कई क्षेत्रों में काम हुआ।
1. बिजली व्यवस्था का विस्तार
कृषि प्रधान राज्य होने के कारण किसानों के लिए बिजली बेहद जरूरी थी।
बंसीलाल सरकार ने बिजली व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया।
इससे कृषि उत्पादन बढ़ाने में मदद मिली।
2. सिंचाई व्यवस्था
हरियाणा की खेती पानी पर निर्भर थी।
नहरों और सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर ध्यान दिया गया।
3. सड़क निर्माण
गांवों को सड़कों से जोड़ने की दिशा में काम हुआ।
इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिली।
4. औद्योगिक विकास
हरियाणा में औद्योगिक विकास की नींव इसी दौर में मजबूत हुई।
बाद के वर्षों में गुरुग्राम जैसे क्षेत्रों के विकास के लिए यह आधार बना।
बंसीलाल की मजबूत प्रशासनिक छवि
बंसीलाल को कड़े फैसले लेने वाले नेता के रूप में जाना जाता था।
उनकी शैली थी—
- तेज निर्णय
- प्रशासन पर नियंत्रण
- विकास योजनाओं पर जोर
समर्थकों का मानना था कि उन्होंने छोटे राज्य को विकास की दिशा दी।
वहीं आलोचक कहते थे कि उनकी कार्यशैली काफी केंद्रीकृत थी और पार्टी के अंदर अन्य नेताओं को पर्याप्त जगह नहीं मिलती थी।
यहीं से कांग्रेस के अंदर शक्ति संतुलन की राजनीति शुरू हुई।
1972 विधानसभा चुनाव: कांग्रेस का स्वर्णकाल
1972 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया।
कांग्रेस को 52 सीटें मिलीं।
यह वह समय था जब—
- इंदिरा गांधी की लोकप्रियता चरम पर थी।
- कांग्रेस का राष्ट्रीय प्रभाव मजबूत था।
- ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस की पकड़ थी।
हरियाणा में कांग्रेस को किसान, कर्मचारी और ग्रामीण समाज का मजबूत समर्थन मिला।
यह दौर कांग्रेस के सबसे मजबूत समयों में गिना जाता है।
1975–77: आपातकाल और कांग्रेस की गिरती लोकप्रियता
1975 में देश में आपातकाल लगाया गया।
इसका असर हरियाणा की राजनीति पर भी पड़ा।
उस समय हरियाणा में कांग्रेस सरकार थी।
लेकिन 1977 आते-आते पूरे देश में कांग्रेस विरोधी माहौल बन गया।
लोगों में असंतोष बढ़ा और विपक्ष मजबूत हुआ।
1977 विधानसभा चुनाव: कांग्रेस का पहला बड़ा झटका
1977 का चुनाव कांग्रेस के लिए बड़ा झटका साबित हुआ।
कांग्रेस केवल 3 सीटों पर सिमट गई।
यह पहली बार था जब हरियाणा में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई।
इसके पीछे कारण थे—
- आपातकाल की नाराजगी
- जनता पार्टी की लहर
- चौधरी देवीलाल जैसे क्षेत्रीय नेताओं का उभार
यह चुनाव हरियाणा की राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ।
अब राज्य की राजनीति में क्षेत्रीय नेताओं का महत्व बढ़ने लगा था।
भजनलाल का उदय: राजनीति के माहिर खिलाड़ी
1980 के दशक में हरियाणा कांग्रेस को एक ऐसा नेता मिला जिसने पार्टी को फिर मजबूत किया।
वह थे—
चौधरी भजनलाल।
भजनलाल को हरियाणा की राजनीति का सबसे कुशल राजनीतिक प्रबंधक माना जाता है।
उनकी सबसे बड़ी ताकत थी—
- अलग-अलग वर्गों को साथ जोड़ना
- नेताओं को साधना
- चुनावी समीकरण बनाना
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भजनलाल युग: कांग्रेस की वापसी
1980 में केंद्र में कांग्रेस की वापसी के बाद हरियाणा में भी कांग्रेस मजबूत हुई।
भजनलाल ने संगठन और सत्ता दोनों पर पकड़ बनाई।
उनकी राजनीति विकास से ज्यादा राजनीतिक प्रबंधन पर आधारित मानी जाती थी।
उन्होंने—
- ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस की पकड़ मजबूत की।
- विभिन्न समुदायों को पार्टी से जोड़ा।
- प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत किया।
उनकी राजनीतिक शैली अलग थी।
जहां बंसीलाल विकास और प्रशासन के लिए जाने जाते थे, वहीं भजनलाल राजनीतिक समीकरणों के लिए प्रसिद्ध हुए।
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भजनलाल की राजनीति: ताकत और आलोचना
भजनलाल के समर्थक कहते थे कि वे हर परिस्थिति में सरकार बचाने और पार्टी को मजबूत रखने की क्षमता रखते थे।
लेकिन विरोधियों का आरोप था कि उनकी राजनीति सत्ता केंद्रित थी।
उन पर आरोप लगाए गए कि वे व्यक्तिगत राजनीतिक प्रबंधन पर ज्यादा निर्भर रहते थे।
हालांकि यह भी सच है कि उन्होंने कांग्रेस को लंबे समय तक हरियाणा की राजनीति में मजबूत बनाए रखा।
1990 के दशक की शुरुआत: कांग्रेस के सामने नई चुनौती
1990 के दशक तक हरियाणा की राजनीति बदलने लगी थी।
अब कांग्रेस के सामने नई चुनौतियां थीं—
चौधरी देवीलाल की किसान राजनीति
क्षेत्रीय दलों का विस्तार
जातीय समीकरण
नए नेताओं का उभारकांग्रेस के अंदर भी कई शक्ति केंद्र बनने लगे थे।
बंसीलाल, भजनलाल और नए उभरते नेताओं के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी।
1991 में कांग्रेस की वापसी
1991 में कांग्रेस ने फिर सत्ता में वापसी की।
भजनलाल मुख्यमंत्री बने।
यह दिखाता है कि हरियाणा में कांग्रेस का जनाधार अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था।
जनता अभी भी कांग्रेस को स्थिर सरकार के विकल्प के रूप में देखती थी।
लेकिन 1990 के दशक के मध्य तक परिस्थितियां तेजी से बदलने लगीं।
1996: कांग्रेस के लिए बड़ा संकट
1996 विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए कठिन साबित हुआ।
पार्टी केवल 9 सीटों तक सिमट गई।
इसके पीछे कई कारण थे—
क्षेत्रीय दलों का उभार
कांग्रेस के अंदर गुटबाजी
जनता का बदलता राजनीतिक मूड
नए नेतृत्व की तलाशयह चुनाव संकेत था कि हरियाणा की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही।
हुड्डा युग, कांग्रेस का पतन, भाजपा का उभार और 2014–2024 चुनावी सफर (1996–2024)
- हरियाणा की राजनीति में 1990 के दशक के बाद का दौर बेहद उतार-चढ़ाव वाला रहा। जिस कांग्रेस ने लंबे समय तक प्रदेश की राजनीति पर एकछत्र राज किया था, उसे पहली बार ऐसी चुनौती मिली जिसमें क्षेत्रीय दलों, जातीय समीकरणों और बदलती सामाजिक आकांक्षाओं ने उसकी पुरानी राजनीतिक जमीन को हिला दिया।1996 के बाद हरियाणा की राजनीति में कांग्रेस का प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर होने लगा। एक समय था जब कांग्रेस का संगठन गांव-गांव तक मजबूत माना जाता था, लेकिन बदलते दौर में पार्टी को नए नेतृत्व, मजबूत संगठन और स्पष्ट राजनीतिक रणनीति की कमी महसूस होने लगी।इसी दौर में इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) जैसी क्षेत्रीय ताकतों का उभार हुआ और बाद में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने गैर-जाट राजनीति, शहरी मतदाताओं और राष्ट्रीय नेतृत्व के सहारे हरियाणा में अपनी मजबूत पकड़ बनानी शुरू कर दी।लेकिन इसी संघर्ष के बीच कांग्रेस को एक ऐसा नेता मिला जिसने पार्टी को दो बार सत्ता तक पहुंचाया — चौधरी भूपेंद्र सिंह हुड्डा।
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1996 के बाद कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती
1996 का विधानसभा चुनाव हरियाणा कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ। उस समय प्रदेश की राजनीति में बदलाव की लहर थी। कांग्रेस लंबे समय से सत्ता में थी और जनता में सत्ता विरोधी भावना भी बढ़ रही थी।
हरियाणा की राजनीति में चौधरी देवीलाल और ओमप्रकाश चौटाला के नेतृत्व वाली इनेलो ने ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत पकड़ बनाई। किसान राजनीति, क्षेत्रीय अस्मिता और चौधरी परिवार की राजनीतिक विरासत ने कांग्रेस को चुनौती दी।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी समस्या थी:
मजबूत स्थानीय नेतृत्व का अभाव
संगठन में गुटबाजी
नेताओं के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा
बदलते सामाजिक समीकरणों को समझने में देरीकांग्रेस अब केवल पुराने वोट बैंक के भरोसे चुनाव नहीं जीत सकती थी।
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बंसीलाल और हविपा का दौर: कांग्रेस से दूरी और वापसी की कोशिश
1996 में चौधरी बंसीलाल ने अपनी पार्टी हरियाणा विकास पार्टी (हविपा) बनाई और भाजपा के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई।
बंसीलाल हरियाणा के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक थे। उन्होंने प्रदेश में सड़क, बिजली, सिंचाई और प्रशासनिक सुधारों के लिए पहचान बनाई थी।
लेकिन उनकी सरकार को कई फैसलों के कारण आलोचना भी झेलनी पड़ी। विशेष रूप से शराबबंदी का फैसला राजनीतिक रूप से विवादित रहा।
1999 में भाजपा ने हविपा से दूरी बना ली और प्रदेश की राजनीति फिर बदल गई।
इसके बाद कांग्रेस ने धीरे-धीरे अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश शुरू की।
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2005: कांग्रेस की ऐतिहासिक वापसी और हुड्डा युग की शुरुआत
2005 का विधानसभा चुनाव हरियाणा कांग्रेस के लिए नया अध्याय लेकर आया।
कांग्रेस ने चौधरी भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और भारी बहुमत हासिल किया।
यह जीत कई कारणों से महत्वपूर्ण थी:
किसान और ग्रामीण मतदाताओं का समर्थन
हुड्डा खुद किसान पृष्ठभूमि से आते थे। उन्होंने ग्रामीण विकास, किसान हित और रोजगार जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी।
भाजपा-इनेलो सरकार के खिलाफ नाराजगी
उस समय जनता में बदलाव की इच्छा थी और कांग्रेस इसका फायदा उठाने में सफल रही।
मजबूत नेतृत्व की तलाश
कांग्रेस को एक ऐसे नेता की आवश्यकता थी जो सभी वर्गों को साथ लेकर चल सके। हुड्डा को इस भूमिका में देखा गया।
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हुड्डा सरकार (2005–2014): विकास और विवाद दोनों का दौर
- भूपेंद्र सिंह हुड्डा का मुख्यमंत्री कार्यकाल हरियाणा की राजनीति में सबसे चर्चित दौरों में से एक रहा।उनकी सरकार ने प्रदेश में विकास के कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए।
विकास की राजनीति
हुड्डा सरकार के समर्थक मानते हैं कि उनके कार्यकाल में:
सड़क नेटवर्क का विस्तार हुआ
शिक्षा संस्थानों में वृद्धि हुई
औद्योगिक निवेश बढ़ा
गुरुग्राम का तेजी से विकास हुआ
आईटी और रियल एस्टेट सेक्टर को बढ़ावा मिला
खेल सुविधाओं का विस्तार हुआगुरुग्राम को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के केंद्र के रूप में विकसित करने में इस दौर की बड़ी भूमिका मानी जाती है।
हरियाणा में कई बड़े विश्वविद्यालय, मेडिकल संस्थान और तकनीकी संस्थान इसी दौर में विकसित हुए।
लेकिन हुड्डा सरकार विवादों से भी घिरी रही
जहां एक ओर विकास की चर्चा हुई, वहीं दूसरी ओर विपक्ष ने कई मुद्दों पर कांग्रेस सरकार को घेरा।
भूमि अधिग्रहण और रियल एस्टेट विवाद
गुरुग्राम, फरीदाबाद और आसपास के क्षेत्रों में जमीन अधिग्रहण को लेकर विपक्ष ने आरोप लगाए कि कुछ चुनिंदा लोगों को फायदा पहुंचाया गया।
कांग्रेस ने इन आरोपों को राजनीतिक विरोध बताया, लेकिन यह मुद्दा धीरे-धीरे बड़ा चुनावी विषय बन गया।
भर्ती और नौकरियों का मुद्दा
सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए।
बाद के वर्षों में भाजपा ने इन्हीं मुद्दों को कांग्रेस के खिलाफ चुनावी हथियार बनाया।
2009: कांग्रेस की दूसरी जीत
2009 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की।
हालांकि पार्टी को 2005 जैसी बड़ी सफलता नहीं मिली, लेकिन वह सबसे बड़ी पार्टी बनी और हुड्डा दोबारा मुख्यमंत्री बने।
यह चुनाव दिखाता था कि कांग्रेस का ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में प्रभाव अभी कायम था।
लेकिन इसी समय पार्टी के अंदर गुटबाजी भी बढ़ने लगी।
कांग्रेस में गुटबाजी का बढ़ता प्रभाव
हरियाणा कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी लंबे समय से अंदरूनी खींचतान रही है।
हुड्डा के अलावा कई नेता प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान रखते थे:
कुमारी सैलजा
रणदीप सिंह सुरजेवाला
चौधरी बीरेंद्र सिंह
किरण चौधरी
अशोक तंवरहर नेता का अपना राजनीतिक आधार था।
लेकिन समस्या यह रही कि पार्टी इन सभी नेताओं को एक मंच पर लाने में पूरी तरह सफल नहीं रही।
2014: कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका
2014 विधानसभा चुनाव हरियाणा की राजनीति का ऐतिहासिक मोड़ था।
देश में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की लहर चल रही थी। हरियाणा में भी भाजपा ने पहली बार अपने दम पर सरकार बनाने का लक्ष्य रखा।
भाजपा ने पहली बार प्रदेश में पूर्ण बहुमत हासिल किया।
कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ।
इसके पीछे कई कारण माने गए:
सत्ता विरोधी लहर
लगातार 10 साल सरकार में रहने के कारण कांग्रेस के खिलाफ नाराजगी बढ़ रही थी।
भ्रष्टाचार के आरोप
विपक्ष ने भूमि सौदे और प्रशासनिक फैसलों को बड़ा मुद्दा बनाया।
भाजपा की नई सामाजिक रणनीति
भाजपा ने गैर-जाट मतदाताओं को मजबूती से जोड़ा।
दलित, पिछड़ा वर्ग, व्यापारी, कर्मचारी और शहरी वर्ग में भाजपा का प्रभाव बढ़ा।
मनोहर लाल खट्टर युग और कांग्रेस का संघर्ष
2014 में मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनी।
यह पहली बार था जब भाजपा ने हरियाणा में अपने दम पर सरकार बनाई।
भाजपा सरकार ने:
पारदर्शिता
ऑनलाइन सेवाएं
भ्रष्टाचार विरोधी अभियान
परिवारवाद के खिलाफ राजनीतिको प्रमुख मुद्दा बनाया।
कांग्रेस के लिए यह नई राजनीतिक चुनौती थी।
2019 विधानसभा चुनाव: कांग्रेस की वापसी की उम्मीद
2019 में कांग्रेस ने भाजपा सरकार के खिलाफ चुनाव लड़ा।
इस चुनाव में कांग्रेस ने पहले की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया।
भूपेंद्र सिंह हुड्डा को फिर से पार्टी का प्रमुख चेहरा बनाया गया।
कांग्रेस ने:
बेरोजगारी
किसान समस्या
सरकारी कर्मचारियों के मुद्दे
आर्थिक मंदीको प्रमुख मुद्दा बनाया।
लेकिन भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी और गठबंधन सरकार बनाई।
2024 लोकसभा चुनाव: कांग्रेस की मजबूत वापसी के संकेत
2024 लोकसभा चुनाव हरियाणा कांग्रेस के लिए सकारात्मक संकेत लेकर आया।
कांग्रेस ने कई सीटों पर मजबूत प्रदर्शन किया और भाजपा को कड़ी चुनौती दी।
इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ा कि प्रदेश में कांग्रेस दोबारा सत्ता हासिल कर सकती है।
लेकिन इसके बाद सबसे बड़ी परीक्षा विधानसभा चुनाव की थी।
2024 हरियाणा विधानसभा चुनाव: उम्मीदों पर झटका
2024 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को उम्मीद थी कि वह सत्ता में लौटेगी।
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि:
किसान आंदोलन का प्रभाव
भाजपा सरकार के खिलाफ नाराजगी
बेरोजगारी का मुद्दा
एंटी-इनकंबेंसीकांग्रेस के पक्ष में जा सकते हैं।
लेकिन चुनाव परिणाम कांग्रेस की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहे।
भाजपा सत्ता में वापसी करने में सफल रही।
इसके पीछे कई कारण बताए गए:
संगठन की कमजोरी
कांग्रेस बूथ स्तर पर भाजपा जितनी मजबूत नहीं दिखी।
मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर स्पष्टता का अभाव
पार्टी के अंदर नेतृत्व को लेकर संदेश साफ नहीं था।
गुटबाजी
कई क्षेत्रों में नेताओं के बीच तालमेल की कमी दिखाई दी।
भाजपा की चुनावी मशीनरी
भाजपा ने संगठन, प्रचार और बूथ प्रबंधन में बढ़त बनाए रखी।
1996 से 2024 तक कांग्रेस की राजनीति का निष्कर्ष
हरियाणा कांग्रेस का यह दौर उतार-चढ़ाव से भरा रहा।
जहां 2005 और 2009 में पार्टी ने सत्ता हासिल की, वहीं 2014 के बाद उसे लगातार संघर्ष करना पड़ा।
कांग्रेस की ताकत आज भी है:
मजबूत पारंपरिक वोट बैंक
अनुभवी नेता
ग्रामीण क्षेत्रों में पकड़
राष्ट्रीय स्तर का संगठनलेकिन चुनौतियां भी बड़ी हैं:
अंदरूनी गुटबाजी
युवा नेतृत्व की कमी
संगठनात्मक कमजोरी
भाजपा की मजबूत चुनावी रणनीतिअब सवाल यही है कि क्या कांग्रेस 2029 तक अपनी खोई हुई जमीन वापस हासिल कर पाएगी?
इसका जवाब काफी हद तक 2026 के बाद पार्टी की रणनीति, नेतृत्व संघर्ष और संगठन निर्माण पर निर्भर करेगा।
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हरियाणा कांग्रेस का सफर: सत्ता के स्वर्णकाल से संघर्ष के दौर तक, 2026 में वापसी की तलाश
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जुलाई 2026 तक कांग्रेस की स्थिति, गुटबाजी, प्रमुख नेताओं की भूमिका और 2029 की संभावनाएं
- हरियाणा की राजनीति में कांग्रेस आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां उसके सामने सबसे बड़ा सवाल है — क्या वह फिर से प्रदेश की सत्ता में वापसी कर सकती है या आने वाले वर्षों में भाजपा का मुकाबला करने के लिए उसे खुद को पूरी तरह बदलना पड़ेगा?एक समय था जब हरियाणा में कांग्रेस को सत्ता का स्वाभाविक दावेदार माना जाता था। गांवों से लेकर शहरों तक पार्टी का संगठन मजबूत था। प्रदेश के बड़े-बड़े राजनीतिक चेहरे कांग्रेस से निकलते थे और मुख्यमंत्री पद के लिए कई दिग्गज नेताओं के नाम चर्चा में रहते थे।लेकिन 2014 के बाद हरियाणा की राजनीति पूरी तरह बदल गई। भाजपा ने अपनी मजबूत संगठन क्षमता, गैर-जाट सामाजिक समीकरण और केंद्र सरकार की लोकप्रियता के सहारे कांग्रेस के लंबे राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती दी।2024 के विधानसभा चुनाव के बाद भी कांग्रेस सत्ता से बाहर रही। हालांकि पार्टी के पास मजबूत नेता, अनुभवी संगठन और बड़ा राजनीतिक आधार मौजूद है, लेकिन अंदरूनी खींचतान और नेतृत्व को लेकर असमंजस उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बना हुआ है।
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जुलाई 2026 में हरियाणा कांग्रेस की स्थिति
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2026 तक आते-आते कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती है।
एक तरफ उसे भाजपा सरकार के खिलाफ जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाना है, वहीं दूसरी तरफ अपने घर को भी व्यवस्थित करना है।
प्रदेश में कांग्रेस के सामने प्रमुख मुद्दे हैं:
बेरोजगारी
किसानों की समस्याएं
सरकारी कर्मचारियों की मांगें
महंगाई
कानून व्यवस्था
शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था
ग्रामीण विकासकांग्रेस इन मुद्दों को लेकर सरकार पर हमला करती रही है, लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकार विरोधी राजनीति से सत्ता में वापसी संभव नहीं होगी। इसके लिए मजबूत संगठन, स्पष्ट नेतृत्व और जनता के बीच लगातार मौजूदगी जरूरी होगी।
हुड्डा की राजनीति: कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा
हरियाणा कांग्रेस में सबसे प्रभावशाली नेताओं में चौधरी भूपेंद्र सिंह हुड्डा का नाम सबसे ऊपर आता है।
दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हुड्डा के पास प्रदेश के कई जिलों में मजबूत राजनीतिक नेटवर्क है।
उनकी राजनीति मुख्य रूप से:
किसान हित
ग्रामीण विकास
रोजगार
प्रदेश के विकास मॉडलके आसपास रही है।
समर्थकों का मानना है कि हुड्डा ही वह नेता हैं जो कांग्रेस को सत्ता तक वापस पहुंचा सकते हैं।
उनके समर्थक यह तर्क देते हैं कि:
2005 और 2009 की जीत उनके नेतृत्व में हुई
उनका प्रशासनिक अनुभव सबसे अधिक है
ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी पकड़ मजबूत हैलेकिन विरोधी खेमे की चिंता यह है कि पार्टी को केवल एक नेता के भरोसे नहीं चलाया जा सकता।
कुमारी सैलजा: दलित और महिला नेतृत्व का मजबूत चेहरा
कुमारी सैलजा हरियाणा कांग्रेस की वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं।
केंद्र सरकार में मंत्री रह चुकी सैलजा का राजनीतिक आधार दलित समाज और कांग्रेस के पारंपरिक समर्थक वर्गों में माना जाता है।
उनकी राजनीति की खासियत:
साफ-सुथरी छवि
राष्ट्रीय स्तर का अनुभव
दलित और महिला प्रतिनिधित्वहै।
कांग्रेस के भीतर लंबे समय से यह चर्चा रही है कि पार्टी को सामाजिक संतुलन के लिए सैलजा जैसे नेताओं को अधिक महत्व देना चाहिए।
सैलजा समर्थक मानते हैं कि हरियाणा में कांग्रेस को केवल एक जातीय समीकरण के आधार पर नहीं बल्कि सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाली राजनीति करनी होगी।
रणदीप सिंह सुरजेवाला: राष्ट्रीय पहचान वाला युवा चेहरा
रणदीप सिंह सुरजेवाला कांग्रेस के उन नेताओं में हैं जिनकी पहचान प्रदेश के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी है।
वे कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं में रहे हैं और केंद्र सरकार के खिलाफ पार्टी का पक्ष मजबूती से रखते रहे हैं।
उनकी ताकत:
मीडिया और राजनीतिक बहसों में प्रभावी पकड़
संगठनात्मक अनुभव
युवाओं से जुड़ने की क्षमतामानी जाती है।
हालांकि हरियाणा की जमीनी राजनीति में उन्हें अभी भी अपने लिए बड़ा जनाधार बनाने की चुनौती है।
किरण चौधरी: कांग्रेस से दूरी और नई राजनीतिक भूमिका
किरण चौधरी लंबे समय तक कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में शामिल रहीं।
वह चौधरी बंसीलाल की राजनीतिक विरासत से जुड़ी हैं और दक्षिण हरियाणा में उनका प्रभाव माना जाता रहा है।
लेकिन कांग्रेस के अंदर नेतृत्व और संगठन से मतभेदों के बाद उन्होंने पार्टी से अलग राजनीतिक रास्ता चुना।
उनके जाने से कांग्रेस को दक्षिण हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में नुकसान की चर्चा रही।
यह घटना कांग्रेस की अंदरूनी चुनौतियों को भी सामने लाती है कि पार्टी अपने पुराने नेताओं को साथ रखने में कितनी सफल रही।
चौधरी बीरेंद्र सिंह: पुराने अनुभव और किसान राजनीति का चेहरा
चौधरी बीरेंद्र सिंह हरियाणा की राजनीति के अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं।
वह लंबे समय तक कांग्रेस में रहे, बाद में भाजपा में गए और फिर कांग्रेस में लौटे।
उनकी राजनीति:
किसान मुद्दे
ग्रामीण नेतृत्व
प्रशासनिक अनुभवके लिए जानी जाती है।
हरियाणा में जाट राजनीति और किसान समुदाय के बीच उनका प्रभाव रहा है।
उनका अनुभव कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन नई पीढ़ी के नेताओं के साथ तालमेल भी जरूरी है।
हरियाणा कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती: गुटबाजी
कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या कोई बाहरी ताकत नहीं बल्कि अंदरूनी एकता की कमी रही है।
हरियाणा कांग्रेस में वर्षों से कई गुट सक्रिय रहे हैं:
हुड्डा गुट
सैलजा समर्थक नेता
सुरजेवाला समर्थक नेता
पुराने कांग्रेसी नेतायह गुटबाजी कई बार चुनावों में टिकट वितरण, प्रचार और संगठन के काम को प्रभावित करती रही है।
राजनीति में यह माना जाता है कि जब पार्टी के नेता एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं तो विरोधी दल को फायदा मिलता है।
कांग्रेस की ताकत क्या है?
तमाम चुनौतियों के बावजूद कांग्रेस के पास कई मजबूत पक्ष हैं।
पुराना संगठन और कार्यकर्ता आधार1.
कांग्रेस का इतिहास हरियाणा में काफी लंबा है। गांवों में आज भी पार्टी के पुराने कार्यकर्ता मौजूद हैं।
भाजपा सरकार के खिलाफ मुद्दे
बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं और सामाजिक मुद्दे कांग्रेस को राजनीतिक अवसर देते हैं।
अनुभवी नेतृत्व
हुड्डा, सैलजा, सुरजेवाला और अन्य वरिष्ठ नेताओं का अनुभव पार्टी की बड़ी पूंजी है।
राष्ट्रीय संगठन
कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टियों में से एक है और उसके पास राष्ट्रीय स्तर का ढांचा है।
कांग्रेस की कमजोरियां
लेकिन वापसी की राह आसान नहीं है।
मजबूत बूथ संगठन की कमी
भाजपा ने पिछले वर्षों में बूथ स्तर तक संगठन मजबूत किया है।
स्पष्ट नेतृत्व का सवाल
जनता के सामने यह स्पष्ट होना जरूरी है कि कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद का चेहरा कौन होगा।
युवाओं से दूरी
नई पीढ़ी के मतदाताओं को जोड़ना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है।
सोशल मीडिया और आधुनिक प्रचार
भाजपा इस क्षेत्र में कांग्रेस से आगे दिखाई देती है।
2029 विधानसभा चुनाव: कांग्रेस के सामने बड़ा मौका
2029 विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए निर्णायक हो सकता है।
अगर पार्टी को सत्ता में वापसी करनी है तो उसे कुछ बड़े कदम उठाने होंगे:
पहला — संगठन में सुधार
हर बूथ पर सक्रिय कार्यकर्ता और मजबूत टीम बनानी होगी।
दूसरा — गुटबाजी खत्म करना
नेताओं को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर पार्टी हित में काम करना होगा।
तीसरा — नया सामाजिक समीकरण
कांग्रेस को जाट, दलित, पिछड़ा वर्ग, व्यापारी, युवा और महिलाओं सभी वर्गों को जोड़ना होगा।
चौथा — युवा नेतृत्व को आगे लाना
नई पीढ़ी के नेताओं को जिम्मेदारी देनी होगी।
क्या कांग्रेस 2029 में सत्ता में लौट सकती है?
हरियाणा की राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है।
जिस तरह कांग्रेस 2005 में सत्ता में वापस आई थी, उसी तरह भविष्य में भी वापसी कर सकती है।
लेकिन इसके लिए केवल सरकार विरोधी माहौल पर्याप्त नहीं होगा।
कांग्रेस को जनता के बीच यह भरोसा पैदा करना होगा कि:
उसके पास मजबूत नेतृत्व है
उसके पास विकास का स्पष्ट रोडमैप है
वह सभी वर्गों को साथ लेकर चल सकती हैअगर पार्टी संगठन मजबूत करती है और अंदरूनी मतभेदों को नियंत्रित करती है तो 2029 में मुकाबला बेहद रोचक हो सकता है।
संघर्ष के बाद फिर अवसर की तलाश
हरियाणा कांग्रेस की कहानी सत्ता, संघर्ष और बदलाव की कहानी है।
1966 से लेकर 2026 तक पार्टी ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं।
बंसीलाल और भजनलाल के दौर में कांग्रेस सत्ता का केंद्र थी।
हुड्डा युग में उसने फिर मजबूत वापसी की।
2014 के बाद भाजपा के उभार ने उसकी राजनीतिक जमीन को चुनौती दी।
हरियाणा कांग्रेस: मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल
कांग्रेस पार्टी ने हरियाणा को कई कद्दावर मुख्यमंत्री दिए हैं, जिनका ब्यौरा निम्नलिखित है:
| मुख्यमंत्री का नाम | कार्यकाल (कब से कब तक) |
| भगवत दयाल शर्मा | 01-11-1966 से 23-03-1967 |
| चौधरी बंसीलाल | 21-05-1968 से 30-11-1975 |
| बनारसी दास गुप्ता | 01-12-1975 से 30-04-1977 |
| चौधरी बंसीलाल | 05-06-1986 से 20-06-1987 |
| भजन लाल | 23-06-1991 से 10-05-1996 |
| भूपेंद्र सिंह हुड्डा | 05-03-2005 से 25-10-2009 |
| भूपेंद्र सिंह हुड्डा | 25-10-2009 से 26-10-2014 |
हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी: अध्यक्षों की सूची (1966–2026)
संगठन को गति देने में प्रदेश अध्यक्षों की भूमिका निर्णायक रही है:
| क्रम | प्रदेश अध्यक्ष | कार्यकाल |
| 1 | भगवत दयाल शर्मा | 1966 (अगस्त-नवंबर) |
| 2 | राम किशन गुप्ता | 1966–1969 |
| 3 | रामचंद्र मित्तल | 1970–1972 |
| 4 | राव निहाल सिंह | 1972–1977 |
| 5 | रणबीर सिंह हुड्डा | 1977–1978 |
| 6 | सुल्तान सिंह | 1978–1979 |
| 7 | चौधरी दलबीर सिंह | 1979–1980 |
| 8 | सरदार हरपाल सिंह | 1980–1982 |
| 9 | सुल्तान सिंह (दूसरा) | 1982–1985 |
| 10 | चौधरी बीरेंद्र सिंह | 1985–1986 |
| 11 | सरदार हरपाल सिंह (दूसरा) | 1986–1987 |
| 12 | बलबीर पाल शाह | 1987–1989 |
| 13 | शमशेर सिंह सुरजेवाला | 1989–1990 |
| 14 | चौधरी बीरेंद्र सिंह (दूसरा) | 1990–1992 |
| 15 | धर्मपाल सिंह मलिक | 1992–1997 |
| 16 | भूपेंद्र सिंह हुड्डा | 1997–2002 |
| 17 | भजन लाल | 2002–2006 |
| 18 | फूलचंद मुलाना | 2007–2014 |
| 19 | अशोक तंवर | 2014–2019 |
| 20 | कुमारी सैलजा | 2019–2022 |
| 21 | उदय भान | 2022–2025 |
| 22 | राव नरेंद्र सिंह | 2025–वर्तमान |
वर्तमान राजनीतिक स्थिति और चुनौतियाँ
जुलाई 2026 में हरियाणा कांग्रेस एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। नए प्रभारी संजय दत्त की देखरेख में पार्टी संगठन को मजबूत करने और गुटबाजी को दूर करने का प्रयास कर रही है। 8 जुलाई 2026 को चंडीगढ़ में आयोजित जनरल बॉडी बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने भविष्य की रणनीति पर चर्चा की।
पार्टी के सामने 2029 की चुनावी तैयारी के लिए प्रमुख चुनौतियाँ हैं:
एकजुटता: गुटबाजी से ऊपर उठकर साझा नेतृत्व को स्थापित करना।
जमीनी संगठन: बूथ स्तर तक पार्टी की पैठ बनाना।
युवा एजेंडा: रोजगार और आधुनिक विकास के मुद्दों पर भाजपा के खिलाफ आक्रामक विकल्प पेश करना।
हरियाणा कांग्रेस का इतिहास उत्थान और पतन का एक मिला-जुला सफर है। आज भले ही पार्टी विपक्ष में है, लेकिन राज्य की राजनीतिक धुरी आज भी कांग्रेस के इर्द-गिर्द ही घूमती है। यदि पार्टी अपने अनुभवी नेतृत्व और कार्यकर्ताओं की ऊर्जा को एक दिशा में केंद्रित कर ले, तो वह फिर से अपने गौरव को प्राप्त करने में सक्षम है।
- अब 2026 में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल है — क्या वह पुराने गौरव को नए राजनीतिक अंदाज के साथ वापस ला पाएगी?हरियाणा की जनता आने वाले वर्षों में यह तय करेगी कि प्रदेश की राजनीति में अगला अध्याय भाजपा के विस्तार का होगा या कांग्रेस की वापसी का।
अटल हिन्द राजनीतिक विश्लेषण

