राम मंदिर में चंदा और दान की कथित लूट : संघ के ‘चरित्र निर्माण’ की राजनीति कटघरे में है?

अपने आप को चरित्र निर्माण के लिए प्रतिबद्ध कहने वाले हिंदुत्ववादी संगठन और उनका कुनबा राम मंदिर में चली डकैती के प्रसंग को लेकर जबरदस्त दुविधा का शिकार दिख रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सुप्रीमो मोहन भागवत ने जहां ‘राम राम’ कहकर पत्रकारों के सवालों का जवाब देने से इंकार कर दिया, वही दत्तात्रय होसबले को, जो आरएसएस के नंबर दो के नेता हैं, घटना के सार्वजानिक होने के एक माह बाद पहली दफा मुंह खोलते हुए – इस संगठित लूट का उजागर होना ही ‘हिन्दू विरोधी’ और ‘राष्ट्र विरोधी’ ताक़तों की साजिश लग रहा है।
दरअसल हक़ीक़त यही है कि अपनी स्थापना के सौ साल पूरे होने के बाद उसके सामने इतना बड़ा संकट शायद ही कभी खड़ा हुआ हो, क्योंकि जैसे-जैसे जांच का दायरा आगे बढ़ने की सम्भावना दिख रही है, राम मंदिर के संचालन में उजागर होती अपारदर्शिता के पहलू सामने आ रहे हैं और जाहिर है कि फिर यह कहते बचना सम्भव नहीं हो रहा है इस लूट और डकैती के लिए कि डोनेशन की गिनती में लगे कारिंदे ही जिम्मेदार हैं। यह सवाल आम लोग भी पूछ रहे हैं कि कारिंदे वहां कैसे पहुंचे, किसने उन्हें वहां बिठाया और ट्रस्ट के चंद मेंबरों से उनकी नजदीकी के क्या मायने हैं और सबसे बढ़कर लूट के असली मास्टरमाइंड कौन हैं?

संघ : सदी का सबसे बड़ा संकट?
‘मौन एक सच्चा मित्र है, जो कभी विश्वासघात नहीं करता।’ यह नहीं पता कि प्रधानमंत्री ने चीन के महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस ( ईसा पूर्व 551 से ईसा पूर्व 471) की यह सलाह पढ़ी है या नहीं, लेकिन उनके आलोचकों का कहना है कि यह उनकी शासन-कला का एक प्रमुख हिस्सा है।
राम मंदिर में हुई कथित लूट – जहां करोड़ों रुपये का गबन हुआ, और आरोप है कि इसमें मंदिर ट्रस्ट के प्रबंधन से जुड़े लोगों की भूमिका रही – एक और ऐसा अवसर बन गया है, जब उनके मौन की चर्चा हो रही है। यह इसलिए भी अधिक खटकता है, क्योंकि राम मंदिर तीर्थ ट्रस्ट के प्रबंधन में शामिल प्रमुख व्यक्तियों का चयन उनके कार्यालय द्वारा इस आधार पर किया गया था कि वे लंबे समय से हिंदुत्व परिवार का हिस्सा रहे हैं।
विपक्ष की लगातार आवाज उठाने की भूमिका के कारण इस कथित लूट का खुलासा हुआ और अब तक ट्रस्ट की तीन प्रमुख हस्तियों ने इस्तीफा दे दिया है, जबकि अब यह जगजाहिर है कि मुद्दे को उठाने के लिए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और सांसद अखिलेश यादव को किस तरह बदनाम करने की कोशिशें चली।
ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार, इस संस्थान से जुड़े लगभग 50-60 लोग जांच के दायरे में हैं और उनमें से आठ लोगों को कथित भूमिका के लिए गिरफ्तार भी किया जा चुका है। जो बात अब अधिक स्पष्ट होती जा रही है, वह यह है कि गिरफ्तार किए गए अधिकांश लोग इस खेल के छोटे खिलाड़ी हैं और असली मास्टरमाइंडों को छुआ भी नहीं जा रहा है.
व्यापक हिंदुत्व परिवार में शायद ही कोई इसे स्वीकार करने को तैयार हो, लेकिन राष्ट्रीयकृत बैंकों के अधिकारियों की निगरानी और सीसीटीवी कैमरों की पूरी मौजूदगी में राम मंदिर में हुई यह डकैती एक ऐसा अवसर बन गई है, जिसने ‘परिवार’ की भीतर गहरी सड़ांध को उजागर कर दिया है। जो लोग स्वयं को राष्ट्र का चरित्र-निर्माता बताते रहे, वे जनता के सामने बेनकाब हो गए हैं। उनके उपदेशों और व्यवहार के बीच की गहरी खाई अब साफ़ दिखाई देने लगी है।
प्रमुख विश्लेषकों ने सही ही तर्क दिया है कि जैसे महात्मा गांधी की हत्या का मामला व्यापक हिंदुत्व ‘परिवार’ के लिए एक निर्णायक क्षण था, उसी प्रकार यह घटना भी समान महत्व रखती है। इस बार मामला इसलिए भी जटिल हो गया है, क्योंकि ‘परिवार’ के भीतर के मतभेद और आपसी खींचतान — जो सामान्यतः छिपी रहती है — इस बार खुलकर सामने भी आती दिख रही है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ही उदाहरण लें। रिपोर्टों के अनुसार, वे स्वयं को इस बात से उपेक्षित महसूस कर रहे थे कि ट्रस्ट के संचालन से उन्हें बाहर रखा गया और ट्रस्ट की संरचना एवं गठन का पूरा अधिकार केंद्र के पास रहा। उनके लिए दान और निधियों के इस कथित गबन का मामला 2027 के चुनावों से ठीक पहले अपनी ‘स्वच्छ छवि’ को और चमकाने का अवसर बन गया है, जिससे संघ और विहिप के कुछ बड़े नेता असहज हैं, क्योंकि लूट की जांच का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
ध्यान रहे कि जहां केंद्र सरकार ने इस घटनाक्रम पर अजीब तरह की चुप्पी बनाए रखी, मानो उम्मीद हो कि समय के साथ मामला शांत हो जाएगा, वहीं उसने इस मामले में सीबीआई जांच कराने की ज़रूरत भी नहीं समझी। दूसरी ओर, इस लूट कांड में हुई गिरफ्तारियां राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने की हैं।
हिंदुत्व के दोहरे मानदंड!
सच्चाई यह है कि राम मंदिर में हुई कथित लूट का खुलासा भाजपा के लिए बेहद असुविधाजनक समय पर हुआ है और इससे उसके दोहरे मापदंड और उजागर हुए हैं।
यह मुद्दा सबरीमाला मामले के तुरंत बाद सुर्खियों में आया, जहां केरल में भाजपा मंदिर के स्वर्ण-लूट मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रही है, जबकि अयोध्या में दान के कथित गबन पर चुप्पी साधे हुए है। दूसरी ओर, इसने फिलहाल विश्व हिंदू परिषद की उस मांग को भी झटका दिया है, जिसमें वह ‘मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त’ करने की बात कर रही थी। यह तर्क दिया जा रहा है कि यदि स्वयं सरकार की निगरानी में भी मंदिर में दान की इतनी संगठित लूट और गबन हो सकता है, तो यदि मंदिरों को निजी संस्थाओं या धार्मिक ट्रस्टों को सौंप दिया जाए, तो वहां होने वाली संभावित लूट की कल्पना करना भी कठिन होगा।
फिलहाल आम जनता राम मंदिर में सामने आयी इस लूट की क्रोनोलोजी से परिचित है, जो हालिया खुलासों के बाद विस्फोटक स्थिति तक पहुंच चुका है।
– वर्ष 2019 : सर्वोच्च न्यायालय ने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले में फैसला सुनाया और केंद्र सरकार को अयोध्या के नियमित प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया।
– प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन।
– अयोध्या से जुड़े भूमि सौदों पर आरोपों की बाढ़।
– आम चुनावों से पहले जनवरी 2024 में प्रधानमंत्री मोदी की मुख्य यजमान की भूमिका में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा।
– सीसीटीवी, राष्ट्रीयकृत बैंकों के अधिकारियों और दान-संग्रह में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए स्वयंसेवकों की एक टीम की नियुक्ति।
– दान और फण्ड के लूट और गबन के आरोप सामने आए, प्रारंभिक स्तर पर मामले को दबाने की कोशिश हुई।
– एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई। मंदिर में धन संग्रह और गिनती से जुड़े कई छोटे कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन ट्रस्ट के किसी भी प्रमुख व्यक्ति को नहीं छुआ गया। आरोप लगे कि इन लोगों को कार्रवाई से बचाने के लिए सुनियोजित प्रयास किए जा रहे हैं। यहां तक कि मीडिया में भी उनके ‘त्याग’ और ‘समर्पण’ की कहानियां प्रचारित की गईं।
सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी राम मंदिर में हुई इस कथित लूट पर अपनी चुप्पी तोड़ेंगे, या मुख्यमंत्री योगी को इस मामले में पूरी स्वतंत्रता दी जाएगी, जिससे हिंदुत्व प्रतिष्ठान के कई शीर्ष लोग असहज स्थिति में आ सकते हैं।
सार्वजनिक बयानों की अपनी जगह है, लेकिन यह कल्पना करना भी कठिन है कि यदि जांच सरकार के ही हाथ में रही, तो कोई व्यापक और निष्पक्ष जांच संभव होगी। न केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकार पूरी सड़ांध को उजागर करना चाहेगी, क्योंकि ऐसी कोई भी जांच भानुमती का पिटारा खोल देगी और स्वयं हिंदुत्व परियोजना के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े कर सकती है।
यह अकारण नहीं कि विपक्ष की तरफ से यह मांग की जा रही है कि आला अदालत की निगरानी में जांच हो। मीडिया के एक हिस्से में यह खबर भी छपी है कि ट्रस्ट ने यह निर्णय लिया कि सीसीटीवी फुटेज डेढ़ मांह के बाद नष्ट किया जायेगा, इसके पीछे क्या तर्क थे? यह जानना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सूत्रों के हवाले से यह ख़बर भी लीक की जा रही है कि ‘उपलब्ध फुटेज’ में अभियुक्त नोटों के बंडल छिपाते दिख रहे हैं और एक तरह से उन तक ही जांच सीमित करने के कोशिश की जा रही है! यह भी तो हो सकता है कि वह किसी ‘अन्य’ के आदेश पर यह बंडल छिपा रहे हों!
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण दशकों से हिंदुत्व राजनीति का केंद्रीय मुद्दा रहा है और इससे उसे भारी राजनीतिक लाभ मिला है और वह फण्ड और डोनेशन की लूट की जांच के नाम पर इस अवसर को दांव पर नहीं लगाएगी। इसलिए संभवतः हम राम मंदिर में हुए इस संगठित लूट के असली मास्टरमाइंडों को कभी नहीं जान पाएंगे।
यह मानना भोलेपन की पराकाष्ठा होगी कि जिन छोटे कर्मचारियों — ड्राइवरों या वरिष्ठ लोगों के सहायकों — को गिरफ्तार किया गया है, उन्होंने ऊपर बैठे लोगों की मिलीभगत के बिना इतने बड़े पैमाने पर धन और दान का गबन कर लिया होगा। वहां के घटनाक्रमों पर नजदीकी नजर डालने से इस दिशा में पर्याप्त संकेत मिलते हैं।
ट्रस्ट की तीन प्रमुख हस्तियों ने इस्तीफा दिया
इस पूरे मामले में कई अन्य बड़े सवाल भी हैं। उदाहरण के लिए, मंदिर उच्च सुरक्षा क्षेत्र में होने के बावजूद, और केंद्र व राज्य सरकार द्वारा उच्च स्तरीय सुरक्षा उपलब्ध कराए जाने के बावजूद, यह भी रिपोर्ट किया गया है कि लगभग 400 सुरक्षा कर्मियों वाली एक निजी सुरक्षा एजेंसी भी तैनात थी, जिसे हिंदुत्व ‘परिवार’ के किसी करीबी व्यक्ति द्वारा संचालित किया जाता था और जिसकी सेवाओं के लिए प्रति माह एक करोड़ रुपये दिए जाते थे। सवाल यह उठता है कि इतने उच्च सुरक्षा क्षेत्र में इस निजी सुरक्षा एजेंसी को क्यों नियुक्त किया गया और इसकी अनुमति किसने दी?
जब तक नीचे से व्यापक जन-दबाव नहीं बनेगा, लूट और डकैती के ये सभी महत्वपूर्ण पहलू दबे रहेंगे। यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस मामले के शुरुआती व्हिसलब्लोअर अब अपनी जान के डर से अचानक चुप हो गए हैं। उदाहरण के लिए, बैंक अधिकारी महिपाल, जिन्होंने इस मुद्दे को उठाया था, अब मीडिया से बात करने को तैयार नहीं हैं।
राजनीतिक विपक्ष ने अब तक इस मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाया है, लेकिन उसे इसे तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने और व्यापक जनमत तैयार करने की रणनीति भी बनानी होगी। यदि सरकार के समर्थक इस मुद्दे को उठाने के लिए विपक्ष को बदनाम करना चाहते हैं, तब भी विपक्ष और प्रत्येक जागरूक नागरिक का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह मंदिर के संचालन में पूर्ण पारदर्शिता की मांग करे और इस कथित लूट के वास्तविक मास्टरमाइंडों को पकड़ने की मांग भी करे।
अब समय आ गया है कि विपक्ष सरकार पर दबाव बनाए कि वह निधियों के कथित गबन पर एक श्वेत पत्र जारी करे और जांच दल की रिपोर्ट सार्वजनिक करे, ताकि वास्तविक तस्वीर सामने आ सके। यदि नागरिक सतर्क नहीं रहे, यदि विपक्ष का दबाव अचानक कम हो गया, तो सत्ता में बैठे लोगों के लिए इस जनाक्रोश को नियंत्रित करना आसान हो जाएगा।
यदि अतीत कोई संकेत देता है, तो यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि यह आक्रोश भी अस्थायी साबित हो सकता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि जब हिंदुत्व स्वयं रक्षात्मक स्थिति में होता है, तब भी वह ऐसे विस्फोटक हालात को कैसे संभालता या नियंत्रित करता है।


‘ना ताला टूटा, ना तिजोरी, फिर भी ढाई करोड़ चोरी!
क्या किसी को आज भी दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में हुई उस कथित ‘चोरी’ की याद है, जिसमें कहा गया था कि लगभग ढाई करोड़ रुपये चोरी हो गए थे?
पत्रकार समुदाय में व्यापक रूप से प्रसारित एक एसएमएस ने इस ‘चोरी’ का मजाक उड़ाते हुए कहा था— ‘ना ताला टूटा, ना तिजोरी, फिर भी भाजपा मुख्यालय से ढाई करोड़ चोरी!’ रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी के ख़ज़ाने से केवल 1000 रुपये के नोट गायब पाए गए थे, जबकि 500 रुपये के नोटों को हाथ भी नहीं लगाया गया था।
बताया गया कि यह चोरी 26 दिसंबर 2008 को उप लेखा अधिकारी नलिन टंडन ने तब पकड़ी, जब क्रिसमस के बाद कार्यालय खुला। रहस्य तब और गहरा गया, जब यह सामने आया कि न तो लेखा कार्यालय के ताले टूटे थे और न ही तिजोरी। कहीं भी जबरन प्रवेश के कोई निशान नहीं थे, जिससे अंदरूनी मिलीभगत की आशंका प्रबल हुई। तब पर्यवेक्षकों को सबसे अधिक आश्चर्य इस बात पर हुआ कि पुलिस और खोजी कुत्तों को बुलाने के बजाय भाजपा — जो उस समय विपक्ष में थी — ने इस मामले की जांच के लिए निजी जासूसों को नियुक्त किया। इस ‘चोरी’ की एक और उल्लेखनीय बात यह थी कि इसकी जानकारी भी पार्टी के भीतर के लोगों ने ही मीडिया को लीक की थी। इस मामले में लोग लगातार पूछते रहे कि यदि वास्तव में इतनी बड़ी राशि गायब हुई थी, तो मुख्य द्वार से नोटों से भरा बैग बाहर ले जाते हुए किसी ने क्यों नहीं देखा?
भाजपा मुख्यालय से इस ‘गायब धन’ के बारे में इसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र में कोई और जानकारी उपलब्ध नहीं हुई। संभव है कि इस ‘गायब धन’ के लिए ज़िम्मेदार लोगों का हृदय परिवर्तन हो गया हो और उन्होंने धन लौटा दिया हो, या फिर यह मामला सुविधाजनक ढंग से भुला दिया गया है।
पार्टी मुख्यालय की इस घटना ने लोगों को उस पुराने प्रकरण की याद भी दिलाई, जब तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण कैमरे पर एक कथित हथियार व्यापारी से नोटों की गड्डियां लेते हुए पकड़े गए थे। उन्हें वहां मौजूद पत्रकार — जो हथियार व्यापारी के एजेंट के रूप में था — से अगली बार डॉलर लाने के लिए कहते हुए भी देखा गया था।
‘तहलका’ के खुलासों के बाद की घटनाओं को दोहराने का कोई अर्थ नहीं है, जिन्होंने यह दिखाया कि रक्षा सौदों का प्रबंधन किस प्रकार किया जाता है। बंगारू लक्ष्मण को तत्काल पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से बाहर कर दिया गया और संघ ने उन्हें ‘असफल स्वयंसेवक’ घोषित कर दिया। तब किसी ने संघ से यह नहीं पूछा कि यह ‘असफल स्वयंसेवक’ उसकी घोषित चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया का परिणाम कैसे बना?
वित्तीय लेन-देन और कथित अनियमितताओं के मामलों में संघ परंपरा में पले-बढ़े लोगों की संलिप्तता कोई दुर्लभ बात नहीं रही है। जहां पूरी दुनिया ने तहलका के स्टिंग ऑपरेशन के कारण बंगारू लक्ष्मण को एक फर्जी हथियार व्यापारी से नोटों की गड्डियां लेते देखा, वहीं उसने यह भी देखा कि इसी तरह के स्टिंग ऑपरेशन के बाद जिन सांसदों को निष्कासित किया गया, उनमें सबसे बड़ा समूह भी संघ पृष्ठभूमि से आने वालों का था।
जो लोग अपने संघीय संस्कारों पर गर्व करते हैं, वे वर्षों तक दलितों के लिए आवंटित जमीन पर कब्जा करने में भी नहीं हिचके। शायद ‘परिवार’ का सबसे उल्लेखनीय उदाहरण उस शीर्ष नेता का है, जिसे भाजपा और संघ के बीच समन्वय का दायित्व दिया गया था। संघ के निकट मानी जाने वाली पत्रकार तवलीन सिंह ने 2003 में इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने लेख ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ में उस नेता के बेटे की पेट्रोल पंप घोटाले में कथित संलिप्तता का विवरण दिया था। दिलचस्प बात यह है कि नेताओं का ‘नैतिक पतन’ भले हाल के वर्षों में चिंता का विषय बना हो, लेकिन इसे कोई नई घटना नहीं कहा जा सकता।
भारतीय जनसंघ के वरिष्ठ नेता बलराज मधोक ने अपनी आत्मकथा ज़िंदगी का सफ़र में वरिष्ठ नेताओं की जीवनशैली और कार्यशैली का विस्तृत वर्णन किया है। तीन भागों में प्रकाशित इस आत्मकथा में उन्होंने यह भी बताया है कि उस समय के शीर्ष संघ नेता गोलवलकर नैतिक पतन से जुड़े मामलों को किस प्रकार देखते थे।
बलराज मधोक लिखते हैं : कुछ समय पहले, जब मैं जनसंघ का अध्यक्ष था, तो केंद्रीय कार्यालय के प्रभारी जगदीश प्रसाद माथुर ने — जो 30, राजेंद्र प्रसाद रोड पर एक वरिष्ठ नेता के साथ रह रहे थे — मुझसे शिकायत की कि उस नेता ने उस घर को अनैतिक गतिविधियों का अड्डा बना दिया है ; वहाँ रोज़ नई लड़कियाँ आती थीं। अब पानी सिर से ऊपर जा चुका था। इसलिए, जनसंघ के एक वरिष्ठ नेता के तौर पर मैंने यह बात आपके ध्यान में लाने की हिम्मत की। मुझे उस नेता के चरित्र के बारे में कुछ जानकारी तो थी, लेकिन हालात इतने बिगड़ चुके हैं, यह मुझे नहीं पता था। (बलराज मधोक, जिंदगी का सफ़र – 3 : दीनदयाल उपाध्याय की हत्या से इंदिरा गांधी की हत्या तक, दिल्ली : दिनमान प्रकाशन, 2003, पृष्ठ 22)
आगे वे बताते हैं कि जब उन्होंने गोलवलकर से इस विषय पर मुलाकात की, तब संघ नेतृत्व उसी नेता को भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष बनाना चाहता था। उस मुलाकात का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं : मेरी बात सुनने के बाद वे कुछ देर चुप रहे और फिर बोले – ‘मैं इन लोगों के चरित्र की कमजोरियों को जानता हूँ। लेकिन मुझे एक संगठन चलाना है। मुझे सबको साथ लेकर चलना है, इसलिए शिव की तरह मैं रोज जहर पीता हूँ।’ (वहीं, पृष्ठ 62)
नैतिकता का गड़बड़झाला
अगर कोई वित्तीय अनियमितता किसी प्रतिष्ठान में या महकमे में सामने आती है और उसका खुलासा होता है, तो जांच शुरू होने के पहले ही यह सुनिश्चित किया जाता है कि संबंधित अधिकारी तथा उसके मातहत सभी लोग कम से कम पदमुक्त कर छुट्टी पर भेज दिए जाएं या निलंबित किये जाए, ताकि निष्पक्ष तरीके से जांच संभव हो। पदासीन अधिकारी अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए जांच को प्रभावित न कर सकें इसके लिए यह अनिवार्य होता है।
जैसा कि दुनिया के सामने है, राम मंदिर में संगठित लूट और डकैती का खुलासा हुआ। यह भी सामने आया कि जिन-जिन लोगों ने मंदिर के लिए पैसे, चांदी की ईंटे या गहने दिए थे, उनका हिसाब तक नहीं मिल रहा है, इसके बावजूद ऐसी न्यूनतम कार्रवाई भी नहीं हुई है। ट्रस्ट के जो पदाधिकारी खुद संदेह के घेरे में है, वह आज भी सभी संचालन अपने हाथ में लिए हैं, उन्होंने भले ही लाज-शरम के मारे पदों से इस्तीफा दिया हो, वह आज भी केंद्र में ही हैं। क्या ऐसी स्थिति में सुनिश्चित किया जा सकता है कि वह तमाम सबूतों को नष्ट नहीं कर रहे हों?
संघ परिवार और उससे जुड़े आनुषंगिक संगठनों को लेकर यह सवाल हमेशा उठता रहा है कि क्या स्थापित नैतिकता की बात उसे अस्वीकार है। सबसे बढ़कर यह उनकी नैतिक समझदारी को बेपर्द करता है और यह महज उस त्रिमूर्ति की बात नहीं है, उन सभी की बात है, जो ट्रस्ट के सदस्य है। ट्रस्ट के ट्रेजरर अर्थात खजांची जिनकी आंखों नीचे यह लूट और डकैती चलती रही, क्या उन्हें यह नैतिक अधिकार है कि वह एक पल के लिए भी अपने पद पर बने रहे!
अग्रणी पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह ने इस पहलू की विस्तार से चर्चा की है और यह स्पष्ट किया है कि संघ के लिए नैतिकता के क्या मायने हैं। उनके निष्कर्षों पर विस्तार से बहस होनी चाहिए और उन्हें आत्मसात किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, ‘संघ परिवार न हिंदू नैतिकता को मानने को तैयार हैं, न संवैधानिक नैतिकता को और अगर कोई भारतीय नैतिकता है, तो उसे वह सर्वाधिक दरकिनार करता है। इसीलिए ख़ुद को समस्त हिंदुओं का रहनुमा और संरक्षक बताने के बावजूद वह ‘उसके’ भव्य और दिव्य राम मंदिर की दानराशि की ईमानदारी से रखवाली नहीं कर पाया।’
(संदर्भ-स्रोत : द वायर, टेलीग्राफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, मिंट, बीबीसी, इंडिया टुडे, इकोनॉमिक टाइम्स)
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, वामपंथी चिंतक, दलित और मानवाधिकार आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता हैं।)

