स्त्री को देह से आगे देखने की जरूरत: एक सशक्त समाज की नींव
डॉ. प्रियंका सौरभ
समाज की असली प्रगति इमारतों, सड़कों या जीडीपी के आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपनी बेटियों, बहनों, माताओं और पत्नियों को किस नजर से देखता है। अगर हम स्त्री को सिर्फ उसके शारीरिक रूप, सौंदर्य या पारंपरिक भूमिकाओं तक सीमित रखते हैं, तो हम समाज का आधा सच ही देख रहे होते हैं।
स्त्री एक मनुष्य है – देह से आगे की पहचान
स्त्री एक मनुष्य है — बुद्धिमान, सृजनशील, संघर्षशील और क्षमतावान। उसे केवल देह के रूप में देखना न सिर्फ अन्याय है, बल्कि पूरे समाज के लिए नुकसानदायक है।
क्यों जरूरी है स्त्री को देह से आगे देखना?
आज की दुनिया में महिलाएँ हर क्षेत्र में कमाल कर रही हैं, फिर भी उनकी उपलब्धियों की तुलना में उनके बाहरी व्यक्तित्व पर ज्यादा चर्चा होती है। सोशल मीडिया, फिल्में और विज्ञापन अक्सर स्त्री को आकर्षण की वस्तु बना देते हैं। नतीजा? उनकी बुद्धि, मेहनत और योगदान पीछे छूट जाता है।
भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर बढ़कर करीब 35-41% तक पहुँच गई है। STEM शिक्षा में लड़कियों की हिस्सेदारी वैश्विक औसत से ज्यादा (लगभग 43%) है। फिर भी कार्यस्थलों और समाज में उन्हें कई पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है।
भारतीय महिलाओं की प्रेरणादायक उपलब्धियाँ

डॉ. टेसी थॉमस – मिसाइल वुमन ऑफ इंडिया
टेसी थॉमस को “मिसाइल वुमन ऑफ इंडिया” कहा जाता है। उन्होंने अग्नि मिसाइल कार्यक्रम में अहम भूमिका निभाई और DRDO में कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व किया।

कल्पना चावला और सुनिता विलियम्स – आकाश को छूने वाली महिलाएँ
कल्पना चावला और सुनिता विलियम्स जैसी महिला अंतरिक्ष यात्री आकाश की सीमाओं को तोड़ चुकी हैं।

अन्य महिला वैज्ञानिक और शिक्षिकाएँ
गगनदीप कांग जैसी वैज्ञानिकों ने माइक्रोबायोलॉजी में विश्व स्तर पर योगदान दिया। हजारों महिला शिक्षिकाएँ आज स्कूलों-कॉलेजों में गणित, विज्ञान और मानव मूल्यों का ज्ञान दे रही हैं।
घरेलू श्रम को भी सम्मान दें
घर संभालना, बच्चों का पालन-पोषण, बुजुर्गों की देखभाल — ये सब अदृश्य लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण श्रम है। अगर यही काम किसी ऑफिस में किया जाए तो उसकी तनख्वाह तय होती है, लेकिन घर में इसे “कर्तव्य” कहकर अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। इस सोच को बदलना जरूरी है।
आज भी बाकी चुनौतियाँ
- सोशल मीडिया पर महिलाओं को अक्सर ऑब्जेक्टिफाई किया जाता है।
- कार्यस्थल पर लैंगिक वेतन अंतर और सुरक्षा की कमी।
- परिवार में बेटियों को कम अवसर और बेटों को ज्यादा स्वतंत्रता।
- मीडिया में प्रेरक महिला कहानियों की कमी।
समाधान: कैसे बदलें यह दृष्टिकोण?
शिक्षा में बदलाव
बचपन से लड़के और लड़कियों दोनों को समानता, सम्मान और संवेदनशीलता सिखाएं। स्कूल के पाठ्यक्रम में महिला वैज्ञानिकों, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की कहानियाँ शामिल करें।
मीडिया की जिम्मेदारी
समाचार चैनल, फिल्में और डिजिटल प्लेटफॉर्म महिलाओं को सशक्त, बुद्धिमान और नेतृत्व करने वाली भूमिकाओं में दिखाएँ। प्रेरणादायक कहानियों को ज्यादा जगह दें।
कार्यस्थल पर समानता
समान वेतन, सुरक्षित वातावरण और प्रमोशन में कोई भेदभाव नहीं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम (33% महिला आरक्षण) जैसे कदमों को प्रभावी बनाएं।
परिवार स्तर पर परिवर्तन
बेटियों को भी सपने देखने और निर्णय लेने का अधिकार दें। बेटों को सिखाएं कि सम्मान और साझेदारी जरूरी है।
सरकारी और सामाजिक प्रयास
बजट 2025-26 में महिला केंद्रित योजनाओं (रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य) को और मजबूत किया गया है। इनका सही क्रियान्वयन जरूरी है।
अंतिम विचार
जो लोग स्त्री को केवल देह तक देखते हैं, वे खुद को अभागा बना रहे हैं। वे स्त्री की संवेदना, बुद्धि, साहस और सृजनशीलता से वंचित रह जाते हैं।
स्त्री को देह से आगे देखना मतलब है — उसे एक पूर्ण मनुष्य के रूप में स्वीकार करना। जब समाज यह कर पाएगा, तभी हम सच्ची प्रगति और समृद्धि की ओर बढ़ सकेंगे।
एक सशक्त, संवेदनशील और समान भारत की कल्पना तभी साकार होगी, जब हम अपनी बेटियों को उनकी पूरी क्षमता के साथ देखेंगे और सम्मान देंगे।
स्त्री शक्ति = राष्ट्र शक्ति
डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।


