दिल्ली के त्रि नगर के निवासी कुछ हिन्दू परिवारों ने पूजा-अर्चना का एक नया तरीका ईजाद किया है। इसका एक लाभ यह है कि इससे उनके मुसलमान पड़ोसी परेशान और दुखी होते हैं।
इस इलाके के कुछ परिवार इन दिनों अपने घरों में सूअरों को पिंजरों में रखते हैं और बाहरी दीवारों पर गहने पहने हुए सूअर जैसे चेहरे वाले देवता के पोस्टर लगाते है। यह मुस्लिम बसाहटों के नजदीक स्थित बस्तियों में हो रहा है। पिंजरों में कैद सूअरों का अब्दुल या रहमान या ऐसा ही कोई नाम रखा जाता है और जब भी कोई मुस्लिम वहां से निकलता है, तो जोर-जोर से उन्हें इन नामों से पुकारा जाता है।
इसके साथ ही रहती है सजी-धजी, आभूषणों से सुसज्जित भगवान वराह की तस्वीर, जिन्हें विष्णु का तीसरा अवतार माना जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि यह चलन एक साल पहले शुरू हुआ। वहीं कुछ कहते हैं कि यह सिलसिला कुछ ही महीनों पुराना है। मुसलमानों की सूअरों के प्रति नापसंदगी जानी-मानी है। जाहिर है कि यह मुसलमानों को भड़काने का एक नया तरीका है। इस तरह की चालें अक्सर समुदायों के बीच नफरत की दीवारें खड़ी करने के लिए चली जाती हैं।
हमें यह पता नहीं है कि किस उर्वर और नफरत से भरे दिमाग ने यह तरकीब खोजी और ना ही हमें यह पता है कि यह सब केवल दिल्ली की एक बस्ती तक सीमित है या और कहीं भी यह हो रहा है। लेकिन इस बात का पूरा-पूरा खतरा है कि समाज को बांटने वाले इस ताजे औजार का नए-नए इलाकों में इस्तेमाल किया जाएगा और यह नफरत और उसके जरिए हिंसा फैलाने वालों के शस्त्रागार में एक नए हथियार के रूप में शामिल हो जाएगा।
9/11 के बाद से इस्लामोफोबिया एक वैश्विक प्रवृत्ति बन गया है। अमेरिकी मीडिया ने इस्लामिक आतंकवाद जैसे जुमले गढ़ कर इसे हवा दी। यह दिलचस्प और आंखें खोलने वाली बात है कि ऐसा ही कुछ न्यूयार्क में मेयर जोहरान ममदानी के घर के सामने हुआ। “पिछले महीने मागा समर्थकों ने ममदानी के दफ्तर के सामने एक सूअर भूना। लेकिन इन घटनाओं के संबंध में सबसे मजेदार बात यह है कि यह नासमझी और गलतफहमी पर आधारित है। हिंदू और ईसाई जितना जी चाहे उतना सूअर का मांस खा सकते हैं और सूअरों को पालतू पशु के रूप में रख सकते हैं – इससे मुसलमानों को कोई परेशानी नहीं होती है।”
पिछले कुछ दशकों से माहौल ख़राब करने के लिए सूअरों का इस्तेमाल कुछ कम हो गया था। गाय मुख्य मुद्दा बनी हुई थी। सूअर का इस्तेमाल साम्प्रदायिक ताकतों ने आजादी की लड़ाई के दौरान किया। उस समय गाय और सुअर दोनों का इस्तेमाल हिंसा भड़काने के लिए बढ़-चढ़कर किया जाता था। हमें गोविंद निहलानी का सीरियल ‘तमस‘ याद है, जो भीष्म साहनी की पुस्तक पर आधारित था। उसमें एक अछूत नाथू को एक मुस्लिम राजनीतिज्ञ कुछ रकम देता है और उसे एक सूअर मारकर एक मस्जिद में फेंकने का काम सौंपता है। इस फिरकापरस्त नेता को पूरा भरोसा रहता है कि इसके नतीजे में हिंसा होगी और उसका सामाजिक-राजनीतिक कद बढ़ेगा।
वर्तमान दौर में ऐसी इक्का-दुक्का घटनाएं होती रहती हैं, जिनमें हिंसा भड़काने के लिए मंदिर में गौमांस रख दिया जाता है। इनमें से ज्यादातर मामलों में आखिर में यह पता लगता कि गोमांस रखने वाले बजरंग दल से जुड़े हुए लोग थे।
“पुलिस ने बजरंग दल के मुरादाबाद जिला अध्यक्ष मोनू विश्नोई सहित चार लोगों को गोवध कर एक मुस्लिम व्यक्ति को इसका दोषी बताकर झूठे मामले फंसाने की कोशिश करने के आरोप में गिरफ्तार किया। उन पर पुलिस के खिलाफ साजिश रचने का भी आरोप लगाया गया।” मवेशी ले जा रहे लोगों पर हमले के दोषी गौरक्षकों के गिरफ्तारी के कई मामले सामने आए हैं। ऐसे गौरक्षक समूहों की एक लंबी श्रृंखला है, जो गोवध का विरोध करने के नाम पर पैसा कमा कर मौज उड़ा रहे हैं।
देश में लिंचिंग की शुरुआत गाय के मुद्दे पर हुई। पिछले 10 सालों से 100 से अधिक लिंचिंग हुई हैं। दादरी में पहलू खान से जुड़ी घटना से शुरू होकर लिंचिंग की घटनाएं भयावह स्तर तक पहुंच गई हैं। ये सारे मामले हृदयविदारक हैं। इनमें से जुनैद का मामला खासतौर से बहुत तकलीफदेह है। 16 साल का जुनैद खान अपने भाई से साथ ट्रेन में जा रहा था। उससे एक बुजुर्ग व्यक्ति को बैठने के लिए सीट देने के लिए कहा गया और उसने तुरंत ऐसा किया। लेकिन इसके बाद करीब 25 लोगों की भीड़ ने उसे घेर कर ‘गौभक्षक‘‘ और ‘‘पाकिस्तानी‘‘ के नारे लगाने शुरू कर दिए। और फिर छुरा घोंपकर जुनैद की हत्या कर दी गई।
इसका सबका सबसे परेशान करने वाला पहलू यह है कि कैसे साम्प्रदायिक ताकतें नफरत फैलाने की नई-नई तरकीबें खोज निकालती हैं, जो बाद में हिंसा का कारण बनती हैं। साम्प्रदायिक राजनीति करने वालों के नफरती भाषणों के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। प्रधानमंत्री से शुरू कर नए-नए नफरती नारे गढ़े जाते हैं और फिर उन्हें हर स्तर पर दोहराया जाता है। मैदानी कार्यकर्ता इन्हें घर-घर तक पहुंचा देते हैं और हिंदुओं और मुसलमानों का जीवन और दूभर, और कष्टपूर्ण बना देते हैं।
उनका पड़ोसियों की तरह रहना बहुत मुश्किल हो जाता है। प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए दो प्रसिद्ध नारे हैं ‘हम पांच हमारे पच्चीस’ और ‘उन्हें उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है‘ । इसी तरह आदित्यनाथ ने नारा दिया था ‘बटेंगे तो कटेगें’।
अकबरुद्दीन ओवैसी जैसे तत्व भी उतनी ही खतरनाक बातें कर रहे हैं। ओवैसी ने कहा था कि यदि 15 मिनट के लिए भी पुलिस को हटा दिया जाए, तो मुसलमान अपनी असली ताकत दिखा देंगे। आदिलाबाद में दिसंबर 2012 में दिए गए एक अत्यंत विवादास्पद भाषण में उन्होंने कहा था कि “यदि पुलिस को 15 मिनट के लिए हटा दिया जाए तो उनका समुदाय (यानि 25 करोड़ मुसलमान) 100 करोड़ हिन्दुओं को अपनी ताकत दिखा देंगे‘‘।
साम्प्रदायिकता की जंग के मैदान में सूअर की एंट्री का सबसे परेशान करने वाला पहलू यह है कि इससे पता चलता है कि विभाजनकारी शक्तियों में नई-नई तरकीबें ईजाद करने की कितनी अधिक क्षमता है। हमारी गंगा-जमुनी तहजीब में विभिन्न समुदायों के बीच जो निकटता थी, वह तेजी से समाप्त हो रही है। सूअर के इस्तेमाल से यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे से पड़ोस में न रह पाएं।
पहले से ही मुसलमानों को अपने मोहल्लों तक सिमटने के लिए मजबूर कर दिया गया है। ऐसे में सोशल इंजीनियरिंग के इस नए अध्याय से हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई और चौड़ी हो जाएगी। इसे तभी रोका जा सकता है, जब हम इसे शुरुआती दौर में ही दफन कर दें और हिन्दुओं द्वारा सूअर पालने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करें।
लोगों को अपने पालतू पशु और देवताओं को चुनने की आजादी है, लेकिन यह आजादी दूसरे समुदाय को अपमानित करने के लिए नहीं है। यहां यह याद दिलाना उचित होगा कि वराह भगवान एक रक्षक की भूमिका निभाने के लिए अवतरित हुए थे। मगर सूअरों को पालतू पशु के रूप में पालने की प्रवृत्ति के विनाशकारी नतीजे होंगे।

आलेख : राम पुनियानी,
(लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं।)
अनुवाद : अमरीश हरदेनिया


